कांग्रेस हाईकमान ने अपने मुख्यमंत्रियों को पीएम श्री स्कूल योजना लागू करने से रोक दिया है। द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, पार्टी का तर्क है कि यह योजना 'ब्रांड मोदी' को राज्यों के स्कूलों पर थोपने का ज़रिया है, जबकि भाजपा इसे विकास-विरोधी राजनीति बताती है।

सोचिए — 27,360 करोड़ रुपये की केंद्रीय योजना मेज़ पर रखी है, जिसमें सरकारी स्कूलों को स्मार्ट क्लासरूम, लैब और लाइब्रेरी से लैस करने का वादा है। और कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्री कह रहे हैं — "नहीं चाहिए।" यह कहानी सिर्फ़ शिक्षा नीति की नहीं, भारत की सबसे तीखी राजनीतिक ब्रांड-वॉर की है।

द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक, कांग्रेस हाईकमान ने अपने राज्यों के मुख्यमंत्रियों को साफ़ निर्देश दिए हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फ्लैगशिप 'पीएम श्री' (PM Schools for Rising India) योजना को लागू न किया जाए। कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों ने केंद्र के साथ MoU साइन करने से इनकार कर दिया है — यानी न फंडिंग आएगी, न स्कूल अपग्रेड होंगे।

कांग्रेस का सार्वजनिक तर्क यह है कि पीएम श्री योजना दरअसल NEP 2020 को पिछले दरवाज़े से राज्यों पर थोपने का ज़रिया है। पार्टी के नेताओं का कहना है कि यह योजना राज्यों की शैक्षिक स्वायत्तता को कमज़ोर करती है — NCERT का केंद्रीय पाठ्यक्रम लागू करना, तीन-भाषा फॉर्मूला अपनाना, और स्कूल के गेट पर 'पीएम श्री' का बोर्ड लगाना अनिवार्य शर्तें हैं। कांग्रेस नेतृत्व इसे "शिक्षा का भगवाकरण" बताता है।

लेकिन भाजपा इस इनकार को "बच्चों के भविष्य से खिलवाड़" कहती है। केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के अनुसार, इस योजना के तहत देशभर में 14,500 से अधिक स्कूलों को अपग्रेड किया जाना है, जिसमें 60% फंडिंग केंद्र और 40% राज्य देगा। भाजपा शासित राज्यों — उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात — में योजना तेज़ी से लागू हो रही है।

पॉलिटिकल पल्स

सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि कांग्रेस का असली डर शिक्षा नीति नहीं, बल्कि ब्रांडिंग है। हर पीएम श्री स्कूल के गेट पर प्रधानमंत्री की तस्वीर और योजना का लोगो लगता है — कांग्रेस शासित राज्यों में मोदी का नाम हर सरकारी स्कूल पर चमकता देखना राहुल गांधी और पार्टी के स्थानीय नेताओं के लिए राजनीतिक आत्मघात जैसा है। एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा था कि "हम अपने टैक्सपेयर के पैसे से मोदी का बिलबोर्ड क्यों लगाएँ?" यह चर्चा इंडस्ट्री हलकों में आम है।

(यह इंडस्ट्री चर्चा और राजनीतिक अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

लेकिन इस ब्रांड-वॉर में सबसे बड़ा नुकसान किसका? ज़ाहिर है — उन लाखों बच्चों का जो सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं। ASER 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, ग्रामीण भारत में कक्षा 5 के क़रीब आधे बच्चे कक्षा 2 के स्तर का पाठ नहीं पढ़ सकते। ऐसे में 27,360 करोड़ रुपये की योजना को राजनीतिक अहंकार के चलते ठुकराना — चाहे कारण कुछ भी हो — एक गंभीर नैतिक सवाल खड़ा करता है।

फंडिंग का असली खेल

इस विवाद की एक और परत है जिसे मीडिया अक्सर अनदेखा करता है — केंद्र-राज्य फंडिंग का गणित। पीएम श्री में 60:40 का फॉर्मूला है, यानी राज्यों को भी 40% ख़र्च उठाना है। कांग्रेस शासित राज्य पहले से राजकोषीय दबाव में हैं — कर्नाटक में गारंटी योजनाओं पर भारी ख़र्च, हिमाचल में पुरानी पेंशन बहाली का बोझ। ऐसे में 40% की शर्त राज्यों के लिए आसान नहीं। लेकिन यही 60:40 फॉर्मूला दूसरी केंद्रीय योजनाओं में भी है जिन्हें कांग्रेस राज्य ख़ुशी से लागू कर रहे हैं — तो सिर्फ़ पीएम श्री से परहेज़ क्यों?

इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि कांग्रेस की असली चिंता दोहरी है — पहली, NEP 2020 को स्वीकार करना राजनीतिक रूप से मोदी सरकार की शिक्षा नीति पर मुहर लगाना होगा, जिसका कांग्रेस ने शुरू से विरोध किया है। दूसरी, 2024 लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस ने 'INDIA गठबंधन' की राजनीति में "मोदी के किसी भी ब्रांड को ज़मीन न देना" एक अलिखित नियम बना लिया है। यह रणनीति चुनावी मंचों पर शायद काम करे, लेकिन ज़मीन पर इसकी क़ीमत सरकारी स्कूलों के बच्चे चुका रहे हैं।

आगे क्या होगा?

