India Today की रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान ने लीबिया के दो विरोधी गुटों — त्रिपोली की GNU सरकार और पूर्वी लीबिया की HoR — के बीच गुपचुप मध्यस्थता शुरू की है। विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम इस्लामिक दुनिया में खोई साख से ज़्यादा सैन्य निर्यात और आर्थिक पैकेज हासिल करने की रणनीति है।
एक मुल्क जिसका खुद का सालाना बजट IMF की किश्तों के बिना नहीं चलता, जहाँ रोटी के दाम में पिछले दो सालों में 60 फ़ीसदी से ज़्यादा का उछाल आया है — वह मुल्क अचानक 1,800 किलोमीटर दूर उत्तरी अफ़्रीका में 'शांति दूत' बनकर प्रकट हो गया है। सुनने में अजीब लगता है, लेकिन पाकिस्तान की कूटनीति का इतिहास देखें तो यह उसके लिए नया नहीं है — बस हर बार चोले का रंग बदलता है, भीतर का मकसद वही रहता है।
India Today की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान ने लीबिया के दो प्रमुख विरोधी खेमों — पश्चिमी लीबिया की अंतरराष्ट्रीय रूप से मान्यता प्राप्त Government of National Unity (GNU) और पूर्वी लीबिया की House of Representatives (HoR) तथा उसके सैन्य कमांडर ख़लीफ़ा हफ़्तर — के बीच गुपचुप मध्यस्थता का अभियान शुरू किया है। रिपोर्ट बताती है कि इस्लामाबाद ने दोनों पक्षों से अलग-अलग 'शांत कूटनीति' के ज़रिए संपर्क किया है।
सवाल यह है कि जिस देश की अपनी अर्थव्यवस्था ज़मीन पर है, वह किसी और के घर की आग बुझाने क्यों भाग रहा है? जवाब 'शांति' से कहीं ज़्यादा गहरा और गंदा है।
पाकिस्तान का 'फ़ौज-फ़ॉर-मनी' मॉडल — नया नहीं, बस नया ग्राहक है
पाकिस्तान का मध्यस्थता में उतरना कोई नेक इरादे की उड़ान नहीं है — यह एक आज़माया हुआ बिज़नेस मॉडल है। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात को दशकों से पाकिस्तानी सेना 'सिक्योरिटी गार्ड' की तरह सप्लाई होती रही है। बहरीन में 2011 के विरोध प्रदर्शनों को दबाने में भी पाकिस्तानी सैनिकों की भूमिका की रिपोर्ट्स आती रहीं। यमन संकट में सऊदी गठबंधन की तरफ़ से पाकिस्तान की संसद ने सीधी भागीदारी तो टाली, लेकिन पर्दे के पीछे सैन्य सलाहकारों और हथियार आपूर्ति की चर्चा कभी रुकी नहीं।
लीबिया इस पुराने फ़ॉर्मूले का नया पड़ाव है। गद्दाफ़ी के बाद से लीबिया में तेल संपदा का ठीक से दोहन नहीं हो पा रहा — लीबिया के पास अफ़्रीका का सबसे बड़ा सिद्ध तेल भंडार है, लगभग 48 अरब बैरल। जो भी पक्ष वहाँ स्थिरता लाएगा, उसे तेल ठेकों से लेकर सैन्य हार्डवेयर की आपूर्ति तक के सौदे मिलेंगे। पाकिस्तान का दांव यही है — मध्यस्थता का चोला पहनो, दोनों पक्षों से संबंध बनाओ, और जब शांति का क्रेडिट मिले तो आर्थिक और सैन्य ठेकों की फ़सल काटो।
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि शहबाज़ शरीफ़ सरकार पर पाकिस्तानी फ़ौज का दबाव है कि वह 'डिफ़ेंस एक्सपोर्ट डिप्लोमेसी' को आक्रामक तरीके से आगे बढ़ाए। JF-17 थंडर लड़ाकू विमानों से लेकर Al-Khalid टैंकों तक — पाकिस्तान के रक्षा उत्पादों को नए ख़रीदार चाहिए। लीबिया, जहाँ दोनों पक्षों को हथियारों की भूख है, इस कारोबार के लिए एक 'परफ़ेक्ट मार्केट' है। ट्रेड सर्कल में यह भी चर्चा है कि तुर्किये — जो GNU का प्रमुख समर्थक है — ने पाकिस्तान को इस मध्यस्थता के लिए अनौपचारिक रूप से 'ग्रीन सिग्नल' दिया होगा, क्योंकि अंकारा को एक ऐसे 'मुस्लिम' मध्यस्थ की ज़रूरत है जो पश्चिमी खेमे का न दिखे।
