बांग्लादेश ने तीस्ता नदी प्रबंधन परियोजना के लिए चीन का समर्थन माँगा है, जो भारत के साथ दशकों पुराने जल-विवाद को नई भू-राजनीतिक धार दे रहा है। यह कदम ढाका की 'चाइना कार्ड' रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसका मकसद नई दिल्ली पर दबाव बनाकर तीस्ता समझौते में रियायतें हासिल करना है।

एक नदी, दो देश, और अब तीसरे खिलाड़ी की एंट्री। तीस्ता — वही नदी जिसके पानी पर भारत और बांग्लादेश पंद्रह साल से बातचीत कर रहे हैं बिना किसी नतीजे के — अब अचानक बीजिंग के कूटनीतिक नक्शे पर चमकने लगी है। और यही वह मोड़ है जहाँ एक 'पानी का झगड़ा' दक्षिण एशिया की सबसे खतरनाक भू-राजनीतिक शतरंज में बदल रहा है।

Telegraph India की रिपोर्ट के अनुसार, बांग्लादेश ने तीस्ता नदी प्रबंधन परियोजना के लिए चीन का समर्थन माँगा है। यह परियोजना बाढ़ नियंत्रण और जल प्रबंधन के नाम पर है, लेकिन इसकी टाइमिंग और संदर्भ कुछ और ही कहानी बयान करते हैं। ढाका यह कदम तब उठा रहा है जब भारत के साथ 2011 से लटका तीस्ता जल-बँटवारा समझौता धूल खा रहा है — एक ऐसा समझौता जो तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के दौर में लगभग हो चुका था, लेकिन पश्चिम बंगाल की तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के विरोध में अटक गया।

सवाल सीधा है: क्या यह सचमुच बाढ़ से बचाव की परियोजना है, या ढाका ने समझ लिया है कि 'ड्रैगन कार्ड' खेलने से दिल्ली की नींद उड़ती है?

तीस्ता का इतिहास — वादे, ठहराव और हताशा

तीस्ता नदी सिक्किम से निकलकर पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी ज़िले से होती हुई बांग्लादेश के रंगपुर डिवीज़न में जाती है। सूखे के मौसम में इसका पानी भारत में ही रुक जाता है — गज़लडोबा बैराज के ज़रिए — और बांग्लादेश के किसानों को प्यासा छोड़ देता है। बरसात में वही नदी बांग्लादेश में भयंकर बाढ़ लाती है। ढाका का कहना हमेशा से रहा है कि भारत पानी रोकता भी है और बाढ़ भेजता भी है।

2011 में भारत-बांग्लादेश के बीच तीस्ता जल-बँटवारे का मसौदा लगभग तैयार हो गया था — भारत 42.5% और बांग्लादेश 37.5% पानी पर सहमत थे। लेकिन ममता बनर्जी ने ढाका यात्रा से ठीक पहले इसे रोक दिया, यह कहते हुए कि उत्तर बंगाल के किसानों का हक़ नहीं छीना जा सकता। तब से लेकर आज तक — पंद्रह साल, दो प्रधानमंत्री, तीन बांग्लादेशी सरकारें बदल गईं — लेकिन तीस्ता पर एक कदम आगे नहीं बढ़ा।

चीन की एंट्री — बाढ़ नियंत्रण या भू-राजनीतिक खेल?

अब ढाका ने बीजिंग का दरवाज़ा खटखटाया है। ऊपरी तौर पर यह एक 'डेवलपमेंट प्रोजेक्ट' है — बाढ़ नियंत्रण, नदी तट प्रबंधन, सिंचाई — लेकिन कूटनीतिक हलकों में इसे कुछ और ही नज़र से देखा जा रहा है।

चीन पहले से बांग्लादेश में गहरे पैठ बना चुका है। पद्मा ब्रिज, कर्णफुली टनल, पायरा बंदरगाह — बीजिंग के बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट ढाका में पहले से चल रहे हैं। बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के तहत चीन ने बांग्लादेश को अरबों डॉलर के लोन दिए हैं। अब अगर तीस्ता पर भी चीन की इंजीनियरिंग और फ़ंडिंग आ जाती है, तो यह भारत के ठीक पेट पर — उत्तर बंगाल और चिकन नेक कॉरिडोर के बग़ल में — बीजिंग की मौजूदगी होगी।

