पंजाब कांग्रेस गुटबाजी के दलदल में धँस चुकी है। दी इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार सभी की निगाहें राहुल गांधी पर हैं, लेकिन दिल्ली हाईकमान की चुप्पी नेताओं को और बेलगाम बना रही है। 2027 विधानसभा चुनाव से पहले यह आंतरिक लड़ाई AAP और BJP को बिना लड़े मैदान दे सकती है।
एक पार्टी जो अपने ही घर में आग लगा रही हो, उसे बाहर के दुश्मनों की ज़रूरत नहीं होती। पंजाब कांग्रेस इस वक्त बिलकुल यही कर रही है — और सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि आग बुझाने वाला कोई नज़र नहीं आ रहा।
दी इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी ताज़ा रिपोर्ट में जो तस्वीर खींची है, वह कांग्रेस के किसी भी शुभचिंतक की नींद उड़ाने के लिए काफी है: पंजाब इकाई गुटबाजी में इस कदर डूबी है कि 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारी तो दूर, पार्टी यह तय नहीं कर पा रही कि कप्तान कौन है। रिपोर्ट के मुताबिक सभी की निगाहें राहुल गांधी पर हैं — लेकिन सवाल यह है कि राहुल की निगाहें पंजाब पर हैं भी या नहीं।
यह कोई नई बीमारी नहीं है। पंजाब कांग्रेस में गुटबाजी का इतिहास दशकों पुराना है — कैप्टन अमरिंदर सिंह बनाम नवजोत सिंह सिद्धू का प्रकरण अभी भी ताज़ा है, जिसने 2022 में पार्टी को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाया था। लेकिन उस समय कम से कम दिल्ली ने हस्तक्षेप तो किया था — भले ही वह हस्तक्षेप विनाशकारी रूप से देर से और उल्टा पड़ा। आज स्थिति उससे भी बदतर है: 2026 में दिल्ली दरबार से न कोई फरमान आ रहा है, न कोई संदेश, न कोई डंडा।
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि राहुल गांधी का ध्यान इस वक्त राष्ट्रीय विपक्षी एकता और अपनी लोकसभा रणनीति पर है — पंजाब जैसे राज्य जहाँ कांग्रेस पहले ही सत्ता से बाहर है, उनकी प्राथमिकता सूची में नीचे खिसक गए हैं। इंडस्ट्री — माफ कीजिए, पार्टी — की बात यह है कि पंजाब के नेताओं को 'जो कर रहे हो करो, बस चुनाव के वक्त लाइन में आ जाना' जैसा अनकहा संदेश मिल चुका है। (यह सियासी हलकों में चल रही चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
लेकिन यही 'जो मर्जी करो' वाला रवैया सबसे खतरनाक है। जब हाईकमान चुप रहता है, तो राज्य के नेता इसे अपनी मनमानी का लाइसेंस मान लेते हैं। दी इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट भी इसी ओर इशारा करती है — क्षत्रप एक-दूसरे को नीचा दिखाने में इतने व्यस्त हैं कि असली विरोधी — भगवंत मान की AAP सरकार और तेजी से पाँव पसारती BJP — बिना किसी मेहनत के फायदे में हैं।
ज़रा पिछली बार का हिसाब देखिए: 2022 पंजाब विधानसभा चुनाव में कांग्रेस — जो पाँच साल तक सत्ता में थी — 117 में से महज 18 सीटों पर सिमट गई। मतदान प्रतिशत 23% से गिरकर लगभग 23% रहा, लेकिन सीटें 77 से 18 पर आ गईं। यह गिरावट किसी बाहरी ताकत ने नहीं, कांग्रेस की अपनी फूट ने कराई थी। अब 2027 से ठीक पहले वही फिल्म फिर चल रही है — बस किरदार बदल गए हैं।
इस पूरी बिसात के पीछे की असली चाल को इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड इस तरह देखता है: राहुल गांधी का 'रिमोट कंट्रोल' मॉडल — जहाँ दिल्ली से एक फोन कॉल पर राज्य इकाई लाइन में आ जाती थी — अब काम नहीं कर रहा। यह मॉडल तब तक चलता है जब तक केंद्रीय नेतृत्व के पास टिकट देने और छीनने की ताकत हो, जब तक हार का डर हो। लेकिन जब पार्टी पहले से ही विपक्ष में हो, टिकट का मतलब सिर्फ हारने का मौका हो, और दिल्ली से किसी सज़ा का डर न हो — तो रिमोट कंट्रोल के बटन दबाने से कुछ नहीं होता।
असल समस्या संरचनात्मक है। कांग्रेस का संगठनात्मक ढाँचा ऊपर से नीचे (top-down) चलता है, लेकिन जब ऊपर से कोई निर्देश ही न आए तो नीचे अराजकता फैलती है। PTI के पिछले विश्लेषणों में भी यह बात उभरी है कि कांग्रेस की राज्य इकाइयों में जहाँ-जहाँ केंद्रीय नेतृत्व ने समय पर हस्तक्षेप नहीं किया — चाहे राजस्थान हो, मध्य प्रदेश हो या पंजाब — वहाँ पार्टी को चुनाव में भारी कीमत चुकानी पड़ी है।
अब आगे क्या? AAP के भगवंत मान सरकार अपनी चुनौतियों से जूझ रही है — बिजली बिल, नशा, कानून-व्यवस्था के मुद्दे अभी भी गर्म हैं। यह कांग्रेस के लिए प्राकृतिक अवसर होना चाहिए था। लेकिन एक विपक्ष जो अपनी ही अंदरूनी लड़ाई में उलझा हो, वह सत्ता पक्ष की कमजोरियों का फायदा कैसे उठाएगा?
BJP का गेम और भी दिलचस्प है। पंजाब में BJP अकेले कभी बड़ी ताकत नहीं रही, लेकिन कांग्रेस और AAP दोनों की कमजोरी उसे हिंदू-बहुल शहरी सीटों पर मौका दे रही है। अगर कांग्रेस अपना घर 2027 से पहले नहीं सँभालती, तो तीन-तरफा बँटवारे में सबसे ज्यादा नुकसान उसी का होगा — ठीक वैसे ही जैसे 2022 में हुआ था।
आगे क्या देखें
अगले कुछ महीने निर्णायक हैं। अगर राहुल गांधी या कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे पंजाब के लिए कोई निर्णायक कदम उठाते हैं — चाहे वह नया प्रदेश अध्यक्ष हो, नेता प्रतिपक्ष का बदलाव हो, या कोई स्पष्ट 'वन-कमांड' संरचना हो — तो शायद पार्टी 2027 की दौड़ में बनी रहे। लेकिन अगर यही चुप्पी जारी रही, तो उम्मीद कीजिए कि गुटबाज नेता अपने-अपने इलाकों में किलेबंदी करेंगे, कुछ BJP या AAP की ओर इशारे करेंगे, और चुनाव से पहले ही आधी लड़ाई हार जाएगी।
पंजाब कांग्रेस का यह 'गृहयुद्ध' सिर्फ एक राज्य की कहानी नहीं है — यह पूरी कांग्रेस की उस बुनियादी कमजोरी का आईना है जहाँ केंद्रीय नेतृत्व के पास राज्यों पर पकड़ का कोई भरोसेमंद तंत्र नहीं बचा है। और जब तक वह तंत्र नहीं बनता, हर राज्य एक नया पंजाब बनने की कतार में है।
सवाल यह नहीं कि पंजाब कांग्रेस बचेगी या नहीं — सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी को अब भी लगता है कि चुप रहकर पार्टी चलाई जा सकती है? क्योंकि पंजाब का इतिहास बताता है: जो दरबार अपने क्षत्रपों को समय पर नहीं रोकता, वह क्षत्रपों से पहले गिरता है।
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आरोप और विवाद यहाँ नामित स्रोतों के हवाले से रिपोर्ट किए गए हैं और जब तक अदालत का फैसला न हो, अप्रमाणित हैं; न्यायाधीन मामले बिना पूर्वाग्रह के रिपोर्ट किए गए हैं।
इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।
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मुख्य बातें
- पंजाब कांग्रेस 2027 विधानसभा चुनाव से पहले गहरी गुटबाजी में फँसी है — दी इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार सभी की निगाहें राहुल गांधी पर हैं लेकिन दिल्ली से कोई हस्तक्षेप नहीं आ रहा
- 2022 में कांग्रेस 77 सीटों से गिरकर महज 18 पर आई थी — वही आंतरिक फूट अब दोबारा दिख रही है
- राहुल गांधी का रिमोट कंट्रोल मॉडल तब काम करता है जब टिकट की ताकत हो — विपक्ष में बैठी पार्टी में वह लीवर कमजोर हो चुका है
- AAP और BJP दोनों बिना मेहनत किए कांग्रेस की फूट का फायदा उठा रहे हैं
- अगले कुछ महीनों में अगर कोई निर्णायक संगठनात्मक बदलाव नहीं हुआ तो 2027 में कांग्रेस और हाशिए पर जा सकती है
आँकड़ों में
- 2022 पंजाब विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 77 सीटों से गिरकर महज 18 सीटों पर सिमटी — यह गिरावट मुख्यतः आंतरिक फूट की वजह से हुई
- पंजाब विधानसभा में कुल 117 सीटें हैं — 2027 में तीन-तरफा बँटवारे में कांग्रेस की स्थिति सबसे कमजोर दिख रही है
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: राहुल गांधी, पंजाब कांग्रेस के प्रतिद्वंद्वी गुट और दिल्ली हाईकमान
- क्या: पंजाब कांग्रेस में गहरी गुटबाजी जो पार्टी की 2027 चुनावी संभावनाओं को नुकसान पहुँचा सकती है
- कब: 2026 — 2027 पंजाब विधानसभा चुनाव से लगभग एक साल पहले
- कहाँ: पंजाब और कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व, नई दिल्ली
- क्यों: दिल्ली हाईकमान की कमज़ोर पकड़ और राज्य स्तर पर नेताओं के बीच सत्ता-संघर्ष
- कैसे: स्थानीय नेता खुलेआम एक-दूसरे के खिलाफ बयानबाजी कर रहे हैं, दिल्ली से कोई निर्णायक हस्तक्षेप नहीं आ रहा — दी इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
पंजाब कांग्रेस में गुटबाजी की असली वजह क्या है?
दी इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार पंजाब कांग्रेस में गुटबाजी का मूल कारण दिल्ली हाईकमान की कमजोर पकड़ और राज्य नेताओं के बीच सत्ता-संघर्ष है। विपक्ष में होने से केंद्रीय नेतृत्व के पास टिकट और अनुशासन का प्रभावी हथियार नहीं बचा है।
क्या पंजाब कांग्रेस की गुटबाजी 2027 चुनाव पर असर डालेगी?
2022 में भी आंतरिक फूट ने कांग्रेस को 77 से 18 सीटों पर ला दिया था। विश्लेषकों का मानना है कि अगर 2027 से पहले गुटबाजी नहीं रुकी तो AAP और BJP को बिना मेहनत फायदा मिलेगा।
राहुल गांधी पंजाब कांग्रेस पर कब हस्तक्षेप करेंगे?
अभी तक कोई स्पष्ट संकेत नहीं है। सियासी हलकों में चर्चा है कि राहुल गांधी का ध्यान राष्ट्रीय विपक्षी एकता पर है और पंजाब उनकी प्राथमिकता सूची में नीचे है — हालाँकि यह अपुष्ट है।
2022 पंजाब चुनाव में कांग्रेस को कितनी सीटें मिली थीं?
2022 पंजाब विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 117 में से सिर्फ 18 सीटें मिलीं, जबकि पिछली बार उसके पास 77 सीटें थीं।



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