केंद्र सरकार ने मणिपुर में सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशंस (SoO) समझौते की समीक्षा और एक नई पीस कमेटी के गठन का फ़ैसला किया है। The Quint के अनुसार, यह कदम मुख्यमंत्री बीरेन सिंह को बायपास करते हुए सीधे केंद्रीय हस्तक्षेप का संकेत है — जो राज्य सरकार की विफलता की परोक्ष स्वीकृति है।
दो साल, सैकड़ों मौतें, हज़ारों बेघर — और एक मुख्यमंत्री जो अपने ही राज्य में दोनों पक्षों के लिए 'दूसरे पक्ष का आदमी' बन चुका है। मणिपुर की इस त्रासदी में केंद्र सरकार ने अब वह कदम उठाया है जो महीनों से टाला जा रहा था: SoO समझौते की सीधी समीक्षा और एक नई पीस कमेटी — दोनों सीधे दिल्ली के हाथ में।
The Quint की रिपोर्ट के अनुसार, गृह मंत्रालय ने सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशंस (SoO) — जो केंद्र, राज्य और कुकी-ज़ो सशस्त्र संगठनों के बीच का युद्धविराम समझौता है — की शर्तों की व्यापक समीक्षा शुरू की है। साथ ही एक पीस कमेटी का गठन प्रस्तावित है जो सीधे केंद्र को रिपोर्ट करेगी, राज्य सरकार को नहीं। यही वह बिंदु है जो इस पूरे कदम को एक प्रशासनिक फ़ैसले से कहीं बड़ा बनाता है।
इसे समझने के लिए SoO की पृष्ठभूमि ज़रूरी है। 2008 में हस्ताक्षरित यह समझौता कुकी-ज़ो सशस्त्र गुटों को 'डेज़िग्नेटेड कैंप' में रहने और हथियार न उठाने की शर्त पर सुरक्षा बलों की कार्रवाई से छूट देता था। लेकिन मई 2023 में भड़की मैतेई-कुकी हिंसा के बाद मैतेई संगठनों ने लगातार आरोप लगाया कि SoO के तहत रहने वाले कुकी गुट इन्हीं कैंपों से हथियार चला रहे हैं। बीरेन सिंह सरकार ने 2023 में ही कुछ कुकी गुटों के SoO को निलंबित करने की कोशिश की थी, लेकिन केंद्र ने तब रोक लगा दी — रिपोर्ट्स के अनुसार।
अब जब केंद्र ख़ुद SoO की समीक्षा कर रहा है, तो इसके दो संकेत हैं। पहला: दिल्ली मान रही है कि मौजूदा ढाँचा टूट चुका है और उसे नए सिरे से गढ़ना होगा। दूसरा — और यही ज़्यादा अहम है — बीरेन सिंह को इस प्रक्रिया से बाहर रखना दिल्ली की चुप स्वीकृति है कि राज्य का मुखिया अब किसी एक पक्ष का भी भरोसा नहीं जीत सकता।
[EMBED-SUGGESTION:tweet]
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में जो बात खुलकर कोई नहीं कहता, वह यह है: बीरेन सिंह को हटाना BJP के लिए अब 'अगर' नहीं बल्कि 'कब' का सवाल बन चुका है। दिल्ली के सूत्रों से जुड़ी चर्चाओं के मुताबिक़, पार्टी नेतृत्व में यह भाव है कि बीरेन के रहते कोई भी शांति प्रक्रिया मैतेई और कुकी दोनों पक्षों को संदेह की नज़र से दिखेगी। लेकिन 2027 से पहले मुख्यमंत्री बदलना BJP के लिए दोधारी तलवार है — बीरेन के बिना मैतेई वोट बैंक पर पकड़ कमज़ोर हो सकती है, और बीरेन के साथ कुकी-ज़ो इलाक़ों में BJP का कोई भविष्य नहीं। (यह इंडस्ट्री चर्चा और राजनीतिक अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
कुकी संगठनों की शर्तें क्या हैं? रिपोर्ट्स के अनुसार, कुकी-ज़ो गुटों की मुख्य माँग एक 'सेपरेट एडमिनिस्ट्रेशन' — अलग प्रशासनिक इकाई — की है, जो मणिपुर के भीतर रहते हुए पहाड़ी ज़िलों को स्वायत्तता दे। मैतेई पक्ष इसे राज्य के विभाजन की दिशा में पहला कदम मानता है और सख़्ती से विरोध करता है। केंद्र की पीस कमेटी को इन्हीं दो ध्रुवों के बीच रास्ता निकालना होगा — और यहीं पर 'कश्मीर मॉडल' की तुलना सामने आती है।
जिस तरह जम्मू-कश्मिर में केंद्र ने अनुच्छेद 370 हटाने के बाद सीधे प्रशासन चलाया, डीलिमिटेशन किया, और फिर चुनाव कराए — क्या मणिपुर में भी वही ब्लूप्रिंट है? The Quint का विश्लेषण बताता है कि पीस कमेटी का सीधे केंद्र को रिपोर्ट करना इसी दिशा का संकेत है। लेकिन एक बड़ा फ़र्क़ है: कश्मीर में सेना और केंद्रीय बल दशकों से मौजूद थे, मणिपुर में जातीय संघर्ष की जड़ें अलग हैं और दोनों पक्ष — मैतेई और कुकी — भारतीय नागरिक हैं। यहाँ 'बाहरी दुश्मन' का नैरेटिव नहीं चलता।
आने वाले दिनों में यह समीकरण किस ओर मुड़ेगा — इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यही है कि केंद्र का यह कदम तीन स्तरों पर एक साथ खेला जा रहा है। पहला: कुकी गुटों को SoO की नई शर्तों के ज़रिए 'नियंत्रित समर्पण' की ओर लाना। दूसरा: पीस कमेटी के माध्यम से बीरेन सिंह की भूमिका को सिकोड़ते हुए 2027 के लिए 'नया चेहरा' लॉन्च करने की ज़मीन तैयार करना। तीसरा: उत्तर-पूर्व में BJP की 'डबल इंजन' सरकार की विश्वसनीयता बचाना, जो मणिपुर की आग में बुरी तरह झुलस चुकी है।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल वह है जिसका जवाब न दिल्ली दे रही है, न इम्फाल: अगर पीस कमेटी विफल हो गई — जैसा कि मणिपुर में पहले भी कई शांति प्रयास विफल हुए हैं — तो क्या केंद्र राष्ट्रपति शासन लगाने को तैयार है? और अगर हाँ, तो क्या यह शुरू से ही असली योजना थी?
मणिपुर का संकट अब सिर्फ़ जातीय हिंसा नहीं रहा — यह BJP के संघीय ढाँचे की परीक्षा है। जिस पार्टी ने 'डबल इंजन' को चुनावी नारा बनाया, उसी के एक राज्य में दोनों इंजन ठप हैं। और अब दिल्ली से सीधे चलाया जा रहा यह 'रिमोट कंट्रोल' — यह समाधान है, या सिर्फ़ यह स्वीकारोक्ति कि समस्या उनकी अपनी बनाई हुई है?
