दिलजीत दोसांझ अभिनीत 'पंजाब 95' को CBFC की 120 से ज़्यादा कटौतियों और शीर्षक बदलकर 'सतलुज' करने के बाद भारत में चुपचाप रिलीज़ किया गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक जसवंत सिंह खालरा की मानवाधिकार कहानी को काफ़ी हद तक बदला गया है, जिससे सेंसरशिप और कलात्मक स्वतंत्रता पर बहस तेज़ हो गई है।
एक आदमी ने हज़ारों ग़ायब लोगों की कब्रें खोजीं, सच सामने लाया, और फिर ख़ुद ग़ायब कर दिया गया। जसवंत सिंह खालरा की कहानी इतनी ताक़तवर है कि तीन दशक बाद भी उसे परदे पर लाना किसी जंग से कम नहीं। और अब जब वह फ़िल्म आख़िरकार दर्शकों तक पहुँची है, तो सवाल यह नहीं कि वह रिलीज़ हुई या नहीं — सवाल यह है कि जो रिलीज़ हुई, क्या वह वही कहानी है?
'पंजाब 95' — दिलजीत दोसांझ की सबसे एंबीशियस फ़िल्म — अब 'सतलुज' बनकर भारतीय दर्शकों तक पहुँची है। Livemint की रिपोर्ट के मुताबिक CBFC ने इस फ़िल्म में 120 से ज़्यादा कट्स लगाए और शीर्षक से 'पंजाब' शब्द ही हटवा दिया। दिलजीत ने इसे 'मस्ट वॉच' बताया है, लेकिन इंडस्ट्री के भीतर इस 'साइलेंट रिलीज़' पर जो बात हो रही है, वह दिलजीत के ट्वीट से कहीं ज़्यादा दिलचस्प है।
यह फ़िल्म जसवंत सिंह खालरा की ज़िंदगी पर आधारित है — वह पंजाबी मानवाधिकार कार्यकर्ता जिन्होंने 1990 के दशक में पंजाब पुलिस द्वारा हज़ारों सिखों के फ़र्ज़ी एनकाउंटर और गुमनाम अंतिम संस्कार का रिकॉर्ड खोजकर दुनिया के सामने रखा। 1995 में खालरा को अपहरण कर मार दिया गया। उनकी कहानी पंजाब के सबसे काले अध्यायों में से एक का दस्तावेज़ है — और यही वह बिंदु है जहाँ सेंसर बोर्ड की कैंची सबसे ज़्यादा चली।
120+ कट्स — आख़िर काटा क्या गया?
CBFC की कटौतियों का पूरा ब्योरा सार्वजनिक नहीं किया गया है, लेकिन रिपोर्ट्स और इंडस्ट्री सूत्रों के हवाले से जो तस्वीर बनती है वह चौंकाने वाली है। Livemint के अनुसार, फ़िल्म का मूल शीर्षक 'पंजाब 95' बदलकर 'सतलुज' कर दिया गया — यानी फ़िल्म के नाम से ही वह भौगोलिक और राजनीतिक पहचान ग़ायब कर दी गई जो कहानी की रीढ़ थी। 120 से ज़्यादा कटौतियाँ यह बताती हैं कि यह मामूली ट्रिमिंग नहीं थी — यह फ़िल्म की सर्जरी थी। ट्रेड हलकों में चर्चा है कि राजनीतिक संवाद, पुलिस कार्रवाई के दृश्य और कुछ डॉक्यूमेंट्री-स्टाइल सीक्वेंस प्रमुख रूप से प्रभावित हुए।
सवाल सीधा है: जब किसी ऐतिहासिक फ़िल्म से 120 टुकड़े काट दिए जाएँ, तो जो बचता है वह इतिहास है या समझौता?
इनसाइड टॉक
इंडस्ट्री की बात यह है कि 'पंजाब 95' को लेकर CBFC और मेकर्स के बीच सालों तक एक थकाऊ खींचतान चली। सूत्रों का कहना है कि फ़िल्म को कई बार रिवाइज़िंग कमेटी और अपीलेट ट्रिब्यूनल के चक्कर लगाने पड़े। इंडस्ट्री इनसाइडर्स की मानें तो मेकर्स के पास आख़िरकार दो रास्ते बचे थे — या तो सारी शर्तें मानो और फ़िल्म रिलीज़ करो, या अनिश्चितकाल तक शेल्फ़ पर सड़ने दो। उन्होंने पहला रास्ता चुना।
फ़ैन्स और फ़िल्म समीक्षकों के बीच एक और बात ज़ोरों पर है — क्या दिलजीत का 'मस्ट वॉच' कहना फ़िल्म की गुणवत्ता का बयान है, या एक कमर्शियल ज़रूरत? आख़िर इतने सालों के इंतज़ार और प्रोडक्शन ख़र्च के बाद फ़िल्म को किसी न किसी रूप में दर्शकों तक पहुँचना ही था।
(यह इंडस्ट्री चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
दिलजीत दोसांझ — सुपरस्टार की सबसे बड़ी दुविधा
दिलजीत दोसांझ इस दौर में भारत के सबसे बड़े क्रॉसओवर स्टार्स में शुमार हैं — म्यूज़िक, सिनेमा, ग्लोबल टूर, सब जगह छाए हुए। लेकिन 'सतलुज' उनके करियर का वह प्रोजेक्ट है जहाँ स्टारडम और सब्सटेंस का टकराव सबसे तीखा है। Livemint के अनुसार दिलजीत ने ख़ुद इस फ़िल्म को 'ज़रूर देखने लायक' बताया है, जो दिखाता है कि कटौतियों के बावजूद वह फ़िल्म के साथ खड़े हैं — कम से कम सार्वजनिक रूप से।
