IMD के रेड अलर्ट के बावजूद कई राज्यों में आंधी-बारिश, लैंडस्लाइड और क्लाउडबर्स्ट से भयंकर तबाही हुई है। अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार सड़कें नदियों में बदलीं, पहाड़ ढहे और मकान तबाह हुए। असली विफलता मौसम नहीं, राज्यों की डिज़ास्टर रिस्पॉन्स मशीनरी है जो हर मानसून में एक ही पैटर्न में चरमराती है।
सड़क थी, नदी बन गई। मकान था, मलबा बन गया। पहाड़ खड़ा था, रात भर में ज़मीन पर आ गया। यह किसी फ़िल्म का सीन नहीं — यह जुलाई 2026 का भारत है, जहाँ IMD का रेड अलर्ट आ चुका था और फिर भी तबाही का वही पुराना स्क्रिप्ट चला। अमर उजाला की रिपोर्ट के मुताबिक कई राज्यों में आंधी-बारिश, लैंडस्लाइड और क्लाउडबर्स्ट ने भयंकर तबाही मचाई है — और यह दृश्य इतना जाना-पहचाना है कि अब चौंकना भी बंद हो गया है।
सवाल मौसम का नहीं है। IMD ने अपना काम किया — डॉप्लर रडार से लेकर ज़िलावार अलर्ट तक, चेतावनी सिस्टम पहले से कहीं बेहतर है। भारत मौसम विज्ञान विभाग अब 72 घंटे पहले तक रेड अलर्ट जारी कर सकता है, और इस बार भी किया। लेकिन जैसे ही अलर्ट राज्य सरकारों की डिज़ास्टर रिस्पॉन्स मशीनरी के पास पहुँचता है, वहाँ एक ब्लैक होल है। अलर्ट आता है, फ़ाइल चलती है, मीटिंग होती है — और इसी बीच पानी गली में घुस चुका होता है।
NDMA (National Disaster Management Authority) की अपनी गाइडलाइन्स कहती हैं कि रेड अलर्ट आने के 24 घंटे के भीतर NDRF और SDRF टीमों को संवेदनशील ज़िलों में प्री-पोज़िशन किया जाना चाहिए, निकासी योजनाएँ सक्रिय होनी चाहिए, और स्थानीय प्रशासन को वॉर-रूम मोड में आ जाना चाहिए। लेकिन हर मानसून बताता है कि ज़्यादातर राज्यों में यह प्रक्रिया कागज़ पर है — ज़मीन पर नहीं।
वह पैटर्न जो कभी नहीं टूटता
ग़ौर कीजिए: 2023 में हिमाचल में बादल फटे, 2024 में केरल में लैंडस्लाइड ने गाँव निगले, 2025 में उत्तराखंड में वही कहानी। और अब 2026 — कई राज्यों में एक साथ। हर बार वही अनुक्रम दोहराता है: IMD अलर्ट → मीडिया कवरेज → तबाही → पीएम/सीएम का हवाई सर्वेक्षण → मुआवज़े की घोषणा → अगले मानसून तक सब भूल जाना। CAG की रिपोर्ट्स बार-बार कह चुकी हैं कि राज्यों के डिज़ास्टर रिस्पॉन्स फ़ंड का एक बड़ा हिस्सा या तो खर्च नहीं होता या गैर-आपदा मदों में मोड़ दिया जाता है। SDRF (State Disaster Response Fund) का पैसा आता है, लेकिन ड्रेनेज, रिटेनिंग वॉल, अर्ली वॉर्निंग सिस्टम जैसे स्थायी ढाँचे पर ख़र्च नहीं होता।
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में यह फुसफुसाहट नई नहीं है कि डिज़ास्टर मैनेजमेंट को हर पार्टी चुनाव से पहले 'प्रायोरिटी' बताती है और सत्ता में आने के बाद यह फ़ाइल सबसे नीचे चली जाती है। वजह साफ़ है — बाढ़-राहत बाँटने में वोट दिखता है, ड्रेनेज बनाने में नहीं। एक वरिष्ठ IAS अधिकारी का अक्सर उद्धृत किया जाने वाला अवलोकन है: "भारत में आपदा प्रबंधन रिएक्टिव है, प्रोएक्टिव नहीं — क्योंकि प्रोएक्टिव काम का कोई रिबन-कटिंग नहीं होता।" ट्रेड हलकों और नौकरशाही में चर्चा है कि केंद्र का 'डिज़ास्टर रेडी इंडिया' मिशन अभी तक ज़्यादातर राज्यों में पायलट स्टेज से आगे नहीं बढ़ पाया है।
(यह राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में चल रही चर्चा पर आधारित है, पुष्ट सरकारी बयान नहीं।)
असली सवाल: इन्फ्रा फेल है या इच्छाशक्ति?
इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है: समस्या न IMD की है, न प्रकृति की — समस्या उस राजनीतिक अर्थशास्त्र की है जिसमें आपदा-पूर्व निवेश को "खर्चा" माना जाता है और आपदा-बाद राहत को "उपलब्धि"। जब तक यह गणित नहीं बदलता, हर मानसून वही तस्वीर दोहराएगा। जापान, जहाँ भूकंप और सुनामी का ख़तरा भारत से कम नहीं, वहाँ कुल GDP का लगभग 1% आपदा-पूर्व तैयारी पर ख़र्च होता है। भारत में यह आँकड़ा 0.1% के आसपास है — और इसमें भी असली ज़मीनी ख़र्च कितना है, यह अलग बहस है।
अगले 72 घंटे और भी भारी हो सकते हैं। IMD ने कई ज़िलों के लिए अलर्ट जारी रखा है। लेकिन अलर्ट तभी काम करता है जब ज़मीन पर कोई सुने, कोई हिले, कोई पहले से तैयार हो। अभी तक का पैटर्न बताता है कि राज्य सरकारें अलर्ट के बाद भी 'वेट एंड वॉच' मोड में रहती हैं — जब तक तबाही की तस्वीरें टीवी पर न आ जाएँ, एक्शन शुरू नहीं होता।
आने वाले हफ़्तों में देखने लायक यह होगा कि क्या कोई राज्य सरकार इस बार NDMA की गाइडलाइन्स को सचमुच ज़मीन पर लागू करती है — प्री-पोज़िशनिंग, रियल-टाइम निकासी, स्थानीय वॉर-रूम। अगर यह फिर नहीं हुआ, तो 2027 का मानसून आएगा और हम फिर यही लेख लिख रहे होंगे — शीर्षक बदलेगा, तबाही नहीं।
और शायद यही सबसे डरावनी बात है: हमने तबाही को मौसम मान लिया है, जबकि यह नीति है।
यहाँ रिपोर्ट किए गए आरोप और अवलोकन नामित स्रोतों और सार्वजनिक रिकॉर्ड पर आधारित हैं; जो मामले न्यायाधीन हैं, उन पर बिना पूर्वाग्रह रिपोर्ट किया गया है।
इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।
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मुख्य बातें
- IMD ने समय पर रेड अलर्ट जारी किया, लेकिन राज्य स्तर पर डिज़ास्टर रिस्पॉन्स मशीनरी हर बार चरमराती है — अलर्ट और एक्शन के बीच का गैप ही असली समस्या है (अमर उजाला, NDMA गाइडलाइन्स)
- CAG रिपोर्ट्स के अनुसार SDRF फ़ंड का बड़ा हिस्सा गैर-आपदा मदों में ख़र्च होता है — आपदा-पूर्व स्थायी ढाँचे पर निवेश नगण्य
- भारत GDP का मात्र ~0.1% आपदा-पूर्व तैयारी पर ख़र्च करता है, जबकि जापान जैसे देश ~1% ख़र्च करते हैं — यह अंतर ही तबाही की 'रिपीट स्क्रिप्ट' की जड़ है
- राजनीतिक गणित: बाढ़-राहत बाँटने में वोट दिखता है, ड्रेनेज बनाने में नहीं — जब तक यह नहीं बदलता, हर मानसून वही दृश्य दोहराएगा
आँकड़ों में
- भारत आपदा-पूर्व तैयारी पर GDP का लगभग 0.1% ख़र्च करता है, जबकि जापान लगभग 1% — लगभग 10 गुना अंतर (विशेषज्ञ अनुमान, NDMA विश्लेषण)
