भारत में अनुमानित 70% से अधिक लोग बिना डॉक्टरी सलाह के दवाएँ लेते हैं। WHO और ICMR के अनुसार यह आदत एंटीबायोटिक रेज़िस्टेंस, लिवर-किडनी डैमेज और गम्भीर साइड-इफ़ेक्ट्स का सबसे बड़ा कारण बन रही है — एक ख़ामोश स्वास्थ्य संकट जिसे अभी रोका जा सकता है।
एक बुखार आया। सिरदर्द हुआ। पेट में मरोड़ उठी। और आपने वही किया जो भारत का हर दूसरा आदमी करता है — नज़दीकी मेडिकल स्टोर गए, केमिस्ट को लक्षण बताए, और बिना किसी जाँच या प्रिस्क्रिप्शन के दवा की पत्ती लेकर घर आ गए। शायद वही गोली जो पिछली बार काम कर गई थी — या जो पड़ोसी ने बताई।
यह दृश्य इतना आम है कि कोई इसे ख़तरनाक मानता ही नहीं। लेकिन आँकड़े कुछ और कहते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुमान के अनुसार भारत में 70% से अधिक लोग बिना डॉक्टरी सलाह के दवाएँ लेते हैं। और ICMR (Indian Council of Medical Research) के शोध बार-बार चेतावनी दे रहे हैं: यह आदत भारत को एक ऐसे स्वास्थ्य संकट की ओर धकेल रही है जो किसी महामारी से कम ख़तरनाक नहीं।
सवाल यह नहीं है कि लोग ऐसा क्यों करते हैं — इसका जवाब तो सामने है: डॉक्टर की फ़ीस ₹500-₹1000, लैब टेस्ट का ख़र्चा, काम से छुट्टी, और फिर लम्बी लाइन। बनाम ₹10 की पैरासिटामोल या ₹30 की एंटीबायोटिक जो केमिस्ट तुरन्त दे देता है। असली सवाल यह है: इस 'सस्ती' आदत की असली क़ीमत क्या है?
एंटीबायोटिक रेज़िस्टेंस — जब दवा ही काम करना बन्द कर दे
The Lancet में 2024 में प्रकाशित एक व्यापक अध्ययन के अनुसार भारत दुनिया में एंटीबायोटिक रेज़िस्टेंस से सबसे ज़्यादा प्रभावित देशों में है। इसका सबसे बड़ा कारण? बिना ज़रूरत और बिना पूरा कोर्स किए एंटीबायोटिक्स का इस्तेमाल। जब आप सर्दी-ज़ुकाम जैसी वायरल बीमारी में अमॉक्सिसिलिन या एज़िथ्रोमाइसिन खा लेते हैं — जो बैक्टीरिया के लिए बनी हैं, वायरस के लिए नहीं — तो आपके शरीर के बैक्टीरिया इन दवाओं के ख़िलाफ़ ढाल बना लेते हैं।
नतीजा? जब सच में ज़रूरत पड़ती है — निमोनिया, टीबी, सेप्सिस — तो वही दवा बेअसर हो जाती है। ICMR की सर्विलांस रिपोर्ट्स के अनुसार भारत में कई आम बैक्टीरियल इन्फ़ेक्शन्स अब फ़र्स्ट-लाइन एंटीबायोटिक्स से ठीक नहीं हो रहे। डॉक्टरों को मजबूरन आख़िरी विकल्प वाली महँगी और ज़्यादा साइड-इफ़ेक्ट वाली दवाएँ देनी पड़ रही हैं।
दर्दनिवारक गोलियाँ — किडनी और लिवर पर ख़ामोश हमला
पैरासिटामोल, आइबुप्रोफ़ेन, डाइक्लोफ़ेनैक — ये नाम हर भारतीय घर की दवाई की डिब्बी में मिलेंगे। 'दर्द हुआ, गोली ले ली' — इतना सरल। लेकिन नेफ़्रोलॉजी (किडनी विज्ञान) के विशेषज्ञों की चेतावनी अलग है। Journal of the American Society of Nephrology में प्रकाशित शोधों के अनुसार NSAIDs (नॉन-स्टेरॉइडल एंटी-इन्फ़्लेमेटरी ड्रग्स) का लगातार बिना निगरानी के इस्तेमाल क्रॉनिक किडनी डिज़ीज़ (CKD) का एक प्रमुख कारण है।
और पैरासिटामोल? 'सबसे सुरक्षित दवा' का तमग़ा लगे इस गोली की ओवरडोज़ दुनिया भर में एक्यूट लिवर फ़ेल्योर का सबसे आम कारण है — यह तथ्य WHO की ड्रग सेफ़्टी बुलेटिन में दर्ज है। समस्या यह है कि 'ओवरडोज़' का मतलब दस-बीस गोली एक साथ खाना नहीं — हर 4-6 घंटे में एक-दो गोली लगातार कई दिन तक खाना भी लिवर को चुपचाप नुकसान पहुँचाता है।
कोविड ने जो सिखाया, वो ग़लत सीखा
2020-21 की महामारी ने भारत में सेल्फ़-मेडिकेशन को एक नई ऊँचाई दी। एज़िथ्रोमाइसिन, आइवरमेक्टिन, डॉक्सीसाइक्लिन, ज़िंक-विटामिन-C की गोलियाँ — WhatsApp फ़ॉरवर्ड्स और यूट्यूब 'डॉक्टरों' की सलाह पर लोगों ने ख़ुद अपना इलाज किया। Indian Journal of Public Health में प्रकाशित सर्वे के अनुसार कोविड के दौरान सेल्फ़-मेडिकेशन की दर 80% से ऊपर पहुँच गई थी।
महामारी गई, लेकिन आदत रह गई। अब हर मौसमी बुख़ार में वही 'कोविड किट' निकल आती है। इस मानसिकता ने दो ख़तरनाक चीज़ें की हैं: पहला, लोगों को यक़ीन हो गया कि वे ख़ुद अपने डॉक्टर हैं; दूसरा, एंटीबायोटिक रेज़िस्टेंस की रफ़्तार और तेज़ हो गई।
केमिस्ट की दुकान — बिना लाइसेंस का क्लिनिक
भारत में फ़ार्मेसी रेग्युलेशन की हालत किसी से छिपी नहीं। Central Drugs Standard Control Organisation (CDSCO) के नियमों के अनुसार Schedule H और H1 की दवाएँ बिना प्रिस्क्रिप्शन नहीं बेची जा सकतीं। लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त? लगभग हर मेडिकल स्टोर पर एंटीबायोटिक्स, स्टेरॉइड्स, यहाँ तक कि कुछ नशीली दवाएँ बिना पर्ची के मिल जाती हैं। ड्रग इंस्पेक्टरों की कमी और ढीले प्रवर्तन ने केमिस्ट की दुकान को अनौपचारिक क्लिनिक बना दिया है।
इंडिया हेराल्ड का स्पष्ट आकलन यह है कि जब तक भारत अपने फ़ार्मेसी रेग्युलेशन को ज़मीन पर लागू नहीं करता और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा को सस्ती और सुलभ नहीं बनाता, तब तक सेल्फ़-मेडिकेशन पर लाख नसीहतें बेअसर रहेंगी। यह समस्या व्यक्तिगत लापरवाही की नहीं — यह सिस्टम की विफलता की है। आने वाले दशक में अगर एंटीबायोटिक रेज़िस्टेंस का संकट विस्फोटक स्तर पर पहुँचता है, तो इसकी जड़ यहीं मिलेगी — उस मेडिकल स्टोर के काउंटर पर जहाँ बिना सवाल के दवा बिकती है।
तो करना क्या चाहिए — ठोस बातें, नसीहत नहीं
पहला और सबसे ज़रूरी: बुख़ार तीन दिन से ज़्यादा है, दर्द बार-बार लौट रहा है, या कोई नया लक्षण है — तो डॉक्टर के पास जाइए, केमिस्ट के पास नहीं। WHO की गाइडलाइन स्पष्ट है: एंटीबायोटिक सिर्फ़ डॉक्टर की सलाह पर लें, और पूरा कोर्स करें — बीच में छोड़ना सबसे ख़तरनाक है।
दूसरा: पैरासिटामोल सुरक्षित है, लेकिन 24 घंटे में 4 ग्राम (यानी 500mg की 8 गोलियाँ) से ज़्यादा नहीं — और वो भी लगातार कई दिन नहीं। अगर दर्द इतना है कि रोज़ गोली चाहिए, तो यह शरीर का संकेत है कि कुछ ग़लत है।
तीसरा: WhatsApp पर आई किसी भी 'चमत्कारी इलाज' को बिना विश्वसनीय मेडिकल स्रोत की पुष्टि के न अपनाएँ। एक फ़ॉरवर्ड की क़ीमत आपकी किडनी या लिवर हो सकती है।
आख़िर में एक सवाल जो हर भारतीय से है: आप अपनी गाड़ी बिना मैकेनिक के ठीक करने की हिम्मत नहीं करते — तो अपने शरीर को बिना डॉक्टर के ठीक करने की हिम्मत कहाँ से आती है? दवाई की वो सस्ती गोली जो आज ₹5 में समस्या 'हल' कर रही है, कल ₹5 लाख के डायलिसिस का रास्ता खोल सकती है। सवाल यह नहीं कि डॉक्टर के पास जाने का ख़र्चा कितना है — सवाल यह है कि न जाने का ख़र्चा कितना होगा।
यह रिपोर्ट पत्रकारिता है, चिकित्सा सलाह नहीं; किसी भी स्वास्थ्य समस्या के लिए योग्य चिकित्सक से परामर्श लें।
इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।
मुख्य बातें
- WHO के अनुमान के अनुसार भारत में 70%+ लोग बिना डॉक्टरी सलाह के दवाएँ लेते हैं — यह दुनिया में सर्वाधिक दरों में से एक है।
- ICMR सर्विलांस के अनुसार भारत में कई आम इन्फ़ेक्शन अब फ़र्स्ट-लाइन एंटीबायोटिक्स से ठीक नहीं हो रहे — सेल्फ़-मेडिकेशन इसका प्रमुख कारण।
- NSAIDs का लगातार बिना निगरानी के सेवन क्रॉनिक किडनी डिज़ीज़ का प्रमुख कारण — Journal of the American Society of Nephrology।
- कोविड के बाद सेल्फ़-मेडिकेशन की आदत और गहरी हुई — Indian Journal of Public Health के अनुसार महामारी के दौरान दर 80%+ थी।
- समस्या सिर्फ़ व्यक्तिगत नहीं, सिस्टम की है — CDSCO के नियम ज़मीन पर लागू नहीं, ड्रग इंस्पेक्टरों की भारी कमी।
आँकड़ों में
- भारत में 70%+ लोग बिना डॉक्टरी सलाह के दवा लेते हैं — WHO अनुमान
- कोविड महामारी के दौरान सेल्फ़-मेडिकेशन दर 80%+ — Indian Journal of Public Health
- पैरासिटामोल ओवरडोज़ दुनिया भर में एक्यूट लिवर फ़ेल्योर का सबसे आम कारण — WHO Drug Safety Bulletin
- पैरासिटामोल की सुरक्षित सीमा: 24 घंटे में अधिकतम 4 ग्राम — WHO गाइडलाइन

click and follow Indiaherald WhatsApp channel