दिल्ली हाईकोर्ट ने Grievance Appellate Committee (GAC) को ध्रुव राठी के विवादित वीडियो पर शिकायत का निपटारा 15 दिन में करने का आदेश दिया है। GAC महीनों से निष्क्रिय बैठी थी। यह केस हिंदी YouTube इकोसिस्टम में डिजिटल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम IT Rules 2021 की शिकायत मशीनरी की अहम कानूनी लड़ाई बन चुका है।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: YouTuber ध्रुव राठी, दिल्ली हाईकोर्ट, और IT Rules 2021 के तहत गठित Grievance Appellate Committee (GAC) — रिपोर्ट्स के अनुसार
  • क्या: दिल्ली HC ने GAC को ध्रुव राठी के विवादित वीडियो से जुड़ी शिकायत पर 15 दिन में फ़ैसला लेने का सख़्त आदेश दिया — Oneindia की रिपोर्ट के मुताबिक
  • कब: जून 2025 — दिल्ली हाईकोर्ट ने यह आदेश हालिया सुनवाई में पारित किया
  • कहाँ: दिल्ली हाईकोर्ट, नई दिल्ली
  • क्यों: GAC ने शिकायत पर कई महीनों तक कोई कार्रवाई नहीं की, जिसके बाद शिकायतकर्ता ने अदालत का रुख किया — रिपोर्ट्स के अनुसार
  • कैसे: शिकायतकर्ता ने ध्रुव राठी के वीडियो के ख़िलाफ़ पहले प्लेटफ़ॉर्म से और फिर GAC से गुहार लगाई; GAC की निष्क्रियता के बाद दिल्ली HC में याचिका दायर हुई, जहाँ कोर्ट ने 15 दिन की डेडलाइन तय की — Oneindia

एक शिकायत दर्ज होती है। महीने बीतते हैं। फ़ाइल धूल खाती है। और फिर एक दिन दिल्ली हाईकोर्ट को कहना पड़ता है — 'पंद्रह दिन, बस।' यह कहानी किसी सरकारी दफ़्तर की लालफ़ीताशाही की नहीं, बल्कि उस तंत्र की है जिसे बनाया गया था डिजिटल शिकायतों के त्वरित समाधान के लिए — IT Rules 2021 के तहत गठित Grievance Appellate Committee, यानी GAC। और निशाने पर है हिंदी YouTube का वह नाम जिसे करोड़ों लोग जानते हैं — ध्रुव राठी।

Oneindia की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली हाईकोर्ट ने GAC को ध्रुव राठी के एक विवादित वीडियो से जुड़ी शिकायत पर 15 दिन के भीतर फ़ैसला सुनाने का सख़्त आदेश दिया है। शिकायतकर्ता ने पहले सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म के ग्रीवांस ऑफ़िसर से गुहार लगाई, वहाँ संतोषजनक जवाब न मिलने पर GAC का दरवाज़ा खटखटाया, लेकिन GAC ने भी महीनों तक कोई सुनवाई नहीं की। आख़िरकार मामला दिल्ली हाईकोर्ट पहुँचा, और कोर्ट ने GAC की इस ठंडी चुप्पी पर सख़्त नाराज़गी जताई।

अब सवाल सिर्फ़ यह नहीं कि ध्रुव राठी का वह वीडियो हटेगा या रहेगा। असली सवाल कहीं ज़्यादा गहरा है — और वह यह है कि IT Rules 2021 के तहत बनी यह शिकायत मशीनरी आख़िर काम कैसे कर रही है, किसके लिए कर रही है, और क्या यह हिंदी YouTube जैसे विशाल डिजिटल लोकतंत्र के लिए एक 'म्यूट बटन' बनती जा रही है।

GAC — 'त्वरित न्याय' का वादा, 'अनंत प्रतीक्षा' की हक़ीक़त

IT Rules 2021 में 2023 के संशोधन के बाद GAC अस्तित्व में आई। सरकार ने कहा था कि यह डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर शिकायतों का तेज़ी से निपटारा करेगी — एक तरह का 'फ़ास्ट-ट्रैक ट्रिब्यूनल'। लेकिन हक़ीक़त क्या है? ध्रुव राठी का मामला ही देख लीजिए — शिकायत दर्ज हुई, महीने गुज़रे, और GAC ने कोई सुनवाई तक नहीं की। यह इकलौता उदाहरण नहीं है। डिजिटल राइट्स से जुड़े विशेषज्ञ और वकील लगातार कह रहे हैं कि GAC के पास न पर्याप्त स्टाफ़ है, न पारदर्शी प्रक्रिया, और न ही कोई सार्वजनिक ट्रैकिंग सिस्टम जहाँ शिकायतकर्ता या कंटेंट क्रिएटर को पता चले कि उनका मामला किस चरण में है।

जब तक GAC ख़ुद चुप बैठी रही, किसी को कोई समस्या नहीं दिखी। लेकिन जिस दिन दिल्ली हाईकोर्ट को दखल देना पड़ा, उस दिन यह साफ़ हो गया कि यह तंत्र अपने मूल उद्देश्य — त्वरित और निष्पक्ष निवारण — से कोसों दूर है। अगर शिकायतकर्ता को हर बार हाईकोर्ट जाना पड़े तो GAC का अस्तित्व क्या है? और अगर कंटेंट क्रिएटर को पता ही न चले कि उसके ख़िलाफ़ क्या शिकायत है, कब सुनवाई है, तो यह 'न्याय' कैसा?

'बैकडोर सेंसरशिप' या जेनुइन शिकायत निवारण — असली सवाल

ध्रुव राठी जैसे क्रिएटर्स, जिनके चैनल पर करोड़ों सब्सक्राइबर्स हैं और जो अक्सर सरकारी नीतियों, सत्ता पक्ष और राजनीतिक दलों पर तीखी टिप्पणी करते हैं — उनके ख़िलाफ़ शिकायतों की बाढ़ कोई नई बात नहीं। बड़ा सवाल यह है: क्या ये शिकायतें ऑर्गेनिक हैं, यानी सचमुच किसी नागरिक को आपत्ति है? या फिर यह 'कोऑर्डिनेटेड कम्प्लेंट कैम्पेन' है — जहाँ राजनीतिक रूप से प्रेरित समूह संगठित तरीके से शिकायतें दर्ज कराते हैं ताकि प्लेटफ़ॉर्म या GAC पर दबाव बने और असुविधाजनक कंटेंट हटवा दिया जाए?

इस बारे में अभी तक कोई पुष्ट सबूत सार्वजनिक नहीं हुआ है कि ध्रुव राठी के मामले में शिकायत किसी संगठित अभियान का हिस्सा है। लेकिन सियासी गलियारों और डिजिटल राइट्स समुदायों में यह चर्चा ज़ोरों पर है कि GAC जैसे तंत्र का इस्तेमाल एक तरह की 'बैकडोर सेंसरशिप' के रूप में किया जा सकता है — जहाँ सीधे प्रतिबंध लगाने की ज़रूरत नहीं, बस शिकायतों का ढेर लगाते जाओ और तंत्र अपना काम करेगा। (यह इंडस्ट्री चर्चा और विश्लेषण पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

पॉलिटिकल पल्स

परदे के पीछे की बात करें तो इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि यह मामला ध्रुव राठी से कहीं आगे की कहानी बता रहा है। हिंदी YouTube आज भारत का सबसे बड़ा 'ओपिनियन मार्केट' है — 50 करोड़ से ज़्यादा हिंदी भाषी इंटरनेट यूज़र्स का अनुमान लगाया जाता है, और इनमें से बड़ी तादाद YouTube पर राजनीतिक कंटेंट देखती है। जब राठी जैसे बड़े चैनल पर शिकायत तंत्र सक्रिय होता है, तो यह सिग्नल हर छोटे-बड़े हिंदी YouTuber तक पहुँचता है — 'अगर वो निशाने पर आ सकते हैं, तो हम तो कुछ भी नहीं।'

ट्रेड हलकों में चर्चा है कि कई हिंदी पॉलिटिकल कमेंट्री चैनल अब 'सेल्फ़-सेंसरशिप' की ओर बढ़ रहे हैं — वीडियो बनाने से पहले सोचते हैं कि कहीं शिकायतों का सैलाब तो नहीं आएगा। यह 'चिलिंग इफ़ेक्ट' — जहाँ सरकार को सीधे कुछ करने की ज़रूरत नहीं, बस तंत्र की मौजूदगी ही काफ़ी है — किसी भी लोकतंत्र के लिए ख़तरे की घंटी है।

दिल्ली HC की 15 दिन की डेडलाइन — न्यायपालिका का संदेश

दिल्ली हाईकोर्ट का यह आदेश दो स्तरों पर पढ़ा जाना चाहिए। पहला — यह GAC की कार्यप्रणाली पर सीधा सवाल है। जब कोर्ट को कहना पड़े कि 'पंद्रह दिन में फ़ैसला करो', तो इसका मतलब है कि कोर्ट ख़ुद मान रहा है कि GAC अपनी ज़िम्मेदारी नहीं निभा रही। दूसरा — यह एक तरह की न्यायिक नज़ीर भी है। अगर कोर्ट GAC को डेडलाइन दे सकता है, तो भविष्य में कोई भी कंटेंट क्रिएटर या शिकायतकर्ता, जिसकी बात GAC नहीं सुन रही, सीधे हाईकोर्ट जा सकता है।

लेकिन यहाँ एक विडंबना भी है। जिस शिकायतकर्ता ने ध्रुव राठी के वीडियो हटवाने की गुहार लगाई, उसे कोर्ट ने राहत दी — GAC को कहा कि सुनो और फ़ैसला करो। लेकिन अगर कल GAC वीडियो हटाने का आदेश देती है, तो क्या ध्रुव राठी को भी उतनी ही आसानी से न्यायिक राहत मिलेगी? या फिर उन्हें सुप्रीम कोर्ट तक की लंबी लड़ाई लड़नी पड़ेगी? यह असमान खेल का मैदान — जहाँ शिकायत करना आसान है लेकिन अपना बचाव करना कठिन — डिजिटल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सबसे बड़ा ख़तरा है।

आगे क्या — तीन संभावित रास्ते

इंडिया हेराल्ड का आकलन है कि अब तीन रास्ते खुले हैं। पहला — GAC 15 दिन में फ़ैसला करती है और वीडियो हटाने का आदेश देती है। अगर ऐसा हुआ, तो यह हर पॉलिटिकल YouTuber के लिए एक ख़तरनाक प्रीसिडेंट बनेगा — कोई भी असुविधाजनक वीडियो शिकायत-GAC-आदेश के रास्ते हटवाया जा सकेगा। दूसरा — GAC शिकायत ख़ारिज करती है। इस सूरत में शिकायतकर्ता सुप्रीम कोर्ट जा सकता है, और मामला कंटेंट मॉडरेशन बनाम अभिव्यक्ति की आज़ादी की संवैधानिक लड़ाई बन सकता है। तीसरा — GAC फिर चुप बैठ जाती है और डेडलाइन तोड़ती है, जो कोर्ट की अवमानना का मामला बनेगा और सरकार की डिजिटल गवर्नेंस की साख पर बड़ा सवाल खड़ा करेगा।

किसी भी रास्ते पर चलिए — हर नतीजा हिंदी YouTube के भविष्य की दिशा तय करेगा। यह अब ध्रुव राठी बनाम एक शिकायतकर्ता का मामला नहीं रहा — यह GAC बनाम डिजिटल लोकतंत्र का मामला है।

और सबसे बेचैन करने वाला सवाल यह है: अगर 50 करोड़ हिंदी भाषी यूज़र्स का सबसे बड़ा ओपिनियन प्लेटफ़ॉर्म — YouTube — एक ऐसे शिकायत तंत्र के रहमोकरम पर आ जाए जिसकी न कोई पारदर्शिता है, न जवाबदेही, न समयसीमा — तो लोकतंत्र में 'बोलने की आज़ादी' का बटन किसके हाथ में होगा?

इस रिपोर्ट में उल्लिखित आरोप नामित स्रोतों के हवाले से हैं और जब तक किसी अदालत ने फ़ैसला नहीं सुनाया, ये अप्रमाणित हैं; न्यायालय में विचाराधीन मामलों की रिपोर्टिंग बिना किसी पूर्वाग्रह के की गई है।

इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।

आँकड़ों में

  • 50 करोड़ से ज़्यादा हिंदी भाषी इंटरनेट यूज़र्स का अनुमान — हिंदी YouTube भारत का सबसे बड़ा ओपिनियन मार्केट
  • GAC को IT Rules 2021 के 2023 संशोधन के बाद गठित किया गया — लेकिन पारदर्शी ट्रैकिंग सिस्टम अभी तक अनुपस्थित
  • दिल्ली HC ने GAC को 15 दिन की सख़्त डेडलाइन दी — Oneindia रिपोर्ट

मुख्य बातें

  • दिल्ली हाईकोर्ट ने GAC को ध्रुव राठी के विवादित वीडियो पर 15 दिन में फ़ैसला लेने का सख़्त आदेश दिया — Oneindia की रिपोर्ट के अनुसार
  • GAC — IT Rules 2021 के तहत 2023 में गठित — महीनों से शिकायत पर निष्क्रिय बैठी थी, जिस पर कोर्ट ने नाराज़गी जताई
  • यह केस हिंदी YouTube इकोसिस्टम में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम सरकारी शिकायत मशीनरी की सबसे अहम कानूनी लड़ाई बन सकता है
  • अगर GAC वीडियो हटाने का आदेश देती है तो यह हर पॉलिटिकल YouTuber के लिए ख़तरनाक प्रीसिडेंट बनेगा
  • डिजिटल राइट्स विशेषज्ञों में चर्चा है कि GAC जैसे तंत्र 'बैकडोर सेंसरशिप' का टूल बन सकते हैं

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

GAC (Grievance Appellate Committee) क्या है और यह कैसे काम करती है?

GAC — Grievance Appellate Committee — IT Rules 2021 में 2023 के संशोधन के बाद गठित एक सरकारी समिति है। अगर किसी सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म का ग्रीवांस ऑफ़िसर किसी शिकायत पर संतोषजनक जवाब नहीं देता, तो शिकायतकर्ता GAC के पास अपील कर सकता है। GAC के पास कंटेंट हटवाने या बहाल करने का अधिकार है।

ध्रुव राठी के किस वीडियो पर शिकायत हुई है?

उपलब्ध रिपोर्ट्स के अनुसार शिकायत ध्रुव राठी के एक विवादित वीडियो पर दर्ज हुई है, लेकिन विशिष्ट वीडियो का नाम और शिकायतकर्ता की पहचान की पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं है। दिल्ली हाईकोर्ट ने GAC को 15 दिन में फ़ैसला लेने का आदेश दिया है।

अगर GAC वीडियो हटाने का आदेश दे तो क्या होगा?

अगर GAC वीडियो हटाने का आदेश देती है, तो यह हिंदी YouTube पर एक बड़ी कानूनी नज़ीर बनेगी — कोई भी राजनीतिक कंटेंट शिकायत-GAC-आदेश के रास्ते हटवाया जा सकेगा। ध्रुव राठी इस फ़ैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती दे सकते हैं।

क्या GAC को 'बैकडोर सेंसरशिप' का टूल माना जा रहा है?

डिजिटल राइट्स विशेषज्ञों और सिविल सोसाइटी समूहों में यह चिंता लगातार जताई जा रही है कि GAC जैसे तंत्र का इस्तेमाल संगठित शिकायत अभियानों के ज़रिए असुविधाजनक कंटेंट हटवाने के लिए किया जा सकता है। हालाँकि इसका कोई पुष्ट सबूत सार्वजनिक नहीं हुआ है।

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