परिसीमन से यूपी-बिहार को 100 से अधिक नई लोकसभा सीटें मिल सकती हैं जबकि तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना का प्रतिनिधित्व घटेगा। इससे NDA सहयोगी TDP प्रमुख चंद्रबाबू नायडू के लिए गठबंधन में बने रहना राजनीतिक रूप से आत्मघाती हो सकता है।
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: केंद्र सरकार (NDA/BJP), चंद्रबाबू नायडू (TDP), एम.के. स्टालिन (DMK), और दक्षिण भारत के राजनीतिक दल
- क्या: मानसून सत्र 2026 में परिसीमन विधेयक या संवैधानिक संशोधन लाने की तैयारी, जिससे लोकसभा सीटों का पुनर्वितरण 2031 की जनगणना के आधार पर होगा
- कब: जुलाई-अगस्त 2026 के मानसून सत्र में — WION की रिपोर्ट के अनुसार
- कहाँ: भारतीय संसद, नई दिल्ली
- क्यों: 2026 में संविधान के अनुच्छेद 82 के तहत 2031 जनगणना आधारित परिसीमन पर लगी रोक (फ़्रीज़) समाप्त होने वाली है, जिसके बाद जनसंख्या अनुपात में सीटें बँटेंगी
- कैसे: जनसंख्या आधारित सीट वितरण से उत्तर भारत के राज्यों को अधिक सीटें मिलेंगी क्योंकि वहाँ जनसंख्या वृद्धि दर अधिक रही, जबकि दक्षिण के राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण किया — फलस्वरूप उनकी सीटें अनुपातिक रूप से घटेंगी
एक ऐसा देश जहाँ परिवार नियोजन अपनाने वाले राज्यों को संसद में कम आवाज़ मिले — और बेलगाम जनसंख्या बढ़ाने वालों को ज़्यादा। यही वह विडंबना है जो 2026 के मानसून सत्र में परिसीमन के नाम पर संसद के गलियारों में गूँजने वाली है। WION की रिपोर्ट के अनुसार, मानसून सत्र 2026 में परिसीमन विधेयक या उससे जुड़ा संवैधानिक संशोधन सरकार के प्रमुख एजेंडे में है — और अगर यह आगे बढ़ा, तो भारतीय लोकतंत्र का नक्शा हमेशा के लिए बदल जाएगा।
बात सीधी है, लेकिन उसके नतीजे ज़हरीले हैं। संविधान का अनुच्छेद 82 कहता है कि हर जनगणना के बाद लोकसभा सीटों का पुनर्वितरण होगा — जनसंख्या के अनुपात में। लेकिन 1976 में इंदिरा गांधी ने 42वें संशोधन से इस प्रक्रिया पर 2001 तक रोक लगा दी, फिर 2001 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने 84वें संशोधन से यह फ़्रीज़ 2026 तक बढ़ा दी। अब वह डेडलाइन आ चुकी है। अगली जनगणना — संभवतः 2031 — के आँकड़ों पर आधारित परिसीमन का रास्ता अब क़ानूनी तौर पर खुला है।
गणित जो दक्षिण को डराता है
आँकड़ों की ज़बान समझिए। अभी लोकसभा में 543 सीटें हैं। अगर कुल सीटें बढ़ाकर 753 या उससे अधिक की जाएँ (जैसा कि कई रिपोर्ट्स में अनुमान लगाया गया है), तो जनसंख्या के हिसाब से उत्तर प्रदेश की सीटें मौजूदा 80 से बढ़कर 120-130 के आसपास पहुँच सकती हैं। बिहार की 40 सीटें 55-60 हो सकती हैं। राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र को भी बड़ा फ़ायदा मिलेगा। दूसरी तरफ़ तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना — जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में अनुकरणीय काम किया — उनकी सीटों का अनुपात सापेक्षिक रूप से गिरेगा। ऐसा नहीं कि उनकी सीटें घटेंगी ज़रूरी तौर पर, लेकिन कुल सीटों में उनका हिस्सा काफ़ी कम हो जाएगा — और लोकतंत्र में हिस्सा ही ताक़त है।
इसे ऐसे समझें: आज केरल की 20 सीटें 543 में लगभग 3.7% हैं। परिसीमन के बाद अगर कुल सीटें 800 हों और केरल को 22-23 सीटें भी मिलें, तो उसका प्रतिशत 2.8% रह जाएगा। यानी केरल की आवाज़ संसद में पहले से कमज़ोर — भले ही पूर्ण संख्या में एक-दो सीट बढ़ जाएँ। यही दक्षिण का असली डर है।
नायडू का दोहरा जाल
अब इस कहानी का सबसे दिलचस्प किरदार — तेलुगु देशम पार्टी (TDP) के अध्यक्ष और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू। NDA गठबंधन में नायडू की 16 लोकसभा सीटें मोदी सरकार के बहुमत का अहम स्तंभ हैं। लेकिन परिसीमन से आंध्र प्रदेश का सापेक्षिक राजनीतिक वज़न कम होगा — वह राज्य जिसकी जनसंख्या वृद्धि दर राष्ट्रीय औसत से कम रही है।
नायडू के सामने क्लासिक 'कैच-22' है: अगर वे परिसीमन का समर्थन करते हैं, तो अपने ही राज्य में जनता को समझाना मुश्किल होगा कि आपने दक्षिण की आवाज़ कमज़ोर करने में हाथ बँटाया। अगर विरोध करते हैं, तो NDA से रिश्ते ख़राब — और केंद्र से मिलने वाले पैकेज, विशेष दर्जे की माँग, और पोलावरम जैसी परियोजनाओं पर ख़तरा।
सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि नायडू की टीम ने पिछले कुछ महीनों में एक बीच का रास्ता तलाशना शुरू किया है — 'वेटेड रिप्रेज़ेंटेशन' का फ़ॉर्मूला, जिसमें जनसंख्या के साथ-साथ विकास सूचकांक, साक्षरता दर और जनसंख्या नियंत्रण प्रदर्शन को भी सीट आवंटन का आधार बनाया जाए। लेकिन BJP का गणित ऐसे किसी समझौते के लिए तैयार क्यों होगा — जब सीधा जनसंख्या आधारित बँटवारा उसके सबसे मज़बूत राज्यों (UP, बिहार, MP, राजस्थान) को भारी फ़ायदा दे रहा है?
पॉलिटिकल पल्स
परदे के पीछे की बात करें तो DMK प्रमुख एम.के. स्टालिन ने पहले ही 'दक्षिण बनाम उत्तर' का नैरेटिव तैयार कर रखा है। विपक्षी INDIA गठबंधन के लिए यह मुद्दा सोने की खान है — 'हिंदी बेल्ट का वर्चस्व' बनाम 'संघीय ढाँचे की रक्षा'। कांग्रेस की स्थिति दिलचस्प रूप से दुविधापूर्ण है: उत्तर में उसे परिसीमन से फ़ायदा हो सकता है (अगर वह अपना वोट शेयर सुधारे), लेकिन दक्षिण में उसके सहयोगी — DMK, कम्युनिस्ट पार्टियाँ — इसके सख़्त ख़िलाफ़ हैं।
(यह इंडस्ट्री चर्चा और राजनीतिक अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि BJP का असली मास्टरप्लान 2029 के लिए है। अगर परिसीमन हो जाता है, तो 2029 का चुनाव नए सीट-ढाँचे पर लड़ा जाएगा — और उत्तर भारत में BJP का एकतरफ़ा दबदबा उसे अकेले दम पर 350+ सीटें दिला सकता है। उस स्थिति में NDA सहयोगियों — TDP, JD(U), LJP — की सौदेबाज़ी की ताक़त लगभग शून्य हो जाएगी। BJP को गठबंधन की ज़रूरत ही नहीं रहेगी।
दक्षिण का 'टैक्स तर्क' — सबसे धारदार हथियार
दक्षिण के राज्यों के पास एक और ताक़तवर तर्क है जो परिसीमन बहस को संघीय ढाँचे के संकट में बदल सकता है। भारत के कुल GST कलेक्शन में तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और केरल का योगदान उनकी जनसंख्या के अनुपात से कहीं अधिक है। केंद्रीय करों के वित्त आयोग द्वारा वितरण में पहले ही दक्षिणी राज्य कम हिस्सा पाते हैं — क्योंकि जनसंख्या एक बड़ा मानदंड है। अब अगर संसद में भी उनका प्रतिनिधित्व घटे, तो वे 'दोहरी मार' झेलेंगे: ज़्यादा टैक्स दो, कम आवाज़ मिले।
यह तर्क सिर्फ़ राजनीतिक नहीं, भावनात्मक भी है — और इसमें दक्षिण की उप-राष्ट्रवादी भावनाओं को हवा देने की क्षमता है। 2019-20 में तमिलनाडु के DMK नेताओं ने 'द्रविड़ नाडु' की बात उठाई थी — परिसीमन उस आग में घी का काम कर सकता है।
BJP का 'नया संसद भवन' कार्ड
एक बात जो अक्सर नज़रअंदाज़ की जाती है: नया संसद भवन 888 सांसदों तक की क्षमता रखता है। 2023 में जब नया भवन बनाया गया, तब कई विश्लेषकों ने पूछा था कि 543 सीटों के लिए इतनी बड़ी इमारत क्यों? अब जवाब साफ़ होता दिख रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सरकार लोकसभा सीटें 753 से 888 के बीच तक बढ़ा सकती है। यह तैयारी साल भर पहले की गई चाल जैसी लगती है — बुनियादी ढाँचा पहले, क़ानून बाद में।
2029 का असली दाँव
इस पूरी कवायद को सिर्फ़ 'सीटों के बँटवारे' के चश्मे से देखना ग़लत होगा। असली सवाल यह है: क्या भारत का संघीय ढाँचा — जिसमें छोटे और विकसित राज्यों को बराबरी की आवाज़ मिलती है — जनसंख्या के बेक़ाबू गणित के आगे टिक पाएगा?
आने वाले हफ़्तों में देखिए: नायडू क्या करते हैं। अगर वे मानसून सत्र से पहले कोई शर्त रखते हैं — जैसे 'वेटेड फ़ॉर्मूला' या राज्यसभा सीटों में दक्षिण को अतिरिक्त प्रतिनिधित्व — तो समझिए कि NDA के भीतर दरार शुरू हो गई है। अगर चुपचाप साथ चलते हैं, तो समझिए कि उन्होंने आंध्र प्रदेश के हित से ज़्यादा अपनी कुर्सी को तरजीह दी — और 2029 में TDP का वोटर उन्हें यह हिसाब ज़रूर पूछेगा।
परिसीमन सिर्फ़ गणित नहीं — यह उस सवाल का जवाब है कि भारत में 'एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य' का मतलब क्या है। क्या बच्चे कम पैदा करने वाले राज्य को दंड मिलना चाहिए? क्या संसद में ताक़त सिर्फ़ संख्या से तय होनी चाहिए या योगदान से भी?
यह सवाल सिर्फ़ सीटों का नहीं — यह भारत की आत्मा का है। और इसका जवाब मानसून सत्र में नहीं मिलेगा, लेकिन इसकी दिशा ज़रूर तय हो जाएगी।
आरोपों और दावों को यहाँ नामित स्रोतों के हवाले से प्रस्तुत किया गया है और जब तक न्यायालय का निर्णय न हो, ये अप्रमाणित हैं; न्यायाधीन मामलों की रिपोर्टिंग बिना पूर्वाग्रह के की गई है।
इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।
आँकड़ों में
- नया संसद भवन 888 सांसदों की क्षमता रखता है जबकि वर्तमान में 543 लोकसभा सीटें हैं
- केरल की 20 सीटें अभी कुल 543 में 3.7% हैं — 800 सीटों वाली लोकसभा में यह अनुपात 2.8% तक गिर सकता है
- 1976 में 42वें संशोधन से परिसीमन पर रोक लगी थी, 2001 में 84वें संशोधन से 2026 तक बढ़ाई गई
मुख्य बातें
- परिसीमन से यूपी की लोकसभा सीटें 80 से बढ़कर 120-130 और बिहार की 40 से 55-60 तक पहुँच सकती हैं — उत्तर भारत को 100+ नई सीटों का फ़ायदा
- दक्षिण भारत की सीटों की पूर्ण संख्या भले न घटे, कुल सीटों में उनका प्रतिशत हिस्सा काफ़ी कम होगा — केरल का हिस्सा 3.7% से गिरकर 2.8% तक जा सकता है
- NDA सहयोगी नायडू 'कैच-22' में हैं: परिसीमन का समर्थन करें तो दक्षिण में जनता नाराज़, विरोध करें तो केंद्र से टकराव
- नया संसद भवन 888 सीटों की क्षमता रखता है — सरकार की तैयारी पहले से थी
- BJP का 2029 कैलकुलेशन: परिसीमन से उत्तर में 350+ सीटें अकेले जीतना संभव — गठबंधन सहयोगियों की ज़रूरत ख़त्म
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
परिसीमन क्या है और 2026 में यह क्यों चर्चा में है?
परिसीमन का मतलब है जनसंख्या के आधार पर लोकसभा और विधानसभा सीटों का पुनर्वितरण। संविधान के अनुच्छेद 82 के तहत हर जनगणना के बाद यह होता है, लेकिन 1976 और 2001 के संशोधनों से इसे 2026 तक रोका गया था। अब यह रोक समाप्त हो रही है, इसलिए मानसून सत्र 2026 में इसे संसद में लाने की तैयारी हो रही है।
परिसीमन से दक्षिण भारत को नुकसान क्यों होगा?
दक्षिण भारत के राज्यों — तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक — ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया। जनसंख्या आधारित सीट वितरण में उनका अनुपात कम होगा। यानी ज़्यादा टैक्स देने वाले राज्यों को संसद में कम आवाज़ मिलेगी।
चंद्रबाबू नायडू परिसीमन पर क्या रुख अपनाएँगे?
नायडू NDA सहयोगी हैं लेकिन परिसीमन से आंध्र प्रदेश का सापेक्षिक प्रतिनिधित्व घटेगा। वे 'वेटेड रिप्रेज़ेंटेशन' फ़ॉर्मूले की माँग कर सकते हैं जिसमें विकास सूचकांक भी सीट आवंटन का आधार हो — लेकिन BJP का इसमें कोई फ़ायदा नहीं है।
नया संसद भवन 888 सीटों का क्यों बनाया गया?
2023 में बना नया संसद भवन 888 सांसदों की क्षमता रखता है — जबकि वर्तमान में 543 लोकसभा सीटें हैं। विश्लेषकों का मानना है कि यह परिसीमन के बाद बढ़ी हुई सीटों के लिए पहले से की गई तैयारी है।



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