चुनाव आयोग ने तृणमूल कांग्रेस के 'जोड़ा फूल' चिह्न और पार्टी नाम पर ममता बनर्जी और ऋतब्रत बनर्जी दोनों गुटों से जवाब माँगा है। यह ठीक वही रास्ता है जो महाराष्ट्र में शिवसेना और NCP विवाद में दिखा — और बंगाल की सत्ता-राजनीति के लिए यह संकेत गंभीर हैं।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: चुनाव आयोग ने ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले TMC गुट और ऋतब्रत बनर्जी के विद्रोही गुट — दोनों को नोटिस भेजा है।
  • क्या: TMC के आधिकारिक नाम 'ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस' और चुनाव चिह्न 'जोड़ा फूल' (जोड़ा फूल/twin flower) पर दोनों गुटों ने दावा किया है, जिस पर EC ने जवाब तलब किया है।
  • कब: जून 2025 में चुनाव आयोग ने यह नोटिस जारी किया।
  • कहाँ: विवाद पश्चिम बंगाल की राजनीति से जुड़ा है, लेकिन फैसला दिल्ली स्थित चुनाव आयोग मुख्यालय में होगा।
  • क्यों: ऋतब्रत बनर्जी गुट ने खुद को 'असली TMC' बताते हुए पार्टी नाम और चिह्न पर दावा ठोका, जो महाराष्ट्र में शिवसेना-NCP विभाजन की याद दिलाता है।
  • कैसे: चुनाव आयोग ने दोनों गुटों को लिखित जवाब देने को कहा है, जिसमें संगठनात्मक बहुमत, विधायकों-सांसदों का समर्थन और पार्टी संविधान के तहत वैधता के सबूत माँगे गए हैं — ठीक वैसे ही जैसे शिवसेना और NCP विवाद में हुआ था।

एक चुनाव चिह्न — दो फूलों की जोड़ी — जो तीन दशकों से बंगाल की सबसे ताकतवर पार्टी की पहचान रही है। और अब उसी चिह्न पर दो दावेदार खड़े हैं। चुनाव आयोग ने ममता बनर्जी और ऋतब्रत बनर्जी दोनों गुटों को नोटिस भेजकर जवाब माँगा है — कौन है 'असली' तृणमूल कांग्रेस? यह सवाल सुनने में जितना साधारण लगता है, बंगाल की सियासत के लिए उतना ही विस्फोटक है।

टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयोग ने दोनों धड़ों को पत्र लिखकर पार्टी के नाम 'ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस' और चुनाव चिह्न 'जोड़ा फूल' पर अपने-अपने दावों के पक्ष में सबूत माँगे हैं। ऋतब्रत बनर्जी — जो कभी TMC के राज्यसभा सांसद रहे और फिर पार्टी से निकाले गए — ने एक विद्रोही गुट खड़ा कर 'असली TMC' होने का दावा ठोक दिया है।

अब ज़रा याद कीजिए — दो साल पहले महाराष्ट्र में क्या हुआ था। एकनाथ शिंदे ने शिवसेना के बहुसंख्यक विधायकों को अपने साथ लिया, चुनाव आयोग के सामने बहुमत साबित किया, और उद्धव ठाकरे के हाथ से न सिर्फ़ सत्ता बल्कि पार्टी का नाम और 'धनुष-बाण' चिह्न भी छिन गया। NCP में अजित पवार ने वही दोहराया — शरद पवार को उनकी ही पार्टी में 'अल्पमत' में धकेल दिया। वह 'महाराष्ट्र पैटर्न' अब बंगाल के दरवाज़े पर दस्तक दे रहा है।

ऋतब्रत — 'बगावती मोहरा' या 'ट्रोजन हॉर्स'?

ऋतब्रत बनर्जी का राजनीतिक सफ़र किसी बॉलीवुड स्क्रिप्ट से कम नहीं। वामपंथी छात्र राजनीति से निकले, TMC में आए, राज्यसभा पहुँचे, फिर पार्टी अनुशासन तोड़ने और विवादों के बाद निकाले गए। अब वही ऋतब्रत पार्टी पर 'असली उत्तराधिकारी' का दावा लेकर खड़े हैं। सवाल यह है — एक निष्कासित नेता के पास इतनी ताकत कहाँ से आई कि चुनाव आयोग को सुनवाई करनी पड़ रही है?

सियासी गलियारों में जो फुसफुसाहट है, वह कहीं ज़्यादा दिलचस्प है। बंगाल की विपक्षी राजनीति में यह चर्चा ज़ोरों पर है कि ऋतब्रत की इस 'बगावत' को पर्दे के पीछे से भाजपा का रणनीतिक समर्थन मिल रहा है — ठीक वैसे ही जैसे महाराष्ट्र में शिंदे गुट को केंद्र सरकार की छत्रछाया में ताकत मिली थी। ममता बनर्जी के TMC ने भी कई बार यह आरोप दोहराया है कि भाजपा उनकी पार्टी को तोड़ने के लिए हर संभव हथकंडा अपना रही है। भाजपा की ओर से इस विशेष आरोप पर अब तक कोई सीधी प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

चुनाव आयोग का 'टेस्ट' — नंबर गेम ही सब कुछ

चुनाव आयोग के सामने जो प्रक्रिया चल रही है, वह पूरी तरह 'नंबर गेम' है। शिवसेना और NCP विवाद में आयोग ने तीन पैमाने तय किए थे — विधायकों-सांसदों का बहुमत किस गुट के साथ है, पार्टी संगठन (ज़िला-ब्लॉक स्तर) का समर्थन किसे है, और पार्टी संविधान के तहत कौन-सा गुट वैध है।

अगर यही पैमाना बंगाल में लागू होता है, तो ममता बनर्जी की स्थिति फ़िलहाल मज़बूत दिखती है। लोकसभा और विधानसभा में TMC के अधिकांश सांसद-विधायक ममता गुट के साथ हैं। ऋतब्रत के पास न तो विधायकों की सेना है, न सांसदों का समर्थन। लेकिन — और यह 'लेकिन' बहुत बड़ा है — महाराष्ट्र में भी शुरुआत ऐसे ही हुई थी। पहले एक 'कमज़ोर' विद्रोही गुट, फिर धीरे-धीरे विधायकों का 'पलायन', और अंत में चिह्न छीन लिया गया।

टाइम्स ऑफ़ इंडिया के मुताबिक आयोग ने दोनों पक्षों को अपने दावों के समर्थन में दस्तावेज़ पेश करने का समय दिया है। यह प्रक्रिया महीनों खिंच सकती है — और इसी बीच राजनीतिक 'इंजीनियरिंग' का असली खेल चलता है।

पॉलिटिकल पल्स

बंगाल के सियासी हलकों में एक और बात गूँज रही है जो सार्वजनिक बहस में कम दिखती है। ममता बनर्जी के करीबी सूत्रों के हवाले से चर्चा है कि TMC नेतृत्व इस पूरे एपिसोड को '2026 विधानसभा चुनाव से पहले अस्थिरता पैदा करने की साज़िश' मान रहा है। पार्टी के भीतर यह डर है कि भले ही ऋतब्रत का दावा कमज़ोर हो, लेकिन चुनाव आयोग की सुनवाई का सिर्फ़ 'होना' ही पार्टी की छवि को नुकसान पहुँचाता है — यह संदेश जाता है कि TMC में सब ठीक नहीं है।

दूसरी तरफ़, विपक्षी खेमे में अनौपचारिक चर्चा यह है कि ऋतब्रत का यह कदम 'प्रेशर टैक्टिक' है — असली मकसद चिह्न छीनना नहीं, बल्कि TMC के असंतुष्ट नेताओं को संकेत देना है कि 'बाहर निकलने का रास्ता खुला है, और पार्टी-तंत्र का सहारा भी मिलेगा।' (यह इंडस्ट्री चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

ममता के लिए असली ख़तरा क्या है?

सीधे शब्दों में कहें तो ममता बनर्जी के लिए तात्कालिक ख़तरा चिह्न खोने का उतना नहीं है जितना कि इस प्रक्रिया से पैदा होने वाली 'अनिश्चितता' का है। जब तक चुनाव आयोग फ़ैसला नहीं सुनाता, हर असंतुष्ट TMC नेता के मन में एक सवाल घूमता रहेगा — क्या पार्टी बँट सकती है? और जब यह सवाल घूमता है, तो वफ़ादारी की बोली लगने लगती है।

इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि ऋतब्रत बनर्जी का EC के सामने दावा भले ही संख्या के आधार पर टिकने लायक न हो, लेकिन इसका असली मकसद 'महाराष्ट्र मॉडल' का बंगाल संस्करण तैयार करना है — पहले दरार दिखाओ, फिर चौड़ा करो। 2026 का विधानसभा चुनाव अगले साल है, और उससे पहले यह 'सिंबल वॉर' TMC के भीतर का हर गुटीय असंतोष सतह पर ला सकता है। ममता बनर्जी ने अब तक अपनी पार्टी पर जो लोहे का शिकंजा रखा है, उसकी असली परीक्षा अब शुरू हो रही है।

