केंद्र सरकार ने एसिड अटैक से आंतरिक अंगों को नुकसान झेलने वाले पीड़ितों को दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 के तहत विकलांगता लाभ देने का निर्णय लिया है। इससे पीड़ितों को मेडिकल सहायता, आर्थिक राहत और सामाजिक पुनर्वास का रास्ता मिलेगा।
चेहरे पर फेंका गया तेज़ाब सिर्फ त्वचा नहीं जलाता — यह फेफड़े झुलसाता है, आँखों की रोशनी छीनता है, पेट और लिवर को भीतर से तबाह करता है। लेकिन अब तक भारत के क़ानूनी ढाँचे में एक विचित्र अंधापन था — अगर ज़ख्म बाहर दिखता है तो आप विकलांग हैं, अगर भीतर है तो आप सिर्फ 'बीमार' हैं। केंद्र सरकार ने अब यह दीवार गिरा दी है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, केंद्र सरकार ने दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 (Rights of Persons with Disabilities Act) के दायरे का विस्तार करते हुए एसिड अटैक से आंतरिक अंगों को नुकसान झेलने वाले पीड़ितों को भी विकलांगता लाभ देने का फैसला किया है। पहले यह अधिनियम मुख्य रूप से बाहरी शारीरिक विकृति — जैसे जली हुई त्वचा, अंग विच्छेदन — को ही विकलांगता मानता था। अब फेफड़ों, लिवर, किडनी और अन्य आंतरिक अंगों की स्थायी क्षति को भी इसमें शामिल किया गया है।
यह एक ऐसा बदलाव है जो कागज़ पर छोटा लग सकता है, लेकिन हज़ारों ज़िंदगियों के लिए इसके मायने बहुत बड़े हैं।
आर्थिक राहत — रुपयों में कितनी मदद?
विकलांगता प्रमाणपत्र मिलने से पीड़ितों के लिए कई दरवाज़े खुलते हैं। सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण, मासिक विकलांगता पेंशन, मुफ्त या रियायती चिकित्सा सुविधाएँ, रेलवे और बस किराये में छूट, और विभिन्न सरकारी योजनाओं में प्राथमिकता — ये सब अब उन पीड़ितों को भी मिल सकेंगे जिनके ज़ख्म बाहर नहीं दिखते लेकिन भीतर से उन्हें हर रोज़ तोड़ रहे हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के पिछले आँकड़ों के अनुसार भारत में हर साल एसिड अटैक के सैकड़ों मामले दर्ज होते हैं, और विशेषज्ञ मानते हैं कि असल संख्या इससे कई गुना अधिक है क्योंकि अनेक मामले रिपोर्ट ही नहीं होते।
मेडिकल सहायता — सिर्फ सर्जरी नहीं, लंबी लड़ाई
एसिड अटैक के बाद इलाज कोई एक बार की सर्जरी नहीं है। पीड़ितों को कई-कई साल तक रिकंस्ट्रक्टिव सर्जरी, स्किन ग्राफ्टिंग, नेत्र उपचार और मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग की ज़रूरत होती है। सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में लक्ष्मी बनाम भारत सरकार मामले में राज्य सरकारों को पीड़ितों के इलाज और पुनर्वास का निर्देश दिया था, लेकिन ज़मीन पर अमल आज भी अधूरा है। कई पीड़ितों ने बताया है कि सरकारी अस्पतालों में उन्हें महीनों इंतज़ार करना पड़ता है और निजी अस्पतालों का खर्च उनकी पहुँच से बाहर है। विकलांगता प्रमाणपत्र मिलने से कम-से-कम AIIMS और सरकारी मेडिकल कॉलेजों में प्राथमिकता उपचार का रास्ता खुलेगा।
सामाजिक पुनर्वास — सबसे कठिन लड़ाई
आर्थिक मदद और मेडिकल सहायता ज़रूरी है, लेकिन एसिड अटैक सर्वाइवर्स की सबसे बड़ी लड़ाई समाज में वापस लौटने की है। नौकरी देने से इनकार, शादी टूटना, परिवार का साथ छोड़ना, सार्वजनिक जगहों पर घूरती नज़रें — यह वह दर्द है जिसका कोई प्रमाणपत्र नहीं बनता। छापा छूट मुहिम (Stop Acid Attacks) जैसी संस्थाओं ने बार-बार माँग की है कि सरकार सिर्फ मुआवज़ा नहीं, बल्कि कौशल प्रशिक्षण, रोज़गार गारंटी और मानसिक स्वास्थ्य सहायता का पूरा पैकेज दे।
इंडिया हेराल्ड का मानना है कि इस फैसले की असली परीक्षा कागज़ पर नहीं, ज़िला अस्पतालों की खिड़कियों पर होगी — जहाँ एक सर्वाइवर विकलांगता प्रमाणपत्र लेने जाएगी और देखेगी कि बाबू उसकी आंतरिक चोट को 'काफी गंभीर' मानता है या नहीं। नौकरशाही की मशीन क़ानून को कितना ईमानदारी से लागू करती है, यह हमेशा से भारत की सबसे बड़ी चुनौती रही है।
आगे क्या होगा — नज़र किस पर रखें?
आने वाले महीनों में देखने वाली बात यह होगी कि राज्य सरकारें इस केंद्रीय निर्णय को अपने यहाँ कितनी तेज़ी से लागू करती हैं। विकलांगता प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया में आंतरिक चोटों के आकलन के लिए नए मेडिकल मानदंड तय करने होंगे — और यहीं सबसे बड़ी देरी हो सकती है। साथ ही, एसिड की खुली बिक्री पर सुप्रीम कोर्ट के पुराने निर्देशों के बावजूद कई राज्यों में तेज़ाब आसानी से मिल जाता है — जब तक यह सप्लाई चेन नहीं टूटती, सिर्फ पुनर्वास से बात नहीं बनेगी।
एक और अहम सवाल: क्या यह फैसला बर्न सर्वाइवर्स (आग से जले हुए) और अन्य रासायनिक हमलों के पीड़ितों तक भी विस्तारित होगा? अगर आंतरिक क्षति को मान्यता देने का सिद्धांत स्वीकार हो गया है, तो इसकी तार्किक परिणति यही है कि हर तरह की आंतरिक स्थायी क्षति को विकलांगता का दर्जा मिले।
तेज़ाब फेंकने वाला एक सेकंड में ज़िंदगी बदल देता है। सरकारें बरसों में जवाब देती हैं। यह फैसला देर से आया — लेकिन सवाल यह है कि जिस सर्वाइवर ने आज सुबह आईने में अपना चेहरा देखा, क्या उसे कल सुबह इस फैसले का एक भी फ़ायदा महसूस होगा?
अभियोग और आरोप यहाँ नामित स्रोतों के हवाले से हैं और जब तक कोई न्यायालय निर्णय नहीं देता, अप्रमाणित माने जाएँ।
इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।
मुख्य बातें
- केंद्र ने दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 का दायरा बढ़ाकर एसिड अटैक से आंतरिक अंग क्षति झेलने वालों को भी विकलांगता लाभ दिया।
- पीड़ितों को अब सरकारी नौकरी में आरक्षण, विकलांगता पेंशन, रियायती इलाज और सरकारी योजनाओं में प्राथमिकता मिल सकेगी।
- असली चुनौती ज़िला स्तर पर अमल है — आंतरिक चोटों के मेडिकल आकलन के नए मानदंड तय करने होंगे।
- एसिड की खुली बिक्री पर रोक के बिना सिर्फ पुनर्वास अधूरा है।
आँकड़ों में
- NCRB के अनुसार भारत में हर साल एसिड अटैक के सैकड़ों मामले दर्ज होते हैं, विशेषज्ञों के अनुसार वास्तविक संख्या कई गुना अधिक है।
- सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में लक्ष्मी बनाम भारत सरकार मामले में पीड़ितों के इलाज और पुनर्वास का निर्देश दिया था।



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