मध्य प्रदेश सरकार ने UCC ड्राफ्ट प्रस्तावित किया है जिसमें लिव-इन कपल्स का अनिवार्य रजिस्ट्रेशन, ट्रिपल तलाक़ और बहुविवाह पर पूर्ण प्रतिबंध, और सभी धर्मों के लिए एकसमान उत्तराधिकार नियम शामिल हैं। टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार, यह उत्तराखंड के बाद दूसरा भाजपा-शासित राज्य है जिसने इस दिशा में ठोस क़दम उठाया।

कल्पना कीजिए — लखनऊ, इंदौर या पटना के किसी फ़्लैट में साथ रह रहे दो नौजवानों को अब सरकारी दफ़्तर जाकर अपने रिश्ते का रजिस्ट्रेशन कराना पड़े। सुनने में यह 21वीं सदी के भारत में अजीब लगता है, लेकिन मध्य प्रदेश का नया UCC ड्राफ्ट ठीक यही कह रहा है — और यह कोई छोटी बात नहीं।

टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, मध्य प्रदेश सरकार ने समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) का एक व्यापक ड्राफ्ट तैयार किया है जिसमें लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले कपल्स के लिए अनिवार्य रजिस्ट्रेशन का प्रावधान है। यह उत्तराखंड के बाद दूसरा भाजपा-शासित राज्य है जिसने इस दिशा में ठोस विधायी क़दम उठाया है। लेकिन सवाल सिर्फ़ रजिस्ट्रेशन का नहीं है — सवाल यह है कि यह ड्राफ्ट किसकी ज़िंदगी कैसे बदलेगा, और इसके पीछे सियासी गणित क्या है।

उत्तराखंड से कितना अलग, कितना कॉपी-पेस्ट?

उत्तराखंड ने 2024 में UCC लागू किया था — भारत का पहला राज्य जिसने संविधान के अनुच्छेद 44 को ज़मीन पर उतारने की कोशिश की। उस क़ानून में भी लिव-इन रजिस्ट्रेशन अनिवार्य था, रजिस्ट्रेशन न कराने पर जुर्माना और क़ैद का प्रावधान था। मध्य प्रदेश का ड्राफ्ट इस ढाँचे को काफ़ी हद तक उधार लेता है — लिव-इन रजिस्ट्रेशन, ट्रिपल तलाक़ पर पूर्ण प्रतिबंध, बहुविवाह पर रोक, और सभी धर्मों के लिए एकसमान उत्तराधिकार नियम, ये सब उत्तराखंड मॉडल की गूँज हैं।

लेकिन फ़र्क़ भी हैं, और वे मामूली नहीं। मध्य प्रदेश की आबादी उत्तराखंड से सात गुना से ज़्यादा है — लगभग 8.5 करोड़। यहाँ का मुस्लिम जनसंख्या प्रतिशत भी काफ़ी ऊँचा है। उत्तराखंड में UCC एक छोटे, अपेक्षाकृत सजातीय राज्य में लागू हुआ था; MP में इसे लागू करना एक पूरी तरह अलग सियासी और सामाजिक चुनौती है। जिस राज्य में मालवा, बुंदेलखंड, बघेलखंड और चंबल जैसे विविध सांस्कृतिक क्षेत्र हों, वहाँ 'एकसमान' शब्द को ज़मीन पर उतारना उत्तराखंड से कहीं ज़्यादा जटिल होगा।

लिव-इन रजिस्ट्रेशन — युवाओं की निजता बनाम सरकार का दख़ल

ड्राफ्ट का सबसे विवादित प्रावधान लिव-इन कपल्स का अनिवार्य रजिस्ट्रेशन है। इसके पक्ष में तर्क यह है कि इससे ऐसे रिश्तों में महिलाओं को क़ानूनी सुरक्षा मिलेगी — भरण-पोषण, उत्तराधिकार और बच्चों के अधिकार स्पष्ट होंगे। सुप्रीम कोर्ट ने कई फ़ैसलों में लिव-इन रिश्तों को मान्यता दी है, लेकिन क़ानूनी ढाँचे के अभाव में महिलाएँ अक्सर बिना किसी अधिकार के छोड़ दी जाती हैं।

