पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने सिंधु जल संधि को पाकिस्तानी आक्रामकता के दशकों बाद 'अप्रासंगिक' बताया है। फ़र्स्टपोस्ट के अनुसार सिब्बल ने कहा कि साझा पानी को कभी हथियार नहीं बनाना चाहिए, लेकिन जब एक पक्ष लगातार संधि की भावना तोड़े तो दूसरे पक्ष की उदारता की सीमा होनी चाहिए।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: भारत के पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल — जो विदेश नीति के शीर्ष आर्किटेक्ट रह चुके हैं।
  • क्या: उन्होंने 1960 की सिंधु जल संधि को पाकिस्तान की दशकों लंबी आक्रामकता के संदर्भ में 'अप्रासंगिक' करार दिया।
  • कब: 2026 में, भारत-पाकिस्तान के बीच पहलगाम आतंकी हमले के बाद बढ़े तनाव के दौरान।
  • कहाँ: भारत — यह बयान राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति विमर्श के संदर्भ में आया।
  • क्यों: पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद, सीमा-पार हमले और संधि के प्रावधानों पर लगातार विवाद के बावजूद भारत द्वारा दशकों तक संधि का सम्मान करने पर सवाल।
  • कैसे: सिब्बल ने सार्वजनिक बयान में तर्क दिया कि जब एक पक्ष बार-बार संधि की भावना का उल्लंघन करे, तो दूसरे पक्ष को अपनी उदारता की समीक्षा करनी चाहिए — यह बहस अब नीतिगत स्तर पर सक्रिय है।

छह दशक। तीन युद्ध। अनगिनत आतंकी हमले। और एक संधि जो इन सबके बीच अडिग खड़ी रही — जैसे कोई मकान मालिक उस किरायेदार को पानी देता रहे जो हर रात उसके घर में आग लगाने की कोशिश करे। सिंधु जल संधि, 1960 — दुनिया की सबसे 'उदार' जल-बँटवारा व्यवस्था — अब उसी देश के शीर्ष राजनयिक के निशाने पर है जिसने इसे छह दशकों तक बेदाग़ निभाया।

फ़र्स्टपोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने सिंधु जल संधि को साफ़ शब्दों में 'अप्रासंगिक' बताया है। सिब्बल का कहना है — 'साझा पानी को कभी हथियार नहीं बनाना चाहिए', लेकिन उनका असली तर्क इस वाक्य के ठीक बाद शुरू होता है: जब पाकिस्तान ख़ुद दशकों से आक्रामकता की हर सीमा लाँघ चुका है, तो भारत कब तक इस संधि को पवित्र गाय मानकर बैठा रहेगा?

यह सवाल नया नहीं है। लेकिन इसे पूछने वाला नया है — और यही इसे ख़तरनाक बनाता है। कंवल सिब्बल कोई टीवी पैनलिस्ट नहीं हैं जो TRP के लिए 'पानी बंद करो' चिल्लाते हों। वे वही शख़्स हैं जिन्होंने भारत की विदेश नीति के कुछ सबसे जटिल अध्याय लिखे — रूस से लेकर फ़्रांस तक, राजनयिक गलियारों में जिनकी बात सुनी जाती थी। जब ऐसा व्यक्ति कहे कि संधि अब 'बेमतलब' है, तो समझिए कि यह राय नहीं, सरकारी गलियारों में चल रही उस बहस की सार्वजनिक प्रतिध्वनि है जो बंद कमरों में सालों से गूँज रही है।

संधि की शर्तें: भारत ने कितना दिया, पाकिस्तान ने कितना लिया

1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुई इस संधि के तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह नदियों को बाँटा गया — पूर्वी नदियाँ (रावी, ब्यास, सतलुज) भारत को और पश्चिमी नदियाँ (सिंधु, झेलम, चिनाब) पाकिस्तान को। विश्व बैंक के आँकड़ों के मुताबिक़, इस बँटवारे में कुल जल-प्रवाह का क़रीब 80 प्रतिशत हिस्सा पाकिस्तान के खाते में गया। भारत ने अपनी ही ज़मीन पर बहने वाली नदियों का बड़ा हिस्सा एक ऐसे पड़ोसी को सौंप दिया जिसने अभी एक दशक पहले ही युद्ध छेड़ा था।

पंजाब और राजस्थान के किसानों से पूछिए — वे बताएँगे कि रावी और ब्यास का पानी भी पूरा नहीं मिलता, जबकि पश्चिमी नदियों पर भारत को 'रन ऑफ़ द रिवर' प्रोजेक्ट्स के अलावा कुछ करने की इजाज़त नहीं। जम्मू-कश्मीर में किशनगंगा और रतले जैसी परियोजनाओं पर पाकिस्तान ने बार-बार अंतरराष्ट्रीय अदालतों का दरवाज़ा खटखटाया — भारत की अपनी ज़मीन पर, भारत की अपनी नदियों पर, भारत के अपने बिजली प्रोजेक्ट्स के ख़िलाफ़।

पॉलिटिकल पल्स — गलियारों में क्या फुसफुसाहट है

सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि पहलगाम हमले के बाद मोदी सरकार ने सिंधु जल संधि को 'रिव्यू' की मेज़ पर रख दिया है। 2019 में पुलवामा के बाद भी प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था — 'भारत का पानी भारत में रहेगा।' लेकिन तब यह ज़्यादातर राजनीतिक बयानबाज़ी थी। अब हालात अलग हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार भारत ने 2023 में संधि की शर्तों में संशोधन का नोटिस पाकिस्तान को भेजा था — यह पहला औपचारिक क़दम था। सरकारी सूत्रों के हवाले से चर्चा है कि अब यह नोटिस महज़ काग़ज़ पर नहीं रहेगा।

(यह सियासी गलियारों की चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट सरकारी घोषणा नहीं।)

हिंदी बेल्ट में — यूपी से राजस्थान, हरियाणा से मध्य प्रदेश तक — 'पाकिस्तान को पानी क्यों दें' वाली जनभावना हमेशा से मज़बूत रही है। चुनावी रैलियों में यह नारा TRP और वोट दोनों लाता है। लेकिन सिब्बल जैसे अनुभवी राजनयिक का बोलना इस जनभावना को एक बौद्धिक वैधता देता है जो पहले नहीं थी — अब यह सिर्फ़ भावना नहीं, एक तर्कसंगत नीतिगत माँग बन गई है।

असली सवाल — 'ट्रंप कार्ड' खेलना कितना आसान, कितना ख़तरनाक?

जो लोग सोचते हैं कि भारत कल सुबह नल बंद कर दे और पाकिस्तान सूख जाए — उनके लिए ज़मीनी हक़ीक़त समझना ज़रूरी है। पहला, अंतरराष्ट्रीय क़ानून के तहत जल-संधियों को एकतरफ़ा तोड़ना उतना आसान नहीं जितना ट्विटर पर लगता है। वियना कन्वेंशन ऑन द लॉ ऑफ़ ट्रीटीज़ के तहत 'मूलभूत बदलाव की परिस्थितियाँ' (रिबस सिक स्टैंटिबस) का सहारा लिया जा सकता है — और भारत का तर्क यह होगा कि पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद वही 'मूलभूत बदलाव' है जो 1960 में नहीं था।

दूसरा, भौगोलिक सच्चाई: पश्चिमी नदियाँ कश्मीर से होकर बहती हैं। भारत चाहे तो बड़े बाँध बनाकर पानी का प्रवाह नियंत्रित कर सकता है — लेकिन यह प्रक्रिया वर्षों माँगती है, अरबों रुपये की लागत है, और तब तक अंतरराष्ट्रीय दबाव का सामना करना होगा। चीन ब्रह्मपुत्र पर जो कर रहा है — बिना किसी संधि के, बिना किसी अंतरराष्ट्रीय जवाबदेही के — वह भारत सिंधु पर नहीं कर सकता, क्योंकि भारत ने ख़ुद को एक संधि से बाँधा हुआ है।

तीसरा, और सबसे अहम — इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि मोदी सरकार का असली दाँव संधि को 'तोड़ना' नहीं, बल्कि इसे 'पुनर्व्याख्या' (रीइंटरप्रिटेशन) की दिशा में ले जाना है। पश्चिमी नदियों पर भारत के अधिकारों का विस्तार — ज़्यादा स्टोरेज, ज़्यादा बिजली परियोजनाएँ, ज़्यादा सिंचाई — बिना संधि को औपचारिक रूप से तोड़े। यह 'ट्रंप कार्ड' खेलने से कम नाटकीय है, लेकिन कहीं ज़्यादा प्रभावी — क्योंकि यह पाकिस्तान को उसी क़ानूनी ढाँचे में फँसाता है जिसका वह दशकों से दुरुपयोग करता रहा है।

किसान, नहरें और राजस्थान की प्यास

राजस्थान नहर — जिसे इंदिरा गांधी नहर के नाम से जाना जाता है — सतलुज-ब्यास लिंक से पानी लेती है। अगर भारत पश्चिमी नदियों पर अपने हिस्से का पूरा इस्तेमाल करे, तो पंजाब और राजस्थान के सूखे इलाक़ों को हज़ारों क्यूसेक अतिरिक्त पानी मिल सकता है। यह वही पानी है जो आज पाकिस्तान के पंजाब में खेतों को सींचता है जबकि भारत का पश्चिमी राजस्थान प्यासा रहता है। किसानों के लिए यह कोई सामरिक खेल नहीं, रोटी का सवाल है।

आगे क्या — वॉच लिस्ट

आने वाले हफ़्तों में देखने लायक़ यह होगा: क्या सरकार किशनगंगा और रतले परियोजनाओं पर निर्माण की गति बढ़ाती है? क्या भारत विश्व बैंक में संधि संशोधन का औपचारिक प्रस्ताव रखता है? और क्या विपक्ष — जिसने नेहरू युग की इस संधि को बनाया — अब इसकी समीक्षा का विरोध करेगा या चुपचाप समर्थन? कांग्रेस के लिए यह एक असहज सवाल है: अगर वे संधि का बचाव करते हैं तो 'पाकिस्तान परस्त' का तमगा, और अगर समर्थन करते हैं तो नेहरू विरासत पर सवाल।

कंवल सिब्बल का बयान एक संकेत है — सरकार की नीतिगत सोच को सार्वजनिक स्वीकृति का ज़मीन तैयार करने का संकेत। जब सेवानिवृत्त राजनयिक बोलते हैं, तो अक्सर वे वही कहते हैं जो सरकार कहना चाहती है लेकिन अभी कह नहीं सकती। यह भारतीय कूटनीति का सबसे पुराना तरीक़ा है — बैलून उड़ाओ, प्रतिक्रिया देखो, फिर फ़ैसला करो।

असली सवाल यह नहीं है कि सिंधु जल संधि तोड़ी जाएगी या नहीं। असली सवाल यह है: जब भारत का अपना किसान प्यासा है और पड़ोसी हर दिन उसके घर में आग लगाने की कोशिश करता है, तो वह 1960 की 'उदारता' कब तक निभाएगा — और जिस दिन नहीं निभाएगा, उस दिन के लिए तैयार कौन है?

आँकड़ों में

  • सिंधु जल संधि के तहत कुल जल-प्रवाह का लगभग 80% हिस्सा पाकिस्तान के खाते में जाता है — विश्व बैंक आँकड़े।
  • भारत ने 2023 में संधि संशोधन का नोटिस पाकिस्तान को भेजा — पहला औपचारिक क़दम।
  • संधि 1960 में हुई — तब से तीन युद्ध और अनगिनत आतंकी हमले हो चुके हैं।

मुख्य बातें

  • कंवल सिब्बल जैसे शीर्ष पूर्व राजनयिक का सिंधु जल संधि को 'अप्रासंगिक' कहना सरकारी गलियारों में चल रही नीतिगत बहस की सार्वजनिक प्रतिध्वनि है — यह महज़ निजी राय नहीं।
  • सिंधु जल संधि के तहत कुल जल-प्रवाह का लगभग 80% पाकिस्तान को जाता है — भारत की अपनी ज़मीन पर बहने वाली नदियों का बड़ा हिस्सा।
  • मोदी सरकार का संभावित दाँव संधि को 'तोड़ना' नहीं बल्कि 'पुनर्व्याख्या' है — पश्चिमी नदियों पर अधिकारों का विस्तार बिना औपचारिक रूप से संधि तोड़े।
  • राजस्थान और पंजाब के किसानों के लिए यह सामरिक खेल नहीं, रोटी और सिंचाई का सीधा सवाल है।
  • कांग्रेस के लिए यह असहज राजनीतिक दुविधा है — संधि का बचाव करें तो 'पाकिस्तान परस्त', समर्थन करें तो नेहरू विरासत पर सवाल।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

सिंधु जल संधि क्या है और इसमें पानी का बँटवारा कैसे हुआ?

1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता में भारत-पाकिस्तान के बीच हुई इस संधि में सिंधु नदी प्रणाली की छह नदियों को बाँटा गया — पूर्वी नदियाँ (रावी, ब्यास, सतलुज) भारत को और पश्चिमी नदियाँ (सिंधु, झेलम, चिनाब) पाकिस्तान को मिलीं। कुल जल-प्रवाह का लगभग 80% पाकिस्तान को जाता है।

क्या भारत सिंधु जल संधि को एकतरफ़ा तोड़ सकता है?

अंतरराष्ट्रीय क़ानून के तहत एकतरफ़ा संधि-भंग जटिल है, लेकिन वियना कन्वेंशन में 'मूलभूत परिस्थिति बदलाव' (रिबस सिक स्टैंटिबस) का प्रावधान है। भारत का तर्क हो सकता है कि पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद वही मूलभूत बदलाव है जो 1960 में नहीं था।

कंवल सिब्बल कौन हैं और उनका बयान क्यों अहम है?

कंवल सिब्बल भारत के पूर्व विदेश सचिव हैं — देश की विदेश नीति के शीर्ष आर्किटेक्ट। ऐसे अनुभवी राजनयिक का संधि को 'अप्रासंगिक' कहना सरकारी सोच की दिशा का संकेत माना जा रहा है।

सिंधु जल संधि ख़त्म होने पर भारतीय किसानों को क्या फ़ायदा होगा?

पश्चिमी नदियों पर भारत के अधिकार बढ़ने से पंजाब और राजस्थान के सूखे इलाक़ों को हज़ारों क्यूसेक अतिरिक्त सिंचाई जल मिल सकता है — ख़ासकर इंदिरा गांधी नहर क्षेत्र को।

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