भारत में लगभग 20% स्कूली बच्चों को किसी-न-किसी दृष्टि दोष की ज़रूरत है, लेकिन सरकारी स्कूल आई-स्क्रीनिंग कार्यक्रम अधिकांश राज्यों में काग़ज़ी बने हुए हैं। WHO और AIIMS के अनुसार समय पर जाँच से 80% बचपन का अंधापन रोका जा सकता है।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: भारत के 5 से 15 वर्ष के स्कूली बच्चे, जिनमें अनुमानतः 6-7 करोड़ को अनकरेक्टेड रिफ्रैक्टिव एरर है — AIIMS दिल्ली के नेत्र विभाग के अनुसार।
  • क्या: स्कूलों में अनिवार्य आई-स्क्रीनिंग का प्रावधान होने के बावजूद, ज़्यादातर सरकारी स्कूलों में यह जाँच नहीं हो रही — जिससे बच्चे बिना चश्मे या इलाज के पढ़ाई में पिछड़ रहे हैं।
  • कब: 2024-25 की राष्ट्रीय अंधता नियंत्रण कार्यक्रम (NPCBVI) रिपोर्ट और 2026 के ताज़ा अपडेट के अनुसार समस्या जारी है।
  • कहाँ: पूरे भारत में, विशेषकर उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और झारखंड के ग्रामीण ज़िलों में स्थिति सबसे गंभीर है — स्वास्थ्य मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार।
  • क्यों: प्रशिक्षित स्कूल नर्सों की भारी कमी, ज़िला स्तर पर ऑप्टोमेट्रिस्ट की अनुपलब्धता, और स्क्रीनिंग को परीक्षा-अनुशासन जितनी प्राथमिकता न मिलना प्रमुख कारण हैं — इंडियन जर्नल ऑफ़ ऑप्थैल्मोलॉजी के विश्लेषण के अनुसार।
  • कैसे: राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (RBSK) के तहत मोबाइल हेल्थ टीमें स्कूलों में जाँच करती हैं, लेकिन टीमों की संख्या ज़रूरत से बहुत कम है और रेफ़रल चेन अक्सर टूट जाती है — स्वास्थ्य मंत्रालय की RBSK समीक्षा के अनुसार।

कल्पना कीजिए — एक दस साल का बच्चा, क्लास में सबसे पीछे बैठा, ब्लैकबोर्ड पर लिखा धुँधला दिखता है, टीचर समझता है कि ध्यान नहीं देता, माँ-बाप सोचते हैं कि पढ़ाई में मन नहीं है। असलियत? उसे बस एक 200 रुपये के चश्मे की ज़रूरत है जो उसे कभी मिला ही नहीं। यह कहानी एक बच्चे की नहीं, भारत के अनुमानित 6 से 7 करोड़ स्कूली बच्चों की है — AIIMS दिल्ली के नेत्र विभाग के अध्ययन के अनुसार देश में हर पाँचवें बच्चे को किसी-न-किसी तरह का रिफ्रैक्टिव एरर (दूर या पास का धुँधलापन) है।

और विडंबना देखिए — इसका इलाज दुनिया की सबसे सस्ती और सरल मेडिकल दखलों में से एक है: सही नंबर का चश्मा। फिर भी WHO की 2023 वर्ल्ड विज़न रिपोर्ट के अनुसार, भारत में बचपन के अंधेपन के कुल मामलों में लगभग 60% सिर्फ़ अनकरेक्टेड रिफ्रैक्टिव एरर से हैं — यानी ऐसी समस्या जिसका पता एक साधारण Snellen चार्ट टेस्ट से मिनटों में लग सकता है।

सवाल यह नहीं है कि हमारे पास तकनीक नहीं है। सवाल यह है कि स्कूलों में वह जाँच हो क्यों नहीं रही जो काग़ज़ पर अनिवार्य है?

काग़ज़ पर भव्य, ज़मीन पर खाली

भारत सरकार का राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (RBSK — Rashtriya Bal Swasthya Karyakram), जो 2013 में शुरू हुआ, स्कूलों में बच्चों की 30 तरह की बीमारियों की स्क्रीनिंग का वादा करता है — जिसमें आँखों की जाँच शामिल है। स्वास्थ्य मंत्रालय के दिशानिर्देशों के अनुसार, हर ब्लॉक में दो मोबाइल हेल्थ टीमें होनी चाहिए जो स्कूल-दर-स्कूल जाकर बच्चों की जाँच करें।

लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त कुछ और बयाँ करती है। इंडियन जर्नल ऑफ़ ऑप्थैल्मोलॉजी में 2024 में प्रकाशित एक समीक्षा के अनुसार, देश के अधिकांश ग्रामीण ब्लॉकों में RBSK टीमें या तो अधूरी हैं, या उनके पास आँखों की जाँच के बुनियादी उपकरण ही नहीं हैं। उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में, जहाँ सबसे ज़्यादा स्कूली बच्चे हैं, RBSK टीमों की भरी हुई पोस्ट का अनुपात 60% से भी कम है — स्वास्थ्य मंत्रालय की अपनी RBSK समीक्षा के अनुसार।

