सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल के पांचवें दिन उनकी सेहत गंभीर रूप से बिगड़ गई है। CJP ने दिल्ली पुलिस पर प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग और मीडिया को रोकने का आरोप लगाया है। द हिंदू और द प्रिंट की रिपोर्ट के मुताबिक, लद्दाख को छठी अनुसूची में शामिल करने और राज्य का दर्जा देने की माँग पर सरकार की चुप्पी विरोध को और तीखा कर रही है।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: लद्दाख के जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक और नागरिक अधिकार संगठन CJP (सिटिज़न्स फ़ॉर जस्टिस एंड पीस) — द प्रिंट और तेलंगाना टुडे के अनुसार
  • क्या: वांगचुक की भूख हड़ताल के पांचवें दिन सेहत गंभीर रूप से बिगड़ी; CJP ने दिल्ली पुलिस पर प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग और मीडिया ब्लैकआउट का आरोप लगाया — द प्रिंट रिपोर्ट
  • कब: भूख हड़ताल का पांचवां दिन, जून 2025 — द प्रिंट के अनुसार
  • कहाँ: दिल्ली, लद्दाख की संवैधानिक माँगों को लेकर — तेलंगाना टुडे रिपोर्ट
  • क्यों: लद्दाख को छठी अनुसूची में शामिल करने, राज्य का दर्जा देने और स्थानीय अधिकारों की सुरक्षा की माँग को सरकार ने बार-बार टाला — तेलंगाना टुडे
  • कैसे: CJP की राष्ट्रीय सचिव दीपिका डिपके ने आरोप लगाया कि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग किया और मीडिया की पहुँच रोकी; वांगचुक की सेहत बिगड़ने के बावजूद सरकार की ओर से कोई संवाद नहीं — द प्रिंट रिपोर्ट

एक शख़्स जिसने लद्दाख की बर्फ़ीली वादियों में बच्चों के लिए स्कूल बनाए, जिसकी ज़िंदगी पर हॉलीवुड ने फ़िल्म बनाई, जिसे दुनिया 'आइसमैन ऑफ़ लद्दाख' कहती है — वो आज दिल्ली की सड़क पर भूखा पड़ा है और उसकी सेहत पांचवें दिन ख़तरनाक स्तर पर पहुँच गई है। सोनम वांगचुक की सेहत बिगड़ने की ख़बर द प्रिंट ने दी है, और CJP (सिटिज़न्स फ़ॉर जस्टिस एंड पीस) ने दिल्ली पुलिस पर प्रदर्शनकारियों पर हमले और मीडिया ब्लैकआउट का गंभीर आरोप लगाया है। सवाल सीधा है: क्या सरकार को लगता है कि गांधीवादी तरीक़े से लड़ रहे एक व्यक्ति को चुप कराने से लद्दाख की आवाज़ दब जाएगी?

द प्रिंट की रिपोर्ट के मुताबिक, CJP की राष्ट्रीय सचिव दीपिका डिपके ने आरोप लगाया है कि दिल्ली पुलिस ने न सिर्फ़ प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग किया बल्कि मीडिया को भी विरोध स्थल तक पहुँचने से रोका। तेलंगाना टुडे ने भी इस ख़बर की पुष्टि करते हुए बताया कि वांगचुक की भूख हड़ताल के दौरान पुलिस ने सख़्त पाबंदियाँ लगाई हैं। दिल्ली पुलिस की ओर से अब तक इन आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

यहाँ ज़रा ठहरकर सोचिए — वांगचुक कोई राजनीतिक पार्टी के नेता नहीं हैं। न उनके पीछे कोई चुनावी मशीनरी है, न कोई वोट बैंक की गणित। वो एक जलवायु कार्यकर्ता और शिक्षाविद हैं जिनकी माँग संवैधानिक है: लद्दाख को छठी अनुसूची में शामिल करो, राज्य का दर्जा दो, और स्थानीय लोगों के ज़मीनी अधिकारों की रक्षा करो। ये माँगें कोई नई नहीं हैं — 2019 में अनुच्छेद 370 हटने के बाद से लद्दाख के लोग यही कह रहे हैं।

पुलिसिया 'एक्शन' के पीछे का हिसाब-किताब

CJP का आरोप है कि पुलिस ने जानबूझकर मीडिया को विरोध स्थल से दूर रखा। अगर यह सच है — और दिल्ली पुलिस ने अब तक इसका खंडन नहीं किया है — तो यह लोकतांत्रिक विरोध के मूल अधिकार पर सीधा हमला है। द प्रिंट के अनुसार डिपके ने स्पष्ट रूप से कहा कि प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग किया गया।

एक पैटर्न है जो बार-बार दोहराया जा रहा है। पिछले साल भी वांगचुक दिल्ली मार्च पर निकले थे तो उन्हें सिंघु बॉर्डर पर रोका गया था। उससे पहले भी उन्हें हिरासत में लिया गया था। हर बार सरकार ने पहले रोका, फिर 'अनौपचारिक बातचीत' का नाटक किया, और फिर मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया। तेलंगाना टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, इस बार भी वही स्क्रिप्ट दोहराई जा रही है — पुलिसिया पाबंदियाँ, मीडिया ब्लैकआउट, और सरकारी चुप्पी।

पॉलिटिकल पल्स

सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि केंद्र सरकार वांगचुक को 'थकाने' की रणनीति पर चल रही है। तर्क सीधा है: अगर छठी अनुसूची दे दी तो पूर्वोत्तर के कई राज्यों में भी वही माँग उठेगी, और लद्दाख को राज्य का दर्जा देना कश्मीर-लद्दाख विभाजन के पूरे राजनीतिक नैरेटिव को कमज़ोर कर देगा जो 2019 में बनाया गया था। (यह सियासी हलकों की चर्चा और अपुष्ट विश्लेषण पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

लेकिन इस हिसाब में एक बड़ी ग़लती है। वांगचुक कोई सत्ता-विरोधी राजनेता नहीं हैं जिन्हें 'विपक्षी एजेंडा' का ठप्पा लगाकर ख़ारिज किया जा सके। रेमन मैग्सेसे पुरस्कार विजेता, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित, और सबसे बड़ी बात — उनका विरोध पूरी तरह अहिंसक और गांधीवादी है। जब सरकार ऐसे व्यक्ति के ख़िलाफ़ बल प्रयोग करती है, तो वो अनजाने में उसे और बड़ा बना देती है।

सरकार का 'सेल्फ-गोल' — आँकड़े बोलते हैं

द हिंदू की पिछली रिपोर्ट्स के अनुसार, 2019 के बाद से लद्दाख में कम से कम चार बड़े विरोध प्रदर्शन हो चुके हैं — हर बार भीड़ पिछली बार से बड़ी रही। लद्दाख की कुल आबादी लगभग तीन लाख है, और वांगचुक के साथ लेह में निकले जुलूसों में अनुमानतः दस हज़ार से ज़्यादा लोग शामिल हुए हैं — यानी हर तीसवाँ लद्दाखी सड़क पर उतरा। यह अनुपात किसी भी सरकार के लिए ख़तरे की घंटी होना चाहिए।

इंडिया हेराल्ड का सटीक पॉलिटिकल रीड यह है कि सरकार जितना ज़्यादा वांगचुक को दबाएगी, लद्दाख का मुद्दा उतना ही राष्ट्रीय बनेगा। पहले यह एक क्षेत्रीय माँग थी जो दिल्ली की ख़बरों में कभी-कभार आती थी। अब CJP जैसी राष्ट्रीय नागरिक अधिकार संस्था इसमें कूद पड़ी है, विपक्ष इसे संसद में उठा रहा है, और अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने इसे कवर करना शुरू कर दिया है। पुलिसिया बल प्रयोग का हर आरोप इस आग में ईंधन डालता है।

आगे क्या — वो तीन बातें जो अब देखनी होंगी

पहला, वांगचुक की सेहत। अगर उनकी हालत और बिगड़ती है और सरकार संवाद नहीं करती, तो यह एक ह्यूमैनिटेरियन क्राइसिस बन जाएगा जिसे कोई मीडिया ब्लैकआउट नहीं रोक पाएगा। दूसरा, सुप्रीम कोर्ट। लद्दाख की संवैधानिक स्थिति पर पहले भी याचिकाएँ दाखिल हो चुकी हैं — अगर CJP या कोई अन्य संगठन अब न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाता है तो सरकार के लिए 'अनौपचारिक बातचीत' का बहाना ख़त्म हो जाएगा। तीसरा, विपक्ष की एकजुटता — अगर कांग्रेस, AAP और क्षेत्रीय दल इसे 2029 के चुनावी एजेंडे से जोड़ लें तो लद्दाख, कश्मीर पॉलिसी का सबसे कमज़ोर बिंदु बन जाएगा।

एक और बात जो सरकार के रणनीतिकार शायद भूल रहे हैं: लद्दाख की सामरिक स्थिति। यह वो इलाक़ा है जहाँ चीन से सीमा विवाद चल रहा है, जहाँ भारतीय सेना की भारी तैनाती है। अगर स्थानीय आबादी सरकार से पूरी तरह नाराज़ हो जाती है, तो सीमा सुरक्षा का पूरा ढाँचा कमज़ोर होता है। यह सिर्फ़ राजनीतिक सवाल नहीं, राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला है।

वांगचुक ने एक इंटरव्यू में कहा था — 'मैं भारत से लड़ नहीं रहा, मैं भारत के लिए लड़ रहा हूँ।' यह वाक्य किसी भी सरकार को सोचने पर मजबूर कर दे कि जब एक गांधीवादी कार्यकर्ता आपके ही देश के संविधान की भाषा में बात कर रहा है, तो उसे लाठियों से जवाब देना किस तरह की लोकतांत्रिक परिपक्वता है?

अभी सवाल यह नहीं है कि वांगचुक जीतेंगे या हारेंगे। सवाल यह है कि जब इतिहास लिखा जाएगा, तो दिल्ली की सड़क पर भूखे पड़े एक शिक्षक को चुप कराने की कोशिश किसकी हार के रूप में दर्ज होगी — उसकी, या सत्ता की?

यहाँ रिपोर्ट किए गए आरोप नामित स्रोतों से उद्धृत हैं और जब तक न्यायालय का निर्णय न हो, अप्रमाणित हैं; न्यायालय के अधीन मामले बिना पूर्वाग्रह के रिपोर्ट किए गए हैं।

इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।

आँकड़ों में

  • लद्दाख की आबादी ~3 लाख, वांगचुक के जुलूसों में अनुमानतः 10,000+ — हर तीसवाँ लद्दाखी सड़क पर उतरा
  • 2019 के बाद से लद्दाख में कम से कम 4 बड़े विरोध प्रदर्शन — हर बार पिछली बार से बड़ी भीड़
  • भूख हड़ताल का पांचवां दिन — सेहत गंभीर स्तर पर

मुख्य बातें

  • सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल के पांचवें दिन सेहत गंभीर रूप से बिगड़ी — द प्रिंट रिपोर्ट
  • CJP की राष्ट्रीय सचिव दीपिका डिपके ने दिल्ली पुलिस पर प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग और मीडिया ब्लैकआउट का आरोप लगाया; पुलिस की ओर से अब तक कोई प्रतिक्रिया नहीं
  • लद्दाख की माँग: छठी अनुसूची में शामिल करना, राज्य का दर्जा, ज़मीनी अधिकारों की सुरक्षा — 2019 से अनसुलझी
  • 2019 के बाद से लद्दाख में कम से कम चार बड़े विरोध प्रदर्शन — हर बार भीड़ बढ़ी, सरकारी जवाब वही: रोको, बातचीत का नाटक करो, भूल जाओ
  • CJP की एंट्री ने इसे क्षेत्रीय से राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया — सुप्रीम कोर्ट और विपक्षी एकजुटता अगले दो अहम मोड़

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल क्यों है?

वांगचुक लद्दाख को छठी अनुसूची में शामिल करने, राज्य का दर्जा देने और स्थानीय ज़मीनी अधिकारों की सुरक्षा की माँग कर रहे हैं। 2019 में अनुच्छेद 370 हटने के बाद लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश बना लेकिन स्थानीय स्वशासन के अधिकार सीमित हो गए।

CJP ने दिल्ली पुलिस पर क्या आरोप लगाए हैं?

CJP की राष्ट्रीय सचिव दीपिका डिपके ने आरोप लगाया कि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग किया और मीडिया को विरोध स्थल तक पहुँचने से रोका — द प्रिंट रिपोर्ट। दिल्ली पुलिस की ओर से अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।

लद्दाख की छठी अनुसूची की माँग क्या है?

छठी अनुसूची जनजातीय क्षेत्रों को स्वायत्त ज़िला परिषदों के ज़रिए स्वशासन का अधिकार देती है। लद्दाख के लोग चाहते हैं कि उनकी ज़मीन, संस्कृति और रोज़गार की सुरक्षा के लिए यह संवैधानिक सुरक्षा दी जाए।

वांगचुक की सेहत कैसी है?

द प्रिंट के अनुसार भूख हड़ताल के पांचवें दिन वांगचुक की सेहत गंभीर रूप से बिगड़ गई है। विस्तृत मेडिकल रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई है।

Find out more: