राजबंशी समाज ने आगामी जनगणना से पहले अलग जातीय पहचान और कामतापुरी भाषा को मातृभाषा के रूप में दर्ज कराने की माँग तेज़ की है। द स्टेट्समैन के अनुसार, यह अभियान बंगाल में BJP के हिंदू एकत्रीकरण और TMC की बंगाली अस्मिता दोनों के लिए चुनावी ख़तरा बन सकता है।
कूचबिहार की गलियों में इन दिनों एक नारा गूँज रहा है — 'आमरा बांग्लादेशी नोय, आमरा राजबंशी।' सुनने में यह एक सांस्कृतिक दावा लगता है, लेकिन इसकी धड़कन पूरी तरह राजनीतिक है। आगामी जनगणना से ठीक पहले उत्तर बंगाल का राजबंशी समाज — जो कम से कम डेढ़ करोड़ की आबादी का दावा करता है — अपनी अलग जातीय और भाषाई पहचान दर्ज कराने के लिए उठ खड़ा हुआ है। और इस एक माँग ने बंगाल की दो सबसे बड़ी राजनीतिक ताक़तों — BJP और TMC — दोनों के पैरों तले ज़मीन हिला दी है।
द स्टेट्समैन की रिपोर्ट के अनुसार, राजबंशी समुदाय के संगठनों ने जनगणना अभियान को संगठित रूप दे दिया है। उनकी दो मुख्य माँगें हैं — पहली, जनगणना में 'बंगाली' के बजाय 'राजबंशी' जाति अलग से दर्ज हो; दूसरी, मातृभाषा कॉलम में 'बांग्ला' की जगह 'कामतापुरी' या 'राजबंशी' लिखी जाए। ये माँगें देखने में प्रशासनिक लगती हैं, लेकिन इनका असली मतलब समझिए — अगर डेढ़ करोड़ लोग जनगणना में ख़ुद को 'बंगाली' नहीं बताते, तो बंगाल की पूरी जनसांख्यिकीय कहानी बदल जाती है।
यही वह बिंदु है जहाँ राजनीति का असली खेल शुरू होता है। BJP ने पिछले कई चुनावों में उत्तर बंगाल को अपना गढ़ बनाया — 2019 के लोकसभा चुनाव में कूचबिहार, अलीपुरद्वार और जलपाईगुड़ी से BJP ने शानदार जीत दर्ज की थी। उनकी रणनीति का आधार था 'हिंदू एकत्रीकरण' — मतलब राजबंशी, नामशूद्र, आदिवासी सबको एक हिंदू छतरी के नीचे लाना। लेकिन अब राजबंशी समाज कह रहा है कि हम सिर्फ़ 'हिंदू' नहीं, हम एक अलग क़ौम हैं — अपनी भाषा, अपनी संस्कृति, अपनी पहचान। यह एक वाक्य BJP के पूरे उत्तर बंगाल प्रोजेक्ट पर सवालिया निशान लगा देता है।
TMC के लिए ख़तरा कम नहीं
ममता बनर्जी की TMC का पूरा राजनीतिक ब्रांड 'बंगाली अस्मिता' पर टिका है — भाषा, संस्कृति, बंगाल की एकता। लेकिन राजबंशी समाज की माँग इस 'एकता' की परिभाषा को ही चुनौती दे रही है। अगर उत्तर बंगाल का एक बड़ा हिस्सा ख़ुद को 'बंगाली' मानने से इनकार करता है, तो 'बांग्लार गर्व' का नारा किसका गर्व रह जाएगा? सियासी गलियारों में फुसफुसाहट है कि TMC का कलकत्ता-केंद्रित लीडरशिप मॉडल उत्तर बंगाल की इस अलगाव भावना को कभी गंभीरता से समझ ही नहीं पाया।
पॉलिटिकल पल्स
बंगाल के राजनीतिक हलकों में इस अभियान को लेकर जो चर्चा चल रही है, वह चुनावी रणनीतिकारों की नींद उड़ाने वाली है। ट्रेड पंडितों और विश्लेषकों के बीच कहा जा रहा है कि राजबंशी पहचान आंदोलन के पीछे कुछ क्षेत्रीय दलों — ख़ासकर ग्रेटर कूचबिहार पीपुल्स एसोसिएशन और कामतापुर पार्टी जैसे संगठनों — की सक्रियता बढ़ी है। इनसाइडर्स का मानना है कि अगर यह आंदोलन जनगणना के बाद संख्या बल के साथ सामने आया, तो 2026 और उसके बाद के विधानसभा चुनावों में यह एक स्वतंत्र राजनीतिक ताक़त बन सकता है — ठीक वैसे जैसे झारखंड में आदिवासी पहचान की राजनीति ने नक़्शा बदल दिया था।
जनता की नब्ज़ भी दिलचस्प है। उत्तर बंगाल के ज़िलों में फ़ैन्स — यानी आम लोग — बता रहे हैं कि जनगणना फ़ॉर्म में 'कामतापुरी' लिखवाने को लेकर गाँवों में वॉलंटियर टीमें सक्रिय हैं। सोशल मीडिया पर भी यह बहस गरम है कि क्या भाषा की अलग पहचान से शेड्यूल्ड ट्राइब (ST) का दर्जा मिलने का रास्ता खुल सकता है — जो राजबंशी समाज की पुरानी और सबसे बड़ी माँग रही है। (यह इंडस्ट्री चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
जातीय जनगणना का बड़ा सवाल
इस पूरे अभियान को देशव्यापी जातीय जनगणना की माँग से अलग करके नहीं देखा जा सकता। बिहार में नीतीश कुमार पहले ही राज्य स्तरीय जाति सर्वे करा चुके हैं, और विपक्ष लगातार केंद्र से राष्ट्रीय जातीय जनगणना की माँग कर रहा है। राजबंशी अभियान इस बहस में एक नया आयाम जोड़ता है — यह सिर्फ़ OBC-SC-ST की संख्या गिनने तक सीमित नहीं, बल्कि यह सवाल उठाता है कि 'बंगाली' या 'हिंदू' जैसी बड़ी छतरी पहचानें कितनी उप-पहचानों को दबा रही हैं।
इंडिया हेराल्ड का सटीक पॉलिटिकल रीड यही है कि राजबंशी अभियान की असली ताक़त जनगणना के बाद सामने आएगी। अगर संख्या साबित हुई — और डेढ़ करोड़ का दावा अगर दस-बारह लाख भी निकला — तो यह उत्तर बंगाल की 50 से ज़्यादा विधानसभा सीटों पर किंगमेकर की भूमिका में आ सकता है। BJP को अपना 'हिंदू एकत्रीकरण' फ़ॉर्मूला दोबारा लिखना पड़ सकता है, और TMC को कलकत्ता से बाहर निकलकर पहचान की राजनीति की नई भाषा सीखनी पड़ सकती है। आने वाले दिनों में देखने लायक़ यह होगा कि केंद्र सरकार जनगणना फ़ॉर्म में भाषा और जाति के कॉलम को लेकर क्या रुख़ अपनाती है — क्योंकि एक कॉलम में एक शब्द का फ़र्क़ बंगाल की चुनावी ज़मीन ही बदल सकता है।
और सबसे बड़ा सवाल यह है — जब हिंदू वोटबैंक के भीतर से ही जातीय पहचान का दावा उठ खड़ा हो, तो 'एक हिंदू, एक वोट' का सपना कितने दिन और चलेगा?
आरोपों और दावों को नामित स्रोतों के हवाले से रिपोर्ट किया गया है और जब तक अदालत का फ़ैसला न हो, ये अप्रमाणित हैं; न्यायाधीन मामलों की रिपोर्टिंग बिना पूर्वाग्रह के की गई है।
इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।
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मुख्य बातें
- राजबंशी समाज ने जनगणना में 'बंगाली' की जगह अलग जातीय और भाषाई पहचान दर्ज कराने का संगठित अभियान शुरू किया है — द स्टेट्समैन
- यह माँग BJP के 'हिंदू एकत्रीकरण' और TMC की 'बंगाली अस्मिता' दोनों फ़ॉर्मूलों को एक साथ चुनौती देती है
- उत्तर बंगाल की 50+ विधानसभा सीटों पर यह समुदाय किंगमेकर बन सकता है
- जनगणना फ़ॉर्म में भाषा कॉलम का एक शब्द बंगाल की पूरी जनसांख्यिकीय कहानी बदल सकता है
- ST दर्जे की पुरानी माँग को इस अभियान से नई ऊर्जा मिल रही है
आँकड़ों में
- राजबंशी समुदाय की अनुमानित आबादी 1.5 करोड़ (समुदाय का दावा) — यह उत्तर बंगाल की सबसे बड़ी सामाजिक इकाइयों में से एक है
- उत्तर बंगाल में 50 से अधिक विधानसभा सीटें इस समुदाय के प्रभाव क्षेत्र में आती हैं
- 2019 लोकसभा चुनाव में BJP ने कूचबिहार, अलीपुरद्वार, जलपाईगुड़ी जैसी उत्तर बंगाल सीटें जीती थीं
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: उत्तर बंगाल का राजबंशी समाज और उससे जुड़े सामाजिक-राजनीतिक संगठन।
- क्या: आगामी जनगणना में अलग जातीय पहचान और कामतापुरी को मातृभाषा के रूप में मान्यता देने की माँग। — द स्टेट्समैन
- कब: 2026 की जनगणना से पहले यह अभियान तेज़ हुआ है।
- कहाँ: पश्चिम बंगाल का उत्तर बंगाल क्षेत्र — कूचबिहार, जलपाईगुड़ी, अलीपुरद्वार और आसपास के ज़िले।
- क्यों: राजबंशी समुदाय का मानना है कि बंगाली पहचान के तहत उनकी अलग सांस्कृतिक और भाषाई पहचान दबा दी गई है; जनगणना में अलग दर्ज होने से आरक्षण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को बल मिलेगा।
- कैसे: सामुदायिक संगठन जागरूकता अभियान, रैलियाँ और राजनीतिक दबाव के ज़रिये जनगणना फ़ॉर्म में कामतापुरी भाषा और राजबंशी जाति अलग से दर्ज कराने की अपील कर रहे हैं। — द स्टेट्समैन
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
राजबंशी समाज कौन हैं और उनकी जनगणना माँग क्या है?
राजबंशी उत्तर बंगाल और असम के सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाला एक बड़ा समुदाय है। उनकी माँग है कि जनगणना में उन्हें 'बंगाली' के बजाय अलग 'राजबंशी' जाति के रूप में और मातृभाषा 'कामतापुरी' के रूप में दर्ज किया जाए। — द स्टेट्समैन
यह माँग BJP और TMC के लिए ख़तरा क्यों है?
BJP का उत्तर बंगाल फ़ॉर्मूला 'हिंदू एकत्रीकरण' पर टिका है — अलग जातीय पहचान इसे कमज़ोर करती है। TMC का 'बंगाली अस्मिता' ब्रांड भी चुनौती में आता है जब बड़ी आबादी ख़ुद को बंगाली मानने से इनकार करे।
जनगणना में अलग भाषा दर्ज होने से क्या फ़र्क़ पड़ेगा?
अगर बड़ी संख्या में लोग कामतापुरी को मातृभाषा बताते हैं, तो इसे संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने और ST दर्जे की माँग को बल मिल सकता है — इससे आरक्षण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व का पूरा समीकरण बदल सकता है।







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