(यह इंडस्ट्री चर्चा और राजनयिक अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
भारत का सीधा जवाब — 'तुलना मत करो'
दिलचस्प बात यह है कि पाकिस्तान ने पश्चिम एशिया में भारत की बढ़ती कूटनीतिक भूमिका से तुलना करते हुए ख़ुद को भी 'मध्यस्थ शक्ति' के रूप में पेश करने की कोशिश की। India Today की एक अलग रिपोर्ट के अनुसार भारत ने इस तुलना को साफ़ तौर पर ख़ारिज कर दिया। भारत का संदेश स्पष्ट था — भारत की मध्यस्थता आर्थिक ताक़त, रणनीतिक स्वायत्तता और दोनों पक्षों के भरोसे पर टिकी है, जबकि पाकिस्तान की कूटनीति अपने ही संकटों से ध्यान भटकाने और डॉलर जुटाने का साधन है।
यह अंतर सिर्फ़ बयानबाज़ी का नहीं है। भारत ने इज़रायल-हमास संघर्ष और रूस-यूक्रेन के बीच बातचीत के दौर में अपनी 'स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी' से जगह बनाई — बिना किसी खेमे में गए। पाकिस्तान का मॉडल इसके ठीक उलटा है: पहले खेमा चुनो, फिर उस खेमे से पैसा लो।
असली सवाल — शांति या 'शॉपिंग लिस्ट'?
इस पूरे खेल को इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि पाकिस्तान की लीबिया मध्यस्थता 'शांति कूटनीति' कम और 'सर्वाइवल इकॉनॉमिक्स' ज़्यादा है। शहबाज़ सरकार को तीन चीज़ें चाहिए: पहला, इस्लामिक दुनिया में प्रासंगिकता जो OIC मंचों पर कश्मीर का मुद्दा उठाने के लिए ज़रूरी है; दूसरा, लीबिया से सैन्य निर्यात के सौदे जो विदेशी मुद्रा लाएँ; और तीसरा, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर 'ज़िम्मेदार राष्ट्र' की छवि जो FATF ग्रे लिस्ट से निकलने के बाद बनाए रखनी है।
लेकिन इतिहास गवाह है कि पाकिस्तान की ऐसी हर 'शांति पहल' का अंत या तो अपनी ही अस्थिरता में दफ़्न होता है या फिर उससे पैदा हुए जिहादी नेटवर्क दुनिया के लिए सिरदर्द बनते हैं। अफ़ग़ानिस्तान इसका सबसे ताज़ा और सबसे दर्दनाक सबूत है।
आने वाले हफ़्तों में देखने लायक़ यह होगा कि क्या पाकिस्तान लीबिया के किसी गुट के साथ कोई औपचारिक रक्षा समझौता करता है — अगर ऐसा होता है तो 'शांति दूत' का नक़ाब उतरते देर नहीं लगेगी। और अगर तुर्किये-रूस की लीबिया में चल रही प्रॉक्सी खींचतान में पाकिस्तान कहीं फँसा, तो यह मध्यस्थता एक नई भू-राजनीतिक उलझन में बदल सकती है।
पाकिस्तान के लिए असली चुनौती यह नहीं कि लीबिया में शांति कैसे लाई जाए — असली चुनौती यह है कि अपने ही लोगों को, जो दो वक़्त की रोटी के लिए तरस रहे हैं, यह कैसे समझाया जाए कि उनका टैक्स का पैसा किसी और के गृहयुद्ध में क्यों लग रहा है। जब तक पाकिस्तान यह सवाल अपने ही नागरिकों से ईमानदारी से नहीं पूछता, 'शांति दूत' का चोला बस वही रहेगा — चोला।
आरोपित तथ्य यहाँ नामित स्रोतों के हवाले से प्रस्तुत हैं और जब तक न्यायालय ने निर्णय न दिया हो, अप्रमाणित हैं; न्यायाधीन मामलों की रिपोर्टिंग बिना पूर्वाग्रह के की गई है।
इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।
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मुख्य बातें
