भारत के प्रमुख महानगरों में कामकाजी महिलाएँ समान योग्यता और अनुभव के बावजूद पुरुषों की तुलना में औसतन 23% कम वेतन पा रही हैं। विश्व आर्थिक मंच और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की रिपोर्ट्स के अनुसार यह अंतर दशकों से बना हुआ है और संरचनात्मक भेदभाव, करियर ब्रेक और बातचीत (नेगोशिएशन) की असमानता इसकी मुख्य वजहें हैं।
एक ही ऑफ़िस, एक ही डेस्क, एक ही डेडलाइन — लेकिन महीने के आख़िर में बैंक अकाउंट में आने वाली रकम अलग। यह किसी फ़िल्म की कहानी नहीं, भारत के हर बड़े शहर की हक़ीक़त है। ताज़ा आँकड़े बताते हैं कि महानगरों में काम करने वाली महिलाएँ अपने पुरुष सहकर्मियों से 23 प्रतिशत कम कमा रही हैं — और यह अंतर कम होने की बजाय, कई सेक्टर्स में बढ़ रहा है।
ज़रा इसे रुपये में समझिए: अगर एक पुरुष कर्मचारी को सालाना 10 लाख रुपये मिलते हैं, तो ठीक उसी काम के लिए उसकी महिला सहकर्मी को सिर्फ़ 7.7 लाख। यानी हर साल 2.3 लाख रुपये का 'जेंडर टैक्स' — जो न कोई सरकार लगाती है, न कोई क़ानून अनुमति देता है, पर व्यवस्था चुपचाप वसूलती रहती है।
विश्व आर्थिक मंच (WEF) की ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2025 के अनुसार आर्थिक भागीदारी और अवसर के मामले में भारत दुनिया के सबसे ख़राब प्रदर्शन करने वाले देशों में शामिल है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के अनुमान बताते हैं कि वैश्विक स्तर पर महिलाएँ पुरुषों के हर एक रुपये के मुकाबले क़रीब 80 पैसे कमाती हैं, लेकिन भारत में यह अनुपात और भी बदतर है — ख़ासतौर पर प्राइवेट सेक्टर में।
इनसाइड टॉक
HR कंसल्टेंट्स और रिक्रूटमेंट प्लेटफ़ॉर्म्स के बीच एक खुला रहस्य है: ज़्यादातर कंपनियाँ नई भर्ती में 'पिछली सैलरी' पूछती हैं। इंडस्ट्री हलकों में चर्चा है कि यह एक तरीक़ा बन गया है जिससे शुरुआती गैप अगली नौकरी में भी ट्रांसफ़र हो जाता है — जैसे एक ज़ंजीर जो कभी टूटती ही नहीं। ट्रेड एनालिस्ट्स का मानना है कि जब तक कंपनियाँ 'सैलरी हिस्ट्री बैन' नहीं अपनाएँगी, यह चक्र चलता रहेगा। फ़ैन्स — यानी इस बहस को फ़ॉलो करने वाली लाखों कामकाजी महिलाएँ — सोशल मीडिया पर लगातार सवाल उठा रही हैं: "बराबर की डिग्री, बराबर का काम, तो सैलरी स्लिप अलग क्यों?"
(यह इंडस्ट्री चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
23% का गणित — कहाँ से आता है यह अंतर?
सतह पर देखें तो लगता है कि शायद महिलाएँ कम अनुभव वाली भूमिकाओं में हैं, इसलिए कम कमाती हैं। लेकिन पीरियोडिक लेबर फ़ोर्स सर्वे (PLFS) और मॉन्स्टर सैलरी इंडेक्स जैसी रिपोर्ट्स कुछ और ही कहानी बयान करती हैं। समान पद, समान अनुभव, समान शहर — इन सब वेरिएबल्स को एडजस्ट करने के बाद भी 10-15% का 'अनएक्सप्लेन्ड गैप' बचता है। यह वह हिस्सा है जिसे किसी तार्किक कारण से नहीं समझाया जा सकता — सिवाय भेदभाव के।
इसकी तीन परतें हैं। पहली: करियर ब्रेक का दंड। मातृत्व अवकाश के बाद लौटने वाली महिलाओं को अक्सर उसी स्तर पर नहीं, बल्कि एक पायदान नीचे रखा जाता है। मॉन्स्टर सैलरी इंडेक्स 2024-25 के अनुसार करियर ब्रेक लेने वाली महिलाओं की सैलरी में औसतन 28% तक की गिरावट दर्ज की गई। दूसरी: नेगोशिएशन गैप। लिंक्डइन की एक स्टडी बताती है कि भारत में सिर्फ़ 30% महिलाएँ सैलरी नेगोशिएट करती हैं, जबकि पुरुषों में यह आँकड़ा 52% है। तीसरी: लीडरशिप पाइपलाइन का टूटना। NSE-लिस्टेड कंपनियों में सीनियर मैनेजमेंट में महिलाओं की हिस्सेदारी अभी भी 20% से कम है — और जहाँ सैलरी सबसे ज़्यादा होती है, वहाँ महिलाएँ सबसे कम हैं।
ग्लोबल तस्वीर में भारत कहाँ?
