लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला मानसून सत्र से पहले TMC और शिवसेना के भीतर चल रहे मर्जर दावों पर फैसला लेने वाले हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार, यह निर्णय तय करेगा कि संसद में किस धड़े को 'असली पार्टी' की मान्यता मिलेगी — जिसका सीधा असर व्हिप, सीटिंग और विपक्ष की ताकत पर पड़ेगा।

कल्पना कीजिए — संसद का मानसून सत्र शुरू होने वाला है, और दो बड़ी पार्टियों के सांसद एक-दूसरे को घूरते हुए उसी बेंच पर बैठे हैं, लेकिन दोनों का दावा है कि 'असली पार्टी' वही हैं। व्हिप कौन जारी करेगा? विपक्ष की गिनती में किसके नंबर जुड़ेंगे? और सबसे बड़ा सवाल — इस झगड़े का फैसला करने वाला शख्स 'न्यूट्रल' है या उसकी अपनी पार्टी लाइन चल रही है?

टाइम्स ऑफ इंडिया की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला मानसून सत्र 2026 से पहले TMC (तृणमूल कांग्रेस) और शिवसेना — दोनों पार्टियों के भीतर लंबित मर्जर दावों पर अपना निर्णय सुनाने वाले हैं। यह कोई रूटीन प्रशासनिक फैसला नहीं — यह 18वीं लोकसभा के बचे कार्यकाल का सबसे बड़ा 'पावर रीसेट बटन' है।

मामला समझिए। संविधान की दसवीं अनुसूची — यानी दल-बदल कानून — कहती है कि अगर किसी पार्टी के दो-तिहाई सांसद किसी दूसरी पार्टी में विलय का फैसला करते हैं, तो उन्हें दल-बदल का दोषी नहीं माना जाएगा। शिवसेना में एकनाथ शिंदे गुट ने और TMC में एक धड़े ने इसी प्रावधान का सहारा लेकर दावा ठोंका है कि 'असली पार्टी' वही हैं, और बाकी लोग अल्पमत में हैं। अब बिरला को तय करना है — गिनती किसके पक्ष में है, और किसे पार्टी की 'आधिकारिक' मान्यता मिलेगी।

शिवसेना का मामला तो अब राजनीतिक लोककथा बन चुका है। 2022 में एकनाथ शिंदे ने उद्धव ठाकरे के खिलाफ बगावत की, बहुमत सांसदों को अपने साथ लिया, और सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई गई। चुनाव आयोग ने 'शिवसेना' नाम और चुनाव चिह्न शिंदे गुट को दे दिया — लेकिन लोकसभा के भीतर 'विलय' का दावा अभी तक अध्यक्ष के पास लंबित है। यानी कोर्ट और चुनाव आयोग ने अपना काम किया, पर संसद के भीतर का 'फाइनल सील' अभी बिरला की कलम से लगना बाकी है।

TMC का मामला अलग रंग का है, पर नस्ल वही। ममता बनर्जी की पार्टी में अभिषेक बनर्जी की बढ़ती ताकत और पार्टी संगठन पर उनकी पकड़ किसी से छिपी नहीं। पार्टी के भीतर जो सांसद NDA की तरफ झुके या जिन्होंने 'विलय' का दावा किया — उनका भविष्य भी बिरला के इसी फैसले से तय होगा। अगर बिरला मर्जर को वैध मानते हैं, तो TMC की लोकसभा में संख्या सिकुड़ जाएगी; अगर खारिज करते हैं, तो दल-बदल का मुकदमा शुरू होगा और उन सांसदों की सदस्यता ख़तरे में आएगी।

पॉलिटिकल पल्स

सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि BJP हाईकमान इस फैसले को लेकर 'बेचैन उत्साह' में है। तर्क सीधा है — अगर TMC और शिवसेना (ठाकरे गुट) दोनों की संसदीय ताकत कम होती है, तो विपक्षी INDIA ब्लॉक का नंबर गेम और कमज़ोर होगा। मानसून सत्र में अविश्वास प्रस्ताव, बजट पर वोटिंग, और किसी भी विवादास्पद बिल पर NDA को आरामदेह बहुमत मिल जाएगा। ट्रेड हलकों में चर्चा है कि बिरला पर दबाव दोनों तरफ से है — एक तरफ संवैधानिक निष्पक्षता की उम्मीद, दूसरी तरफ वह सच्चाई कि अध्यक्ष खुद BJP से आते हैं।

