मोजतबा खामेनेई अपने पिता अयातुल्ला अली खामेनेई के जनाज़े से सुरक्षा कारणों का हवाला देकर गैरहाज़िर हैं। इंडिया टुडे और टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार खामेनेई के सहायक ने पुष्टि की कि मोजतबा अंतिम संस्कार में शामिल नहीं होंगे। यह गैरमौजूदगी ईरान में सत्ता-उत्तराधिकार के तीखे संघर्ष की ओर इशारा करती है।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: मोजतबा खामेनेई — ईरान के दिवंगत सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के बेटे और संभावित उत्तराधिकारी (टाइम्स ऑफ़ इंडिया)।
  • क्या: मोजतबा अपने पिता के छह दिवसीय अंतिम संस्कार समारोह से पूरी तरह गैरहाज़िर हैं, जबकि IRGC के सबसे ख़ौफ़नाक जनरल ने सार्वजनिक रूप से अमेरिका-इज़राइल को चुनौती दी (टाइम्स ऑफ़ इंडिया)।
  • कब: जून 2025 — अली खामेनेई की मृत्यु के बाद जारी छह दिवसीय शोक अवधि के दौरान (NDTV)।
  • कहाँ: ईरान, तेहरान — जहाँ लाखों लोग अंतिम संस्कार में उमड़े (NDTV, टाइम्स ऑफ़ इंडिया)।
  • क्यों: सुरक्षा चिंताओं को आधिकारिक कारण बताया गया है, लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि IRGC और धार्मिक प्रतिष्ठान के बीच सत्ता-संघर्ष असली वजह है (इंडिया टुडे)।
  • कैसे: खामेनेई के सहायक ने आधिकारिक बयान जारी कर मोजतबा की अनुपस्थिति की पुष्टि की; इस बीच IRGC के वरिष्ठ जनरल ने अंतिम संस्कार में नाटकीय सार्वजनिक उपस्थिति दर्ज कराकर सैन्य-शक्ति का प्रदर्शन किया (टाइम्स ऑफ़ इंडिया)।

एक बेटा, जिसके कंधे पर पिता का जनाज़ा होना चाहिए — वह कहीं नज़र नहीं आता। लाखों लोग तेहरान की सड़कों पर उमड़े हैं, छाती पीट रहे हैं, काले झंडे लहरा रहे हैं, लेकिन वह शख़्स ग़ायब है जिसे ईरान का अगला सर्वोच्च नेता माना जाता था — मोजतबा खामेनेई। यह कोई सामान्य अनुपस्थिति नहीं है। यह ईरान के सत्ता-ढाँचे में आई उस दरार की पहली सार्वजनिक झलक है, जो अयातुल्ला अली खामेनेई की मृत्यु के बाद फट पड़ी है।

टाइम्स ऑफ़ इंडिया और इंडिया टुडे की रिपोर्ट्स के मुताबिक, खामेनेई के एक वरिष्ठ सहायक ने पुष्टि की है कि मोजतबा अपने पिता के छह दिवसीय अंतिम संस्कार समारोह में शामिल नहीं होंगे। आधिकारिक कारण? "सुरक्षा चिंताएँ।" NDTV ने भी इस बात की पुष्टि की है कि ईरान ने अली खामेनेई के लिए छह दिन का शोक घोषित किया है, लेकिन उनके बेटे को कहीं नहीं देखा गया।

अब ज़रा सोचिए — किस तरह के ख़तरे में एक बेटा अपने पिता के अंतिम संस्कार से दूर रहे? ईरान, जहाँ IRGC (इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स) के पास देश की सबसे ताक़तवर सेना, ख़ुफ़िया एजेंसी और मिसाइल कार्यक्रम का नियंत्रण है — वहाँ "सुरक्षा चिंता" का मतलब सिर्फ़ इज़राइल या अमेरिका नहीं है। यह चिंता भीतर से भी हो सकती है।

बसीज मिलिशिया — मोजतबा का सबसे बड़ा हथियार और सबसे बड़ी वजह

मोजतबा खामेनेई कोई साधारण राजनीतिक वारिस नहीं हैं। पिछले दो दशकों में उन्होंने चुपचाप ईरान के सबसे विवादास्पद अर्धसैनिक बल — बसीज मिलिशिया — पर अपनी पकड़ मज़बूत की। बसीज वही ताक़त है जिसने 2009 के ग्रीन मूवमेंट को बेरहमी से कुचला, जिसने 2019 और 2022 के विरोध प्रदर्शनों में प्रदर्शनकारियों पर गोलियाँ चलवाईं। यह IRGC के अधीन ज़रूर है, लेकिन मोजतबा ने इसके भीतर अपने वफ़ादारों का एक समानांतर नेटवर्क खड़ा किया — एक तरह की निजी सेना।

और यही बात IRGC के शीर्ष जनरलों को रास नहीं आई। टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, जनाज़े में ईरान के "सबसे ख़ौफ़नाक जनरल" ने एक नाटकीय सार्वजनिक उपस्थिति दर्ज कराई — अमेरिका और इज़राइल को खुली चुनौती देते हुए। यह सिर्फ़ शोक नहीं था, यह ताक़त का प्रदर्शन था। संदेश साफ़ था: ईरान की सैन्य मशीनरी किसी "राजकुमार" के हाथ में नहीं जाएगी — वह उनके अपने हाथ में रहेगी।

पॉलिटिकल पल्स — सियासी गलियारों में क्या फुसफुसाहट है?

ईरान के भीतर जो लोग सत्ता-गलियारों की नब्ज़ जानते हैं, उनकी बातों में एक सुर साफ़ सुनाई देता है — मोजतबा को "सुरक्षा" के नाम पर नहीं, बल्कि सत्ता-खेल में चुपचाप किनारे किया जा रहा है। सियासी हलकों में चर्चा है कि IRGC के भीतर एक गुट मोजतबा को सर्वोच्च नेता बनाने के सख़्त ख़िलाफ़ है। उनका तर्क? ईरान गणतंत्र है, राजशाही नहीं — पिता से बेटे को सत्ता सौंपना इस्लामी क्रांति के मूल सिद्धांत का अपमान होगा।

दूसरी ओर, कुछ वरिष्ठ मौलवी भी मोजतबा के ख़िलाफ़ हैं। क़ुम के धार्मिक प्रतिष्ठान में कई ऐसे आयातुल्ला हैं जो ख़ुद को सर्वोच्च नेता पद के लिए ज़्यादा योग्य मानते हैं। मोजतबा के पास न तो ग्रैंड आयातुल्ला का दर्जा है, न कोई प्रकाशित धार्मिक ग्रंथ — जो पारंपरिक रूप से इस पद के लिए ज़रूरी माना जाता है। (यह इंडस्ट्री चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

इज़राइल का साया — क्या बाहरी ख़तरा असली है?

"सुरक्षा चिंता" का एक दूसरा पहलू भी है, और उसे पूरी तरह ख़ारिज करना भी ग़लत होगा। इज़राइल ने पिछले कुछ वर्षों में ईरान के परमाणु वैज्ञानिकों, IRGC कमांडरों और यहाँ तक कि हमास प्रमुख इस्माइल हनीया की हत्या तेहरान की धरती पर करवाई। ऐसे में ईरान का अगला सर्वोच्च नेता — चाहे वह मोजतबा हो या कोई और — इज़राइल के लिए सबसे बड़ा लक्ष्य होगा। लेकिन अगर ख़तरा सिर्फ़ बाहरी होता, तो मोजतबा को IRGC की सबसे कड़ी सुरक्षा में जनाज़े में लाया जा सकता था। IRGC के जनरल ख़ुद जनाज़े में मौजूद हैं, इज़राइल को चुनौती दे रहे हैं — तो मोजतबा की सुरक्षा क्यों नहीं हो सकती थी?

इंडिया हेराल्ड का सीधा पॉलिटिकल रीड यही है: मोजतबा की गैरमौजूदगी सुरक्षा से ज़्यादा सत्ता-संरचना की कहानी है। IRGC ने जनाज़े को अपने शक्ति-प्रदर्शन का मंच बना लिया है — और उस मंच पर "उत्तराधिकारी" को जगह नहीं दी गई।

ईरान की 'किंगमेकर' संस्था — असेंबली ऑफ़ एक्सपर्ट्स का खेल

ईरान में सर्वोच्च नेता का चुनाव "असेंबली ऑफ़ एक्सपर्ट्स" करती है — 88 मौलवियों का एक निकाय। अली खामेनेई ने 1989 में यह पद तब हासिल किया था जब उनके पूर्ववर्ती आयातुल्ला ख़ुमैनी का निधन हुआ। उस समय भी खामेनेई सबसे स्वाभाविक उम्मीदवार नहीं थे — उन्हें IRGC के समर्थन ने गद्दी दिलवाई। आज इतिहास दोहराने की स्थिति में है: IRGC जिसे चुनेगा, वही अगला सर्वोच्च नेता होगा। और IRGC के संकेत साफ़ हैं — वह कोई कठपुतली चाहती है, कोई ऐसा शख़्स नहीं जिसकी अपनी निजी मिलिशिया हो।

यहाँ एक और पेंच है। मोजतबा की अनुपस्थिति सिर्फ़ जनाज़े तक सीमित नहीं रही — टाइम्स ऑफ़ इंडिया की एक अलग रिपोर्ट के मुताबिक, वे अपनी पत्नी के अंतिम संस्कार से भी ग़ायब रहे थे। अगर कोई शख़्स अपनी पत्नी और पिता दोनों के जनाज़े से दूर है, तो सवाल यह नहीं है कि वह कहाँ है — सवाल यह है कि उसे कहाँ रखा जा रहा है।

भारत के लिए क्यों मायने रखता है ईरान का सत्ता-संघर्ष?

भारत के लिए ईरान सिर्फ़ एक मध्य-पूर्वी देश नहीं है। चाबहार बंदरगाह — जिसमें भारत ने अरबों रुपये का निवेश किया है — सीधे ईरान की स्थिरता पर टिका है। ईरान से तेल आयात, अफ़ग़ानिस्तान तक ज़मीनी पहुँच, और मध्य एशिया की कनेक्टिविटी — ये सब ईरान में सत्ता-परिवर्तन के तरीके पर निर्भर करते हैं। अगर IRGC एक कट्टर सैन्यवादी नेता को गद्दी पर बैठाती है, तो अमेरिकी प्रतिबंधों का नया दौर आ सकता है — और भारत फिर वही कूटनीतिक कसौटी पर खड़ा होगा जहाँ उसे ईरान और अमेरिका के बीच चुनना पड़े।

दूसरी तरफ़, अगर कोई अपेक्षाकृत उदारवादी या व्यावहारिक नेता आता है — जो फ़िलहाल कम संभावना दिखती है — तो भारत-ईरान संबंधों को नई ऊर्जा मिल सकती है।

आगे क्या? — वह सवाल जो तेहरान से दिल्ली तक गूँजेगा

अगले कुछ हफ़्तों में असेंबली ऑफ़ एक्सपर्ट्स की बैठक सबसे अहम होगी। अगर मोजतबा का नाम उम्मीदवारों की सूची से ही बाहर रहता है, तो समझिए कि IRGC ने खेल पूरा कर लिया। अगर नाम आता है लेकिन चुनाव हारते हैं, तो बसीज मिलिशिया और IRGC के बीच टकराव ईरान की सड़कों पर दिख सकता है।

और सबसे ख़तरनाक परिदृश्य? मोजतबा अगर चुपचाप गायब ही रहे — न जनाज़े में, न राजनीति में, न सार्वजनिक जीवन में — तो यह ईरान के इतिहास का वह अध्याय होगा जो लिखा नहीं जाएगा, सिर्फ़ महसूस किया जाएगा। जैसे सोवियत संघ में कई "उत्तराधिकारी" बिना किसी घोषणा के इतिहास से ग़ायब हो गए।

एक बात तय है: ईरान में सत्ता की लड़ाई सड़कों पर नहीं, बंद कमरों में लड़ी जा रही है। और उन बंद कमरों में अभी सबसे ताक़तवर आवाज़ IRGC की है — न किसी मौलवी की, न किसी बेटे की। जिस शख़्स के कंधे पर पिता का जनाज़ा होना चाहिए था, वह ख़ुद एक सवाल बन गया है — और यही सवाल अगले कई महीनों तक ईरान, मध्य-पूर्व और भारत की विदेश नीति की दिशा तय करेगा।

आरोप एवं दावे संबंधित स्रोतों के हवाले से प्रस्तुत हैं और जब तक न्यायालय का निर्णय न आए, अप्रमाणित हैं; न्यायाधीन मामलों की रिपोर्टिंग बिना पूर्वाग्रह के की गई है।

इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।

आँकड़ों में

  • ईरान ने अली खामेनेई के लिए 6 दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित किया (NDTV)।
  • असेंबली ऑफ़ एक्सपर्ट्स — 88 मौलवियों का निकाय — सर्वोच्च नेता का चुनाव करता है।
  • मोजतबा अपनी पत्नी और पिता दोनों के अंतिम संस्कार से गैरहाज़िर रहे (टाइम्स ऑफ़ इंडिया)।

मुख्य बातें

  • मोजतबा खामेनेई अपने पिता अयातुल्ला अली खामेनेई के छह दिवसीय अंतिम संस्कार से पूरी तरह गैरहाज़िर हैं — आधिकारिक कारण 'सुरक्षा चिंता' बताया गया (इंडिया टुडे, टाइम्स ऑफ़ इंडिया)।
  • IRGC के सबसे ताक़तवर जनरल ने जनाज़े में नाटकीय सार्वजनिक उपस्थिति दर्ज कराई — यह सत्ता-प्रदर्शन उत्तराधिकार की लड़ाई का सीधा संकेत है (टाइम्स ऑफ़ इंडिया)।
  • मोजतबा ने बसीज मिलिशिया पर अपनी पकड़ बनाई थी — यही IRGC के साथ उनके टकराव की मूल वजह है।
  • ईरान का अगला सर्वोच्च नेता असेंबली ऑफ़ एक्सपर्ट्स चुनेगी, लेकिन असली किंगमेकर IRGC है — 1989 में भी यही हुआ था।
  • भारत के लिए चाबहार बंदरगाह, तेल आयात और मध्य एशिया कनेक्टिविटी ईरान की सत्ता-स्थिरता पर सीधे निर्भर हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

मोजतबा खामेनेई अपने पिता के जनाज़े में क्यों नहीं आए?

आधिकारिक तौर पर 'सुरक्षा चिंताओं' को कारण बताया गया है। इंडिया टुडे और टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार खामेनेई के सहायक ने पुष्टि की कि मोजतबा अंतिम संस्कार में शामिल नहीं होंगे। हालाँकि विश्लेषकों का मानना है कि IRGC के साथ सत्ता-संघर्ष असली वजह हो सकती है।

ईरान का अगला सर्वोच्च नेता कौन होगा?

सर्वोच्च नेता का चुनाव 88 मौलवियों की 'असेंबली ऑफ़ एक्सपर्ट्स' करती है। मोजतबा खामेनेई को प्रबल दावेदार माना जाता था, लेकिन उनकी गैरमौजूदगी और IRGC का रुख़ संकेत देता है कि फ़ैसला अभी खुला है।

IRGC की ईरान के सत्ता-उत्तराधिकार में क्या भूमिका है?

IRGC ईरान की सबसे ताक़तवर सैन्य-राजनीतिक संस्था है। 1989 में भी IRGC के समर्थन ने अली खामेनेई को गद्दी दिलवाई थी। अब भी IRGC ही असली 'किंगमेकर' मानी जा रही है।

भारत पर ईरान के सत्ता-संघर्ष का क्या असर पड़ेगा?

भारत का चाबहार बंदरगाह निवेश, ईरान से तेल आयात और मध्य एशिया कनेक्टिविटी सीधे ईरान की स्थिरता पर निर्भर हैं। कट्टर सैन्यवादी नेता के आने पर नए अमेरिकी प्रतिबंधों का ख़तरा बढ़ सकता है।

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