अगर कांग्रेस का यह वीटो जारी रहता है, तो केंद्र सरकार के पास दो रास्ते हैं — या तो शर्तों में ढील दे (जैसे ब्रांडिंग हटाए), या फिर इसे चुनावी हथियार बनाए और कहे कि "कांग्रेस बच्चों की पढ़ाई रोक रही है।" भाजपा ने दूसरा रास्ता चुना है — केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने पहले ही उन राज्यों की सूची जारी की है जहाँ योजना नहीं लागू हुई, जो सीधे कांग्रेस शासित राज्य हैं। यह सूची 2029 के चुनावी प्रचार में एक तैयार "चार्जशीट" बन सकती है।

दूसरी ओर, कांग्रेस अगर अपनी ज़िद पर अड़ी रहती है तो उसे अपनी वैकल्पिक शिक्षा योजना दिखानी होगी — सिर्फ़ "हमें पीएम श्री नहीं चाहिए" कहना काफ़ी नहीं, "हमारा मॉडल यह है" बताना ज़रूरी है। अभी तक ऐसा कोई ठोस विकल्प सामने नहीं आया है।

अंत में सवाल वही है जो शुरू में था — जब कक्षा 5 का बच्चा कक्षा 2 की किताब नहीं पढ़ पा रहा, तो स्कूल के गेट पर किसका नाम लिखा है, यह इतना अहम क्यों हो गया? शायद इसलिए कि भारतीय राजनीति में बच्चे वोट नहीं देते — लेकिन ब्रांड ज़रूर वोट दिलाते हैं।

आरोप और प्रत्यारोप यहाँ रिपोर्ट किए गए हैं, नामित स्रोतों के हवाले से — जब तक अदालत या जाँच एजेंसी कुछ तय न करे, ये अप्रमाणित आरोप हैं।

इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।

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मुख्य बातें

  • कांग्रेस हाईकमान ने अपने राज्यों के मुख्यमंत्रियों को 27,360 करोड़ रुपये की पीएम श्री स्कूल योजना लागू करने से रोका — द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट
  • कांग्रेस का तर्क: यह NEP 2020 थोपने और 'ब्रांड मोदी' को राज्यों के स्कूलों पर स्थापित करने का ज़रिया है
  • ASER 2024 के अनुसार कक्षा 5 के क़रीब आधे बच्चे कक्षा 2 स्तर का पाठ नहीं पढ़ सकते — ऐसे में योजना रोकना गंभीर सवाल उठाता है
  • भाजपा इसे चुनावी हथियार बना रही है — उन राज्यों की सूची जारी की जहाँ योजना लागू नहीं हुई
  • कांग्रेस ने अभी तक कोई वैकल्पिक शिक्षा मॉडल पेश नहीं किया — सिर्फ़ इनकार काफ़ी नहीं

आँकड़ों में

  • पीएम श्री योजना का कुल बजट 27,360 करोड़ रुपये — केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय
  • 14,500 से अधिक स्कूलों को अपग्रेड करने का लक्ष्य — 60% केंद्र, 40% राज्य फंडिंग
  • ASER 2024: ग्रामीण भारत में कक्षा 5 के क़रीब आधे बच्चे कक्षा 2 का पाठ नहीं पढ़ सकते

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: कांग्रेस हाईकमान और कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्री — कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश, तेलंगाना जैसे राज्य प्रभावित
  • क्या: पीएम श्री (PM Schools for Rising India) योजना को कांग्रेस शासित राज्यों में लागू करने से रोका गया — द न्यू इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार
  • कब: 2026 — योजना 2022 में लॉन्च हुई थी, चार साल बाद भी कांग्रेस राज्यों में अटकी हुई
  • कहाँ: कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश, तेलंगाना समेत कांग्रेस शासित राज्यों में
  • क्यों: कांग्रेस का आरोप है कि योजना केंद्रीय पाठ्यक्रम और NEP 2020 थोपने का माध्यम है; भाजपा का कहना है कि यह विकास-विरोधी राजनीति है
  • कैसे: राज्य सरकारों ने केंद्र के साथ MoU साइन करने से इनकार किया, जिससे फंडिंग और अपग्रेडेशन दोनों रुके

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

पीएम श्री स्कूल योजना क्या है?

यह केंद्र सरकार की 27,360 करोड़ रुपये की योजना है जिसके तहत देशभर में 14,500 से अधिक सरकारी स्कूलों को स्मार्ट क्लासरूम, लैब, लाइब्रेरी और आधुनिक सुविधाओं से अपग्रेड किया जाना है। फंडिंग 60:40 के अनुपात में केंद्र और राज्य के बीच बँटती है।

कांग्रेस ने पीएम श्री योजना का विरोध क्यों किया?

कांग्रेस का कहना है कि यह योजना NEP 2020 को पिछले दरवाज़े से लागू करने और राज्यों की शैक्षिक स्वायत्तता छीनने का ज़रिया है। इसके अलावा, स्कूलों पर 'पीएम श्री' ब्रांडिंग अनिवार्य होने से कांग्रेस इसे मोदी सरकार के प्रचार का माध्यम मानती है।

कौन-कौन से राज्यों ने पीएम श्री योजना नहीं लागू की?

द न्यू इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश और तेलंगाना समेत कांग्रेस शासित राज्यों ने केंद्र के साथ MoU साइन नहीं किया है।

पीएम श्री योजना में राज्यों को कितना ख़र्च उठाना होता है?

60:40 के फॉर्मूले के तहत केंद्र 60% और राज्य 40% फंडिंग देता है। कांग्रेस शासित राज्य पहले से राजकोषीय दबाव में हैं, लेकिन यही फॉर्मूला अन्य केंद्रीय योजनाओं में भी है जिन्हें ये राज्य लागू कर रहे हैं।

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