(यह इंडस्ट्री चर्चा और राजनीतिक अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

इस पूरी बिसात के पीछे की असली चाल को इंडिया हेराल्ड ने करीब से देखा है। बिरला का फैसला सिर्फ 'कौन असली पार्टी है' का जवाब नहीं देगा — यह तय करेगा कि मानसून सत्र में विपक्ष की बेंच पर कितनी कुर्सियाँ भरी होंगी और कितनी खाली। व्हिप का अधिकार किसके पास होगा — यह सीधे तौर पर तय करता है कि कोई सांसद वोटिंग में 'आज़ाद' है या 'बंधा हुआ'। अगर शिंदे गुट को शिवसेना की पूरी विरासत मिल जाती है, तो ठाकरे गुट के बचे सांसद या तो NDA में समा जाएँगे या राजनीतिक अनाथ हो जाएँगे। TMC में भी यही दाँव — पार्टी की ताकत जितनी सिकुड़ेगी, ममता बनर्जी का 2029 तक का राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा का रोडमैप उतना धुँधला होगा।

एक और पहलू है जो कोई खुलकर नहीं कह रहा। संविधान की दसवीं अनुसूची में 'मर्जर' का प्रावधान 2003 के 91वें संशोधन से हटाया जा चुका था — लेकिन व्यवहार में कुछ दावे अभी भी पुरानी व्याख्याओं और लंबित मामलों के सहारे चल रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने 2023 के शिवसेना फैसले में अध्यक्ष की भूमिका पर कड़ी टिप्पणी की थी — कहा था कि अध्यक्ष को 'उचित समय' में फैसला करना चाहिए, अनिश्चितकाल तक लटकाना संवैधानिक नैतिकता के खिलाफ है। अब बिरला के लिए यह कसौटी है — देर की तो कोर्ट का हस्तक्षेप, और जल्दबाज़ी की तो राजनीतिक आरोप।

आने वाले दिनों में देखिए — अगर बिरला मर्जर दावे स्वीकार करते हैं, तो विपक्ष सड़क से लेकर कोर्ट तक 'स्पीकर की निष्पक्षता' पर हमला बोलेगा। अगर खारिज करते हैं, तो दल-बदल कानून के तहत सुनवाई शुरू होगी और NDA को सत्र के बीच में ही 'नंबर मैनेजमेंट' का सिरदर्द होगा। दोनों नतीजे मानसून सत्र को तूफानी बनाने की गारंटी हैं।

असली सवाल वही है जो हर बार उठता है जब अध्यक्ष की कुर्सी पर सत्तापक्ष का व्यक्ति बैठा हो — क्या संसदीय लोकतंत्र में 'रेफरी' कभी सच में तटस्थ होता है? बिरला का यह फैसला जवाब नहीं देगा, लेकिन सवाल को इतना तेज़ कर देगा कि अनसुना करना नामुमकिन होगा।

आरोप और दावे संबंधित पक्षों और रिपोर्टों के हवाले से हैं और जब तक न्यायालय/अध्यक्ष का अंतिम निर्णय नहीं आता, अप्रमाणित हैं; विचाराधीन मामलों की रिपोर्टिंग बिना पूर्वाग्रह के की गई है।

इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लिखा गया; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।