यह कोई मामूली बात नहीं। सिलीगुड़ी कॉरिडोर — जिसे 'चिकन नेक' कहा जाता है — भारत के पूर्वोत्तर को मुख्य भूमि से जोड़ने वाला एकमात्र रास्ता है। यह गलियारा मुश्किल से 22 किलोमीटर चौड़ा है। इसके दोनों तरफ़ नेपाल और बांग्लादेश हैं — और दोनों जगह चीन की आर्थिक उपस्थिति बढ़ रही है।

पॉलिटिकल पल्स

सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि ढाका का यह कदम 'प्रेशर डिप्लोमेसी' का क्लासिक उदाहरण है। कूटनीतिक विश्लेषकों के बीच चर्चा है कि बांग्लादेश की मौजूदा सरकार ने शायद यह गणना कर ली है कि भारत तब तक नहीं हिलेगा जब तक उसे कोई 'विकल्प' न दिखाया जाए। चीन वह विकल्प है — असली हो या दिखावटी, इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता, दबाव बनता है।

विदेश नीति विश्लेषकों का अनुमान है कि ढाका का असली मक़सद तीस्ता पर चीनी बाँध बनवाना नहीं, बल्कि दिल्ली को बातचीत की मेज़ पर वापस लाना है — इस बार अपनी शर्तों पर। जैसे 2014 में श्रीलंका ने हंबनटोटा पर चीन को आमंत्रित किया था और भारत की कूटनीतिक हलचल तेज़ हो गई थी, वैसा ही पैटर्न यहाँ भी दिख रहा है।

(यह इंडस्ट्री चर्चा और कूटनीतिक अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

मोदी सरकार की 'नेबरहुड फर्स्ट' नीति का लिटमस टेस्ट

भारत की विदेश नीति का सबसे बड़ा दावा रहा है — 'नेबरहुड फर्स्ट'। लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त कुछ और कहती है। नेपाल में चीनी रेल प्रोजेक्ट, श्रीलंका में हंबनटोटा, म्यांमार में चीनी गैस पाइपलाइन, मालदीव में बीजिंग की सैन्य-आर्थिक पकड़ — और अब बांग्लादेश में तीस्ता पर चीन। पैटर्न साफ़ है: जहाँ-जहाँ भारत ने देर की, वहाँ-वहाँ चीन ने जगह बना ली।

इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि तीस्ता अब सिर्फ़ जल-विवाद नहीं रही — यह भारत की पूरी पड़ोस नीति का लिटमस टेस्ट बन गई है। अगर दिल्ली इस बार भी पश्चिम बंगाल की राज्य राजनीति में उलझकर ढाका को टालती रही, तो बीजिंग के लिए यह न्योता है — सिर्फ़ तीस्ता पर नहीं, बल्कि हर उस मुद्दे पर जहाँ भारत का कोई पड़ोसी असंतुष्ट है।

आगे क्या — किस ओर मुड़ेगा पासा?

आने वाले हफ़्तों में देखने लायक बातें ये होंगी: क्या भारत का विदेश मंत्रालय इस पर कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया देता है? क्या ममता बनर्जी — जो अब TMC सुप्रीमो और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री दोनों हैं — अपना रुख़ नरम करती हैं? और सबसे अहम: क्या मोदी सरकार पश्चिम बंगाल की राजनीति को दरकिनार करके सीधे ढाका से बात करने का जोखिम उठाएगी?

अगर भारत ने जल्दी नहीं चला, तो 'बाढ़ नियंत्रण' के नाम पर चीनी इंजीनियर तीस्ता के किनारे पर खड़े होंगे — और तब 'नेबरहुड फर्स्ट' सिर्फ़ भाषण का मुहावरा रह जाएगा, नीति का नहीं।

तीस्ता पर पानी बँटा नहीं, लेकिन दक्षिण एशिया का नक्शा बँट रहा है — और इस बार नदी पर ड्रैगन की परछाई है।

इस रिपोर्ट में उल्लिखित आरोप नामित स्रोतों के हवाले से हैं और जब तक अदालत का फ़ैसला न हो, अप्रमाणित हैं; न्यायाधीन मामलों की रिपोर्टिंग बिना पूर्वाग्रह के की गई है।

इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।

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मुख्य बातें

  • बांग्लादेश ने तीस्ता नदी प्रबंधन परियोजना के लिए चीन का समर्थन माँगा है — यह भारत के साथ दशकों पुराने जल-विवाद में एक नया भू-राजनीतिक आयाम है।
  • तीस्ता जल-बँटवारा समझौता 2011 से अटका है — पश्चिम बंगाल की राज्य राजनीति ने केंद्र सरकार के हाथ बाँधे रखे हैं।
  • चीन पहले से BRI के तहत बांग्लादेश में पद्मा ब्रिज, कर्णफुली टनल जैसे बड़े प्रोजेक्ट चला रहा है — तीस्ता पर उसकी मौजूदगी 'चिकन नेक' कॉरिडोर के क़रीब होगी।
  • यह भारत की 'नेबरहुड फर्स्ट' नीति का सबसे बड़ा लिटमस टेस्ट है — जहाँ भारत ने देर की, वहाँ चीन ने जगह बनाई।

आँकड़ों में

  • तीस्ता जल-बँटवारा समझौता 2011 से — यानी 15 साल से — लटका हुआ है।
  • सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) मुश्किल से 22 किलोमीटर चौड़ा है — भारत के पूर्वोत्तर को मुख्य भूमि से जोड़ने वाला एकमात्र रास्ता।
  • 2011 के मसौदे में भारत 42.5% और बांग्लादेश 37.5% जल-हिस्सेदारी पर सहमत थे।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: बांग्लादेश सरकार ने चीन से तीस्ता नदी परियोजना पर समर्थन माँगा है, जिससे भारत सरकार चिंतित है।
  • क्या: तीस्ता नदी के जल प्रबंधन और बाढ़ नियंत्रण परियोजना में चीनी तकनीकी-वित्तीय सहयोग की माँग की गई है।
  • कब: 2026 में यह मामला सामने आया है, जबकि तीस्ता जल-बँटवारा समझौता 2011 से लटका हुआ है।
  • कहाँ: तीस्ता नदी उत्तरी बंगाल (भारत) और बांग्लादेश के रंगपुर डिवीज़न से होकर बहती है।
  • क्यों: भारत के साथ दशकों से तीस्ता जल-बँटवारा अटका है; ढाका चीनी विकल्प दिखाकर नई दिल्ली पर कूटनीतिक दबाव बनाना चाहता है — Telegraph India के अनुसार।
  • कैसे: बांग्लादेश ने चीन से द्विपक्षीय चैनलों के ज़रिए तीस्ता परियोजना पर तकनीकी और वित्तीय समर्थन की बातचीत शुरू की है, जो भारत की 'नेबरहुड फर्स्ट' नीति को सीधी चुनौती है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

तीस्ता नदी विवाद क्या है?

तीस्ता नदी सिक्किम से निकलकर पश्चिम बंगाल से होते हुए बांग्लादेश जाती है। भारत गज़लडोबा बैराज से पानी रोकता है, जिससे बांग्लादेश को सूखे और बाढ़ दोनों की समस्या होती है। 2011 में जल-बँटवारे का मसौदा तैयार हुआ था लेकिन पश्चिम बंगाल के विरोध में अटक गया।

बांग्लादेश ने तीस्ता के लिए चीन का सहारा क्यों लिया?

Telegraph India के अनुसार, बांग्लादेश ने तीस्ता नदी प्रबंधन परियोजना के लिए चीन का समर्थन माँगा है। विश्लेषकों का मानना है कि ढाका का मक़सद 'चाइना कार्ड' दिखाकर भारत पर कूटनीतिक दबाव बनाना और तीस्ता समझौते में रियायतें हासिल करना है।

तीस्ता पर चीन की मौजूदगी भारत के लिए क्यों ख़तरनाक है?

तीस्ता नदी सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) के पास से गुज़रती है — यह मुश्किल से 22 किमी चौड़ा गलियारा भारत के पूर्वोत्तर को मुख्य भूमि से जोड़ता है। यहाँ चीनी इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट भारत की सामरिक सुरक्षा के लिए गंभीर चिंता है।

भारत की नेबरहुड फर्स्ट नीति पर इसका क्या असर पड़ेगा?

जहाँ-जहाँ भारत ने पड़ोसियों की माँगों पर देर की — श्रीलंका, नेपाल, मालदीव — वहाँ चीन ने पैर जमा लिए। तीस्ता इसी पैटर्न की अगली कड़ी है और 'नेबरहुड फर्स्ट' की विश्वसनीयता पर सीधा सवाल खड़ा करती है।

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