ट्रंप प्रशासन एक तरफ़ रुबियो को दिल्ली भेजकर भारत को 'गहरा साझेदार' बता रहा है, दूसरी तरफ़ पाकिस्तान से सैन्य और कूटनीतिक रिश्ते बहाल कर रहा है। यह वही दोहरा खेल है जो 9/11 के बाद अमेरिका ने खेला और जिसकी कीमत पूरी दुनिया ने चुकाई। मोदी सरकार की चुप्पी रणनीतिक है — घबराहट नहीं।
कूटनीति में एक पुरानी कहावत है — जब कोई देश दोनों गालों पर एक साथ मुस्कुराए, तो समझ लो कि कम-से-कम एक मुस्कुराहट नक़ली है। अमेरिका इन दिनों ठीक यही कर रहा है। मार्को रुबियो दिल्ली में 'अटूट दोस्ती' की क़समें खाकर लौटे नहीं थे कि डोनाल्ड ट्रंप ने इस्लामाबाद की तरफ़ बाँहें फैला दीं — वही इस्लामाबाद जिसकी ज़मीन से ओसामा बिन लादेन निकला, जिसके ISI के रास्ते तालिबान पला-बढ़ा, और जिसने हर अमेरिकी डॉलर को आतंक की खाद में बदलने का कमाल किया।
सवाल सीधा है: क्या ट्रंप 9/11 के बाद की वही ऐतिहासिक भूल दोहरा रहे हैं, या इस बार खेल कुछ और है?
रुबियो की दिल्ली और ट्रंप का इस्लामाबाद — एक ही सिक्के के दो धोखे?
News18 Hindi की विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप प्रशासन ने पाकिस्तान के साथ F-16 लड़ाकू विमानों के रखरखाव और स्पेयर पार्ट्स की आपूर्ति बहाल करने की दिशा में क़दम बढ़ाए हैं। यह वही F-16 हैं जिन्हें पाकिस्तान ने 2019 में बालाकोट के बाद भारत के ख़िलाफ़ इस्तेमाल करने की कोशिश की थी। इसके साथ ही उच्चस्तरीय सैन्य-से-सैन्य संवाद फिर से शुरू किया जा रहा है — ठीक उसी दौर में जब रुबियो दिल्ली में भारत को 'डीप स्ट्रैटेजिक पार्टनर' बता रहे थे।
यह दोहरापन नया नहीं है। 2001 में 9/11 के बाद जॉर्ज बुश ने पाकिस्तान के तत्कालीन तानाशाह परवेज़ मुशर्रफ़ को 'आतंकवाद के ख़िलाफ़ अगली पंक्ति का सिपाही' घोषित किया था। अमेरिका ने अरबों डॉलर की सैन्य सहायता भेजी। नतीजा? वही पैसा और वही हथियार भारत के ख़िलाफ़ आतंकी ढाँचे को मज़बूत करने में लगे। 26/11 का मुंबई हमला उसी 'दोस्ती' की उपज था। रॉयटर्स और अमेरिकी कांग्रेसनल रिसर्च सर्विस की रिपोर्ट्स के अनुसार, 2002 से 2015 के बीच अमेरिका ने पाकिस्तान को लगभग 33 अरब डॉलर की सहायता दी — जिसका एक बड़ा हिस्सा कभी अपने घोषित उद्देश्य तक पहुँचा ही नहीं।
पॉलिटिकल पल्स — परदे के पीछे क्या चल रहा है?
दिल्ली के सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि NSA-स्तर पर इस 'दोहरे खेल' को लेकर गहरी चिंता है। सूत्रों के हवाले से चर्चा है कि भारतीय सुरक्षा प्रतिष्ठान ने ट्रंप प्रशासन को स्पष्ट संदेश दिया है — पाकिस्तान को दी गई हर गोली का हिसाब भारत माँगेगा। लेकिन सार्वजनिक रूप से मोदी सरकार ने चुप्पी साध रखी है।
यह चुप्पी कमज़ोरी नहीं, गणित है। इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि मोदी सरकार जानबूझकर इस मसले पर शोर नहीं मचा रही — क्योंकि शोर मचाने से ट्रंप को एक और 'डील' का बहाना मिल जाएगा। भारत का दांव यह है कि अमेरिका से जो भी लेना है — रक्षा तकनीक, सेमीकंडक्टर साझेदारी, iCET फ़्रेमवर्क — वह चुपचाप लो, और पाकिस्तान को दी जा रही गलबहियों को ट्रंप की 'ट्रांज़ैक्शनल डिप्लोमेसी' की अस्थायी क़ीमत मानो।
लेकिन ट्रेड विश्लेषकों और रणनीतिक हलकों में एक और बात घूम रही है — क्या ट्रंप का पाकिस्तान-प्रेम दरअसल चीन के ख़िलाफ़ है? बीजिंग ने CPEC (चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा) के ज़रिए इस्लामाबाद पर अपनी पकड़ मज़बूत की है। ट्रंप शायद पाकिस्तान को चीन की गोद से खींचकर अपनी बिसात पर रखना चाहते हैं। लेकिन इतिहास गवाह है — पाकिस्तान किसी की गोद में टिकता नहीं, हर गोद को जेब की तरह इस्तेमाल करता है। (यह इंडस्ट्री चर्चा और रणनीतिक अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
9/11 की भूल और 2026 का ख़तरा — फ़र्क़ क्या है?
फ़र्क़ यह है कि 2001 में अमेरिका को पाकिस्तान की 'ज़रूरत' थी अफ़ग़ानिस्तान में ज़मीनी रास्ते के लिए। 2026 में वह ज़रूरत ख़त्म हो चुकी है — अमेरिकी फ़ौज अफ़ग़ानिस्तान से 2021 में निकल चुकी है। तो फिर पाकिस्तान से यह नई मोहब्बत किसलिए? इसका जवाब एक आँकड़े में छुपा है: PTI की रिपोर्ट के मुताबिक़, 2025-26 में पाकिस्तान ने चीन से लगभग 5 अरब डॉलर का नया सैन्य ऋण लिया — ट्रंप प्रशासन के लिए यह ख़तरे की घंटी है।
लेकिन ख़तरा वही पुराना है। जब अमेरिका पाकिस्तान को हथियार देता है, तो वे हथियार सिर्फ़ आतंकवाद के ख़िलाफ़ नहीं चलते — वे कश्मीर की सीमा पर तैनात होते हैं, वे भारतीय वायुसेना के ख़िलाफ़ उड़ान भरते हैं। 33 अरब डॉलर का इतिहास यही बताता है।
मोदी का असली दांव — 'चुनिंदा निर्भरता' से पीछे हटना
सबसे अहम सवाल यह है कि क्या भारत अब अमेरिका पर 'चुनिंदा निर्भरता' की अपनी नीति पर पुनर्विचार करेगा? भारत ने पिछले दशक में अमेरिका से रक्षा ख़रीद को लगभग 20 अरब डॉलर तक पहुँचाया है — SIPRI के आँकड़ों के अनुसार। S-400 पर अमेरिकी दबाव झेलते हुए भी भारत ने रूस से डील पूरी की — यह दिखाता है कि दिल्ली 'सारे अंडे एक टोकरी में' रखने को तैयार नहीं।
आने वाले हफ़्तों में देखने लायक़ यह होगा कि भारत फ़्रांस, इज़राइल और रूस के साथ अपने वैकल्पिक रक्षा गलियारों को कितनी तेज़ी से मज़बूत करता है। अगर ट्रंप का पाकिस्तान-प्रेम 'ट्रांज़ैक्शनल' से आगे बढ़कर 'स्ट्रक्चरल' होता है — यानी स्थायी सैन्य ठिकाने या बड़ी हथियार डील — तो भारत के लिए यह एक रणनीतिक मोड़ होगा।
और अमेरिका के लिए? इतिहास की सबसे महँगी दोस्ती की रसीद अभी भी ग्राउंड ज़ीरो पर पड़ी है। सवाल यह नहीं कि ट्रंप पाकिस्तान से दोस्ती करेंगे या नहीं — सवाल यह है कि इस बार रसीद किसके नाम कटेगी।
रिपोर्ट में उल्लिखित आरोप और चर्चाएँ संबंधित स्रोतों के हवाले से हैं और जब तक न्यायालय या सक्षम प्राधिकरण निर्णय न दे, अप्रमाणित मानी जाएँगी।
इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।
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मुख्य बातें
- ट्रंप प्रशासन ने रुबियो की दिल्ली यात्रा के तुरंत बाद पाकिस्तान से F-16 डील और सैन्य संवाद बहाल किया — यह 9/11 के बाद के दोहरे खेल की गूँज है।
- 2002-2015 के बीच अमेरिका ने पाकिस्तान को लगभग 33 अरब डॉलर दिए — जिसका बड़ा हिस्सा आतंकवाद-रोधी उद्देश्यों तक कभी नहीं पहुँचा।
- मोदी सरकार की चुप्पी रणनीतिक है — अमेरिका से तकनीक और रक्षा साझेदारी चुपचाप लेना, पाकिस्तान-गलबहियों को अस्थायी क़ीमत मानना।
- भारत फ़्रांस, इज़राइल और रूस के साथ वैकल्पिक रक्षा गलियारे मज़बूत कर रहा है — 'सारे अंडे एक टोकरी में' नीति से पीछे हटने के संकेत।
- अगर ट्रंप का पाकिस्तान-प्रेम ट्रांज़ैक्शनल से स्ट्रक्चरल होता है, तो भारत-अमेरिका रिश्तों में रणनीतिक मोड़ आ सकता है।
आँकड़ों में
- अमेरिकी कांग्रेसनल रिसर्च सर्विस के अनुसार, 2002-2015 के बीच अमेरिका ने पाकिस्तान को लगभग 33 अरब डॉलर की सहायता दी।
- SIPRI के आँकड़ों के अनुसार, भारत ने पिछले दशक में अमेरिका से रक्षा ख़रीद लगभग 20 अरब डॉलर तक पहुँचाई।
- PTI के अनुसार, 2025-26 में पाकिस्तान ने चीन से लगभग 5 अरब डॉलर का नया सैन्य ऋण लिया।
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, विदेश मंत्री मार्को रुबियो, पाकिस्तानी सैन्य-राजनीतिक नेतृत्व, और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी।
- क्या: ट्रंप प्रशासन रुबियो की दिल्ली यात्रा के तुरंत बाद पाकिस्तान से सैन्य-कूटनीतिक रिश्ते गर्म कर रहा है — F-16 रखरखाव डील और उच्चस्तरीय संपर्क इसके संकेत हैं।
- कब: 2026 में रुबियो की भारत यात्रा के ठीक बाद यह कूटनीतिक गतिविधि तेज़ हुई।
- कहाँ: वॉशिंगटन, नई दिल्ली और इस्लामाबाद — तीन राजधानियों का त्रिकोण।
- क्यों: ट्रंप को अफ़ग़ानिस्तान-पाकिस्तान क्षेत्र में आतंकवाद-रोधी सहयोग और चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए इस्लामाबाद की ज़रूरत है — भले ही इसकी कीमत भारत का भरोसा हो।
- कैसे: अमेरिका ने पाकिस्तान को F-16 लड़ाकू विमानों के रखरखाव और पुर्ज़ों की आपूर्ति फिर से शुरू करने के संकेत दिए हैं, साथ ही उच्चस्तरीय सैन्य-से-सैन्य संवाद बहाल किया जा रहा है — News18 Hindi की रिपोर्ट के अनुसार।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
ट्रंप पाकिस्तान को गले क्यों लगा रहे हैं?
ट्रंप प्रशासन का मानना है कि चीन ने CPEC के ज़रिए पाकिस्तान पर पकड़ मज़बूत की है। अमेरिका पाकिस्तान को चीन से दूर खींचने और दक्षिण एशिया में अपना प्रभाव बनाए रखने के लिए सैन्य-कूटनीतिक रिश्ते बहाल कर रहा है।
9/11 के बाद अमेरिका ने पाकिस्तान को कितनी सहायता दी थी?
अमेरिकी कांग्रेसनल रिसर्च सर्विस के अनुसार, 2002 से 2015 के बीच अमेरिका ने पाकिस्तान को लगभग 33 अरब डॉलर की सैन्य और आर्थिक सहायता दी — जिसका बड़ा हिस्सा घोषित उद्देश्यों तक नहीं पहुँचा।
भारत पर ट्रंप की पाकिस्तान नीति का क्या असर होगा?
भारत अमेरिका पर 'चुनिंदा निर्भरता' की नीति पर पुनर्विचार कर सकता है। फ़्रांस, इज़राइल और रूस के साथ वैकल्पिक रक्षा गलियारे मज़बूत करने की गति तेज़ होने की संभावना है।
F-16 डील का भारत के लिए क्या मतलब है?
पाकिस्तान ने 2019 में बालाकोट के बाद F-16 का इस्तेमाल भारत के ख़िलाफ़ करने की कोशिश की थी। अमेरिका द्वारा इन विमानों के रखरखाव और पुर्ज़ों की आपूर्ति बहाल करना भारत की सुरक्षा चिंताओं को सीधे बढ़ाता है।




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