मनरेगा में अनिवार्य डिजिटल हाजिरी (NMMS ऐप) ने यूपी-बिहार के गांवों में मजदूरी भुगतान में हफ्तों की देरी पैदा कर दी है। नेटवर्क न मिलने, स्मार्टफोन न होने और तकनीकी गड़बड़ियों से लाखों मजदूरों का काम रिकॉर्ड ही नहीं हो पाता, जिससे BJP का 'लाभार्थी राजनीति' मॉडल ज़मीन पर चरमरा रहा है।

एक मजदूर सुबह पांच बजे उठता है, पांच किलोमीटर पैदल चलकर मनरेगा की साइट पर पहुंचता है, दिनभर मिट्टी खोदता है — और शाम को पता चलता है कि उसकी हाजिरी 'लगी ही नहीं'। वजह? फोन में नेटवर्क नहीं आया। यह कहानी यूपी के बुंदेलखंड की है, बिहार के कोसी अंचल की है, एमपी के विंध्य की है। और यह एक-दो मज़दूरों की नहीं, लाखों की कहानी है।

दिल्ली से देखें तो तस्वीर बड़ी साफ-सुथरी दिखती है: 'डिजिटल इंडिया' का झंडा, भ्रष्टाचार पर डिजिटल ताला, फर्जी हाजिरी का खात्मा। लेकिन गांव से देखें तो यही डिजिटल ताला असली मजदूर की रोटी पर लग गया है। केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय ने NMMS (National Mobile Monitoring System) ऐप को मनरेगा कार्यस्थलों पर अनिवार्य किया ताकि 'घोस्ट वर्कर्स' पकड़े जा सकें। नियम सीधा है — दिन में दो बार GPS-आधारित सेल्फी ऐप पर अपलोड करो, वरना हाजिरी शून्य।

सुनने में तर्कसंगत लगता है। लेकिन ज़मीन पर यह तर्क उन गांवों में पहुंचता है जहां बिजली बारह घंटे आती है, इंटरनेट कनेक्टिविटी 2G से बेहतर नहीं है, और एक स्मार्टफोन पूरे परिवार की पूंजी है। TRAI की 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक भारत के ग्रामीण इलाकों में अभी भी करीब 35-40% आबादी के पास स्मार्टफोन नहीं है। मनरेगा मजदूर जो ₹250-350 रोज़ कमाता है, उससे ₹8,000-10,000 का स्मार्टफोन रखने की उम्मीद करना — यह नीति है या मज़ाक?

द हिंदू की एक रिपोर्ट ने बताया कि NMMS ऐप लागू होने के बाद कई राज्यों में मनरेगा में 'एक्टिव वर्कर्स' की संख्या काग़ज़ पर तेज़ी से गिरी — लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मजदूरों ने काम छोड़ दिया; इसका मतलब यह है कि उनकी हाजिरी सिस्टम में दर्ज ही नहीं हो पा रही। इंडियन एक्सप्रेस ने यूपी के कई जिलों से रिपोर्ट किया कि ग्राम रोज़गार सहायकों (GRS) को एक फोन से दर्जनों मजदूरों की सेल्फी लेनी पड़ती है — कभी-कभी एक ही व्यक्ति अलग-अलग लोगों की हाजिरी लगा रहा होता है, यानी जिस 'फर्जीवाड़े' को रोकने के लिए ऐप बना, वही नए रूप में लौट आया।

पॉलिटिकल पल्स

सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि ग्रामीण विकास मंत्रालय को भी अंदरूनी रिपोर्ट्स मिल रही हैं कि NMMS के कारण मनरेगा में 'ड्रॉपआउट' बढ़ रहा है — लेकिन इसे सार्वजनिक रूप से स्वीकार करना 'डिजिटल इंडिया' नैरेटिव के लिए झटका होगा। पार्टी के अंदर के लोग मानते हैं कि 2024 लोकसभा चुनाव में ग्रामीण सीटों पर जो अप्रत्याशित नुकसान हुआ, उसमें मनरेगा की ज़मीनी गड़बड़ियों का एक अनकहा हिस्सा था। विपक्ष अभी तक इस मुद्दे को केंद्रित तरीके से नहीं उठा पाया है — लेकिन अगर राहुल गांधी या अखिलेश यादव इसे '2027 यूपी' का मुद्दा बना लें, तो BJP के लिए यह उसी 'लाभार्थी' दीवार में सेंध होगी जिसे पार्टी अभेद्य मानती रही है।

(यह राजनीतिक हलकों की चर्चा और विश्लेषण पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

असली ख़तरा यह है कि मनरेगा सिर्फ एक योजना नहीं है — यह ग्रामीण भारत का सबसे बड़ा 'सर्वाइवल नेट' है। 2005 में UPA सरकार ने इसे कानूनी अधिकार के रूप में बनाया था, और BJP ने सत्ता में आने के बाद इसे खत्म करने की बजाय अपना लिया — क्योंकि ₹60,000 करोड़+ सालाना बजट वाली योजना को बंद करने की राजनीतिक कीमत बहुत भारी है। लेकिन 'डिजिटल अपग्रेड' के ज़रिए इसे धीरे-धीरे इतना जटिल बना दिया गया है कि सबसे ज़रूरतमंद लोग ही इससे बाहर हो रहे हैं। CAG की ऑडिट रिपोर्ट्स बार-बार रेखांकित करती रही हैं कि मनरेगा में भुगतान में देरी एक 'सिस्टमिक' समस्या है — औसतन 30-45 दिन की देरी, जबकि कानून 15 दिन में भुगतान का वादा करता है।

राजस्थान में जब VB-GRAMG (Video Based – GRAM Geo-tagging) सिस्टम लागू हुआ तो गांवों में इतना बवाल मचा कि इंडिया हेराल्ड ने विस्तार से रिपोर्ट किया कि कैसे BJP अपनी ही ज़मीन खोद रही है। वही पैटर्न अब यूपी और बिहार में दिख रहा है — बस आवाज़ अभी धीमी है क्योंकि हिंदी बेल्ट में विपक्ष संगठित नहीं है।

इसे एक नंबर से समझिए: मनरेगा में 2024-25 में कुल 5.6 करोड़ से ज़्यादा परिवारों ने काम मांगा — सरकारी आंकड़ों के मुताबिक। लेकिन औसतन हर परिवार को साल में मात्र 40-48 दिन का काम मिला, जबकि कानून 100 दिन की गारंटी देता है। डिजिटल हाजिरी ने इस खाई को और चौड़ा किया है — जो मजदूर पहले 50-60 दिन काम कर लेता था, अब ऐप की अड़चन से 30-35 दिन ही 'रिकॉर्ड' हो पाते हैं।

इस पूरे संकट के पीछे की असली चाल को इंडिया हेराल्ड बेबाकी से डिकोड कर रहा है: यह सिर्फ 'तकनीकी गड़बड़ी' नहीं है — यह एक राजनीतिक डिज़ाइन है। डिजिटल अनिवार्यता लागू करने से फर्जी हाजिरी रुकी या नहीं, यह बहस का विषय है; लेकिन इससे मनरेगा का बजट 'कम खर्च' दिखाना ज़रूर आसान हो गया। जब हाजिरी ही रिकॉर्ड न हो, तो भुगतान का सवाल ही नहीं उठता — और सरकार दिखा सकती है कि 'मांग कम है'। यह एक शांत, बिना शोर-शराबे वाला बजट कट है — बिना 'मनरेगा बंद' का ऐलान किए।

सवाल यह है कि BJP इस खेल को कब तक खेल सकती है। परिसीमन की बहस में यूपी-बिहार को अधिक सीटें मिलने की संभावना पर जो राजनीतिक गणित बन रहा है, उसमें ग्रामीण मतदाता की नाराज़गी किसी भी 'सीट बोनस' को बेकार कर सकती है। 2024 में यूपी में BJP को जो 29 सीटों का झटका लगा, उसकी एक अनकही वजह ग्रामीण योजनाओं में ज़मीनी खामियां थीं — और मनरेगा उस सूची में सबसे ऊपर है।

आने वाले महीनों में देखने लायक यह होगा कि क्या सरकार NMMS ऐप की अनिवार्यता में कोई 'ऑफलाइन मोड' या छूट देती है — कुछ राज्यों ने इसकी मांग पहले ही की है। अगर 2027 यूपी चुनाव से पहले यह 'डिजिटल सख्ती' नरम नहीं हुई, तो हिंदी बेल्ट के उन्हीं गांवों में जहां से 'मोदी की गारंटी' का नारा उठता था, एक नया नारा बन सकता है: 'मजदूरी दो, ऐप हटाओ।' और जिस दिन यह नारा संगठित हुआ, BJP का 'लाभार्थी किला' अभेद्य नहीं रहेगा।

Reported and written with AI assistance under India Herald's editorial standards; a human editor governs publication.

इस रिपोर्ट में उल्लिखित आरोप और शिकायतें नामित स्रोतों को दी गई हैं और जब तक अदालत न कहे, अप्रमाणित हैं; न्यायाधीन मामले बिना पूर्वग्रह के रिपोर्ट किए गए हैं।

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मुख्य बातें

  • NMMS ऐप ने मनरेगा में 'डिजिटल हाजिरी' अनिवार्य की, लेकिन गांवों में नेटवर्क और स्मार्टफोन की कमी से लाखों असली मजदूरों की हाजिरी ही दर्ज नहीं हो पा रही।
  • CAG रिपोर्ट्स के अनुसार मनरेगा भुगतान में औसतन 30-45 दिन की देरी है, जबकि कानून 15 दिन का वादा करता है।
  • 2024-25 में 5.6 करोड़+ परिवारों ने काम मांगा लेकिन औसतन 40-48 दिन ही काम मिला — 100 दिन की गारंटी से बहुत कम।
  • यह 'डिजिटल सख्ती' बिना ऐलान के बजट कटौती का काम कर रही है — हाजिरी न दर्ज होने से भुगतान का सवाल ही खत्म।
  • 2027 यूपी चुनाव से पहले अगर यह नाराज़गी संगठित हुई, तो BJP का 'लाभार्थी वोट बैंक' गंभीर ख़तरे में आ सकता है।

आँकड़ों में

  • TRAI 2025: ग्रामीण भारत में 35-40% आबादी के पास अभी भी स्मार्टफोन नहीं
  • मनरेगा 2024-25: 5.6 करोड़+ परिवारों ने काम मांगा, औसतन 40-48 दिन काम मिला (100 दिन की गारंटी बनाम)
  • CAG: मनरेगा भुगतान में औसतन 30-45 दिन की देरी — कानूनी सीमा 15 दिन
  • मनरेगा सालाना बजट: ₹60,000 करोड़+
  • 2024 लोकसभा: यूपी में BJP को 29 सीटों का नुकसान

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: यूपी, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान के ग्रामीण मनरेगा मजदूर — जिनमें बड़ी संख्या दलित और अति पिछड़ा वर्ग की है।
  • क्या: मनरेगा में NMMS (National Mobile Monitoring System) ऐप से अनिवार्य डिजिटल हाजिरी लागू होने के बाद मजदूरी भुगतान में गंभीर देरी और फर्जी 'अनुपस्थिति' दर्ज होने की शिकायतें तेज़ी से बढ़ी हैं।
  • कब: 2023 से NMMS ऐप लागू, 2025-26 में शिकायतें चरम पर — ग्रामीण रोज़गार गारंटी कानून 2005 से लागू।
  • कहाँ: उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और झारखंड के दूरदराज़ गांव — जहां मोबाइल नेटवर्क और इंटरनेट कनेक्टिविटी सबसे कमज़ोर है।
  • क्यों: केंद्र सरकार ने फर्जी हाजिरी रोकने के लिए GPS-आधारित ऐप अनिवार्य किया, लेकिन ज़मीनी इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार नहीं होने से असली मजदूर ही सिस्टम से बाहर हो रहे हैं।
  • कैसे: मजदूरों को दिन में दो बार NMMS ऐप पर जियो-टैग्ड सेल्फी अपलोड करनी होती है; नेटवर्क न मिलने पर हाजिरी दर्ज नहीं होती, जिससे भुगतान अटक जाता है या कट जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

मनरेगा में NMMS ऐप क्या है और यह कैसे काम करता है?

NMMS (National Mobile Monitoring System) केंद्र सरकार का ऐप है जिसमें मनरेगा मजदूरों को दिन में दो बार GPS-आधारित सेल्फी अपलोड करनी होती है। इससे कार्यस्थल पर उनकी उपस्थिति डिजिटल रूप से दर्ज होती है। अगर नेटवर्क या फोन न हो तो हाजिरी दर्ज नहीं होती और मजदूरी कट जाती है।

मनरेगा में भुगतान में कितनी देरी हो रही है?

CAG की ऑडिट रिपोर्ट्स के अनुसार मनरेगा भुगतान में औसतन 30-45 दिन की देरी हो रही है, जबकि कानून के तहत 15 दिन में भुगतान अनिवार्य है। NMMS ऐप की तकनीकी अड़चनों ने इस देरी को और बढ़ाया है।

क्या डिजिटल हाजिरी से मनरेगा में भ्रष्टाचार कम हुआ है?

सरकार का दावा है कि NMMS ऐप से फर्जी हाजिरी रुकी है। लेकिन ज़मीनी रिपोर्ट्स बताती हैं कि एक ही GRS का फोन दर्जनों मजदूरों की हाजिरी के लिए इस्तेमाल हो रहा है — यानी फर्जीवाड़ा नए रूप में लौट आया है, जबकि असली मजदूर सिस्टम से बाहर हो रहे हैं।

2027 यूपी चुनाव पर मनरेगा संकट का क्या असर हो सकता है?

मनरेगा मजदूरों का बड़ा हिस्सा दलित और अति पिछड़ा वर्ग से है — जो BJP के 'लाभार्थी वोट बैंक' का मूल है। अगर डिजिटल हाजिरी की नाराज़गी संगठित हुई तो 2024 लोकसभा में यूपी में हुए 29 सीटों के नुकसान जैसा झटका 2027 विधानसभा में दोहराया जा सकता है।

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