TMC के वरिष्ठ नेता मदन मित्रा ने ED द्वारा उनकी पत्नी और बेटों को समन भेजने के अगले दिन ममता बनर्जी का साथ छोड़कर बागी गुट में शामिल होने का ऐलान किया। इसके तुरंत बाद चंद्रिमा भट्टाचार्य ने भी सभी पार्टी पदों से इस्तीफ़ा दे दिया, जो TMC के भीतर गहराते सत्ता-संघर्ष का संकेत है।
एक पार्टी जिसने दो दशक तक 'दीदी' के एक इशारे पर चुनाव जीते, उसकी नींव में दरार अब बाहर से नहीं — भीतर से आ रही है। TMC के सबसे 'कलरफुल' और सबसे वफ़ादार चेहरों में गिने जाने वाले मदन मित्रा ने ममता बनर्जी का साथ छोड़कर बागी खेमे में शामिल होने का ऐलान कर दिया है। और यह अकेला झटका नहीं — इसके तुरंत बाद पार्टी की एक और दिग्गज नेता चंद्रिमा भट्टाचार्य ने सभी पार्टी पदों से इस्तीफ़ा दे दिया। हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, मित्रा का यह कदम ED द्वारा उनकी पत्नी और बेटों को समन भेजे जाने के ठीक एक दिन बाद आया है।
यहाँ सवाल सीधा है — क्या मदन मित्रा ममता बनर्जी से नाराज़ हैं, या असली निशाना अभिषेक बनर्जी हैं? और इसका जवाब अगर दूसरा है, तो TMC की कहानी अब सिर्फ़ बंगाल की नहीं, पूरे विपक्षी गठबंधन की कहानी बन जाती है।
ED का समन, पार्टी की चुप्पी — और टूटता भरोसा
मदन मित्रा कोई छोटा नाम नहीं हैं। शारदा चिटफंड केस में गिरफ्तारी से लेकर जेल की सज़ा तक — उन्होंने TMC का झंडा कभी नहीं छोड़ा। लेकिन इस बार जब ED ने सीधे उनके परिवार — पत्नी और बेटों — को समन भेजा, तो हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार पार्टी की ओर से कोई ठोस समर्थन या सुरक्षा का संकेत नहीं आया। यही वह बिंदु है जहाँ विश्वास टूटता है। मित्रा जैसे नेता के लिए पार्टी से लड़ाई लड़ना बर्दाश्त है, पार्टी की चुप्पी नहीं।
और मित्रा अकेले नहीं हैं। News18 की रिपोर्ट के मुताबिक, चंद्रिमा भट्टाचार्य — जो ममता की कैबिनेट में मंत्री और पार्टी के भीतर एक सम्मानित आवाज़ रही हैं — ने भी सभी पार्टी पदों से इस्तीफ़ा दे दिया। दो दिग्गज, दो अलग-अलग रास्ते, लेकिन निशाना एक ही ओर।
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि मदन मित्रा की नाराज़गी ममता बनर्जी से उतनी नहीं जितनी अभिषेक बनर्जी की 'न्यू टीम' से है। पिछले दो-तीन सालों में अभिषेक ने TMC का संगठनात्मक ढाँचा पूरी तरह बदला है — पुराने ज़िला अध्यक्ष हटाए, नए चेहरे लाए, और पार्टी फंडिंग का कंट्रोल अपने हाथ में लिया। ट्रेड हलकों में चर्चा है कि ओल्ड गार्ड को लगातार हाशिए पर धकेला गया — न टिकट की गारंटी, न मंत्रालय, न जाँच एजेंसियों से बचाव। एक इनसाइडर की भाषा में कहें तो: "अभिषेक ने पार्टी को स्टार्टअप की तरह चलाना शुरू किया — जहाँ पुराने कर्मचारी 'रिडंडेंट' हो गए।" (यह इंडस्ट्री चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
चुनाव आयोग तक पहुँची लड़ाई — दाँव अब कितना बड़ा?
बात सिर्फ़ नाराज़गी और इस्तीफ़ों तक सीमित नहीं रही। News18 के अनुसार, बागी गुट ने चुनाव आयोग (EC) के समक्ष TMC की लीडरशिप पर ही दावा ठोक दिया है — ममता बनर्जी के पार्टी अध्यक्ष पद को चुनौती देते हुए। यह कोई मामूली विद्रोह नहीं — यह संवैधानिक तंत्र का इस्तेमाल करके पार्टी के नियंत्रण की लड़ाई है। अगर EC इस दावे को सुनवाई योग्य मानता है, तो TMC का चुनाव चिह्न तक दाँव पर आ सकता है।
इतिहास गवाह है — जब शरद पवार की NCP में ऐसा ही हुआ था, तो पार्टी सचमुच दो टुकड़ों में बँट गई। TMC के लिए 2026 का बंगाल नगर निकाय चुनाव और 2027 का विधानसभा सीज़न नज़दीक है — ठीक इसी वक़्त पार्टी का DNA टूटना ममता के लिए सबसे ख़तरनाक टाइमिंग है।
BJP की भूमिका — मूक दर्शक या सूत्रधार?
यहाँ एक और परत है जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। ED का समन ठीक उस वक़्त आया जब TMC के भीतर पहले से असंतोष पक रहा था। सियासी गलियारों में कुछ विश्लेषकों का मानना है कि BJP की रणनीति 'ऑपरेशन लोटस' की क्लासिक कॉपी है — पहले जाँच एजेंसी का दबाव, फिर असंतुष्ट नेताओं को 'सुरक्षित रास्ता' दिखाना। हालाँकि, इसका कोई प्रत्यक्ष प्रमाण अभी सामने नहीं आया है और BJP की ओर से इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई है। मदन मित्रा ने भी BJP से किसी संपर्क से इनकार किया है — लेकिन राजनीति में शब्दों से ज़्यादा टाइमिंग बोलती है।
इस पूरी बिसात को इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि यह विद्रोह सिर्फ़ मदन मित्रा की व्यक्तिगत नाराज़गी नहीं — यह TMC के भीतर एक पीढ़ीगत सत्ता-संघर्ष है जो अब छुपाए नहीं छुप रहा। अभिषेक बनर्जी ने पार्टी को 'प्रोफेशनलाइज़' करने के नाम पर जो सर्जरी की, उसमें कई पुराने अंगों को काट दिया गया — और अब वे अंग अलग शरीर बना रहे हैं। अगर आने वाले हफ़्तों में दो-तीन और दिग्गज इस बागी खेमे में शामिल होते हैं, तो TMC का NCP जैसा विभाजन असंभव नहीं रहेगा।
आगे क्या — डोमिनो इफ़ेक्ट या दीदी का 'कंट्रोल शॉट'?
ममता बनर्जी ने पहले भी ऐसे तूफ़ान झेले हैं — शुवेंदु अधिकारी का BJP में जाना, मुकुल रॉय का पाला बदलना। लेकिन इस बार फ़र्क यह है कि विद्रोह बाहर नहीं जा रहा — वह भीतर ही रहकर पार्टी पर दावा कर रहा है। चुनाव आयोग के सामने लीडरशिप चैलेंज करना एक बिलकुल अलग खेल है। अगर ममता अगले दो हफ़्तों में ओल्ड गार्ड को मनाने में नाकाम रहती हैं, तो 2026 के नगर निकाय चुनाव में TMC को दो झंडों तले लड़ना पड़ सकता है — और बंगाल में विपक्ष का मतलब सीधे BJP को फ़ायदा है।
[EMBED-SUGGESTION:tweet]
देखने वाली बात यह है कि क्या ममता अपनी पुरानी स्टाइल में खेलती हैं — सीधे मदन मित्रा से बात, एक फ़ोन कॉल, एक गले लगना — या फिर अभिषेक की टीम इसे 'अनुशासनहीनता' का मामला बनाकर और सख़्ती करती है। अगर दूसरा रास्ता चुना गया, तो TMC में दरार खाई बन जाएगी।
आख़िर में सवाल यह नहीं कि मदन मित्रा कहाँ गए — सवाल यह है कि जो पार्टी 'दीदी के परिवार' कहलाती थी, उसमें अब परिवार के मुखिया को कौन तय करेगा — दीदी, या उनका भतीजा? और जब तक यह सवाल खुला है, TMC का हर दरवाज़ा BJP के लिए भी खुला है।
More from India Herald
मुख्य बातें
- मदन मित्रा ED द्वारा परिवार को समन भेजे जाने के अगले दिन ममता कैंप छोड़कर बागी गुट में शामिल हुए — पार्टी ने खुला समर्थन नहीं दिया (हिंदुस्तान टाइम्स)
- चंद्रिमा भट्टाचार्य ने भी सभी पार्टी पदों से इस्तीफ़ा दिया — दो दिग्गजों का एक साथ बग़ावत TMC के भीतर गहरे असंतोष का संकेत (News18)
- बागी गुट ने चुनाव आयोग में TMC लीडरशिप पर दावा ठोका — पार्टी चिह्न तक दाँव पर आ सकता है (News18)
- असली संघर्ष ममता बनर्जी बनाम अभिषेक बनर्जी की 'न्यू टीम' का है — पुरानी गार्ड को हाशिए पर धकेला गया
- 2026 नगर निकाय चुनाव नज़दीक — TMC का विभाजन BJP को सीधा फ़ायदा पहुँचा सकता है
आँकड़ों में
- ED ने मदन मित्रा की पत्नी और बेटों को समन भेजा — अगले ही दिन मित्रा ने पाला बदला (हिंदुस्तान टाइम्स)
- बागी गुट ने चुनाव आयोग के समक्ष TMC लीडरशिप पर औपचारिक दावा दायर किया (News18)
- एक ही सप्ताह में दो वरिष्ठ नेता — मदन मित्रा और चंद्रिमा भट्टाचार्य — ममता कैंप से अलग हुए (News18)
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: TMC के वरिष्ठ नेता मदन मित्रा और चंद्रिमा भट्टाचार्य — दोनों ममता बनर्जी के दशकों पुराने विश्वासपात्र (हिंदुस्तान टाइम्स, News18 के अनुसार)
- क्या: मदन मित्रा ने ममता कैंप छोड़कर बागी गुट में शामिल होने की घोषणा की; चंद्रिमा भट्टाचार्य ने सभी पार्टी पदों से इस्तीफ़ा दिया (News18 के अनुसार)
- कब: जून 2026 — ED द्वारा मित्रा की पत्नी और बेटों को समन भेजने के ठीक अगले दिन (हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार)
- कहाँ: पश्चिम बंगाल, कोलकाता — TMC का राजनीतिक केंद्र
- क्यों: अभिषेक बनर्जी के बढ़ते वर्चस्व से पुराने नेताओं में असंतोष, ED की कार्रवाई के बाद पार्टी से सुरक्षा न मिलने की शिकायत (हिंदुस्तान टाइम्स, News18)
- कैसे: बागी गुट ने चुनाव आयोग के समक्ष TMC की लीडरशिप पर दावा ठोककर ममता के अधिकार को सीधी चुनौती दी (News18 के अनुसार)
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
मदन मित्रा ने TMC क्यों छोड़ी?
हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार, ED द्वारा उनकी पत्नी और बेटों को समन भेजे जाने के बाद पार्टी से कोई खुला समर्थन नहीं मिला। अभिषेक बनर्जी की नई टीम द्वारा पुराने नेताओं को हाशिए पर धकेले जाने की नाराज़गी भी प्रमुख कारण मानी जा रही है।
TMC बागी गुट ने चुनाव आयोग में क्या दावा किया?
News18 के अनुसार, बागी गुट ने चुनाव आयोग के समक्ष TMC की लीडरशिप पर दावा ठोका है — ममता बनर्जी के पार्टी अध्यक्ष पद को चुनौती देते हुए। इससे पार्टी चिह्न तक दाँव पर आ सकता है।
क्या TMC का NCP जैसा विभाजन हो सकता है?
अभी यह कहना जल्दबाज़ी होगी, लेकिन चुनाव आयोग में लीडरशिप चैलेंज और एक साथ दो दिग्गजों का अलग होना — ये वही संकेत हैं जो NCP विभाजन से पहले दिखे थे। आने वाले हफ़्तों में और नेता जुड़ते हैं तो तस्वीर साफ़ होगी।
इसका 2026 बंगाल चुनावों पर क्या असर होगा?
TMC में विभाजन का सीधा फ़ायदा BJP को होगा। 2026 के नगर निकाय चुनाव नज़दीक हैं — अगर पार्टी दो खेमों में बँटकर लड़ती है, तो बंगाल में BJP की ज़मीन मज़बूत हो सकती है।







click and follow Indiaherald WhatsApp channel