कैबिनेट ने मोबाइल विनिर्माण के लिए PLI स्कीम का नया राउंड मंज़ूर किया है, जिसमें 60,000 नई नौकरियों का वादा है। लेकिन पिछले PLI राउंड में लक्ष्य से कम रोज़गार ज़मीन पर आए और ज़्यादातर प्लांट नोएडा-चेन्नई में सिमटे रहे — हिंदी बेल्ट के ITI-पॉलिटेक्निक पास युवा अब भी इंतज़ार में हैं।
60,000 — यह आँकड़ा सुनने में ठीक वैसे ही गर्म लगता है जैसे चुनाव से पहले लड्डू बँटते हैं। केंद्रीय कैबिनेट ने मोबाइल मैन्युफ़ैक्चरिंग के लिए PLI स्कीम का नया राउंड मंज़ूर कर दिया है — और News18 Hindi की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार दावा कर रही है कि इससे 60,000 सीधी नौकरियाँ आएँगी। लेकिन इसी वादे की पिछली फ़िल्म देखी है हमने — और क्लाइमैक्स उतना धमाकेदार नहीं था।
असली सवाल वादे से बड़ा है: पिछले PLI राउंड में जो नौकरियाँ पैदा हुईं, वो कहाँ गईं? और इस बार हिंदी बेल्ट के उस ITI-पॉलिटेक्निक पास लड़के को, जो लखनऊ या पटना में बैठा है, इसमें कुछ मिलेगा — या सब कुछ फिर नोएडा सेक्टर-63 और श्रीपेरंबदूर के बीच सिमट जाएगा?
पिछला PLI: वादा बनाम ज़मीन
2020 में शुरू हुई PLI-1 स्कीम ने मोबाइल सेक्टर में करीब ₹11,000 करोड़ का इंसेंटिव ऑफ़र किया था। IT मंत्रालय की सालाना रिपोर्ट और ICEA (India Cellular and Electronics Association) के आँकड़ों के अनुसार, इस स्कीम से भारत का मोबाइल एक्सपोर्ट ₹45,000 करोड़ से बढ़कर ₹1.2 लाख करोड़ के पार पहुँचा — यह आँकड़ा सच में प्रभावशाली है। लेकिन रोज़गार? IT मंत्रालय के अपने दस्तावेज़ों में स्वीकार किया गया कि PLI-1 के तहत सीधी नौकरियों का आँकड़ा लक्ष्य से पीछे रहा — बहुत-सी कंपनियों ने कॉन्ट्रैक्ट वर्कर्स रखे, जो सरकारी डैशबोर्ड पर 'परमानेंट जॉब' की तरह नहीं गिने जाते।
और सबसे बड़ी बात: इन फ़ैक्ट्रियों में होता क्या है? ICEA और इंडस्ट्री विश्लेषकों ने बार-बार कहा है कि भारत में अभी भी मोबाइल फ़ोन की 'स्क्रूड्राइवर असेंबली' होती है — यानी चीन और वियतनाम से कंपोनेंट आते हैं, यहाँ बस जोड़े जाते हैं। डिस्प्ले, चिपसेट, कैमरा मॉड्यूल — ये सब आज भी आयात होते हैं। तो 'मेड इन इंडिया' लेबल लगता है, लेकिन असली वैल्यू एडिशन 15-20% के आसपास अटका है।
नया राउंड: क्या बदलेगा?
कैबिनेट के ताज़ा फ़ैसले में, रिपोर्ट्स के मुताबिक, कंपोनेंट मैन्युफ़ैक्चरिंग पर ज़्यादा ज़ोर है। सरकार Samsung, Foxconn, Dixon Technologies और Lava जैसी कंपनियों को न सिर्फ़ असेंबली बल्कि PCB माउंटिंग, बैटरी सेल और चार्जर जैसी चीज़ों के लिए भी इंसेंटिव दे रही है। अगर यह सच में ज़मीन पर उतरा, तो नौकरियों की क्वालिटी बदल सकती है — स्क्रूड्राइवर वाले हाथों की जगह टेक्नीशियन और क्वालिटी इंजीनियर की ज़रूरत बढ़ेगी।
लेकिन यहाँ पेच है: ये प्लांट कहाँ लगेंगे? अभी तक PLI के तहत ज़्यादातर निवेश ग्रेटर नोएडा, गुरुग्राम और तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में गया है। कारण साफ़ है — वहाँ पहले से इंफ़्रास्ट्रक्चर है, एयरपोर्ट-पोर्ट कनेक्टिविटी है, सप्लायर इकोसिस्टम है। बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान या पूर्वी UP में कोई बड़ा मोबाइल मैन्युफ़ैक्चरिंग हब आज तक नहीं बना — और सरकार ने नई स्कीम में इस भौगोलिक असंतुलन को सीधे संबोधित किया है या नहीं, यह अभी तक साफ़ नहीं है।
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि 60,000 नौकरियों का ऐलान 2027 के UP और बिहार विधानसभा चुनावों की तैयारी का हिस्सा है। बेरोज़गारी — ख़ासकर हिंदी बेल्ट में — BJP के लिए सबसे चुभने वाला मुद्दा बना हुआ है। CMIE (Centre for Monitoring Indian Economy) के हालिया आँकड़ों के अनुसार, बिहार और UP में युवा बेरोज़गारी दर राष्ट्रीय औसत से ऊपर बनी हुई है। ऐसे में 'मैन्युफ़ैक्चरिंग जॉब्स' का नैरेटिव चुनावी हथियार बन सकता है — लेकिन तभी जब नौकरियाँ इन राज्यों में दिखें।
(यह सियासी गलियारों की चर्चा और विश्लेषण पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
विपक्ष पहले से तैयार है। कांग्रेस और RJD ने पिछले PLI पर सवाल उठाते हुए कहा है कि 'नौकरियाँ कागज़ पर हैं, ज़मीन पर नहीं।' हाल ही में सुप्रिया सुले ने एक अलग मुद्दे पर सरकार को घेरा — विपक्ष की रणनीति अब हर सरकारी दावे पर 'प्रूफ़ माँगो' की है। PLI-2 को भी इसी कसौटी पर कसा जाएगा।
हिंदी बेल्ट के ITI वाले को क्या मिलेगा?
यही वह सवाल है जो सबसे ज़्यादा मायने रखता है। भारत में हर साल करीब 15-17 लाख ITI और पॉलिटेक्निक छात्र पास होते हैं (NCVT और AICTE के आँकड़ों के अनुसार)। इनमें बड़ा हिस्सा हिंदी बेल्ट का है। इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफ़ैक्चरिंग को इन हाथों की ज़रूरत है — SMT ऑपरेटर, टेस्टिंग टेक्नीशियन, क्वालिटी चेकर — ये सब ITI लेवल के स्किल माँगते हैं। लेकिन अगर प्लांट नोएडा-गुरुग्राम में ही रहे, तो गोरखपुर या दरभंगा का लड़का वहीं माइग्रेट करेगा जहाँ पहले से जाता है — और 'लोकल जॉब' का सपना कागज़ पर रह जाएगा।
इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है: अगर सरकार ने नए PLI राउंड में 'लोकेशन-लिंक्ड इंसेंटिव' — यानी हिंदी बेल्ट के ज़िलों में प्लांट लगाने पर एक्स्ट्रा सब्सिडी — नहीं जोड़ी, तो यह स्कीम रोज़गार का नक्शा नहीं बदलेगी। 60,000 नौकरियाँ बनेंगी भी, तो वही पुराने हब में — और 2027 में बिहार-UP का वोटर पूछेगा: 'हमारे यहाँ कहाँ है?'
आगे क्या देखें
आने वाले हफ़्तों में देखना होगा कि IT मंत्रालय नई स्कीम की विस्तृत गाइडलाइन्स में कौन-से राज्य और कौन-से कंपोनेंट शामिल करता है। अगर PCB और बैटरी सेल असेंबली के लिए टियर-2 शहरों — लखनऊ, इंदौर, जयपुर, पटना — को शामिल किया गया, तो पहली बार हिंदी बेल्ट इलेक्ट्रॉनिक्स मैप पर आएगा। अगर नहीं, तो 60,000 का यह आँकड़ा एक और प्रेस रिलीज़ बनकर रह जाएगा — जिसे चुनावी रैली में पढ़ा जाएगा, लेकिन ITI के गेट पर खड़े लड़के को इसका पता नहीं चलेगा।
आखिर में सवाल वही है जो हमेशा से है: सरकार जॉब का वादा करती है, इंडस्ट्री सब्सिडी लेती है — लेकिन वह नौकरी किसकी ज़ेब में पहुँचती है? 60,000 का नंबर तब तक सिर्फ़ एक नंबर है, जब तक उसके पीछे किसी का नाम, किसी का पता, किसी का ITI सर्टिफ़िकेट न लग जाए।
आरोपों/दावों को रिपोर्ट करने में स्रोतों का हवाला दिया गया है; न्यायालय में विचाराधीन मामलों पर बिना पूर्वाग्रह रिपोर्टिंग की गई है।
Reported and written with AI assistance under India Herald's editorial standards; a human editor governs publication.
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मुख्य बातें
- PLI-1 ने मोबाइल एक्सपोर्ट ₹1.2 लाख करोड़ तक पहुँचाया, लेकिन सीधी रोज़गार सृजन लक्ष्य से पीछे रही — ज़्यादातर कॉन्ट्रैक्ट नौकरियाँ
- नया PLI राउंड कंपोनेंट मैन्युफ़ैक्चरिंग (PCB, बैटरी, चार्जर) पर फ़ोकस कर रहा है — स्क्रूड्राइवर असेंबली से आगे बढ़ने का मौका
- 60,000 नौकरियों का वादा 2027 UP-बिहार चुनावों से पहले बड़ा राजनीतिक हथियार — लेकिन प्लांट हिंदी बेल्ट में लगें तभी असर
- भारत में मोबाइल मैन्युफ़ैक्चरिंग वैल्यू एडिशन अभी 15-20% — चीन-वियतनाम से कंपोनेंट इंपोर्ट पर निर्भरता बरकरार
- हर साल 15-17 लाख ITI-पॉलिटेक्निक पास युवा निकलते हैं — PLI में लोकेशन-लिंक्ड इंसेंटिव के बिना ये नौकरियाँ उन तक नहीं पहुँचेंगी
आँकड़ों में
- PLI-1 के बाद भारत का मोबाइल एक्सपोर्ट ₹45,000 करोड़ से बढ़कर ₹1.2 लाख करोड़ के पार (ICEA/IT मंत्रालय आँकड़ों के अनुसार)
- भारत में मोबाइल मैन्युफ़ैक्चरिंग वैल्यू एडिशन करीब 15-20% — बाकी कंपोनेंट आयातित
- भारत में सालाना 15-17 लाख ITI/पॉलिटेक्निक छात्र पास होते हैं (NCVT/AICTE)
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: केंद्रीय कैबिनेट, IT मंत्रालय, मोबाइल विनिर्माण कंपनियाँ (Samsung, Foxconn, Dixon, Lava आदि)
- क्या: मोबाइल फ़ोन मैन्युफ़ैक्चरिंग के लिए PLI (प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव) स्कीम का नया राउंड मंज़ूर, 60,000 नौकरियों का वादा
- कब: जून 2026, कैबिनेट की ताज़ा बैठक में फ़ैसला (News18 Hindi रिपोर्ट के अनुसार)
- कहाँ: भारत — मुख्य प्लांट अब तक नोएडा, श्रीपेरंबदूर (चेन्नई) और गुरुग्राम में केंद्रित; हिंदी बेल्ट (UP, बिहार, MP, राजस्थान) में विस्तार अपेक्षित
- क्यों: इलेक्ट्रॉनिक्स एक्सपोर्ट बढ़ाने, चीन पर निर्भरता घटाने और घरेलू रोज़गार सृजन के लिए — 2027 के चुनावी मौसम से पहले रोज़गार एजेंडा मज़बूत करने की राजनीतिक ज़रूरत
- कैसे: PLI स्कीम के तहत कंपनियों को उत्पादन के आधार पर 4-6% तक इंसेंटिव दिया जाता है; नया राउंड कंपोनेंट मैन्युफ़ैक्चरिंग पर ज़्यादा फ़ोकस करता है ताकि स्क्रूड्राइवर असेंबली से आगे बढ़ा जा सके
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
PLI स्कीम क्या है और मोबाइल सेक्टर में कैसे काम करती है?
PLI (प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव) स्कीम के तहत सरकार मोबाइल मैन्युफ़ैक्चरिंग कंपनियों को उत्पादन के आधार पर 4-6% तक वित्तीय इंसेंटिव देती है — शर्त यह है कि कंपनी भारत में प्रोडक्शन बढ़ाए और निर्यात करे।
पिछले PLI राउंड में कितनी नौकरियाँ बनीं?
IT मंत्रालय की रिपोर्ट्स के अनुसार PLI-1 में सीधी रोज़गार सृजन लक्ष्य से पीछे रही। बहुत-सी कंपनियों ने कॉन्ट्रैक्ट वर्कर्स रखे जो 'परमानेंट जॉब' में नहीं गिने गए।
नया PLI राउंड पुराने से कैसे अलग है?
नया राउंड सिर्फ़ असेंबली नहीं बल्कि कंपोनेंट मैन्युफ़ैक्चरिंग — PCB माउंटिंग, बैटरी सेल, चार्जर — पर ज़्यादा ज़ोर दे रहा है, जिससे वैल्यू एडिशन और स्किल्ड जॉब बढ़ सकती हैं।
क्या हिंदी बेल्ट में मोबाइल फ़ैक्ट्री लगेंगी?
अभी तक ज़्यादातर प्लांट नोएडा, गुरुग्राम और तमिलनाडु में हैं। नई स्कीम में लोकेशन-लिंक्ड इंसेंटिव की घोषणा अभी नहीं हुई है — बिना इसके हिंदी बेल्ट में प्लांट लगने की संभावना कम है।







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