दूसरी तरफ़, हिंदी बेल्ट के युवाओं का एक बड़ा वर्ग इसे निजता में सरकारी दख़ल मानता है। इंदौर, भोपाल या जबलपुर जैसे शहरों में नौकरी के लिए आए युवा जो किराये के फ़्लैट में साथ रहते हैं — उनके लिए सरकारी दफ़्तर में रजिस्ट्रेशन कराना न सिर्फ़ असुविधाजनक है, बल्कि सामाजिक रूप से शर्मनाक भी माना जाएगा। छोटे शहरों में, जहाँ पड़ोसी की नज़र से बचना मुश्किल है, रजिस्ट्रेशन का मतलब सार्वजनिक ऐलान होगा। सवाल यह है — क्या सुरक्षा देने के नाम पर सरकार निगरानी का जाल बुन रही है?

पॉलिटिकल पल्स

सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि MP का UCC ड्राफ्ट कोई अकेला क़दम नहीं — यह एक बड़ी रणनीति का हिस्सा है। टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक़, महाराष्ट्र में सीएम देवेंद्र फड़नवीस ने 7 सदस्यीय कमेटी बनाई है जो दो हफ़्ते में UCC का ड्राफ्ट तैयार करेगी — शीतकालीन सत्र में इसे पेश करने का लक्ष्य है। यानी एक साथ दो बड़े भाजपा-शासित राज्य UCC की दिशा में बढ़ रहे हैं।

पार्टी के भीतर की चर्चा यह है कि यह 2028 के आम चुनावों से पहले एक 'गवर्नेंस नैरेटिव' खड़ा करने की कोशिश है। राम मंदिर का निर्माण हो चुका, अनुच्छेद 370 ख़त्म हो चुका — अब UCC भाजपा के 'वैचारिक एजेंडा' का आख़िरी बड़ा स्तंभ है। अगर MP और महाराष्ट्र में सफलतापूर्वक लागू हो गया, तो UP और राजस्थान में भी इसकी माँग ज़ोर पकड़ेगी — और यही शायद असली खेल है। 'बंद कमरे' में भागवत-कुरैशी मुलाक़ात पर इंडिया हेराल्ड का विश्लेषण भी RSS के बदलते मुस्लिम आउटरीच को इसी संदर्भ में देखता है — एक हाथ से UCC का झंडा, दूसरे हाथ से संवाद का दरवाज़ा।

(यह सियासी गलियारों की चर्चा और विश्लेषकों के अनुमान पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

मुस्लिम संगठनों की आशंका और विपक्ष का रुख़

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जैसे संगठनों ने हमेशा UCC का विरोध किया है — उनका तर्क है कि यह संविधान के अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) का उल्लंघन है। MP में मुस्लिम आबादी क़रीब 7% है, लेकिन राजनीतिक रूप से कई सीटों पर निर्णायक है। कांग्रेस और विपक्षी दलों के सामने दुविधा यह है — खुलकर विरोध करें तो 'तुष्टिकरण' का तमग़ा लगे, चुप रहें तो अपना वोटबैंक नाराज़ हो।

ट्रेड हलकों में चर्चा यह भी है कि UCC का असर सिर्फ़ मुस्लिम समुदाय पर नहीं पड़ेगा। आदिवासी समुदायों की अपनी परंपरागत विवाह और उत्तराधिकार प्रथाएँ हैं — MP में आदिवासी आबादी 21% से ज़्यादा है। उत्तराखंड के क़ानून में आदिवासियों को कुछ हद तक छूट दी गई थी; MP के ड्राफ्ट में यह सवाल और भी गंभीर है क्योंकि यहाँ का आदिवासी वोट राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है।

तलाक़ के नए नियम — 'समानता' की परिभाषा बदलेगी?

ड्राफ्ट में तलाक़ की प्रक्रिया को सभी धर्मों के लिए एकसमान बनाने का प्रस्ताव है। इसका मतलब है कि न सिर्फ़ ट्रिपल तलाक़ (जो पहले से सुप्रीम कोर्ट ने ग़ैरक़ानूनी घोषित कर दिया है) पर पूर्ण विधायी प्रतिबंध होगा, बल्कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत तलाक़ की प्रक्रिया में भी बदलाव आ सकते हैं। उत्तराधिकार के मामले में बेटियों को बेटों के बराबर अधिकार — यह प्रावधान सुनने में प्रगतिशील लगता है, लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त में इसे लागू करना उतना आसान नहीं जितना क़ाग़ज़ पर लिखना। MP में आरक्षण पर मोहन यादव सरकार की उलझनें दिखाती हैं कि नीतिगत इरादे और ज़मीनी अमल के बीच कितना फ़ासला हो सकता है।

इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड — असली दांव 2028 है

इस पूरे ड्राफ्ट की तह में जाएँ तो एक बात साफ़ दिखती है जो बाक़ी मीडिया से छूट गई — इंडिया हेराल्ड का सटीक पॉलिटिकल रीड यही है कि MP का UCC ड्राफ्ट अपने आप में अंतिम लक्ष्य नहीं, बल्कि एक 'पायलट प्रोजेक्ट' है। भाजपा की रणनीति राज्यों में UCC को एक-एक कर लागू करके केंद्रीय स्तर पर राजनीतिक दबाव बनाने की है। उत्तराखंड ने दरवाज़ा खोला, MP ने उसे चौड़ा किया, महाराष्ट्र तैयार है — और अगर ये तीनों सफल रहे, तो 2028 तक UP और राजस्थान में UCC की माँग पार्टी के चुनावी घोषणापत्र का हिस्सा बन सकती है।

लेकिन यहाँ एक विरोधाभास है जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। 'समान' नागरिक संहिता तभी सच में 'समान' है जब वह हर समुदाय की चिंताओं को सुने — न सिर्फ़ बहुसंख्यक नज़रिये से। अगर आदिवासी परंपराओं, अल्पसंख्यक आशंकाओं और युवाओं की निजता को सुने बिना यह लागू हुआ, तो यह 'यूनिफ़ॉर्म' कम और 'यूनिलेटरल' ज़्यादा दिखेगा।

आने वाले हफ़्तों में देखने वाली बात यह होगी कि MP सरकार इस ड्राफ्ट पर सार्वजनिक सुझाव माँगती है या सीधे विधानसभा में ले जाती है। अगर बिना व्यापक परामर्श के पारित किया गया, तो विरोध की आवाज़ तेज़ होगी। और अगर परामर्श हुआ, तो वह प्रक्रिया ही बता देगी कि यह 'सबकी संहिता' है या 'सत्ता की संहिता'।

असली सवाल क़ानून का नहीं, इरादे का है — और उस इरादे का जवाब MP की विधानसभा में नहीं, हिंदी बेल्ट की गलियों में मिलेगा।

आरोप और दावे संबंधित पक्षों और मीडिया रिपोर्ट्स से उद्धृत हैं और जब तक अदालत निर्णय न दे, अप्रमाणित माने जाएँ; सब-ज्यूडिस मामलों पर पूर्वाग्रह के बिना रिपोर्टिंग की गई है।

इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।

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मुख्य बातें

  • मध्य प्रदेश का UCC ड्राफ्ट लिव-इन कपल्स के अनिवार्य रजिस्ट्रेशन, ट्रिपल तलाक़ पर पूर्ण प्रतिबंध और एकसमान उत्तराधिकार प्रस्तावित करता है — उत्तराखंड मॉडल पर आधारित पर पैमाने में बहुत बड़ा।
  • महाराष्ट्र में भी फड़नवीस ने 7 सदस्यीय कमेटी बनाई — दो हफ़्ते में ड्राफ्ट का लक्ष्य — यानी भाजपा एक साथ कई राज्यों में UCC को आगे बढ़ा रही है।
  • MP में 21% से ज़्यादा आदिवासी और 7% मुस्लिम आबादी — यहाँ UCC लागू करना उत्तराखंड से कहीं ज़्यादा जटिल सियासी और सामाजिक चुनौती है।
  • असली दांव 2028 के आम चुनावों से पहले हिंदी बेल्ट में 'गवर्नेंस नैरेटिव' खड़ा करना है — UP और राजस्थान अगला लक्ष्य हो सकते हैं।

आँकड़ों में

  • मध्य प्रदेश की आबादी लगभग 8.5 करोड़ — उत्तराखंड से 7 गुना से ज़्यादा, जो UCC लागू करने की जटिलता को कई गुना बढ़ाती है।
  • MP में आदिवासी आबादी 21% से ज़्यादा — उनकी परंपरागत विवाह और उत्तराधिकार प्रथाओं पर UCC का असर सबसे बड़ा सवाल।
  • महाराष्ट्र में 7 सदस्यीय कमेटी को UCC ड्राफ्ट तैयार करने के लिए दो हफ़्ते का समय दिया गया (टाइम्स ऑफ़ इंडिया)।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: मध्य प्रदेश की मोहन यादव सरकार ने UCC ड्राफ्ट तैयार किया है।
  • क्या: ड्राफ्ट में लिव-इन कपल्स का अनिवार्य रजिस्ट्रेशन, ट्रिपल तलाक़ पर प्रतिबंध, बहुविवाह पर रोक और एकसमान उत्तराधिकार क़ानून प्रस्तावित हैं।
  • कब: 2026 में ड्राफ्ट प्रस्तावित किया गया है — महाराष्ट्र में भी इसी दौर में UCC कमेटी गठित हुई है।
  • कहाँ: मध्य प्रदेश — और इसकी छाया पूरे हिंदी बेल्ट, ख़ासकर उत्तर प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र पर पड़ रही है।
  • क्यों: भाजपा की रणनीति उत्तराखंड मॉडल को हिंदी बेल्ट में विस्तारित करने और 2028 तक एक 'यूनिफ़ॉर्म गवर्नेंस नैरेटिव' खड़ा करने की है।
  • कैसे: राज्य सरकार ने ड्राफ्ट तैयार कर विधानसभा में पेश करने की तैयारी की है, जबकि महाराष्ट्र में सीएम फड़नवीस ने 7 सदस्यीय कमेटी बनाई है जो दो हफ़्ते में ड्राफ्ट तैयार करेगी।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

मध्य प्रदेश के UCC ड्राफ्ट में लिव-इन रजिस्ट्रेशन का क्या नियम है?

ड्राफ्ट के अनुसार लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले कपल्स को अनिवार्य रूप से सरकारी रजिस्ट्रेशन कराना होगा। इसका उद्देश्य ऐसे रिश्तों में महिलाओं को भरण-पोषण और उत्तराधिकार का क़ानूनी अधिकार देना है। (स्रोत: टाइम्स ऑफ़ इंडिया)

MP का UCC ड्राफ्ट उत्तराखंड के UCC से कैसे अलग है?

ढाँचे में काफ़ी समानता है — दोनों में लिव-इन रजिस्ट्रेशन, ट्रिपल तलाक़ प्रतिबंध और एकसमान उत्तराधिकार हैं। लेकिन MP की आबादी उत्तराखंड से 7 गुना ज़्यादा है, आदिवासी जनसंख्या 21% से ऊपर है, और सांस्कृतिक विविधता कहीं ज़्यादा — जो लागू करने में बड़ी चुनौती पेश करती है।

क्या UCC से मुस्लिम पर्सनल लॉ ख़त्म हो जाएगा?

राज्य स्तर पर UCC लागू होने से उस राज्य में विवाह, तलाक़ और उत्तराधिकार के मामलों में धर्म-आधारित पर्सनल लॉ की जगह एकसमान नागरिक क़ानून लागू होगा। हालाँकि, यह केवल उसी राज्य में प्रभावी होगा और केंद्रीय स्तर पर पर्सनल लॉ तब तक बना रहेगा जब तक संसद में क़ानून न बने।

भाजपा और भी राज्यों में UCC लाएगी?

रुझान यही दिखाते हैं — उत्तराखंड के बाद MP और महाराष्ट्र में एक साथ UCC की कवायद शुरू हुई है। विश्लेषकों का अनुमान है कि 2028 के चुनावों से पहले UP और राजस्थान में भी इसकी माँग पार्टी के एजेंडे पर आ सकती है।

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