लखनऊ में एक अंडरपास प्रोजेक्ट महज़ 75 मीटर एप्रोच रोड के लिए नगर निगम और निर्माण एजेंसी के बीच कागजी विवाद में अटक गया है। हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार, निर्माण एजेंसी ने नगर निगम से यह ज़मीन माँगी है, लेकिन फाइलें विभागों के बीच घूम रही हैं — जो योगी सरकार के 'सुपरफास्ट यूपी' दावे पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।

पचहत्तर मीटर। यानी एक क्रिकेट पिच से मुश्किल से साढ़े तीन गुना। इतनी सी सड़क — जिसे एक ठीकठाक ठेकेदार हफ़्ते भर में बिछा दे — लखनऊ जैसी राजधानी में एक पूरे अंडरपास प्रोजेक्ट की जान अटकाए बैठी है। हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के मुताबिक, अंडरपास की निर्माण एजेंसी ने लखनऊ नगर निगम से इस 75 मीटर एप्रोच रोड की ज़मीन माँगी है, लेकिन फाइलें अभी तक विभागों के बीच अदालती-सी रफ़्तार से घूम रही हैं।

अब ज़रा इसे ज़ूम आउट करके देखिए। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार का नारा है — 'डबल इंजन सरकार' और 'सुपरफास्ट यूपी'। चुनावी मंचों से लेकर सोशल मीडिया तक, यूपी को इन्फ्रास्ट्रक्चर का मॉडल बताया जाता है। एक्सप्रेसवे, मेट्रो, स्मार्ट सिटी — ये तमाम प्रोजेक्ट योगी सरकार के विज़िटिंग कार्ड हैं। लेकिन जब राजधानी लखनऊ में ही 75 मीटर सड़क के लिए दो सरकारी विभाग आपस में उलझ जाएँ, तो सवाल यह नहीं कि सड़क कब बनेगी — सवाल यह है कि 'सुपरफास्ट' कहाँ रुक गई।

यह कहानी अकेली नहीं है। हिन्दुस्तान की ही एक और ताज़ा रिपोर्ट बताती है कि लखनऊ नगर निगम ने हाल ही में अतिक्रमण हटाने के लिए बुलडोज़र चलाया — लेकिन वहाँ भी स्थानीय विरोध और नोकझोंक का माहौल रहा। यानी एक तरफ़ निगम के पास अतिक्रमण तोड़ने का समय और संसाधन है, लेकिन उसी निगम के पास एक अंडरपास के लिए 75 मीटर ज़मीन की फाइल आगे बढ़ाने की फ़ुर्सत नहीं। प्राथमिकताओं का यह विरोधाभास ही असली कहानी है।

पॉलिटिकल पल्स

सियासी गलियारों में इसकी चर्चा किसी और स्तर पर हो रही है। लखनऊ में ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले लोगों के बीच फुसफुसाहट है कि जब तक ऊपर से 'फ़ोन' नहीं आता, तब तक कोई फाइल हिलती नहीं — चाहे प्रोजेक्ट कितना भी ज़रूरी हो। एक विभाग दूसरे पर ज़िम्मेदारी डालता है, दूसरा तीसरे पर — और बीच में प्रोजेक्ट की डेडलाइन ख़ामोशी से गुज़र जाती है। ट्रेड हलकों में यह भी चर्चा है कि ऐसे गतिरोध अक्सर तब तक बने रहते हैं जब तक कोई बड़ा राजनीतिक दौरा या इवेंट सामने न आ जाए — फिर रातोंरात फाइलें क्लियर होती हैं और 'उद्घाटन' तय हो जाता है।

(यह इंडस्ट्री चर्चा और ज़मीनी अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

इस पूरे मामले को इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड साफ़ कहता है: समस्या किसी एक अफसर या किसी एक विभाग की नहीं है — समस्या उस सिस्टम की है जहाँ इंटर-डिपार्टमेंटल कोऑर्डिनेशन का कोई सिंगल-विंडो मैकेनिज़्म ही नहीं है। योगी सरकार ने ऊपर से बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स की घोषणा की, एक्सप्रेसवे बनवाए, इन्वेस्टर्स समिट सजाई — लेकिन नीचे ज़मीनी स्तर पर विभागों के बीच की दीवारें वैसी की वैसी खड़ी हैं। यूपी में 2027 विधानसभा चुनाव अब दूर नहीं, और विपक्ष के लिए ऐसी कहानियाँ रेडीमेड हथियार हैं — 'योगी जी, एक्सप्रेसवे तो बना दिया, पर गली की सड़क कब बनेगी?'

यहाँ एक गहरा पैटर्न दिखता है। भारत में इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लंबित होने का सबसे बड़ा कारण तकनीकी चुनौतियाँ या फंडिंग नहीं, बल्कि विभागों के बीच तालमेल की कमी है। नीति आयोग ने कई बार इस बात को रेखांकित किया है कि प्रोजेक्ट्स में देरी का 40% से ज़्यादा हिस्सा 'इंटर-एजेंसी कोऑर्डिनेशन फ़ेल्योर' से आता है। लखनऊ का यह 75 मीटर वाला मामला उसी बीमारी का ताज़ा नमूना है — बस इसकी स्केल इतनी छोटी है कि यह हास्यास्पद लगता है, और इसीलिए ज़्यादा तकलीफ़देह है।

आने वाले दिनों में देखने वाली बात यह होगी कि क्या इस ख़बर के सार्वजनिक होने के बाद प्रशासन हरकत में आता है — जैसा कि अक्सर होता है, मीडिया रिपोर्ट के बाद रातोंरात 'एक्शन' दिखता है। लेकिन असली सवाल वह नहीं है। असली सवाल यह है: क्या यूपी सरकार अपने इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए एक सिंगल-विंडो क्लीयरेंस सिस्टम बनाएगी, जहाँ ज़मीन, अनुमति, और निर्माण की फाइलें एक ही डेस्क से गुज़रें? जब तक ऐसा नहीं होता, हर नया प्रोजेक्ट अपनी-अपनी 75 मीटर की दीवार से टकराता रहेगा।

और सबसे बड़ी विडंबना? योगी सरकार ख़ुद ही 'ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस' और 'सिंगल-विंडो क्लीयरेंस' का दावा करती है — लेकिन जब उसके अपने दो विभाग आपस में 75 मीटर ज़मीन पर नहीं सुलझा पा रहे, तो प्राइवेट इन्वेस्टर क्या सोचेगा? 75 मीटर सड़क बनाने में अगर महीने लग जाएँ, तो फिर 'न्यू इंडिया' का एक्सप्रेसवे किस रफ़्तार से दौड़ेगा?

आरोपों और गतिरोध के संदर्भ में, नगर निगम या निर्माण एजेंसी की ओर से अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

यह रिपोर्ट अभियोग/आरोप आधारित है — यहाँ दर्ज आरोप नामित स्रोतों पर आधारित हैं और जब तक न्यायालय का निर्णय न हो, अप्रमाणित हैं; न्यायाधीन मामलों की रिपोर्टिंग बिना पूर्वाग्रह के की गई है।

इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।

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मुख्य बातें

  • लखनऊ में अंडरपास प्रोजेक्ट महज़ 75 मीटर एप्रोच रोड के लिए नगर निगम और निर्माण एजेंसी के बीच कागजी विवाद में अटका — हिन्दुस्तान की रिपोर्ट
  • नीति आयोग के अनुसार भारत में इन्फ्रा प्रोजेक्ट्स की 40% से ज़्यादा देरी इंटर-एजेंसी कोऑर्डिनेशन फ़ेल्योर से होती है
  • योगी सरकार का 'ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस' और 'सिंगल-विंडो' दावा ज़मीनी स्तर पर अपने ही विभागों के गतिरोध से कमज़ोर पड़ रहा है
  • 2027 यूपी विधानसभा चुनाव नज़दीक — ऐसी कहानियाँ विपक्ष को रेडीमेड हथियार देती हैं

आँकड़ों में

  • 75 मीटर — वह एप्रोच रोड जिसके लिए लखनऊ का पूरा अंडरपास प्रोजेक्ट अटका है (हिन्दुस्तान)
  • 40% से ज़्यादा इन्फ्रा प्रोजेक्ट देरी इंटर-एजेंसी कोऑर्डिनेशन फ़ेल्योर से — नीति आयोग

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: लखनऊ नगर निगम और अंडरपास निर्माण एजेंसी — हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार
  • क्या: अंडरपास के लिए 75 मीटर एप्रोच रोड की माँग पर विभागीय गतिरोध — हिन्दुस्तान के अनुसार
  • कब: जून 2026 में यह विवाद सामने आया — हिन्दुस्तान की ताज़ा रिपोर्ट
  • कहाँ: लखनऊ, उत्तर प्रदेश — हिन्दुस्तान
  • क्यों: नगर निगम और निर्माण एजेंसी के बीच ज़मीन हस्तांतरण की कागजी प्रक्रिया में देरी — हिन्दुस्तान के अनुसार
  • कैसे: निर्माण एजेंसी ने नगर निगम से 75 मीटर सड़क की ज़मीन माँगी, लेकिन अनुमति फाइलें विभागों के बीच लंबित हैं — हिन्दुस्तान

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

लखनऊ में अंडरपास के लिए 75 मीटर एप्रोच रोड का विवाद क्या है?

हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार, अंडरपास निर्माण एजेंसी ने लखनऊ नगर निगम से 75 मीटर एप्रोच रोड की ज़मीन माँगी है, लेकिन अनुमति की फाइलें विभागों के बीच लंबित हैं जिससे पूरा प्रोजेक्ट रुका हुआ है।

यूपी में इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में देरी का सबसे बड़ा कारण क्या है?

नीति आयोग के अनुसार, भारत में इन्फ्रा प्रोजेक्ट्स की 40% से ज़्यादा देरी इंटर-एजेंसी कोऑर्डिनेशन फ़ेल्योर से होती है — लखनऊ का यह मामला उसी पैटर्न का ताज़ा उदाहरण है।

क्या लखनऊ नगर निगम ने एप्रोच रोड पर कोई प्रतिक्रिया दी?

हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार, अब तक नगर निगम या निर्माण एजेंसी की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

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