विश्व आर्थिक मंच की रिपोर्ट के मुताबिक़ मौजूदा रफ़्तार से दुनिया को पूर्ण जेंडर पैरिटी हासिल करने में 134 साल लगेंगे। भारत इस दौड़ में 127वें स्थान पर है — बांग्लादेश और श्रीलंका से भी पीछे। आइसलैंड जैसे देशों ने 'इक्वल पे सर्टिफ़िकेशन' क़ानून लागू किया है, जहाँ कंपनी को साबित करना होता है कि वह बराबर सैलरी दे रही है — भारत में ऐसा कोई बाध्यकारी तंत्र नहीं है।
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इंडिया हेराल्ड का मानना है कि इस आँकड़े की असली ताक़त इसके 'चुप रहने' में है — यह कोई ऐसा संकट नहीं जो सड़कों पर दिखे या हेडलाइन्स बटोरे, बल्कि यह हर महीने, हर सैलरी स्लिप में चुपचाप काम करता रहता है। और ठीक इसीलिए यह सबसे ख़तरनाक है: जो भेदभाव दिखता ही नहीं, उसके ख़िलाफ़ लड़ें कैसे?
आगे क्या — क्या बदलाव की कोई उम्मीद है?
2025-26 में कुछ संकेत उम्मीद जगाते हैं। कई बड़ी IT कंपनियों — इनफ़ोसिस और TCS सहित — ने अपने ESG डिस्क्लोज़र में पे-इक्विटी ऑडिट की बात कही है। कुछ स्टार्टअप्स ने 'सैलरी बैंड ट्रांसपेरेंसी' अपनाई है, जहाँ हर पद की सैलरी रेंज पब्लिक होती है। लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि जब तक केंद्र सरकार 'समान वेतन अधिनियम, 1976' को मज़बूत करके लागू नहीं करती और पे-ऑडिट अनिवार्य नहीं करती, तब तक ये कदम कॉस्मेटिक ही रहेंगे।
एक और बदलाव जो धीरे-धीरे ज़मीन तैयार कर रहा है: सोशल मीडिया पर 'सैलरी ट्रांसपेरेंसी' मूवमेंट। लिंक्डइन और X (ट्विटर) पर हज़ारों महिलाएँ अपनी सैलरी पब्लिक कर रही हैं — और जब आँकड़े सामने आते हैं, तो बहाने टिकते नहीं।
आख़िरी सवाल यह नहीं है कि 23% का गैप कब ख़त्म होगा। असली सवाल यह है: जिस देश में आधी आबादी को 'शक्ति' कहा जाता है, वहाँ यह 'शक्ति' सैलरी स्लिप पर क्यों नहीं दिखती? जब तक हर कंपनी का पे-रजिस्टर पारदर्शी नहीं होता, तब तक हर 'वीमेन एम्पावरमेंट' का नारा एक अधूरा वाक्य बना रहेगा — बिना पूर्णविराम के।
मुख्य बातें
- 23% वेतन अंतर: भारत के बड़े शहरों में महिलाएँ समान काम के लिए पुरुषों से 23% कम कमा रही हैं — समान अनुभव एडजस्ट करने पर भी 10-15% 'अनएक्सप्लेन्ड गैप' बचता है।
- WEF रैंकिंग: विश्व आर्थिक मंच की जेंडर गैप रिपोर्ट में भारत 127वें स्थान पर — बांग्लादेश और श्रीलंका से भी पीछे।
- पूर्ण पैरिटी में 134 साल: मौजूदा रफ़्तार से वैश्विक जेंडर पे पैरिटी हासिल होने में 134 साल और लगेंगे।
मुख्य बातें
- भारत के महानगरों में महिलाओं को समान पद और अनुभव पर भी पुरुषों से 23% कम वेतन — विश्व आर्थिक मंच की रिपोर्ट के अनुसार।
- करियर ब्रेक के बाद लौटने वाली महिलाओं की सैलरी में 28% तक गिरावट — मॉन्स्टर सैलरी इंडेक्स के अनुसार।
- WEF जेंडर गैप रैंकिंग में भारत 127वें स्थान पर; मौजूदा रफ़्तार से पूर्ण पैरिटी में 134 साल लगेंगे।
- सिर्फ़ 30% भारतीय महिलाएँ सैलरी नेगोशिएट करती हैं बनाम 52% पुरुष — लिंक्डइन स्टडी।
- NSE-लिस्टेड कंपनियों में सीनियर मैनेजमेंट में महिलाओं की हिस्सेदारी 20% से कम।
आँकड़ों में
- भारत के बड़े शहरों में जेंडर पे गैप: 23% — विश्व आर्थिक मंच और श्रम सर्वेक्षण रिपोर्ट्स
- करियर ब्रेक के बाद महिलाओं की सैलरी में औसतन 28% गिरावट — मॉन्स्टर सैलरी इंडेक्स 2024-25
- WEF जेंडर गैप इंडेक्स में भारत 146 में से 127वें स्थान पर
- मौजूदा रफ़्तार से वैश्विक जेंडर पे पैरिटी: 134 साल — WEF रिपोर्ट 2025
- भारत में सिर्फ़ 30% महिलाएँ सैलरी नेगोशिएट करती हैं — लिंक्डइन



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