सोनम वांगचुक 9 दिन से भूखे, लिखा 'अभी ज़िंदा हूँ' — मोदी सरकार लद्दाख की एक माँग क्यों नहीं मान रही?
सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल 9वें दिन में है, उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा 'अभी ज़िंदा हूँ'। द हिंदू के अनुसार उनका वज़न 6 किलो गिर चुका है। लद्दाख को छठी अनुसूची में शामिल करने की माँग पर केंद्र सरकार चुप है — इसके पीछे सैन्य-सामरिक हिसाब, चुनावी गणित और प्रशासनिक नियंत्रण की तिकड़ी है।
'अभी ज़िंदा हूँ।' — तीन शब्द, और पूरे देश की नींद उड़ गई। जब कोई आदमी अपनी ज़िंदा होने की ख़बर ख़ुद देने लगे, तो समझ लीजिए कि सिस्टम ने उसे उस मोड़ तक धकेल दिया है जहाँ से वापसी की गारंटी कोई नहीं दे सकता। सोनम वांगचुक — लद्दाख के वो शख़्स जिन्हें बॉलीवुड ने 'थ्री इडियट्स' के फुंगसुक वांगडू के रूप में अमर कर दिया — आज जंतर मंतर पर 9वें दिन की भूख हड़ताल में हैं, और उनका शरीर जवाब दे रहा है।
द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक वांगचुक का वज़न 6 किलोग्राम गिर चुका है। ब्लड शुगर लेवल 61 mg/dL तक लुढ़क गया — जो कि ख़तरनाक हाइपोग्लाइसीमिया की सीमा पर है। टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार वांगचुक ने 7वें दिन सरकार से शिक्षा में जवाबदेही की एक और अपील जारी की थी, और 9वें दिन वो सोशल मीडिया पर सिर्फ़ इतना लिख पाए — 'अभी ज़िंदा हूँ।' यह पोस्ट चिट्ठी नहीं है, यह एक चेतावनी है — सरकार के नाम, देश के नाम।
लेकिन असली सवाल यह नहीं है कि वांगचुक कितने दिन और बर्दाश्त करेंगे। असली सवाल यह है कि आख़िर मोदी सरकार लद्दाख की वो एक माँग क्यों नहीं मान रही, जिसे मानने में कोई संवैधानिक बाधा नहीं है?
छठी अनुसूची — वो माँग जो 2019 से अधर में है
जब अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 हटा और लद्दाख को जम्मू-कश्मीर से अलग करके केंद्रशासित प्रदेश बनाया गया, तो लद्दाख के लोगों ने जश्न मनाया था। उन्हें लगा कि अब विकास सीधे दिल्ली से आएगा, स्वशासन मिलेगा, ज़मीन-नौकरी पर स्थानीय लोगों का हक़ सुरक्षित होगा। लेकिन हुआ उल्टा — विधानसभा नहीं मिली, ज़मीन के अधिकार कमज़ोर हुए, और पहले जो थोड़ा-बहुत स्वायत्त परिषद (LAHDC) के ज़रिए निर्णय लिया जाता था, वो भी LG के हवाले हो गया। छठी अनुसूची में शामिल होने का मतलब है — ज़मीन, संस्कृति और प्रशासन पर जनजातीय स्वशासन की संवैधानिक गारंटी, जैसी मेघालय, मिज़ोरम, त्रिपुरा और असम के कुछ इलाकों को हासिल है। वांगचुक और लद्दाख अपेक्स बॉडी यही माँग रहे हैं — कोई अलगाववाद नहीं, कोई विदेशी साज़िश नहीं, बस संविधान का वो हिस्सा जो पहले से मौजूद है।
सरकार चुप क्यों है — तीन हिसाब जो कोई नहीं बोलता
पहला हिसाब सैन्य-सामरिक है। लद्दाख चीन सीमा पर भारत का सबसे संवेदनशील क्षेत्र है — गलवान, पैंगॉन्ग, देपसांग। सरकार के भीतर एक धारा मानती है कि छठी अनुसूची लागू हुई तो ज़मीन अधिग्रहण के लिए सैन्य ढाँचे को स्थानीय परिषदों से इजाज़त लेनी पड़ेगी, जो सीमा पर तेज़ तैनाती में बाधा बन सकती है। यह तर्क कितना ठोस है, यह बहस का विषय है — क्योंकि पूर्वोत्तर में भी छठी अनुसूची है और वहाँ सेना काम करती है — लेकिन इसे ढाल की तरह इस्तेमाल ज़रूर किया जा रहा है।
दूसरा हिसाब चुनावी है, और इसे ईमानदारी से देखें तो तस्वीर साफ़ होती है। लद्दाख में एक लोकसभा सीट है। 2024 में यह सीट निर्दलीय उम्मीदवार मोहम्मद हनीफ़ा ने BJP से छीनी थी — ख़ासकर इसी स्वशासन मुद्दे पर। अगर छठी अनुसूची मान ली जाए, तो इसका श्रेय आंदोलनकारियों को जाता है, BJP को नहीं। और अगर नहीं मानते, तो 2029 तक यह मुद्दा पकता रहेगा — दोनों तरफ़ नुक़सान ही नुक़सान।
तीसरा हिसाब प्रशासनिक नियंत्रण का है। केंद्रशासित प्रदेश का मतलब है — दिल्ली का सीधा हुक्म। छठी अनुसूची आई तो स्थानीय निकायों के पास असली शक्ति जाएगी, LG की भूमिका सिकुड़ेगी। 2019 में 370 हटाने का पूरा नैरेटिव 'एक देश, एक क़ानून, सीधा केंद्रीय नियंत्रण' पर टिका था — छठी अनुसूची उस नैरेटिव में सुराख़ करती है।
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि सरकार के भीतर भी दो खेमे बन चुके हैं। एक गुट — जिसमें कुछ वरिष्ठ अधिकारी और सत्तारूढ़ गठबंधन के कुछ सहयोगी शामिल बताए जाते हैं — मानता है कि वांगचुक से बात करनी चाहिए, वर्ना मामला अन्ना हज़ारे 2011 जैसा रूप ले सकता है। दूसरा गुट इसे 'ब्लैकमेल' मानता है और कहता है कि एक बार झुके तो हर आंदोलन भूख हड़ताल पर उतरेगा। गृह मंत्रालय ने हाल ही में एक 'अनौपचारिक' बैठक बुलाई — लेकिन 'अनौपचारिक' शब्द ही बता देता है कि सरकार रिकॉर्ड पर कुछ भी कहने को तैयार नहीं।
(यह सियासी गलियारों की चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
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अन्ना से तुलना — कितनी सही, कितनी ग़लत?
2011 में अन्ना हज़ारे जंतर मंतर पर बैठे तो UPA सरकार हिल गई थी। वांगचुक की तुलना अन्ना से होना स्वाभाविक है — दोनों गांधीवादी, दोनों ग़ैर-राजनीतिक, दोनों का मोरल अथॉरिटी ज़बरदस्त। लेकिन एक बुनियादी फ़र्क़ है: अन्ना का लोकपाल आंदोलन दिल्ली के मध्यवर्ग को सीधे छूता था — भ्रष्टाचार हर किसी का मुद्दा था। लद्दाख की छठी अनुसूची भौगोलिक रूप से बहुत सीमित दायरे की माँग है — 2.9 लाख की आबादी। सोशल मीडिया पर हमदर्दी है, लेकिन दिल्ली की सड़कों पर भीड़ नहीं। और यही वो गणित है जिस पर सरकार शायद दांव खेल रही है — कि वांगचुक अकेले थकेंगे और मीडिया का ध्यान हटेगा। सवाल यह है कि अगर वांगचुक की हालत और बिगड़ी — या कुछ अनहोनी हुई — तो क्या यही 2.9 लाख की माँग पूरे देश की अंतरात्मा का मुद्दा बन जाएगी?
कोर्ट, मीडिएशन या चुप्पी — आगे क्या?
इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि सरकार के पास अभी तीन रास्ते हैं, और तीनों में जोखिम है। पहला — सुप्रीम कोर्ट में कोई याचिका पहुँचे और कोर्ट सरकार से जवाब माँगे, जैसा कि किसान आंदोलन में हुआ था। इससे सरकार को बात करने का 'बहाना' मिल जाता है बिना यह दिखाए कि दबाव में झुकी। दूसरा — कोई मध्यस्थता, शायद कोई सम्मानित व्यक्ति जो दोनों पक्षों को बातचीत की मेज़ पर ला सके। तीसरा — और सबसे ख़तरनाक — चुप्पी जारी रखना और उम्मीद करना कि आंदोलन ठंडा पड़ जाएगा। तीसरा रास्ता तभी तक काम करता है जब तक वांगचुक स्वस्थ हैं।
द प्रिंट के मुताबिक CJP कार्यकर्ता तेजस्वी दिपके ने आरोप लगाया कि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग किया — अगर ऐसी और घटनाएँ हुईं तो मीडिया और न्यायपालिका दोनों का ध्यान तेज़ी से बढ़ेगा। आने वाले 72 घंटे इस पूरे संकट का मिज़ाज तय करेंगे।
एक बात तय है — सोनम वांगचुक ने 'अभी ज़िंदा हूँ' लिखकर जो किया है, वो सिर्फ़ स्टेटस अपडेट नहीं है। वो एक शख़्स ने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र से पूछा है — क्या एक आदमी को अपनी जान दांव पर लगानी पड़ेगी ताकि संविधान का एक अध्याय उसके लोगों तक पहुँचे? यह सवाल वांगचुक के उठने या बैठने से नहीं मिटेगा। यह सवाल तब तक ज़िंदा रहेगा जब तक लद्दाख की 2.9 लाख आबादी को जवाब नहीं मिलता।
आरोप यहाँ नामित स्रोतों के हवाले से रिपोर्ट किए गए हैं और जब तक अदालत न कहे, अप्रमाणित हैं; न्यायाधीन मामलों की रिपोर्टिंग बिना पूर्वाग्रह के की गई है।
इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।
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मुख्य बातें
- सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल 9वें दिन में — द हिंदू के अनुसार 6 किलो वज़न गिरा, ब्लड शुगर 61 mg/dL तक पहुँची, हालत गंभीर।
- माँग संविधान की छठी अनुसूची में लद्दाख को शामिल करने की है — जो पूर्वोत्तर के कई राज्यों को पहले से हासिल है, कोई असंवैधानिक माँग नहीं।
- सरकार की चुप्पी के पीछे तीन हिसाब — चीन बॉर्डर पर सैन्य ज़मीन अधिग्रहण की चिंता, 2024 में गँवाई लोकसभा सीट का चुनावी गणित, और केंद्रशासित ढाँचे में सीधे नियंत्रण बनाए रखने की रणनीति।
- गृह मंत्रालय ने 'अनौपचारिक' बैठक बुलाई — 'अनौपचारिक' शब्द ही बताता है कि सरकार रिकॉर्ड पर कुछ कहने को तैयार नहीं।
- आगे तीन रास्ते — सुप्रीम कोर्ट में याचिका, मध्यस्थता, या चुप्पी जारी। अगले 72 घंटे निर्णायक हो सकते हैं।
आँकड़ों में
- सोनम वांगचुक का वज़न 6 किलोग्राम गिरा, ब्लड शुगर 61 mg/dL — द हिंदू
- लद्दाख की कुल आबादी लगभग 2.9 लाख — जो इस माँग के सीमित भौगोलिक दायरे को दर्शाता है
- CJP का विरोध प्रदर्शन जंतर मंतर पर 16वें दिन में — तेलंगाना टुडे
- 2024 लोकसभा चुनाव में लद्दाख की एकमात्र सीट निर्दलीय उम्मीदवार ने BJP से छीनी
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: जलवायु कार्यकर्ता और शिक्षाविद सोनम वांगचुक, जो CJP (कॉन्सर्न्ड जनता पार्टी) प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे हैं — द टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार।
- क्या: लद्दाख को छठी अनुसूची में शामिल करने, राज्य का दर्जा देने और शिक्षा में जवाबदेही की माँग को लेकर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल, जो 9वें दिन में प्रवेश कर चुकी है — द हिंदू के अनुसार।
- कब: भूख हड़ताल जून 2026 में शुरू हुई; 9वें दिन तक वांगचुक की हालत गंभीर बताई जा रही है — टाइम्स ऑफ़ इंडिया।
- कहाँ: नई दिल्ली के जंतर मंतर पर, जहाँ CJP का विरोध प्रदर्शन 16वें दिन में है — तेलंगाना टुडे।
- क्यों: 2019 में लद्दाख को केंद्रशासित प्रदेश बनाते समय जनजातीय अधिकारों और स्वशासन के जो वादे किए गए थे, वे पूरे नहीं हुए — द हिंदू के अनुसार।
- कैसे: वांगचुक ने सोशल मीडिया पर 'अभी ज़िंदा हूँ' पोस्ट करके ध्यान खींचा; CJP कार्यकर्ताओं ने पुलिस द्वारा बल प्रयोग का भी आरोप लगाया — द प्रिंट के अनुसार।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल की मुख्य माँग क्या है?
मुख्य माँग लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने की है, जिससे जनजातीय स्वशासन, ज़मीन के अधिकार और सांस्कृतिक संरक्षण की संवैधानिक गारंटी मिले — जैसी मेघालय, मिज़ोरम और त्रिपुरा को हासिल है। इसके अलावा राज्य का दर्जा और शिक्षा में जवाबदेही भी माँगी जा रही है।
छठी अनुसूची क्या है और लद्दाख को इससे क्या मिलेगा?
छठी अनुसूची भारतीय संविधान का वो प्रावधान है जो जनजातीय इलाकों को स्वायत्त ज़िला परिषदें बनाने का अधिकार देता है — ज़मीन, जंगल, रीति-रिवाज और स्थानीय प्रशासन पर फ़ैसले स्थानीय निकाय लेते हैं। लद्दाख को यह मिले तो वहाँ के लोगों को ज़मीन और नौकरियों पर संवैधानिक सुरक्षा हासिल होगी।
मोदी सरकार लद्दाख की यह माँग क्यों नहीं मान रही?
विश्लेषकों के अनुसार तीन प्रमुख कारण हैं: चीन सीमा पर सैन्य ज़मीन अधिग्रहण में संभावित बाधा, 2024 में लद्दाख लोकसभा सीट गँवाने का चुनावी दंश, और अनुच्छेद 370 हटाने के बाद 'केंद्रीय नियंत्रण' नैरेटिव को बनाए रखने की रणनीति।
सोनम वांगचुक की सेहत कैसी है?
द हिंदू के अनुसार भूख हड़ताल के 8वें दिन तक वांगचुक का वज़न 6 किलोग्राम गिर चुका था। ब्लड शुगर लेवल 61 mg/dL तक पहुँच गया — जो हाइपोग्लाइसीमिया की ख़तरनाक सीमा है।



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