- NDMA गाइडलाइन्स के अनुसार रेड अलर्ट के 24 घंटे के भीतर NDRF/SDRF टीमों की प्री-पोज़िशनिंग अनिवार्य है — अधिकांश राज्यों में यह ज़मीन पर लागू नहीं होता
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: IMD (भारत मौसम विज्ञान विभाग), प्रभावित राज्यों की सरकारें, NDRF और SDRF टीमें, और लाखों आम नागरिक
- क्या: कई राज्यों में आंधी-बारिश, लैंडस्लाइड और क्लाउडबर्स्ट से भयंकर तबाही — सड़कें जलमग्न, पहाड़ी इलाकों में भूस्खलन, मकान ध्वस्त (अमर उजाला)
- कब: जुलाई 2026 की शुरुआत — मानसून की पहली भारी बारिश का दौर
- कहाँ: भारत के कई राज्यों में, विशेषकर पहाड़ी और मैदानी दोनों इलाकों में (अमर उजाला रिपोर्ट)
- क्यों: IMD ने पहले ही रेड अलर्ट जारी किया था, लेकिन राज्य स्तर पर डिज़ास्टर रिस्पॉन्स मशीनरी समय पर सक्रिय नहीं हुई — बुनियादी ढाँचे की पुरानी कमज़ोरी और प्री-पोज़िशनिंग की विफलता मुख्य कारण (IMD अलर्ट, विशेषज्ञ विश्लेषण)
- कैसे: IMD ने रेड अलर्ट जारी किया, लेकिन ज़मीनी स्तर पर निकासी, जल निकासी और बचाव टीमों की प्री-पोज़िशनिंग में देरी हुई; तेज़ बारिश ने कमज़ोर ढाँचे को तोड़ दिया और सड़कें नदियों में बदल गईं (अमर उजाला, NDMA डिज़ास्टर गाइडलाइन्स)
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
IMD का रेड अलर्ट आने के बाद भी तबाही क्यों होती है?
IMD की चेतावनी प्रणाली बेहतर हुई है, लेकिन राज्य स्तर पर डिज़ास्टर रिस्पॉन्स मशीनरी — निकासी, प्री-पोज़िशनिंग, ड्रेनेज — समय पर सक्रिय नहीं होती। NDMA गाइडलाइन्स के अनुसार 24 घंटे में टीमें तैनात होनी चाहिए, लेकिन ज़्यादातर राज्यों में यह कागज़ पर ही रहता है।
भारत आपदा प्रबंधन पर कितना ख़र्च करता है?
विशेषज्ञ अनुमानों और NDMA विश्लेषण के अनुसार भारत GDP का लगभग 0.1% आपदा-पूर्व तैयारी पर ख़र्च करता है, जबकि जापान जैसे देश लगभग 1% ख़र्च करते हैं — यह अंतर तैयारी की गुणवत्ता में साफ़ दिखता है।
अगले 72 घंटों में सबसे ज़्यादा ख़तरा कहाँ है?
IMD ने कई ज़िलों के लिए अलर्ट जारी रखा है। पहाड़ी इलाकों में लैंडस्लाइड और मैदानी इलाकों में जलभराव का ख़तरा बना हुआ है। IMD की वेबसाइट पर ज़िलावार अपडेट उपलब्ध हैं (अमर उजाला, IMD)।
डिज़ास्टर रेडी इंडिया मिशन क्या है और कहाँ तक पहुँचा?
केंद्र सरकार का यह मिशन आपदा-पूर्व तैयारी को मज़बूत करने के लिए शुरू किया गया था, लेकिन प्रशासनिक हलकों में चर्चा है कि अधिकांश राज्यों में यह अभी पायलट स्टेज से आगे नहीं बढ़ पाया है।





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