More from India Herald
मुख्य बातें
- केंद्र ने SoO की समीक्षा और पीस कमेटी गठन का फ़ैसला कर बीरेन सिंह सरकार को व्यावहारिक रूप से बायपास किया — The Quint रिपोर्ट के अनुसार।
- कुकी संगठन 'अलग प्रशासन' की माँग पर अड़े हैं, मैतेई पक्ष इसे विभाजन मानता है — दोनों ध्रुवों के बीच पीस कमेटी की चुनौती विकट है।
- 2027 विधानसभा चुनाव से पहले BJP का असली कैलकुलेशन है: बीरेन सिंह को बदलने की ज़मीन बनाना, बिना मैतेई वोट बैंक खोए — यह दोधारी तलवार है।
- मणिपुर में केंद्र का 'सीधा हस्तक्षेप' कश्मीर मॉडल की झलक देता है, लेकिन जातीय संघर्ष की प्रकृति बुनियादी रूप से अलग है।
- अगर पीस कमेटी विफल होती है, तो राष्ट्रपति शासन अगला कदम हो सकता है — यह संभावना सियासी हलकों में चर्चा में है।
आँकड़ों में
- मणिपुर में मई 2023 से 200 से अधिक लोग मारे गए और 60,000+ विस्थापित हुए — विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार।
- SoO समझौता 2008 से लागू है और इसमें लगभग 25 कुकी-ज़ो सशस्त्र गुट शामिल हैं — रिपोर्ट्स के मुताबिक़।
- 2027 मणिपुर विधानसभा चुनाव में 60 सीटों पर मतदान होगा — जहाँ BJP ने 2022 में 32 सीटें जीती थीं।
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: केंद्र सरकार (गृह मंत्रालय) और मणिपुर के मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह — The Quint के अनुसार।
- क्या: SoO (सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशंस) समझौते की समीक्षा और एक नई पीस कमेटी का गठन — The Quint की रिपोर्ट के मुताबिक़।
- कब: 2026, जबकि मणिपुर में जातीय हिंसा मई 2023 से जारी है — रिपोर्ट्स के अनुसार।
- कहाँ: मणिपुर — विशेषकर इम्फाल घाटी (मैतेई बहुल) और पहाड़ी ज़िले (कुकी-ज़ो बहुल)।
- क्यों: दो साल से अधिक समय से जारी मैतेई-कुकी जातीय संघर्ष को शांत करने में राज्य सरकार की विफलता और 2027 विधानसभा चुनाव से पहले BJP की रणनीतिक ज़रूरत — The Quint के विश्लेषण के अनुसार।
- कैसे: गृह मंत्रालय ने SoO की शर्तों की समीक्षा शुरू की और एक शांति समिति (पीस कमेटी) का प्रस्ताव रखा, जो सीधे केंद्र को रिपोर्ट करेगी — राज्य सरकार को दरकिनार करते हुए।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
SoO (सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशंस) समझौता क्या है?
SoO 2008 में केंद्र, मणिपुर सरकार और कुकी-ज़ो सशस्त्र संगठनों के बीच हुआ युद्धविराम समझौता है, जिसके तहत ये गुट डेज़िग्नेटेड कैंपों में रहते हैं और सुरक्षा बल उन पर कार्रवाई नहीं करते — रिपोर्ट्स के अनुसार।
केंद्र ने पीस कमेटी क्यों बनाई और यह बीरेन सिंह को कैसे बायपास करती है?
The Quint के अनुसार, पीस कमेटी सीधे केंद्र को रिपोर्ट करेगी, राज्य सरकार को नहीं — यह व्यावहारिक रूप से मुख्यमंत्री बीरेन सिंह की शांति प्रक्रिया में भूमिका को सीमित कर देता है।
कुकी संगठनों की मुख्य माँगें क्या हैं?
रिपोर्ट्स के अनुसार, कुकी-ज़ो गुटों की प्रमुख माँग मणिपुर के भीतर पहाड़ी ज़िलों के लिए अलग प्रशासनिक इकाई (सेपरेट एडमिनिस्ट्रेशन) है, जिसे मैतेई पक्ष राज्य विभाजन की दिशा मानकर विरोध करता है।
क्या मणिपुर में राष्ट्रपति शासन लग सकता है?
अगर पीस कमेटी और SoO रिव्यू विफल होते हैं, तो राष्ट्रपति शासन एक विकल्प हो सकता है — सियासी हलकों में यह चर्चा है, हालाँकि केंद्र ने इसकी पुष्टि नहीं की है।



click and follow Indiaherald WhatsApp channel