निर्देशक अहमद खान ने India Today को दिए इंटरव्यू में कहा कि सोशल मीडिया रिव्यूअर्स फ़र्स्ट शो ख़त्म होने से पहले ही फ़िल्मों को फ़्लॉप घोषित कर देते हैं। उनके मुताबिक़ एक संगठित 'सिंडिकेट' काम करता है जो मेकर्स को डराता है — लेकिन क्या यह असली शिकायत है या ख़राब कंटेंट का नया बहाना?
तसवीर कुछ ऐसी है — शुक्रवार सुबह साढ़े नौ बजे का शो शुरू हो रहा है, पर्दे पर अभी टाइटल कार्ड भी नहीं आया, और ट्विटर पर पहला वर्डिक्ट पहुँच चुका है: 'डिज़ास्टर।' फ़िल्म का इंटरवल भी नहीं हुआ कि हैशटैग ट्रेंड करने लगता है — #Flop, #Disaster, #WorstFilm। निर्देशक अहमद खान ने India Today को दिए हालिया इंटरव्यू में इसी दर्द को शब्द दिए हैं: सोशल मीडिया फ़िल्मों को रिलीज़ होने से पहले ही मार सकता है।
अहमद खान ने खुलकर कहा कि उनकी नज़र में एक तरह का 'सिंडिकेट' काम करता है — ऐसे रिव्यूअर्स का जाल जो फ़र्स्ट शो ख़त्म होने का इंतज़ार भी नहीं करता और वर्डिक्ट सुना देता है। India Today के अनुसार, खान ने कहा कि इन रिव्यूअर्स को व्यूज़ और एंगेजमेंट चाहिए, और नेगेटिव कंटेंट ज़्यादा वायरल होता है — इसलिए 'फ़्लॉप' बोलना उनके लिए बिज़नेस मॉडल बन गया है। उनके मुताबिक़ बॉलीवुड में कई मेकर्स इन रिव्यूअर्स से डरते हैं, कुछ तो पहले से 'मैनेज' करने की कोशिश करते हैं।
यह शिकायत अहमद खान की अकेली नहीं है। पिछले कुछ सालों में विवेक अग्निहोत्री से लेकर अनुराग कश्यप तक — इंडस्ट्री के अलग-अलग खेमों के लोगों ने सोशल मीडिया रिव्यू कल्चर पर सवाल उठाए हैं। ट्रेड एनालिस्ट तरण आदर्श ने कई मौक़ों पर कहा है कि ओपनिंग डे के आँकड़े अब थिएटर की टिकट खिड़की से नहीं, ट्विटर की टाइमलाइन से तय होने लगे हैं। यानी समस्या पुरानी है — अहमद खान ने बस उसे एक नया नाम दे दिया है: सिंडिकेट।
इनसाइड टॉक
इंडस्ट्री की गलियारों में जो बात ज़ोर-ज़ोर से फुसफुसाई जाती है, वह यह है कि कुछ बड़े यूट्यूब रिव्यू चैनल्स के साथ प्रोडक्शन हाउसेज़ की 'अनकही डील' होती है — पॉज़िटिव रिव्यू के बदले स्क्रीनिंग पास, इंटरव्यू एक्सेस, और कभी-कभी कुछ और। ट्रेड हलकों में चर्चा है कि जब यह डील नहीं बनती, तो वही चैनल सबसे पहले 'डिज़ास्टर' का ठप्पा लगाता है। फ़ैन्स मानते हैं कि कई रिव्यूअर्स ने फ़िल्म देखी भी नहीं होती जब वे वर्डिक्ट दे रहे होते हैं — बस ट्विटर पर चल रही हवा को पकड़कर अपना वीडियो बना लेते हैं। (यह इंडस्ट्री चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू भी उतना ही तीखा है। अगर 'बागी 3' या 'हीरोपंती 2' जैसी फ़िल्में बॉक्स ऑफ़िस पर धराशायी हुईं, तो क्या इसके लिए सोशल मीडिया ज़िम्मेदार है — या वह कंटेंट जो दर्शक को अपमानित करता है? India Today की ही रिपोर्ट के अनुसार, अहमद खान ने माना कि अच्छी फ़िल्में आख़िरकार अपनी जगह बना ही लेती हैं। तो फिर सवाल यह है: अगर क्वालिटी कंटेंट सोशल मीडिया की 'सिंडिकेट' को भी पछाड़ सकता है, तो शिकायत आख़िर किसकी है — सिस्टम की, या ख़ुद की फ़िल्म की?
