मोदी सरकार IT Rules में संशोधन कर OTT प्लेटफॉर्म पर सख्त नियामक ढाँचा लाने की तैयारी में है। द प्रिंट की रिपोर्ट के मुताबिक ZEE5 के खिलाफ कार्रवाई पहले कदम के रूप में हो सकती है। यह बदलाव सभी OTT प्लेटफॉर्म — नेटफ्लिक्स, अमेज़न प्राइम, JioCinema — पर लागू होगा।
जब सरकार किसी OTT प्लेटफॉर्म पर 'कार्रवाई' की बात करती है, तो असली सवाल यह नहीं होता कि किस शो ने भावनाएँ आहत कीं — असली सवाल यह होता है कि इस कार्रवाई से बाकी सारे प्लेटफॉर्म को क्या संदेश जा रहा है। और ZEE5 के मामले में यह संदेश साफ़ है: अब OTT पर 'चलता है' का ज़माना ख़त्म हो रहा है।
द प्रिंट की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक केंद्र सरकार IT Rules 2021 में संशोधन पर गंभीरता से विचार कर रही है — ख़ासतौर पर OTT प्लेटफॉर्म के लिए। सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट बताती है कि ZEE5 के खिलाफ कार्रवाई इसकी पहली ठोस अभिव्यक्ति हो सकती है। यह वही ZEE5 है जिसके कई शो पिछले महीनों में विवादों में रहे — कंटेंट को लेकर शिकायतें आईं, और तीन-स्तरीय शिकायत निवारण तंत्र ने वह नतीजा नहीं दिया जो सरकार चाहती थी।
लेकिन ज़रा पीछे जाकर देखें — यह कहानी सिर्फ़ ZEE5 की नहीं है। 2021 में जब IT Rules लागू हुए थे, तब OTT को 'स्व-नियमन' का विकल्प दिया गया था। प्लेटफॉर्म अपनी कंटेंट गाइडलाइंस बनाएँ, शिकायत अधिकारी नियुक्त करें, और अगर कोई संतुष्ट न हो तो सरकार के पास अपील जाए। कागज़ पर यह ढाँचा लोकतांत्रिक दिखता था। लेकिन ज़मीन पर? Livemint की रिपोर्टिंग के अनुसार, सरकार का मानना है कि यह 'स्व-नियमन' व्यवहार में 'कोई नियमन नहीं' साबित हुआ — प्लेटफॉर्म ने शिकायत तंत्र को औपचारिकता से ज़्यादा कुछ नहीं माना।
अब जो संशोधन प्रस्ताव पर विचार हो रहा है, उसके कुछ संभावित आयाम हैं। सूत्रों के हवाले से जो तस्वीर उभरती है, उसमें सरकारी ओवरसाइट का दायरा बढ़ेगा — यानी शिकायत निवारण का अंतिम अधिकार सरकार के हाथ में आएगा, प्लेटफॉर्म के नहीं। कंटेंट क्लासिफिकेशन (आयु वर्ग, चेतावनी लेबल) को अनिवार्य और मानकीकृत करने की बात है। और सबसे अहम — 'उल्लंघन' की स्थिति में प्लेटफॉर्म पर सीधी कार्रवाई का प्रावधान, जो अभी तक स्पष्ट नहीं था।
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि ZEE5 को पहला निशाना बनाना कोई इत्तेफ़ाक नहीं। ट्रेड हलकों में चर्चा है कि ज़ी ग्रुप की बदलती प्रमोटर डायनामिक्स और सोनी-ज़ी मर्जर के बिखरने के बाद ज़ी की राजनीतिक सुरक्षा कमज़ोर हुई है — और कमज़ोर शिकार पर पहले निशाना लगाना सरकारों की पुरानी रणनीति है। नेटफ्लिक्स या अमेज़न प्राइम जैसे ग्लोबल प्लेटफॉर्म पर सीधी कार्रवाई करना अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक जटिलता लाता है — भारतीय कंपनी पर कार्रवाई कहीं आसान और 'उदाहरण-स्थापक' होती है।
(यह इंडस्ट्री चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
लेकिन असली बिसात इससे भी बड़ी है। 2027 के आम चुनाव अब डेढ़ साल से कम दूर हैं। OTT प्लेटफॉर्म पिछले पाँच सालों में भारत का सबसे शक्तिशाली 'नैरेटिव इंजन' बन गए हैं — वेब सीरीज़ जो सत्ता, भ्रष्टाचार, सांप्रदायिक तनाव, जातिगत हिंसा जैसे विषयों पर बेबाकी से बात करती हैं और जिनकी पहुँच करोड़ों दर्शकों तक है। इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि IT Rules संशोधन सिर्फ़ 'जवाबदेही' का मसला नहीं — यह मोदी सरकार की व्यापक 'कल्चर वॉर' का अगला मोर्चा है, जहाँ चुनाव से पहले नैरेटिव-कंट्रोल की ज़मीन तैयार की जा रही है।
इसे एक और कोण से समझिए। 'पंजाब 95' से 'सतलुज' तक — दिलजीत की फ़िल्म को सालों तक दबाने वाली ताक़त वाले मामले में हमने देखा कि OTT ने कैसे उन कहानियों को दरवाज़ा दिया जो सेंसर बोर्ड के रास्ते कभी नहीं आतीं। अगर IT Rules संशोधन के बाद OTT पर भी वही सेंसर-जैसी बंदिशें आ गईं, तो वह दरवाज़ा बंद हो जाएगा — और भारत का डिजिटल क्रिएटिव स्पेस फिर से सरकारी स्वीकृति का मोहताज बन जाएगा।
अब सवाल यह है कि 'जवाबदेही' और 'सेंसरशिप' के बीच की लक्ष्मण रेखा कहाँ है? यह सवाल इसलिए ज़रूरी है क्योंकि दोनों पक्षों की दलील में दम है। एक तरफ़ — कुछ OTT कंटेंट वाकई आपत्तिजनक रहा है, ख़ासकर जब बच्चों की पहुँच का सवाल हो। आयु-आधारित फ़िल्टरिंग और कंटेंट चेतावनी को अनिवार्य बनाना कोई अनुचित माँग नहीं। लेकिन दूसरी तरफ़ — जब 'शिकायत' का अंतिम निपटारा सरकार के हाथ में हो, तो हर विवादित कंटेंट सरकारी पसंद-नापसंद की कसौटी पर कसा जाएगा। और यहीं 'जवाबदेही' चुपचाप 'सेंसरशिप' में बदल जाती है।
IAMAI (इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया) जैसे उद्योग निकाय पहले से कह रहे हैं कि OTT पर अत्यधिक नियमन विदेशी निवेश को हतोत्साहित करेगा। भारत का OTT बाज़ार 2025 में अनुमानित 12,000-15,000 करोड़ रुपये का हो चुका है — यह एक ऐसा इकोसिस्टम है जिसने लाखों रोज़गार दिए हैं, हज़ारों इंडिपेंडेंट क्रिएटर्स को प्लेटफॉर्म दिया है। अगर नियमन इतना सख्त हुआ कि हर स्क्रिप्ट सरकारी नज़र से गुज़रे, तो भारत का 'कंटेंट बूम' ठंडा पड़ सकता है।
ZEE5 की तरफ़ से इस रिपोर्ट पर अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सार्वजनिक नहीं हुई है।
आने वाले हफ़्तों में देखने लायक यह होगा कि संशोधन प्रस्ताव का मसौदा सार्वजनिक होता है या नहीं, और क्या सरकार इस पर सार्वजनिक परामर्श की प्रक्रिया अपनाती है — जैसा कि पिछले IT Rules ड्राफ्ट में किया गया था। अगर बिना व्यापक परामर्श के ये नियम लागू हुए, तो 'जवाबदेही' का तर्क और कमज़ोर होगा। और अगर ZEE5 के बाद अगला निशाना किसी और प्लेटफॉर्म पर गिरा — ख़ासकर उस प्लेटफॉर्म पर जो सरकार के लिए 'असुविधाजनक' कंटेंट बनाता है — तो यह तर्क पूरी तरह ढह जाएगा।
असली परीक्षा यह होगी: क्या सरकार सिर्फ़ उन प्लेटफॉर्म पर कार्रवाई करती है जो 'असुविधाजनक' कहानियाँ बताते हैं, या वाकई एक निष्पक्ष, पारदर्शी नियामक ढाँचा बनाती है जो दर्शकों की सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता — दोनों का सम्मान करे? ZEE5 पहला पन्ना है, पूरी किताब अभी लिखी जानी बाकी है।
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मुख्य बातें
- केंद्र सरकार IT Rules 2021 में OTT-विशिष्ट संशोधन पर विचार कर रही है; ZEE5 पर कार्रवाई पहला कदम हो सकता है — द प्रिंट।
- स्व-नियमन का मौजूदा ढाँचा सरकार को अपर्याप्त लग रहा है — सरकारी ओवरसाइट बढ़ाने, कंटेंट क्लासिफिकेशन अनिवार्य करने और सीधी कार्रवाई का प्रावधान जोड़ने की बात है।
- 2027 आम चुनाव से पहले OTT 'नैरेटिव इंजन' पर नियंत्रण — यह 'जवाबदेही' से ज़्यादा 'कल्चर वॉर' का मोर्चा दिखता है।
- भारत का OTT बाज़ार अनुमानित 12,000-15,000 करोड़ रुपये का है — अत्यधिक नियमन निवेश और रोज़गार दोनों पर असर डालेगा।
- असली कसौटी: कार्रवाई निष्पक्ष होगी या सिर्फ़ 'असुविधाजनक' कंटेंट पर — यही तय करेगा कि यह जवाबदेही है या सेंसरशिप।
आँकड़ों में
- भारत का OTT बाज़ार 2025 में अनुमानित 12,000-15,000 करोड़ रुपये — उद्योग अनुमान।
- 2027 आम चुनाव डेढ़ साल से कम दूर — नैरेटिव-कंट्रोल की राजनीतिक टाइमिंग।
- IT Rules 2021 में OTT के लिए तीन-स्तरीय शिकायत निवारण तंत्र — सरकार के अनुसार यह 'व्यवहार में विफल' रहा।
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: केंद्र सरकार का सूचना प्रसारण मंत्रालय (MIB) और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY), निशाने पर ZEE5 और अन्य OTT प्लेटफॉर्म — द प्रिंट के अनुसार।
- क्या: IT Rules 2021 में संशोधन कर OTT प्लेटफॉर्म पर सख्त नियामक ढाँचा लाने की तैयारी; ZEE5 के खिलाफ पहली कार्रवाई की योजना — द प्रिंट की रिपोर्ट।
- कब: जुलाई 2026 में संशोधन प्रस्ताव पर विचार जारी, सूत्रों के हवाले से — द प्रिंट।
- कहाँ: नई दिल्ली, केंद्र सरकार स्तर पर — प्रभाव पूरे भारत के OTT इकोसिस्टम पर।
- क्यों: OTT कंटेंट पर 'स्व-नियमन' के मौजूदा ढाँचे को सरकार अपर्याप्त मान रही है; ZEE5 पर विशिष्ट कंटेंट शिकायतों के बाद कार्रवाई की दिशा तय हुई — द प्रिंट।
- कैसे: IT Rules 2021 के तहत OTT प्लेटफॉर्म के लिए अलग नियामक प्रावधान जोड़कर; तीन-स्तरीय शिकायत निवारण तंत्र को और सख्त बनाकर; सरकारी ओवरसाइट बढ़ाकर — द प्रिंट।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
IT Rules में OTT के लिए क्या बदलाव आ रहा है?
द प्रिंट की रिपोर्ट के अनुसार, सरकार OTT प्लेटफॉर्म पर सरकारी ओवरसाइट बढ़ाने, कंटेंट क्लासिफिकेशन अनिवार्य करने और उल्लंघन पर सीधी कार्रवाई का प्रावधान जोड़ने पर विचार कर रही है।
ZEE5 पर कार्रवाई क्यों हो रही है?
ZEE5 के कुछ शो पर कंटेंट शिकायतें आई थीं और मौजूदा तीन-स्तरीय शिकायत तंत्र ने सरकार की अपेक्षा के अनुसार नतीजे नहीं दिए — सूत्रों के हवाले से द प्रिंट।
क्या यह बदलाव नेटफ्लिक्स और अमेज़न प्राइम पर भी लागू होगा?
हाँ, IT Rules संशोधन सभी OTT प्लेटफॉर्म पर लागू होगा — चाहे भारतीय हो या विदेशी। लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि ग्लोबल प्लेटफॉर्म पर कार्रवाई कूटनीतिक रूप से जटिल होगी।
क्या OTT पर सेंसरशिप लग रही है?
सरकार इसे 'जवाबदेही' कहती है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि जब शिकायत का अंतिम निपटारा सरकार के हाथ में हो, तो यह व्यवहार में सेंसरशिप बन सकती है। असली कसौटी कार्रवाई की निष्पक्षता होगी।






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