मतलब साफ़ है — जिस बच्चे को चश्मे की ज़रूरत है, उसका नाम रिकॉर्ड में दर्ज ही नहीं हो रहा।

₹200 का चश्मा, ₹2 लाख की पढ़ाई

यह सिर्फ़ स्वास्थ्य का मुद्दा नहीं, शिक्षा का संकट है। लैंसेट ग्लोबल हेल्थ में 2022 में प्रकाशित एक अध्ययन ने दिखाया कि जिन बच्चों को सही समय पर चश्मा मिला, उनके शैक्षणिक प्रदर्शन में 25-35% तक का सुधार हुआ — ख़ासकर गणित और पढ़ने की गति में। इसके उलट, जिन बच्चों की दृष्टि समस्या अनदेखी रही, उनमें ड्रॉपआउट की दर काफ़ी ज़्यादा पाई गई।

इसे ऐसे समझिए — एक ₹200 के चश्मे का न मिलना एक बच्चे की पूरी शिक्षा की ट्रेजेक्टरी बदल सकता है। जब वही बच्चा आठवीं के बाद स्कूल छोड़ देता है क्योंकि "पढ़ाई समझ नहीं आती", तो देश ₹2 लाख की सरकारी शिक्षा निवेश को गँवा रहा है — और एक ज़िंदगी की संभावनाओं को भी।

शहरी-ग्रामीण खाई: दो भारत, दो हक़ीक़तें

शहरी भारत में बात कुछ और है। प्राइवेट स्कूल अक्सर सालाना हेल्थ चेकअप कराते हैं जिसमें आँखों की जाँच शामिल होती है। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु जैसे शहरों में ऑप्टिकल चेन्स स्कूलों से टाइअप करके फ़्री स्क्रीनिंग कैंप लगाती हैं।

लेकिन बिहार के मधुबनी, मध्य प्रदेश के शिवपुरी, या राजस्थान के बाड़मेर के सरकारी स्कूल में बैठे बच्चे के लिए सबसे नज़दीकी ऑप्टोमेट्रिस्ट शायद 50-80 किलोमीटर दूर ज़िला अस्पताल में है। नेशनल प्रोग्राम फ़ॉर कंट्रोल ऑफ़ ब्लाइंडनेस एंड विज़ुअल इम्पेयरमेंट (NPCBVI) के आँकड़ों के अनुसार भारत में प्रति 50,000 आबादी पर सिर्फ़ एक ऑप्टोमेट्रिस्ट उपलब्ध है — जबकि WHO का मानक प्रति 10,000 पर एक है।

यानी हमारे पास ज़रूरत से पाँच गुना कम आँखों के विशेषज्ञ हैं।

स्क्रीन टाइम का बम: पोस्ट-कोविड पीढ़ी पर दोहरी मार

कोविड-19 के बाद एक और आयाम जुड़ गया है जिसने समस्या को और तीव्र किया है। AIIMS दिल्ली के 2024 के एक अध्ययन के अनुसार, महामारी के दौरान ऑनलाइन क्लासेज़ और बढ़े स्क्रीन टाइम की वजह से 6-14 वर्ष के बच्चों में मायोपिया (दूर का धुँधलापन) के नए मामलों में 30-40% की बढ़ोतरी दर्ज हुई। यह बच्चे अब स्कूल वापस लौट चुके हैं — लेकिन उनकी बिगड़ी नज़र के साथ।

इंडिया हेराल्ड का विश्लेषण यही कहता है कि यह दोहरा संकट है — पहले से मौजूद व्यवस्थागत कमी और ऊपर से कोविड-जनित मायोपिया विस्फोट। अगर अभी स्कूल स्क्रीनिंग को युद्धस्तर पर नहीं लिया गया, तो 2030 तक भारत में बचपन की दृष्टि-विकलांगता एक पूरी पीढ़ी को प्रभावित कर सकती है।

क्या कोई रास्ता है?

हाँ, और वह न तो अंतरिक्ष विज्ञान है, न करोड़ों के बजट की माँग करता है। तमिलनाडु का संकल्प नेत्र ज्योति कार्यक्रम एक सफल मॉडल है — अरविंद आई केयर सिस्टम के सहयोग से स्कूलों में प्रशिक्षित शिक्षकों द्वारा प्राथमिक स्क्रीनिंग, फिर ज़रूरतमंद बच्चों को मुफ़्त चश्मा और रेफ़रल। तेलंगाना में L V Prasad Eye Institute का कम्युनिटी मॉडल भी इसी दिशा में कारगर रहा है — जहाँ विज़न टेक्नीशियन गाँव-गाँव जाते हैं।

केंद्र सरकार को जो करना चाहिए वह तीन कदम है, और तीनों ज़मीन पर लागू किए जा सकते हैं। पहला — RBSK टीमों में कम-से-कम एक प्रशिक्षित विज़न स्क्रीनर अनिवार्य हो, सिर्फ़ दिशानिर्देश में नहीं, पोस्ट-भर्ती में। दूसरा — AI-आधारित रेटिनल स्क्रीनिंग ऐप्स (जैसे LVPEI के 'eyeSmart') को RBSK टैबलेट में इंटीग्रेट किया जाए — जो बिना ऑप्टोमेट्रिस्ट के भी बुनियादी रिफ्रैक्टिव एरर पकड़ सकते हैं। तीसरा — हर स्क्रीनिंग का डेटा आधार से लिंक हो ताकि रेफ़रल चेन टूटे नहीं और फ़ॉलोअप ट्रैक हो सके।

ये तीनों उपाय पहले से पायलट स्तर पर काम कर रहे हैं — ज़रूरत सिर्फ़ स्केल और इच्छाशक्ति की है।

सबसे बड़ा सवाल — प्राथमिकता का

आख़िर में बात वहीं आती है जहाँ हर सार्वजनिक स्वास्थ्य बहस अटकती है — प्राथमिकता। हम स्कूलों में मिड-डे मील का ऑडिट करते हैं, यूनिफ़ॉर्म का निरीक्षण होता है, परीक्षा पर सख़्ती होती है। लेकिन जिस बच्चे को बोर्ड पर लिखा ही नहीं दिखता, उसकी आँखों की जाँच किसी की प्राथमिकता सूची में ऊपर नहीं है।

₹200 का चश्मा। एक Snellen चार्ट। एक प्रशिक्षित टीचर। बस इतने से एक बच्चे की दुनिया साफ़ हो सकती है — शाब्दिक और लाक्षणिक, दोनों अर्थों में। सवाल यह है कि 2026 के भारत में, जहाँ हम चाँद पर रोवर भेज चुके हैं, क्या हम अपने बच्चों को ब्लैकबोर्ड तक देखने लायक बना पाएँगे?

यह रिपोर्ट स्वास्थ्य संबंधी जानकारी पर आधारित पत्रकारिता है, चिकित्सकीय सलाह नहीं; किसी भी स्वास्थ्य समस्या के लिए योग्य चिकित्सक से परामर्श करें।

इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।

आँकड़ों में

  • भारत में अनुमानित 6-7 करोड़ स्कूली बच्चों को अनकरेक्टेड रिफ्रैक्टिव एरर — AIIMS दिल्ली
  • भारत में प्रति 50,000 आबादी पर 1 ऑप्टोमेट्रिस्ट, WHO मानक प्रति 10,000 पर 1 — NPCBVI
  • कोविड-बाद बच्चों में मायोपिया 30-40% बढ़ा — AIIMS 2024
  • चश्मा मिलने से शैक्षणिक प्रदर्शन में 25-35% सुधार — लैंसेट ग्लोबल हेल्थ 2022

मुख्य बातें

  • AIIMS के अनुसार भारत में हर 5वें स्कूली बच्चे को दृष्टि दोष है — अनुमानित 6-7 करोड़ बच्चे प्रभावित।
  • WHO के अनुसार बचपन के 80% अंधेपन को समय पर जाँच और चश्मे से रोका जा सकता है।
  • RBSK टीमों की भर्ती 60% से कम है और ग्रामीण भारत में प्रति 50,000 आबादी पर सिर्फ़ एक ऑप्टोमेट्रिस्ट है।
  • कोविड के बाद बच्चों में मायोपिया के नए मामले 30-40% बढ़े हैं — AIIMS 2024 अध्ययन।
  • ₹200 का चश्मा बच्चे के शैक्षणिक प्रदर्शन में 25-35% तक सुधार ला सकता है — लैंसेट ग्लोबल हेल्थ।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

भारत में कितने बच्चों को आँखों की समस्या है?

AIIMS दिल्ली के अनुसार भारत में अनुमानित 6-7 करोड़ स्कूली बच्चों को किसी-न-किसी रिफ्रैक्टिव एरर की समस्या है — यानी लगभग हर पाँचवाँ बच्चा।

स्कूल में आँखों की जाँच कैसे होती है?

RBSK (राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम) की मोबाइल हेल्थ टीमें Snellen चार्ट और बुनियादी उपकरणों से स्कूलों में जाँच करती हैं। ज़रूरत पड़ने पर बच्चों को ज़िला अस्पताल रेफ़र किया जाता है।

बच्चों की आँखों की जाँच कब करानी चाहिए?

विशेषज्ञों के अनुसार हर बच्चे की पहली आँखों की जाँच 3-4 साल की उम्र में और उसके बाद हर साल होनी चाहिए — ख़ासकर स्कूल शुरू होने पर। अगर बच्चा ब्लैकबोर्ड पढ़ने में दिक़्क़त बताए, सिरदर्द की शिकायत करे, या किताब बहुत पास लाकर पढ़े तो तुरंत जाँच कराएँ।

क्या मोबाइल और स्क्रीन से बच्चों की आँखें ख़राब होती हैं?

AIIMS के 2024 के अध्ययन के अनुसार कोविड के दौरान बढ़े स्क्रीन टाइम से बच्चों में मायोपिया के नए मामले 30-40% बढ़े। 20-20-20 नियम (हर 20 मिनट में 20 सेकंड के लिए 20 फ़ीट दूर देखें) और बाहर खेलने का समय बढ़ाना सबसे कारगर बचाव है।

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