देखने वाली बात यह होगी कि आने वाले हफ़्तों में TMC के कितने नेता खुलकर ममता के पक्ष में आते हैं — और कितने 'चुप' रहते हैं। महाराष्ट्र ने सिखाया है कि सियासत में चुप्पी सबसे ख़तरनाक बगावत होती है।

अभियोग संबंधी अस्वीकरण: यहाँ रिपोर्ट किए गए आरोप नामित स्रोतों को श्रेय दिए गए हैं और जब तक अदालत का फ़ैसला न आए, अप्रमाणित हैं; न्यायाधीन मामलों की रिपोर्टिंग बिना पूर्वाग्रह के की गई है।

इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।

आँकड़ों में

  • चुनाव आयोग ने TMC के दोनों गुटों — ममता और ऋतब्रत — को एक साथ नोटिस भेजा, जो महाराष्ट्र की शिवसेना-NCP प्रक्रिया की तर्ज़ पर है।
  • शिवसेना विवाद में EC ने तीन पैमाने लागू किए थे — विधायक-सांसद बहुमत, संगठनात्मक समर्थन, और पार्टी संविधान की वैधता।
  • पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में है — इस टाइमलाइन ने 'सिंबल वॉर' की राजनीतिक गणना को और तेज़ कर दिया है।

मुख्य बातें

  • चुनाव आयोग ने ममता बनर्जी और ऋतब्रत बनर्जी दोनों गुटों को TMC के नाम और 'जोड़ा फूल' चिह्न पर दावे के समर्थन में सबूत माँगे हैं।
  • यह वही 'महाराष्ट्र पैटर्न' है जिसमें शिवसेना और NCP दोनों पार्टियों के नाम-चिह्न विद्रोही गुटों को सौंपे गए थे।
  • ममता की स्थिति फ़िलहाल संख्या के आधार पर मज़बूत है — अधिकांश सांसद-विधायक उनके साथ — लेकिन 2026 विधानसभा चुनाव से पहले यह 'अनिश्चितता' पार्टी के भीतर दरारें बढ़ा सकती है।
  • सियासी हलकों में ऋतब्रत की बगावत को भाजपा-समर्थित 'प्रेशर टैक्टिक' माना जा रहा है, हालाँकि भाजपा ने इस पर सीधी प्रतिक्रिया नहीं दी है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या ममता बनर्जी TMC का चुनाव चिह्न खो सकती हैं?

फ़िलहाल ममता बनर्जी के पास अधिकांश सांसदों और विधायकों का समर्थन है, इसलिए तत्काल चिह्न खोने की संभावना कम है। लेकिन महाराष्ट्र में शिवसेना-NCP विवाद ने दिखाया है कि अगर विधायकों का 'पलायन' शुरू हो जाए, तो स्थिति तेज़ी से बदल सकती है।

ऋतब्रत बनर्जी कौन हैं और उन्होंने TMC पर दावा क्यों किया?

ऋतब्रत बनर्जी TMC के पूर्व राज्यसभा सांसद हैं जिन्हें पार्टी अनुशासन तोड़ने के आरोप में निष्कासित किया गया था। अब उन्होंने एक विद्रोही गुट बनाकर 'असली TMC' होने का दावा चुनाव आयोग के सामने पेश किया है।

चुनाव आयोग पार्टी चिह्न विवाद में फ़ैसला कैसे करता है?

EC मुख्य रूप से तीन पैमानों पर फ़ैसला करता है — किस गुट के पास विधायकों-सांसदों का बहुमत है, पार्टी संगठन (ज़िला-ब्लॉक स्तर) किसके साथ है, और पार्टी संविधान के तहत कौन-सा गुट वैध है। शिवसेना और NCP विवाद में यही प्रक्रिया अपनाई गई थी।

क्या भाजपा ऋतब्रत बनर्जी को समर्थन दे रही है?

TMC ने यह आरोप लगाया है कि ऋतब्रत की बगावत को भाजपा का रणनीतिक समर्थन मिल रहा है, लेकिन भाजपा की ओर से इस विशेष आरोप पर अब तक कोई सीधी प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

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