यहीं इंडिया हेराल्ड की पड़ताल एक अहम मोड़ पर पहुँचती है। असलियत शायद दोनों के बीच में है। सोशल मीडिया पर एक इकोसिस्टम ज़रूर बना है जहाँ नेगेटिविटी बिकती है — यह सच है। एक ट्वीट कई बार ₹50-60 लाख के मार्केटिंग बजट को बेकार कर सकता है, यह भी सच है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर फ़्लॉप के पीछे कोई साज़िश है। अक्षय कुमार की हालिया रिलीज़ और Alpha की टक्कर ने दिखाया कि दर्शक अभी भी थिएटर जाता है — बशर्ते पर्दे पर कुछ दिखाने लायक़ हो। और शाहरुख़-फराह ख़ान की अधूरी फ़िल्म वाला किस्सा बताता है कि बॉलीवुड की सबसे बड़ी समस्या सोशल मीडिया नहीं, बल्कि अपने ही प्रोजेक्ट्स को पूरा करने की प्रतिबद्धता है।
असली ख़तरा कहीं और है। जब कोई निर्देशक 'सिंडिकेट' का नाम लेता है, तो वह अनजाने में उन लाखों आम दर्शकों की आवाज़ को भी 'प्लांटेड' बता रहा होता है जो ईमानदारी से अपनी राय रखते हैं। 2026 में भारत में 80 करोड़ से ज़्यादा स्मार्टफ़ोन यूज़र्स हैं — Statista के अनुमान के अनुसार। हर शख़्स अब क्रिटिक है। आप उसे सिंडिकेट नहीं कह सकते सिर्फ़ इसलिए कि उसने आपकी फ़िल्म पसंद नहीं की।
बॉलीवुड के लिए आगे का रास्ता सीधा है, पर कड़वा है: बेहतर फ़िल्में बनाओ। 'पठान' आई तो सोशल मीडिया ने उसे ₹1000 करोड़ तक पहुँचाया, 'बागी 3' आई तो उसी सोशल मीडिया ने उसे दफ़ना दिया। प्लेटफ़ॉर्म वही था — फ़र्क़ कंटेंट का था। अहमद खान की बात में आधा सच ज़रूर है कि कुछ रिव्यूअर्स बेईमान हैं। लेकिन पूरे सिस्टम को 'सिंडिकेट' कहना वैसा ही है जैसे ट्रैफ़िक में फँसकर सड़क को गाली देना — सड़क वही है, गाड़ी आपकी चलानी है।
आने वाले दिनों में देखना यह है कि क्या बॉलीवुड प्रोड्यूसर्स मिलकर किसी तरह की 'रिव्यू रेगुलेशन' की माँग करते हैं — ट्रेड सर्कल में ऐसी फुसफुसाहट पहले से है। अगर ऐसा हुआ, तो यह फ़्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन बनाम कॉर्पोरेट हित की एक बिलकुल नई बहस खोलेगा। और उस बहस में जीतेगा वही जो दर्शक की नब्ज़ पहचानता है — वह रिव्यूअर, जो सच बोलता है, या वह मेकर, जो सच दिखाता है।
तो अगली बार जब कोई निर्देशक कहे कि सोशल मीडिया ने उसकी फ़िल्म मार दी — पूछिएगा ज़रूर: भाई, फ़िल्म में था क्या?
Reported and written with AI assistance under India Herald's editorial standards; a human editor governs publication.
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मुख्य बातें
- अहमद खान ने India Today को बताया कि सोशल मीडिया रिव्यूअर्स का एक 'सिंडिकेट' फ़िल्मों को फ़र्स्ट शो ख़त्म होने से पहले ही फ़्लॉप कर देता है।
- इंडस्ट्री में चर्चा है कि कुछ बड़े रिव्यू चैनल्स पॉज़िटिव रिव्यू के बदले एक्सेस और डील माँगते हैं — डील न बनने पर नेगेटिव वर्डिक्ट देते हैं।
- भारत में 80 करोड़+ स्मार्टफ़ोन यूज़र्स (Statista अनुमान) के दौर में हर दर्शक क्रिटिक है — पूरे सिस्टम को 'सिंडिकेट' कहना आम दर्शकों की आवाज़ को नकारना है।
- 'पठान' और 'बागी 3' एक ही सोशल मीडिया पर रिलीज़ हुईं — फ़र्क़ कंटेंट का था, प्लेटफ़ॉर्म का नहीं।
- आने वाले दिनों में 'रिव्यू रेगुलेशन' की माँग एक नई बहस खोल सकती है — फ़्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन बनाम कॉर्पोरेट हित।
आँकड़ों में
- भारत में 80 करोड़+ स्मार्टफ़ोन यूज़र्स — Statista अनुमान 2026
- 'पठान' ने ₹1000 करोड़+ ग्लोबल कलेक्शन किया — वही सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर







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