राजस्थान की भजनलाल शर्मा सरकार ने समान नागरिक संहिता (UCC) पर जनसुनवाई की प्रक्रिया शुरू की है। कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने इसे 'सियासी रोटियां सेंकने' का उपक्रम बताते हुए सीधा हमला बोला है। यह कदम उत्तराखंड के बाद BJP की दूसरी बड़ी राज्य-स्तरीय UCC पहल है।

एक राज्य जहाँ पानी का संकट गहराता जा रहा है, किसान क़र्ज़ में डूबे हैं, और बेरोज़गारी के आंकड़े सरकार के अपने डैशबोर्ड पर लाल निशान दिखा रहे हैं — वहाँ सबसे पहली 'जनसुनवाई' किस मुद्दे पर? समान नागरिक संहिता। राजस्थान की भजनलाल शर्मा सरकार ने UCC पर जनसुनवाई की प्रक्रिया शुरू कर दी है, और कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने इसे 'सियासी रोटियां सेंकने' का उपक्रम करार दिया है — ABP न्यूज़ की रिपोर्ट के अनुसार।

डोटासरा का हमला सिर्फ़ बयानबाज़ी नहीं है। उनका सीधा आरोप है कि भजनलाल सरकार के पास विकास का कोई ठोस एजेंडा नहीं बचा, इसलिए वह हिंदुत्व के इस पुराने लेकिन हमेशा काम आने वाले कार्ड को फिर से टेबल पर रख रही है। ABP न्यूज़ के मुताबिक़ डोटासरा ने कहा कि जनता को रोज़गार, पानी और महंगाई जैसे असल सवालों के जवाब चाहिए, UCC की 'ड्रामेबाज़ी' नहीं।

लेकिन इस हमले के पीछे कांग्रेस की अपनी बेचैनी भी उतनी ही साफ़ है।

उत्तराखंड का ब्लूप्रिंट, राजस्थान का प्रयोग

उत्तराखंड ने 2024 में UCC लागू किया — भारत का पहला राज्य जिसने आज़ादी के बाद ऐसा कदम उठाया। उस प्रयोग ने BJP को एक ठोस नैरेटिव दिया: 'हम करके दिखाते हैं।' अब राजस्थान में जनसुनवाई की प्रक्रिया उसी ब्लूप्रिंट की अगली कड़ी है। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि उत्तराखंड में मुस्लिम आबादी क़रीब 14 प्रतिशत है, जबकि राजस्थान में यह संख्या लगभग 9-10 प्रतिशत — लेकिन यहाँ की सामाजिक बुनावट कहीं ज़्यादा जटिल है। राजपूत, जाट, गूजर, मीणा — हर समुदाय के अपने निजी क़ानून, रीति-रिवाज़ और विवाह परंपराएँ हैं। UCC की जनसुनवाई यहाँ सिर्फ़ 'हिंदू बनाम मुस्लिम' का मुद्दा नहीं रहेगी — यह जाटों की ज़मीन विरासत से लेकर आदिवासी रीति-रिवाज़ों तक को छूने वाला मसला है।

और यही वह बिंदु है जहाँ भजनलाल सरकार जोखिम उठा रही है — क्योंकि UCC का असली इम्तिहान तब होगा जब इसके प्रावधान सिर्फ़ मुस्लिम पर्सनल लॉ ही नहीं, बल्कि हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) की टैक्स छूट और जनजातीय परंपराओं को भी चुनौती देंगे।

पॉलिटिकल पल्स

सियासी गलियारों में जो बात सबसे ज़्यादा फुसफुसाई जा रही है, वह यह है कि भजनलाल शर्मा ने यह क़दम दिल्ली हाईकमान के सीधे निर्देश पर उठाया है। राजस्थान BJP के भीतर एक धारा मानती है कि 2023 में मिली प्रचंड जीत का श्रेय हिंदुत्व एजेंडे को उतना नहीं जितना कांग्रेस-विरोधी लहर को था — और अब उस हिंदुत्व क्रेडिट को 'खुद का' बनाने के लिए UCC सबसे सुविधाजनक ज़रिया है। (यह इंडस्ट्री चर्चा और राजनीतिक अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

दूसरी तरफ़ कांग्रेस कैंप में डोटासरा का आक्रामक तेवर भी बेवजह नहीं है। पार्टी की आंतरिक गणित यह कहती है कि अगर UCC का नैरेटिव ज़ोर पकड़ गया, तो राजस्थान में मुस्लिम-गूजर-मीणा का वह गठबंधन बिखर सकता है जो कांग्रेस के लिए 60-70 सीटों का आधार है। डोटासरा ख़ुद गूजर समुदाय से आते हैं — उन्हें पता है कि UCC की बहस अगर जाति-आधारित परंपराओं तक पहुँची, तो उनका अपना वोटबैंक भी असहज होगा।

कांग्रेस का 'फ्रंटफुट' — रणनीति या मजबूरी?

आमतौर पर कांग्रेस UCC जैसे मुद्दों पर 'सॉफ्ट-हिंदुत्व' की राह चलती रही है — न खुलकर विरोध, न खुलकर समर्थन। लेकिन इस बार डोटासरा सीधे फ्रंटफुट पर हैं। इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि यह बदलाव इसलिए नहीं आया कि कांग्रेस को अचानक सेक्युलरिज़्म की ज़बरदस्त याद आ गई — यह इसलिए आया क्योंकि पार्टी को 2028 के विधानसभा चुनाव में अपना 'फ़्लोर वोट' बचाने की चिंता सताने लगी है।

ABP न्यूज़ के अनुसार डोटासरा ने यह भी कहा कि सरकार को पहले राजस्थान की बुनियादी समस्याओं पर जनसुनवाई करनी चाहिए। यह लाइन सोची-समझी है — कांग्रेस चाहती है कि बहस UCC बनाम सेक्युलरिज़्म से हटकर UCC बनाम विकास पर जाए, क्योंकि विकास के मोर्चे पर भजनलाल सरकार का रिपोर्ट कार्ड भी कोई बहुत चमकदार नहीं है।

असली सवाल — जनसुनवाई है या जनप्रदर्शन?

जनसुनवाई लोकतंत्र का एक स्वस्थ उपकरण है — जब वह सच में जनता की बात सुनने के लिए हो। लेकिन उत्तराखंड का अनुभव बताता है कि UCC जनसुनवाई का ढांचा अक्सर 'पहले से तय नतीजे को वैधता का मुलम्मा' देने का काम करता है। वहाँ भी जनसुनवाई हुई, आपत्तियाँ आईं, और विधेयक लगभग वैसा ही पारित हुआ जैसा ड्राफ्ट में था। राजस्थान में भी अगर यही फॉर्मूला दोहराया गया, तो डोटासरा का 'सियासी रोटी' वाला तंज़ सच साबित होगा।

BJP के लिए गणित सीधा है — UCC की जनसुनवाई से हिंदू एकीकरण का संदेश जाता है, और अगर कांग्रेस विरोध करती है तो 'मुस्लिम तुष्टीकरण' का तमगा भी चिपकाया जा सकता है। डोटासरा इसी जाल से बचने के लिए 'विकास बनाम ड्रामा' का फ्रेम चुन रहे हैं — ताकि बहस धर्म पर न जाकर शासन की नाकामी पर केंद्रित रहे।

लेकिन क्या कांग्रेस का यह काउंटर-नैरेटिव काम करेगा? अगर इतिहास कोई संकेत है, तो UCC जैसे पहचान-आधारित मुद्दे अक्सर विकास की बहस को निगल जाते हैं — 2019 में CAA-NRC ने भी यही किया था।

आने वाले हफ़्तों में देखने लायक यह होगा कि जनसुनवाई का ड्राफ्ट क्या कहता है — क्या वह सिर्फ़ मुस्लिम पर्सनल लॉ को निशाना बनाता है, या HUF और जनजातीय परंपराओं को भी छूता है। अगर पहला, तो यह ध्रुवीकरण का औज़ार है। अगर दूसरा, तो भजनलाल सरकार ने अपने ही आधार में आग लगाई है। किसी भी सूरत में, राजस्थान की यह 'जनसुनवाई' असल में 2028 का ट्रेलर है — और रिपोर्ट्स के अनुसार, दोनों पक्ष इसे ठीक इसी तरह देख रहे हैं।

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मुख्य बातें

  • राजस्थान सरकार ने UCC पर जनसुनवाई शुरू की — उत्तराखंड के बाद दूसरा BJP-शासित राज्य जो इस दिशा में बढ़ा।
  • कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष डोटासरा ने इसे 'सियासी रोटियां सेंकने' का उपक्रम बताया और विकास के मुद्दों पर पहले जनसुनवाई की माँग की।
  • असली दांव 2028 विधानसभा चुनाव का नैरेटिव सेट करना है — BJP हिंदू एकीकरण चाहती है, कांग्रेस 'विकास बनाम ड्रामा' का फ्रेम।
  • UCC का असली इम्तिहान तब होगा जब यह सिर्फ़ मुस्लिम पर्सनल लॉ नहीं बल्कि HUF और जनजातीय परंपराओं को भी छूएगा।

आँकड़ों में

  • उत्तराखंड 2024 में UCC लागू करने वाला भारत का पहला राज्य बना — अब राजस्थान दूसरा BJP-शासित राज्य है जिसने जनसुनवाई शुरू की।
  • राजस्थान में मुस्लिम आबादी लगभग 9-10% है जबकि उत्तराखंड में लगभग 14% — लेकिन राजस्थान की जातीय बुनावट कहीं ज़्यादा जटिल है।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की BJP सरकार और कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा (ABP न्यूज़ के अनुसार)।
  • क्या: राजस्थान सरकार ने UCC पर जनसुनवाई की प्रक्रिया शुरू की; कांग्रेस ने इसे राजनीतिक स्टंट बताकर विरोध किया (ABP न्यूज़)।
  • कब: जून 2026 में यह प्रक्रिया सार्वजनिक हुई (ABP न्यूज़ रिपोर्ट के अनुसार)।
  • कहाँ: राजस्थान, भारत।
  • क्यों: ABP न्यूज़ के अनुसार डोटासरा का आरोप है कि सरकार विकास के मुद्दों से ध्यान भटकाने और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए UCC का सहारा ले रही है।
  • कैसे: सरकार ने जनसुनवाई (पब्लिक हियरिंग) का ढांचा तैयार किया है जिसमें जनता की राय ली जाएगी — ठीक वैसे ही जैसे उत्तराखंड ने 2024 में UCC लागू करने से पहले की थी (ABP न्यूज़)।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

राजस्थान में UCC पर जनसुनवाई क्या है?

राजस्थान की भजनलाल शर्मा सरकार ने समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने से पहले जनता की राय लेने के लिए जनसुनवाई (पब्लिक हियरिंग) की प्रक्रिया शुरू की है — ABP न्यूज़ के अनुसार। यह उत्तराखंड मॉडल की तर्ज़ पर है।

कांग्रेस और डोटासरा UCC जनसुनवाई का विरोध क्यों कर रहे हैं?

कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा का कहना है कि सरकार विकास के मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए UCC का सहारा ले रही है और 'सियासी रोटियां सेंक' रही है। उनकी माँग है कि पहले रोज़गार, पानी और महंगाई पर जनसुनवाई हो।

क्या राजस्थान में UCC लागू हो जाएगा?

अभी जनसुनवाई की प्रक्रिया शुरुआती चरण में है। उत्तराखंड के अनुभव के आधार पर, जनसुनवाई के बाद ड्राफ्ट बिल आएगा और फिर विधानसभा में पेश होगा। लेकिन राजस्थान की जटिल जातीय संरचना को देखते हुए यह प्रक्रिया राजनीतिक रूप से कहीं ज़्यादा कठिन होगी।

UCC का राजस्थान की जनजातीय और जातीय परंपराओं पर क्या असर होगा?

राजस्थान में राजपूत, जाट, गूजर, मीणा जैसे समुदायों की अपनी विवाह और विरासत परंपराएँ हैं। अगर UCC इन्हें भी एकरूप बनाता है, तो यह सिर्फ़ मुस्लिम पर्सनल लॉ का मामला नहीं रहेगा — हिंदू और आदिवासी समुदायों के भीतर भी विरोध उठ सकता है।

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