लेकिन यहाँ इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि दिलजीत की चुप्पी कट्स पर उतनी ही बोलती है जितनी उनकी तारीफ़। एक कलाकार जो अपनी फ़िल्म से 120 टुकड़े कटवाकर रिलीज़ करता है और फिर भी 'मस्ट वॉच' कहता है — वह या तो बचे हुए हिस्से पर पूरा यक़ीन रखता है, या फिर वह जानता है कि सेंसर से लड़ना एक ऐसी जंग है जो भारतीय सिनेमा में कोई नहीं जीतता। शायद दोनों।
CBFC और भारतीय सिनेमा — यह पैटर्न नया नहीं है
'उड़ता पंजाब' (2016) को याद कीजिए — उस वक़्त भी CBFC ने पंजाब शब्द हटाने की माँग की थी और 89 कट्स सुझाए थे। बॉम्बे हाई कोर्ट ने तब हस्तक्षेप किया और फ़िल्म लगभग बिना कट रिलीज़ हुई। लेकिन 'पंजाब 95' के मामले में ऐसा कोई कोर्ट ड्रामा सामने नहीं आया — मतलब या तो मेकर्स ने क़ानूनी लड़ाई का रास्ता नहीं चुना, या उन्होंने माना कि इस बार माहौल अलग है।
यह पैटर्न एक बड़ा सवाल उठाता है: क्या CBFC का काम फ़िल्मों को सर्टिफ़ाई करना है या उन्हें एडिट करना? जब एक सर्टिफ़िकेशन बोर्ड 120+ बदलाव करवाता है, तो वह व्यावहारिक रूप से सह-निर्देशक बन जाता है। और जब शीर्षक से ही राज्य का नाम हटा दिया जाए, तो यह सिर्फ़ सेंसरशिप नहीं — यह कहानी की भौगोलिक पहचान का विलोपन है।
कहाँ देखें 'सतलुज'?
Livemint की रिपोर्ट के अनुसार 'सतलुज' भारत में रिलीज़ हो चुकी है। दर्शक इसे थिएटर्स में या उपलब्ध प्लेटफ़ॉर्म पर देख सकते हैं — हालाँकि ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म या सटीक थिएटर स्क्रीन काउंट की आधिकारिक पुष्टि अभी सामने नहीं आई है। विस्तृत उपलब्धता की जानकारी के लिए आधिकारिक घोषणा का इंतज़ार करें। [EMBED-SUGGESTION:tweet]
आगे क्या देखना है
अगर 'सतलुज' बॉक्स ऑफ़िस या ओटीटी पर अच्छा प्रदर्शन करती है, तो यह एक ख़तरनाक मिसाल बनेगी — कि संवेदनशील कहानियाँ भी बिक सकती हैं, बशर्ते मेकर्स CBFC की हर शर्त मान लें। और अगर यह नहीं चलती, तो अगला फ़िल्मकार जो किसी राजनीतिक रूप से संवेदनशील विषय पर फ़िल्म बनाना चाहेगा, वह दो बार सोचेगा — इसलिए नहीं कि कहानी कमज़ोर है, बल्कि इसलिए कि जो कहानी बनेगी और जो दर्शक देखेगा, उसमें 120 कट्स का फ़ासला होगा।
खालरा ने कहा था — "ग़ायब लोगों की पहचान करना मेरा फ़र्ज़ है।" विडंबना देखिए कि उन्हीं की कहानी बताने वाली फ़िल्म की पहचान ही ग़ायब कर दी गई। पंजाब का नाम हटा दिया, 120 टुकड़े काट दिए — और फिर भी कहा जा रहा है कि कहानी बची है। शायद बची है। लेकिन असली सवाल यह है: जो सच खालरा ने खोदकर निकाला था, क्या उसे सेंसर बोर्ड की कैंची से भी दफ़नाया जा सकता है?
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मुख्य बातें
- CBFC ने 'पंजाब 95' में 120 से ज़्यादा कट्स लगाए और शीर्षक बदलकर 'सतलुज' कर दिया — Livemint की रिपोर्ट के अनुसार।
- दिलजीत दोसांझ ने फ़िल्म को 'मस्ट वॉच' बताया है, लेकिन कटौतियों पर सीधी टिप्पणी से बचे हुए हैं।
- 'उड़ता पंजाब' (2016) में भी CBFC ने 89 कट्स और नाम बदलने की माँग की थी, लेकिन तब कोर्ट ने हस्तक्षेप किया — इस बार ऐसा नहीं हुआ।
- शीर्षक से राज्य का नाम हटाना सिर्फ़ सेंसरशिप नहीं, कहानी की भौगोलिक-राजनीतिक पहचान मिटाना है।
- फ़िल्म की बॉक्स ऑफ़िस सफलता या विफलता भविष्य में संवेदनशील राजनीतिक फ़िल्मों के लिए मिसाल बनेगी।
आँकड़ों में
- CBFC ने 'पंजाब 95' में 120 से अधिक कटौतियाँ कीं — Livemint के अनुसार।
- 'उड़ता पंजाब' (2016) में CBFC ने 89 कट्स सुझाए थे, जिन्हें बॉम्बे हाई कोर्ट ने लगभग पूरी तरह ख़ारिज कर दिया था।







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