More from India Herald

TNCC Chief's Public Assault on DMK's Anitha Radhakrishnan — Is Congress Bargaining for Seats or Is the INDIA Bloc's Tamil Nadu Seam Ripping Open?PoliticsTNCC Chief's Public Assault on DMK's Anitha Radhakrishnan — Is Congress Bargaining for Seats or Is the INDIA Bloc's Tamil Nadu Seam Ripping Open?The Tamil Nadu Congress Committee president has broken coalition protocol to openly slam a senior DMK minister — a calculated escalation tha…Eknath Shinde in Hospital, Fadnavis at the Wheel — Is Mahayuti's Real Power Shift Happening Under Cover of a Fever?PoliticsEknath Shinde in Hospital, Fadnavis at the Wheel — Is Mahayuti's Real Power Shift Happening Under Cover of a Fever?The deputy CM is on a hospital bed in Thane with fever and exhaustion. But what is really exhausting Eknath Shinde — the virus, or the slow …Mamata's Most Loyal Lieutenant Walks — Is Chandrima Bhattacharya's Exit Abhishek's Boldest Power Grab Yet?PoliticsMamata's Most Loyal Lieutenant Walks — Is Chandrima Bhattacharya's Exit Abhishek's Boldest Power Grab Yet?A minister who held Mamata's most sensitive portfolios has quietly walked away from all party positions — and the silence from Abhishek Bane…The Ink Is Barely Dry on Vijay's CM Chair — Is the Perambur Election Petition DMK's First Legal Landmine or a Genuine Democratic Grievance?PoliticsThe Ink Is Barely Dry on Vijay's CM Chair — Is the Perambur Election Petition DMK's First Legal Landmine or a Genuine Democratic Grievance?An election petition in the Madras High Court targets the very constituency that crowned Tamil Nadu's newest Chief Minister. India Herald br…One Arrested MLA, One Explosive Claim, Two Parties Watching — Is Vijay's TVK Running a Silent Poaching Machine on the DMK?PoliticsOne Arrested MLA, One Explosive Claim, Two Parties Watching — Is Vijay's TVK Running a Silent Poaching Machine on the DMK?A DMK heavyweight arrested for remarks against CM Vijay now alleges he was pressured to quit his seat and join TVK — a claim that, if even h…

मुख्य बातें

  • लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला मानसून सत्र 2026 से पहले TMC और शिवसेना दोनों के मर्जर दावों पर फैसला सुनाएँगे — टाइम्स ऑफ इंडिया।
  • यह फैसला तय करेगा कि संसद में किस धड़े को 'असली पार्टी' माना जाए, जिससे व्हिप अधिकार, सीटिंग और विपक्ष की संख्या सीधे प्रभावित होगी।
  • संविधान की दसवीं अनुसूची का मर्जर प्रावधान 2003 में हटाया गया था, लेकिन पुरानी व्याख्याओं के सहारे कुछ दावे अभी भी लंबित हैं।
  • सुप्रीम कोर्ट ने 2023 के शिवसेना फैसले में अध्यक्ष से 'उचित समय' में निर्णय की माँग की थी — बिरला पर अब यह दबाव बढ़ा है।
  • अगर मर्जर मान्य होता है तो विपक्षी INDIA ब्लॉक की लोकसभा ताकत सिकुड़ेगी; खारिज होता है तो दल-बदल सुनवाई शुरू होगी — दोनों नतीजे मानसून सत्र को तूफानी बनाएँगे।

आँकड़ों में

  • संविधान की दसवीं अनुसूची में मर्जर प्रावधान 91वें संशोधन (2003) से हटाया गया, लेकिन कुछ दावे अभी भी पुरानी व्याख्या के सहारे लंबित हैं।
  • शिवसेना विवाद: 2022 में शिंदे गुट ने बहुमत सांसदों के साथ बगावत की; चुनाव आयोग ने नाम और चिह्न शिंदे को दिया, लेकिन लोकसभा के भीतर मर्जर का दावा अध्यक्ष के पास लंबित है।
  • सुप्रीम कोर्ट का 2023 शिवसेना फैसला: अध्यक्ष को 'उचित समय' में निर्णय लेना चाहिए — अनिश्चितकालीन विलंब संवैधानिक नैतिकता के विरुद्ध।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला, TMC (तृणमूल कांग्रेस) के प्रतिद्वंद्वी धड़े, और शिवसेना के शिंदे व ठाकरे गुट — टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार।
  • क्या: TMC और शिवसेना दोनों में 'मर्जर' या 'विलय' के दावों पर अध्यक्ष का फैसला आना है, जो तय करेगा कि संसद में किस धड़े को पार्टी की मान्यता मिलेगी।
  • कब: मानसून सत्र 2026 शुरू होने से पहले — टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार।
  • कहाँ: लोकसभा, नई दिल्ली।
  • क्यों: दोनों पार्टियों में आंतरिक विभाजन के बाद प्रतिद्वंद्वी धड़ों ने दूसरे गुट में विलय का दावा किया है, जिस पर अध्यक्ष को दसवीं अनुसूची और संसदीय नियमों के तहत फैसला लेना है।
  • कैसे: अध्यक्ष संविधान की दसवीं अनुसूची के प्रावधानों और पार्टी विलय के दो-तिहाई बहुमत नियम के आधार पर दावों की जाँच कर निर्णय लेंगे।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

TMC और शिवसेना के मर्जर दावों पर ओम बिरला कब फैसला लेंगे?

टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला मानसून सत्र 2026 शुरू होने से पहले दोनों पार्टियों के मर्जर दावों पर निर्णय सुनाने वाले हैं।

दसवीं अनुसूची में मर्जर का नियम क्या है और क्या यह अभी लागू है?

दसवीं अनुसूची में पहले दो-तिहाई सांसदों के विलय को दल-बदल से छूट मिलती थी, लेकिन 91वें संविधान संशोधन (2003) से यह प्रावधान हटा दिया गया। हालाँकि, कुछ पुराने और लंबित दावे अभी भी अध्यक्ष के समक्ष विचाराधीन हैं।

बिरला के फैसले का मानसून सत्र पर क्या असर पड़ेगा?

अगर मर्जर दावे स्वीकार होते हैं तो विपक्ष की संख्या कम होगी और NDA को बजट व विवादास्पद बिलों पर आरामदेह बहुमत मिलेगा। खारिज होने पर दल-बदल सुनवाई शुरू होगी और सत्र के बीच नंबर गेम बदल सकता है।

More from India Herald

आलिया की 'अल्फा' — Day 1 'दमदार' मगर YRF स्पाई यूनिवर्स को ₹200 करोड़ कहाँ से आएँगे?Moviesआलिया की 'अल्फा' — Day 1 'दमदार' मगर YRF स्पाई यूनिवर्स को ₹200 करोड़ कहाँ से आएँगे?YRF स्पाई यूनिवर्स की पहली फ़ीमेल-लेड फ़िल्म 'अल्फा' का ओपनिंग डे कलेक्शन — 'दमदार' कहने को तो है, लेकिन 'पठान' और 'टाइगर 3' की छाया में यह …रिफाइनरी, चिप प्लांट, मेट्रो — मोदी गुजरात को 'सब कुछ' दे रहे हैं, तो UP-बिहार की बारी कब?Politicsरिफाइनरी, चिप प्लांट, मेट्रो — मोदी गुजरात को 'सब कुछ' दे रहे हैं, तो UP-बिहार की बारी कब?सालाना 5 अरब चिप्स, पेट्रोकेमिकल रिफाइनरी, बुलेट ट्रेन, मेट्रो — पीएम मोदी के गुजरात दौरे का तोहफ़ा-पैकेज देखें तो लगता है कि 'विकास' का एक …पैन-वोटर ID समेत 15 दस्तावेज़ बेकार — हाई कोर्ट ने 'विदेशी' घोषित किया, तो नागरिकता साबित करे कैसे?Politicsपैन-वोटर ID समेत 15 दस्तावेज़ बेकार — हाई कोर्ट ने 'विदेशी' घोषित किया, तो नागरिकता साबित करे कैसे?पैन कार्ड, वोटर ID, राशन कार्ड — 15 सरकारी दस्तावेज़ लेकर कोर्ट गया, फिर भी 'विदेशी'। इंडिया हेराल्ड बता रहा है कि यह फैसला क्यों करोड़ों भा…

Find out more: