पंजाब कांग्रेस तीन गुटों — सिद्धू, चन्नी और अमरिंदर समर्थकों — में बँटकर 2027 विधानसभा चुनाव से पहले आत्मघाती स्थिति में है। द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार राहुल गांधी पर सारी निगाहें हैं, लेकिन अगर गुटबाज़ी नहीं सुलझी तो BJP बिना ज़मीनी ताक़त के भी पंजाब की सत्ता हथिया सकती है।

एक पार्टी, तीन सेनापति, और हर सेनापति को यक़ीन है कि असली दुश्मन सामने वाली पार्टी में नहीं, बग़ल वाली कुर्सी पर बैठा है। पंजाब कांग्रेस का यही हाल है — 2027 विधानसभा चुनाव की घड़ी क़रीब आ रही है और पार्टी अपने ही घर में तीन टुकड़ों में बँटकर ऐसे लड़ रही है जैसे विपक्ष का अस्तित्व ही न हो।

द इंडियन एक्सप्रेस की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक़ पंजाब कांग्रेस में गुटबाज़ी इस हद तक पहुँच चुकी है कि ज़मीनी कार्यकर्ता तक कन्फ़्यूज़ हैं — उन्हें नहीं पता कि उनका असली 'बॉस' कौन है। रिपोर्ट कहती है कि सारी निगाहें राहुल गांधी पर हैं कि वे इस आग को बुझाएँगे या इसे और भड़कने देंगे। लेकिन जो तस्वीर उभर रही है, वह बताती है कि हाई कमान की चुप्पी ने आग बुझाई नहीं — उसमें हवा दी है।

तीन धड़े, तीन दावे, एक ही कुर्सी

पहला और सबसे शोर मचाने वाला धड़ा नवजोत सिंह सिद्धू का है। 2021 में जब कांग्रेस हाई कमान ने उन्हें पंजाब प्रदेश अध्यक्ष बनाया, तो यह कैप्टन अमरिंदर सिंह के ख़िलाफ़ खुली बग़ावत का इनाम था। सिद्धू की ताक़त उनकी ज़ुबान है — मालवा बेल्ट में उनकी रैलियाँ भीड़ खींचती हैं। लेकिन उनकी कमज़ोरी भी वही ज़ुबान है: पार्टी के भीतर उन्होंने इतने दुश्मन बनाए हैं कि चन्नी समर्थक और अमरिंदर के पुराने वफ़ादार — दोनों एक बात पर सहमत हैं कि सिद्धू को CM कैंडिडेट बनाना आत्मघाती होगा।

दूसरा धड़ा चरणजीत सिंह चन्नी का है। 2021 में मात्र कुछ महीनों के लिए मुख्यमंत्री बने चन्नी का दलित वोट बैंक पर दावा सबसे मज़बूत है। पंजाब की कुल आबादी में दलित समुदाय लगभग 32 प्रतिशत है — किसी भी भारतीय राज्य में सबसे ज़्यादा। चन्नी गुट का तर्क सीधा है: बिना दलित चेहरे के पंजाब जीतना अंकगणित के ख़िलाफ़ है। लेकिन चन्नी की सीमा यह है कि जाट सिख बहुल माझा और दोआबा में उनकी पकड़ कमज़ोर है, और 2022 में उनके CM रहते कांग्रेस को महज़ 18 सीटें मिलीं — यह 'ट्रैक रिकॉर्ड' उनके विरोधी बार-बार याद दिलाते हैं।

तीसरा धड़ा — जिसकी चर्चा कम होती है लेकिन जो ज़मीन पर सबसे गहरी जड़ें रखता है — कैप्टन अमरिंदर सिंह के पुराने समर्थकों का है। अमरिंदर भले ही कांग्रेस छोड़कर BJP के रास्ते गए और फिर राजनीतिक अप्रासंगिकता में चले गए, लेकिन उनके दशकों पुराने संगठन ने ज़िला-ब्लॉक स्तर पर जो ढाँचा बनाया था, वह आज भी टूटा नहीं है। फ़्रंटलाइन मैगज़ीन के विश्लेषण के अनुसार ये 'कैप्टन लॉयलिस्ट' अब किसी एक नेता के पीछे नहीं, बल्कि हर गुट में किंगमेकर की भूमिका में हैं — जो भी उन्हें ज़्यादा टिकट और ज़िला पदाधिकारी पद देगा, वे उधर झुकेंगे।

पॉलिटिकल पल्स

सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि दिल्ली दरबार में तीनों गुटों के 'दूत' लगातार आ-जा रहे हैं। चन्नी खेमे के लोग राहुल गांधी से 'दलित फ़ेस' का तर्क दे रहे हैं, सिद्धू समर्थक 'एनर्जी और ज़मीनी जुड़ाव' का हवाला देते हैं, और कैप्टन के पुराने लोग चुपचाप तीसरे विकल्प — किसी 'न्यूट्रल' चेहरे — की लॉबिंग कर रहे हैं। पार्टी सूत्रों के हवाले से चर्चा है कि कांग्रेस पंजाब में प्रदेश अध्यक्ष का फ़ैसला 2026 के अंत तक ले सकती है, लेकिन हर गुट ने पहले ही अपनी 'वीटो लिस्ट' तैयार कर ली है — जिसमें लिखा है कि फ़लाँ नाम आया तो हम बग़ावत करेंगे।

(यह इंडस्ट्री और सियासी गलियारों की चर्चा और अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

असली ख़तरा: बाहर नहीं, भीतर

अब ज़रा पंजाब के बाक़ी सियासी मैदान पर नज़र डालिए। आम आदमी पार्टी, जिसने 2022 में 92 सीटें जीतकर धमाल मचाया था, अब ख़ुद उलझनों में है — भगवंत मान सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप, कई विधायकों की नाराज़गी, और दिल्ली में केजरीवाल की अपनी मुश्किलें। शिरोमणि अकाली दल का तो सूपड़ा ही साफ़ हो चुका है — बादल परिवार से नाराज़ धड़े अलग हो गए और पार्टी अपने सबसे बुरे दौर में है।

ऐसे में BJP — जिसकी पंजाब में ऐतिहासिक रूप से शहरी हिंदू वोट तक सीमित पहचान रही है — अचानक एक ऐसी स्थिति में है जहाँ उसे जीतने के लिए बहुत कुछ करने की ज़रूरत नहीं। उसे बस इंतज़ार करना है कि बाक़ी सब अपने-अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार लें। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट इसी ख़तरे की ओर इशारा करती है — कांग्रेस की गुटबाज़ी सीधे BJP के हाथ मज़बूत कर रही है।

गुजरात-2017 का साया

इस सारे मंज़र में एक ऐतिहासिक समानता आँखें खोलने वाली है। 2017 गुजरात विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने ज़बरदस्त लड़ाई लड़ी — हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश ठाकोर के सहारे BJP को कड़ी टक्कर दी। लेकिन चुनाव से ठीक पहले अंदरूनी खींचतान ने मोमेंटम तोड़ दिया, और जीत की दहलीज़ पर खड़ी कांग्रेस फिर हारी। पंजाब 2027 में वही ख़तरा है — शायद उससे भी बड़ा, क्योंकि यहाँ गुट दो नहीं, तीन हैं।

इस सियासी पहेली के पीछे की असली चाल को इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यूँ देखता है: यह सिर्फ़ नेताओं की अहम् की लड़ाई नहीं, बल्कि कांग्रेस के संगठनात्मक ढाँचे की संरचनात्मक विफलता है। पार्टी ने 2022 की हार के बाद कोई 'पोस्ट-मॉर्टम' नहीं किया, कोई ज़िम्मेदारी तय नहीं की, कोई एक चेहरा सामने नहीं रखा। नतीजा: हर गुट ने ख़ुद को 'अगला CM कैंडिडेट' मान लिया, और अब सारी ऊर्जा विपक्ष से लड़ने में नहीं, अपनों को नीचा दिखाने में लग रही है।

आगे क्या होगा — नज़र किस पर रखें

आने वाले महीनों में तीन बातें तय करेंगी कि पंजाब कांग्रेस बचेगी या बिखरेगी। पहला: क्या राहुल गांधी 2026 के अंत से पहले एक 'वन-पॉइंट कमान' — चाहे प्रदेश अध्यक्ष हो या CM कैंडिडेट — तय करेंगे? दूसरा: क्या टिकट बँटवारे का फ़ॉर्मूला तीनों धड़ों को न्यूनतम स्वीकार्य हिस्सा देगा, या किसी एक गुट को पूरी तरह हाशिए पर धकेला जाएगा — जिसका मतलब होगा खुली बग़ावत? तीसरा: क्या AAP सरकार की एंटी-इनकम्बेंसी इतनी तीखी होगी कि कांग्रेस को टूटे हुए हाल में भी 'डिफ़ॉल्ट विकल्प' बना दे — जैसा 2017 पंजाब में हुआ था?

अगर इन तीनों सवालों का जवाब कांग्रेस के ख़िलाफ़ गया, तो 2027 पंजाब का नक्शा कुछ ऐसा हो सकता है: AAP कमज़ोर, अकाली दल बिखरा, कांग्रेस तीन टुकड़ों में — और BJP, जो आज पंजाब में सबसे कमज़ोर दिखती है, चुपचाप बाज़ी पलट ले।

पंजाब की ज़मीन पर एक पुरानी कहावत है: "जब घर में ही लड़ाई हो, तो बाहर वाले को ताला तोड़ने की ज़रूरत नहीं पड़ती।" कांग्रेस हाई कमान को अब तय करना है — क्या वे ताला लगाएँगे, या दरवाज़ा खुला छोड़कर 2027 की शाम को BJP के स्वागत के लिए लाल क़ालीन बिछा देंगे?

इस लेख में दर्ज आरोप नामित स्रोतों के हवाले से हैं और जब तक न्यायालय का निर्णय न आए, अप्रमाणित हैं; न्यायालय में विचाराधीन मामलों की रिपोर्टिंग बिना पूर्वाग्रह के की गई है।

इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।

More from India Herald

SC's 'Separate Space' Formula for Bhojshala Namaz — Is This the Legal Blueprint Delhi's Courts Will Copy for Kashi and Mathura?PoliticsSC's 'Separate Space' Formula for Bhojshala Namaz — Is This the Legal Blueprint Delhi's Courts Will Copy for Kashi and Mathura?The Supreme Court has declined to restore namaz inside Bhojshala and instead directed a separate open space nearby for Friday prayers — a su…'Hasina Will Go to Jail' — As Dhaka Issues Its Ultimatum, Is New Delhi Being Forced to Sacrifice Its Oldest Ally?Politics'Hasina Will Go to Jail' — As Dhaka Issues Its Ultimatum, Is New Delhi Being Forced to Sacrifice Its Oldest Ally?Bangladesh's new regime has declared Sheikh Hasina must face prison. India now confronts its most delicate neighbourhood diplomacy test in a…One Meeting, Two Warring Camps, Zero Trust — Is Rahul Gandhi's Punjab Congress Ultimatum Already Too Late?PoliticsOne Meeting, Two Warring Camps, Zero Trust — Is Rahul Gandhi's Punjab Congress Ultimatum Already Too Late?The Punjab Congress rift has reached the high command's doorstep. Rahul Gandhi's closed-door meeting with warring factions reveals a party c…ISF's Rural Bengal Surge, Mamata's Loyal Muslim Vote — Is the Anti-BJP Wall Cracking From Within?PoliticsISF's Rural Bengal Surge, Mamata's Loyal Muslim Vote — Is the Anti-BJP Wall Cracking From Within?Abbas Siddiqui's ISF is no longer a one-election curiosity. Its quiet traction in Bengal's rural minority pockets is fracturing the consolid…Rahul's OBC Crusade Lands in Chennai — But Why Is the DMK Reminding Its Own Ally Who Wrote the Script?PoliticsRahul's OBC Crusade Lands in Chennai — But Why Is the DMK Reminding Its Own Ally Who Wrote the Script?Rahul Gandhi wants OBC justice to be Congress's national war cry. In Chennai, the DMK just quietly reminded him that this song was composed …

मुख्य बातें

  • पंजाब कांग्रेस तीन गुटों — सिद्धू, चन्नी और अमरिंदर लॉयलिस्ट — में बँटी है; तीनों गुट CM कैंडिडेसी पर अपना दावा ठोक रहे हैं — द इंडियन एक्सप्रेस
  • पंजाब में दलित आबादी लगभग 32% है — भारत में सबसे ज़्यादा — जो चन्नी गुट के अंकगणितीय तर्क को ताक़त देती है लेकिन माझा-दोआबा में उनकी कमज़ोर पकड़ सीमा है
  • AAP की एंटी-इनकम्बेंसी, अकाली दल का विघटन और कांग्रेस की गुटबाज़ी — तीनों मिलकर BJP को 'बिना लड़े जीत' का मौक़ा दे सकते हैं
  • राहुल गांधी पर निगाहें हैं — 2026 अंत तक प्रदेश अध्यक्ष या CM कैंडिडेट का फ़ैसला न हुआ तो गुजरात-2017 दोहरा सकती है कांग्रेस
  • फ़्रंटलाइन के विश्लेषण के अनुसार कैप्टन लॉयलिस्ट ज़िला-ब्लॉक स्तर पर किंगमेकर बने हुए हैं — जो सबसे ज़्यादा टिकट देगा, वे उधर झुकेंगे

आँकड़ों में

  • पंजाब में दलित आबादी लगभग 32% — किसी भी भारतीय राज्य में सर्वाधिक, जो CM कैंडिडेट के चुनाव में निर्णायक अंकगणित है
  • 2022 पंजाब विधानसभा चुनाव में चन्नी के CM रहते कांग्रेस को महज़ 18 सीटें मिलीं — 117 में से
  • AAP ने 2022 में 92 सीटें जीती थीं — अब एंटी-इनकम्बेंसी और अंदरूनी नाराज़गी से घिरी है

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: पंजाब कांग्रेस के तीन धड़े — नवजोत सिंह सिद्धू गुट, चरणजीत सिंह चन्नी गुट, और पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के पुराने समर्थक
  • क्या: पार्टी में गहरी गुटबाज़ी जो 2027 पंजाब विधानसभा चुनाव की तैयारियों को पंगु बना रही है
  • कब: 2026 में गुटबाज़ी चरम पर — 2027 विधानसभा चुनाव से लगभग एक साल पहले
  • कहाँ: पंजाब — विशेषकर मालवा, माझा और दोआबा क्षेत्रों में तीनों धड़ों का अलग-अलग प्रभाव
  • क्यों: 2022 की करारी हार के बाद भी कांग्रेस हाई कमान ने एक स्पष्ट नेता नहीं चुना, जिससे तीनों गुट अपना-अपना दावा ठोक रहे हैं — द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार
  • कैसे: ज़िला और ब्लॉक स्तर पर संगठन पर क़ब्ज़े की लड़ाई, टिकट बँटवारे की अग्रिम रस्साकशी, और राहुल गांधी के दरबार में एक-दूसरे के ख़िलाफ़ शिकायतें — यही तरीक़ा है जिससे तीनों धड़े लड़ रहे हैं

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

पंजाब कांग्रेस में कितने गुट हैं और उनके नेता कौन हैं?

तीन प्रमुख गुट हैं — नवजोत सिंह सिद्धू गुट (मालवा बेल्ट में मज़बूत), चरणजीत सिंह चन्नी गुट (दलित वोट बैंक पर दावा), और कैप्टन अमरिंदर सिंह के पुराने समर्थक जो ज़िला-ब्लॉक स्तर पर किंगमेकर हैं — द इंडियन एक्सप्रेस और फ़्रंटलाइन के अनुसार।

क्या BJP पंजाब 2027 में सत्ता हासिल कर सकती है?

अगर कांग्रेस, AAP और अकाली दल तीनों आपसी कलह में उलझे रहे, तो विपक्षी वोट बँटने से BJP को बिना पारंपरिक ज़मीनी ताक़त के भी फ़ायदा मिल सकता है — यह इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड है।

राहुल गांधी पंजाब कांग्रेस की गुटबाज़ी पर क्या कर रहे हैं?

द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार सारी निगाहें राहुल गांधी पर हैं, लेकिन अब तक हाई कमान ने कोई स्पष्ट फ़ैसला नहीं लिया है — न एक प्रदेश अध्यक्ष तय किया, न CM कैंडिडेट, जिससे गुटबाज़ी और गहरी हो रही है।

पंजाब में दलित वोट बैंक कितना बड़ा है और इसका चुनाव पर क्या असर है?

पंजाब में दलित आबादी लगभग 32 प्रतिशत है — किसी भी भारतीय राज्य में सर्वाधिक। यही कारण है कि चन्नी गुट अपने दलित चेहरे को CM कैंडिडेसी का सबसे मज़बूत अंकगणितीय तर्क मानता है।

More from India Herald

MP प्रमोशन में आरक्षण — 21 जुलाई का फैसला मोहन यादव सरकार का 'चक्रव्यूह' क्यों बन गया?PoliticsMP प्रमोशन में आरक्षण — 21 जुलाई का फैसला मोहन यादव सरकार का 'चक्रव्यूह' क्यों बन गया?4 लाख से ज़्यादा सरकारी कर्मचारियों की किस्मत, SAPAKS बनाम AJAKS की खूनी जंग, और BJP की OBC राजनीति — सब कुछ एक तारीख़ पर टिका है। इंडिया हे…डोवल-सुलिवन की 'बंद कमरे' की बैठक — मिडिल ईस्ट की आग में भारत को 'पाला' चुनने पर मजबूर तो नहीं कर रहा अमेरिका?Politicsडोवल-सुलिवन की 'बंद कमरे' की बैठक — मिडिल ईस्ट की आग में भारत को 'पाला' चुनने पर मजबूर तो नहीं कर रहा अमेरिका?मिडिल ईस्ट में ईरान-इस्राइल तनाव चरम पर है, क्रूड ऑयल की कीमतें उबल रही हैं, और ठीक इसी मोड़ पर अमेरिकी NSA जेक सुलिवन नई दिल्ली में अजित डो…जेलेंस्की की टीम में बगावत — ऐन जंग में PM का इस्तीफा, क्या पुतिन बिना लड़े जीत रहे हैं?Politicsजेलेंस्की की टीम में बगावत — ऐन जंग में PM का इस्तीफा, क्या पुतिन बिना लड़े जीत रहे हैं?युद्ध के बीच यूक्रेन के प्रधानमंत्री का इस्तीफा — जेलेंस्की का 'इनर सर्कल' बिखर रहा है और मॉस्को खामोशी से स्कोर कर रहा है। इंडिया हेराल्ड क…

Find out more: