सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति ने नागरिक-केंद्रित न्याय व्यवस्था की ज़रूरत पर ज़ोर दिया है। लेकिन हक़ीक़त यह है कि भारत की ज़िला अदालतों में 4.5 करोड़ से अधिक केस पेंडिंग हैं, जिनका बोझ सबसे ज़्यादा हिंदी बेल्ट के उन ग़रीब वादियों पर है जो एक तारीख़ के लिए दिहाड़ी गँवाते हैं।
साढ़े चार करोड़। यह किसी शहर की आबादी नहीं — यह भारत की ज़िला और तहसील अदालतों में लटके केसों की संख्या है, जो NJDG (नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड) के ताज़ा आँकड़ों के मुताबिक़ एक ऐसा पहाड़ बन चुकी है जिसके नीचे दबा आम आदमी साँस तक नहीं ले पा रहा। और ठीक इसी वक़्त, सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति 'नागरिक-केंद्रित न्याय' का सपना सुना रहे हैं।
टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के एक न्यायमूर्ति ने ज़ोर देकर कहा कि भारत की न्याय व्यवस्था को 'सिटिजन-सेंट्रिक' बनाना वक़्त की माँग है — डिजिटल टूल्स, ई-फ़ाइलिंग और वर्चुअल हियरिंग इसकी दिशा तय करेंगे। बात सही है, इरादा नेक है। लेकिन सवाल वहाँ है जहाँ कोई कैमरा नहीं पहुँचता — लखनऊ की बेंच से लेकर पटना की फ़ैमिली कोर्ट और ग्वालियर की तहसील तक।
आँकड़ों का आईना: हिंदी बेल्ट की अदालतें कहाँ खड़ी हैं?
NJDG के ही डेटा के हिसाब से उत्तर प्रदेश अकेला एक करोड़ से ज़्यादा पेंडिंग केसों का बोझ उठा रहा है — देश में सबसे ज़्यादा। बिहार में क़रीब 27 लाख, मध्य प्रदेश में 18 लाख से अधिक और राजस्थान में 16 लाख से ऊपर केस लंबित हैं। इनमें से लाखों केस पाँच साल से पुराने हैं, हज़ारों दस साल से ज़्यादा। यानी एक किसान जिसने ज़मीन विवाद का केस डाला जब उसका बेटा स्कूल में था — आज वह बेटा शादीशुदा है, केस वहीं है।
भारत में प्रति दस लाख आबादी पर क़रीब 21 जज हैं — जबकि विधि आयोग ने कम से कम 50 जज प्रति दस लाख की सिफ़ारिश की थी। यूपी और बिहार जैसे राज्यों में तो यह अनुपात और भी बदतर है। इसका मतलब? एक जज पर सैकड़ों केसों का बोझ, हर सुनवाई में मिनटों का वक़्त, और 'अगली तारीख़' का वह अंतहीन सिलसिला जो वादी की ज़िंदगी चूस लेता है।
ई-कोर्ट का सपना, ज़मीन की हक़ीक़त
सुप्रीम कोर्ट और कुछ हाईकोर्ट में ई-फ़ाइलिंग, लाइव-स्ट्रीमिंग और वर्चुअल सुनवाई ने ज़रूर बदलाव लाया है — यह नकारा नहीं जा सकता। लेकिन ज़िला अदालत स्तर पर हक़ीक़त कुछ और है। कई ज़िला अदालतों में अभी भी टाइपराइटर पर ऑर्डर लिखे जाते हैं। इंटरनेट कनेक्टिविटी का हाल यह है कि तहसील कोर्ट में वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग के बीच कनेक्शन कट जाना आम बात है। जिस देश के गाँवों में 4G भी ठीक से नहीं पहुँचा, वहाँ 'डिजिटल न्याय' एक लग्ज़री है — ज़रूरत नहीं।
और फिर एक ऐसी परत है जिसे कोई सरकारी रिपोर्ट नहीं पकड़ती — अदालत का 'इकोसिस्टम'। जैसे केजरीवाल ने हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में केंद्र का U-turn पकड़ा, वैसे ही आम आदमी को अदालत में हर कदम पर U-turn मिलता है — बस उसकी जेब से। पेशकार की फ़ीस, वकील की हर तारीख़ की रक़म, फ़ोटोकॉपी का ख़र्चा, कोर्ट तक आने-जाने का किराया — एक साधारण ज़मीन विवाद में सालों में लाखों रुपये ख़र्च होना अजीब नहीं, आम है। बिहार के दरभंगा या यूपी के बाराबंकी में एक ग़रीब वादी के लिए कोर्ट जाना मतलब दिहाड़ी गँवाना, और दिहाड़ी गँवाना मतलब परिवार का उस दिन का खाना।
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में जो बात खुलकर कोई नहीं कहता वह यह है — ज्यूडिशियरी में जजों की नियुक्ति और इंफ्रास्ट्रक्चर दोनों केंद्र और राज्य सरकारों की 'प्रायोरिटी लिस्ट' में सबसे नीचे हैं। चुनावी सभाओं में कोई नेता 'ज़िला अदालतों में 5,000 नए जज भरेंगे' का वादा नहीं करता — क्योंकि इसमें वोट नहीं हैं। मुफ़्त बिजली, राशन, लैपटॉप — ये दिखते हैं। पर वह पिता जो बेटी की ज़मीन बचाने के लिए आठ साल से कोर्ट के चक्कर काट रहा है, वह किसी रैली का चेहरा नहीं बनता।
(यह इनसाइडर चर्चा और राजनीतिक हलकों की अपुष्ट टिप्पणियों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
फुसफुसाहट यह भी है कि केंद्र सरकार ई-कोर्ट्स के तीसरे चरण पर हज़ारों करोड़ ख़र्च करने को तैयार है, लेकिन उस पैसे का बड़ा हिस्सा सॉफ़्टवेयर और हार्डवेयर कंपनियों के पास जाएगा — ज़मीन पर जज की कुर्सी ख़ाली रहेगी। कॉलेजियम और सरकार के बीच जजों की नियुक्ति का टकराव तो जगज़ाहिर है — यह गतिरोध सबसे ज़्यादा निचली अदालतों को मारता है, जहाँ रिक्तियाँ 20-25% तक हैं।
इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड: असली गणित कहाँ छिपा है?
जो कोण बाकी मीडिया से छूट रहा है, उसे इंडिया हेराल्ड सीधे सामने रख रहा है — 'नागरिक-केंद्रित' शब्द सुनने में जितना अच्छा लगता है, उतना ही ख़तरनाक इसका चयनात्मक इस्तेमाल है। शीर्ष अदालत का डिजिटल पुश दरअसल एक तरह का 'टॉप-डाउन' सुधार है — जो ऊपर से नीचे की तरफ़ रिसने वाला है। लेकिन भारत की न्याय व्यवस्था की बीमारी 'बॉटम-अप' है। समस्या नीचे है — ज़िला, तहसील, ग्राम न्यायालय। और जब तक नीचे का ढाँचा नहीं बदलता, ऊपर से कितना भी चमकदार ऐप बना लो, वह उस किसान के स्मार्टफ़ोन तक नहीं पहुँचेगा जिसके पास डेटा रिचार्ज के पैसे नहीं हैं।
जैसे हाल ही में छत्तीसगढ़ में कोर्ट ने हिंदू प्रार्थना पर सवाल उठाए, वैसे ही बड़े फ़ैसले तो आते हैं — लेकिन उन फ़ैसलों को ज़मीन पर लागू करने वाली मशीनरी ध्वस्त है। टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने ही एक अलग रिपोर्ट में दो नागरिक त्रासदियों ('Two Tales Of Justice') पर लिखा — एक ही तरह की घटना, दो अलग सरकारी प्रतिक्रियाएँ। यह 'नागरिक-केंद्रित' होने का भ्रम बनाम हक़ीक़त है।
आगे क्या? — वह सवाल जो रैलियों में नहीं पूछा जाता
आने वाले महीनों में देखने वाली बात यह होगी कि ई-कोर्ट्स फ़ेज़-III का बजट कहाँ ख़र्च होता है — सॉफ़्टवेयर लाइसेंस में या असली कोर्टरूम बनाने में। अगर 2026 के अंत तक ज़िला स्तर पर जजों की रिक्तियाँ 20% से नीचे नहीं आतीं, तो 'नागरिक-केंद्रित' बयान महज़ एक और सरकारी नारा बनकर रह जाएगा — जैसे 'सबका साथ, सबका विकास' जो चुनावी बैनर से आगे नहीं निकला।
राज्य सरकारों पर दबाव बढ़ सकता है — ख़ासकर यूपी में जहाँ 2027 का चुनाव नज़दीक है और विपक्ष 'न्याय में देरी' को मुद्दा बना सकता है। लेकिन क्या कोई पार्टी इसे सच में एजेंडा बनाएगी, या यह फिर हाशिये पर रहेगा — यह देखना बाक़ी है।
असल सवाल यह नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट क्या कह रहा है — सवाल यह है कि बाराबंकी के उस किसान ने आख़िरी बार कब अपने केस की सुनवाई देखी थी। जब तक वह जवाब नहीं बदलता, 'नागरिक-केंद्रित' सिर्फ़ दो शब्द हैं — दिल्ली के एयरकंडीशंड कोर्टरूम में बोले गए, बिहार की धूप में सुनाई न देने वाले।
आरोप और दावे यहाँ नामित स्रोतों के हवाले से प्रस्तुत हैं और जब तक अदालत ने फ़ैसला नहीं दिया, अप्रमाणित हैं; उप-न्यायिक मामलों की रिपोर्टिंग बिना पूर्वाग्रह के की गई है।
इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।
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मुख्य बातें
- भारत की ज़िला अदालतों में NJDG के अनुसार 4.5 करोड़ से ज़्यादा केस पेंडिंग हैं — अकेले यूपी में 1 करोड़+।
- प्रति दस लाख आबादी पर सिर्फ़ 21 जज हैं, जबकि विधि आयोग ने 50 की सिफ़ारिश की थी — ज़िला स्तर पर रिक्तियाँ 20-25% तक हैं।
- ई-कोर्ट्स और डिजिटल पहल शीर्ष अदालतों तक सीमित हैं; ज़िला-तहसील स्तर पर बुनियादी इंटरनेट और इंफ्रास्ट्रक्चर की भारी कमी है।
- यूपी में 2027 का चुनाव नज़दीक है — 'न्याय में देरी' विपक्ष के लिए मुद्दा बन सकता है, लेकिन ऐतिहासिक रूप से यह चुनावी एजेंडा नहीं बना।
- सुप्रीम कोर्ट का 'टॉप-डाउन' डिजिटल सुधार तब तक बेमानी है जब तक 'बॉटम-अप' — जजों की भर्ती, कोर्टरूम और ज़मीनी ढाँचा — पहले न सुधरे।
आँकड़ों में
- भारत की ज़िला अदालतों में 4.5 करोड़+ केस पेंडिंग (NJDG डेटा)
- उत्तर प्रदेश में अकेले 1 करोड़+ पेंडिंग केस — देश में सबसे ज़्यादा
- भारत में प्रति 10 लाख आबादी पर ~21 जज; विधि आयोग की सिफ़ारिश 50 जज
- ज़िला अदालतों में जजों की रिक्तियाँ 20-25% तक
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति, जिन्होंने नागरिक-केंद्रित न्याय प्रणाली की पैरवी की (टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार)।
- क्या: न्यायमूर्ति ने कहा कि न्याय व्यवस्था को नागरिक-केंद्रित बनाना ज़रूरी है, जबकि देश की ज़िला अदालतों में 4.5 करोड़+ केस लंबित हैं (NJDG डेटा)।
- कब: 2026 में, जब NJDG के ताज़ा आँकड़े पेंडेंसी का रिकॉर्ड दिखा रहे हैं।
- कहाँ: सुप्रीम कोर्ट स्तर पर बयान; प्रभाव यूपी, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान की ज़िला अदालतों में।
- क्यों: क्योंकि डिजिटल और ई-कोर्ट पहल ऊपरी अदालतों तक सीमित हैं, जबकि निचली अदालतों में जजों की भारी कमी, इंफ्रास्ट्रक्चर की दुर्दशा और वकीलों-दलालों की महँगी प्रक्रिया आम आदमी को न्याय से दूर रखती है।
- कैसे: ई-कोर्ट्स, वर्चुअल हियरिंग और डिजिटल फ़ाइलिंग जैसी पहल शीर्ष स्तर पर चल रही हैं, लेकिन ज़िला और तहसील स्तर पर बुनियादी ढाँचे और जजों की नियुक्ति के बिना ये बदलाव ज़मीन तक नहीं पहुँच रहे।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने 'नागरिक-केंद्रित न्याय' के बारे में क्या कहा?
टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति ने कहा कि न्याय व्यवस्था को डिजिटल टूल्स, ई-फ़ाइलिंग और वर्चुअल सुनवाई के ज़रिये नागरिक-केंद्रित बनाना ज़रूरी है।
भारत की ज़िला अदालतों में कितने केस पेंडिंग हैं?
NJDG के आँकड़ों के मुताबिक़ 4.5 करोड़ से अधिक केस ज़िला और तहसील अदालतों में लंबित हैं, जिनमें अकेले यूपी का हिस्सा 1 करोड़+ है।
भारत में जजों की कमी कितनी है?
भारत में प्रति दस लाख आबादी पर लगभग 21 जज हैं, जबकि विधि आयोग ने कम से कम 50 की सिफ़ारिश की है। ज़िला अदालतों में रिक्तियाँ 20-25% तक हैं।
ई-कोर्ट्स से निचली अदालतों को कितना फ़ायदा मिल रहा है?
ई-फ़ाइलिंग और वर्चुअल हियरिंग सुप्रीम कोर्ट और कुछ हाईकोर्ट में प्रभावी हैं, लेकिन ज़िला-तहसील स्तर पर इंटरनेट कनेक्टिविटी और बुनियादी ढाँचे की कमी के कारण ये पहल ज़मीन तक नहीं पहुँच पा रही हैं।




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