- India Today के अनुसार पाकिस्तान ने लीबिया के दोनों विरोधी गुटों — GNU और HoR — के बीच गुपचुप मध्यस्थता शुरू की है
- पाकिस्तान का 'फ़ौज-फ़ॉर-मनी' मॉडल पुराना है — सऊदी, बहरीन और यमन में पहले भी सैन्य सेवाएँ बेचने का इतिहास रहा है
- लीबिया के पास अफ़्रीका का सबसे बड़ा सिद्ध तेल भंडार (~48 अरब बैरल) है — मध्यस्थ बनकर सैन्य-आर्थिक ठेके हासिल करना पाकिस्तान का असली दांव हो सकता है
- India Today के अनुसार भारत ने पाकिस्तान की मध्यस्थता से अपनी तुलना को साफ़ ख़ारिज किया
- विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम FATF ग्रे लिस्ट से निकलने के बाद 'ज़िम्मेदार राष्ट्र' की छवि बनाए रखने की रणनीति भी है
आँकड़ों में
- लीबिया के पास अफ़्रीका का सबसे बड़ा सिद्ध तेल भंडार — लगभग 48 अरब बैरल
- पाकिस्तान में रोटी/आटे के दामों में पिछले दो सालों में 60% से अधिक उछाल — IMF पर निर्भरता बरक़रार
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: पाकिस्तान की शहबाज़ शरीफ़ सरकार, लीबिया के विरोधी गुट — त्रिपोली स्थित GNU और पूर्वी लीबिया की HoR
- क्या: पाकिस्तान ने लीबिया के गृहयुद्ध जैसे टकराव में गुपचुप मध्यस्थता अभियान शुरू किया है, India Today की रिपोर्ट के अनुसार
- कब: 2026 में यह मध्यस्थता प्रयास सामने आया, रिपोर्ट जून 2026 में प्रकाशित
- कहाँ: लीबिया — त्रिपोली और बेनग़ाज़ी के बीच का विभाजित भूगोल; पाकिस्तान की राजनयिक चैनलों से
- क्यों: इस्लामिक दुनिया में प्रासंगिकता बनाए रखने, संभावित सैन्य-आर्थिक सौदे हासिल करने और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी छवि चमकाने के लिए
- कैसे: पाकिस्तान ने दोनों पक्षों से अलग-अलग संपर्क कर 'शांत कूटनीति' का रास्ता अपनाया है, India Today के अनुसार
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
पाकिस्तान लीबिया में मध्यस्थता क्यों कर रहा है?
India Today की रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान ने लीबिया के दोनों विरोधी गुटों के बीच गुपचुप मध्यस्थता शुरू की है। विश्लेषकों का मानना है कि इसका मक़सद इस्लामिक दुनिया में प्रासंगिकता बनाना, सैन्य निर्यात के लिए नया बाज़ार खोलना और 'ज़िम्मेदार राष्ट्र' की छवि मज़बूत करना है।
भारत ने पाकिस्तान की मध्यस्थता पर क्या कहा?
India Today के अनुसार भारत ने पाकिस्तान की मध्यस्थता से अपनी कूटनीतिक भूमिका की तुलना को साफ़ ख़ारिज किया, यह कहते हुए कि भारत की मध्यस्थता आर्थिक ताक़त और रणनीतिक स्वायत्तता पर आधारित है।
लीबिया में कौन-कौन से गुट लड़ रहे हैं?
लीबिया में दो प्रमुख गुट हैं — पश्चिमी लीबिया की अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त Government of National Unity (GNU) जो त्रिपोली में है, और पूर्वी लीबिया की House of Representatives (HoR) जिसका नेतृत्व सैन्य कमांडर ख़लीफ़ा हफ़्तर करते हैं।
पाकिस्तान ने पहले भी कहाँ-कहाँ सैन्य कूटनीति की है?
पाकिस्तान ने सऊदी अरब और UAE को दशकों तक सैन्य कर्मी भेजे हैं, बहरीन में 2011 के विरोध प्रदर्शनों को दबाने में भूमिका निभाई और यमन संकट में पर्दे के पीछे सैन्य सलाहकार भेजने की चर्चा रही है।




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