कानपुर में स्मार्ट सिटी और गड्ढामुक्त यूपी अभियान के बावजूद सड़कें जानलेवा हालत में हैं। लाइव हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार, शहर भर में धंसी और खुदी सड़कों से आम लोगों की जान ख़तरे में है। असली वजह — टेंडर-कमीशन का वह खेल जिसे कोई छूना नहीं चाहता।
एक शहर जिसे 'स्मार्ट' बनाने के लिए सैकड़ों करोड़ रुपये बहाए गए, वहाँ आज एक ऑटो ड्राइवर को अपने यात्रियों से कहना पड़ता है — 'साहब, पकड़कर बैठिए, आगे गड्ढा है।' कानपुर की सड़कें अब सिर्फ़ ख़राब नहीं हैं, वे जानलेवा हैं। और यह बात कोई विपक्षी नेता नहीं, ख़ुद ज़मीनी रिपोर्टिंग बता रही है।
लाइव हिन्दुस्तान की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक़, कानपुर में जगह-जगह सड़कें या तो धंस चुकी हैं या खुदाई के बाद अधूरी छोड़ दी गई हैं। शहरवासियों के लिए घर से दफ़्तर या बाज़ार तक का सफ़र एक रोज़ाना का जोखिम बन गया है। बारिश का मौसम अभी दस्तक भी नहीं दे पाया, और ज़मीन पहले ही पानी भरने और धंसने लगी है।
यह वही कानपुर है जो 2015 में केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी स्मार्ट सिटी मिशन की पहली सूची में शामिल हुआ था। लगभग एक दशक और सैकड़ों करोड़ रुपये बाद, सड़कों की हालत देखकर यह सवाल उठना लाज़मी है — पैसा गया कहाँ?
गड्ढामुक्त यूपी: नारा बड़ा, ज़मीन खोखली
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 'गड्ढामुक्त उत्तर प्रदेश' अभियान को बड़े गर्व से लॉन्च किया था। सरकारी दावों में ज़िलों से गड्ढे भरने की तस्वीरें आईं, अफ़सरों ने रिपोर्ट भेजीं, और सोशल मीडिया पर 'पहले-बाद' की तस्वीरें वायरल हुईं। लेकिन कानपुर की ज़मीनी तस्वीर इन सरकारी दावों पर करारा तमाचा है।
असल समस्या सिर्फ़ गड्ढे नहीं हैं। समस्या यह है कि एक सड़क बनती है, फिर कुछ हफ़्तों में जल निगम वाले उसे खोदते हैं, फिर गैस पाइपलाइन वाले, फिर बिजली विभाग। और हर बार खुदाई के बाद सड़क को ठीक करने की ज़िम्मेदारी किसी की नहीं होती। यह समन्वय की विफलता नहीं है — यह एक सिस्टम है जो ठेकेदारों को बार-बार काम दिलाने के लिए डिज़ाइन किया गया लगता है।
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि नगर निगम के टेंडर में 'अपने' ठेकेदारों को काम दिलाने का खेल इतना गहरा है कि कोई अधिकारी ज़बान नहीं खोलता। ट्रेड हलकों में चर्चा है कि कई सड़क निर्माण परियोजनाओं में सामग्री की गुणवत्ता जानबूझकर घटिया रखी जाती है ताकि अगले साल फिर से टेंडर निकले, फिर से कमीशन बने। एक सड़क तीन बार बने तो ठेकेदार तीन बार कमाए — यही वह चक्र है जो कानपुर की हर गली में दिखता है। जनता की नब्ज़ यह है कि लोगों को अब न सरकारी दावों पर भरोसा रहा, न शिकायत पोर्टल पर — क्योंकि शिकायत दर्ज होती है, 'resolved' भी दिखती है, लेकिन सड़क पर गड्ढा जस का तस रहता है।
(यह इंडस्ट्री चर्चा और स्थानीय सूत्रों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
सिर्फ़ कानपुर नहीं — पूरे यूपी का सच
अगर कानपुर को एक केस स्टडी मानें, तो सवाल यूपी के बाक़ी 'स्मार्ट सिटी' शहरों पर भी उठते हैं। लखनऊ, आगरा, वाराणसी, इलाहाबाद (प्रयागराज), अलीगढ़ — इन सबकी स्मार्ट सिटी परियोजनाओं में करोड़ों ख़र्च हो चुके हैं। केंद्र सरकार के स्मार्ट सिटी मिशन की अपनी डैशबोर्ड रिपोर्ट्स बताती हैं कि कई शहरों में परियोजनाओं की प्रगति लक्ष्य से काफ़ी पीछे है। लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे जैसी बड़ी परियोजनाओं के बावजूद शहरों के भीतर की सड़कें बदहाल हैं — जैसे किसी इमारत का बाहरी हिस्सा चमकदार हो लेकिन नींव में दीमक लगी हो।
वाराणसी में प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र होने के बावजूद स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट की सड़कों को लेकर स्थानीय मीडिया में शिकायतें आती रही हैं। आगरा में ताजमहल के आसपास के इलाक़ों में पर्यटकों को गड्ढों से गुज़रना पड़ता है। यह एक शहर की समस्या नहीं, यह एक मॉडल की विफलता है।
जवाबदेही कहाँ है?
सबसे गंभीर बात यह है कि कानपुर में संस्थागत लापरवाही का पैटर्न सिर्फ़ सड़कों तक सीमित नहीं है। जब ज़िम्मेदारी तय करने का वक़्त आता है, तो नगर निगम कहता है स्मार्ट सिटी एजेंसी से पूछो, स्मार्ट सिटी एजेंसी कहती है ठेकेदार से पूछो, और ठेकेदार कहता है सामग्री ठीक थी — ज़मीन ख़राब है। यह जवाबदेही की ऐसी भूलभुलैया है जिसमें हर कोई बचकर निकल जाता है और नुक़सान सिर्फ़ उस आदमी का होता है जिसका टायर फट गया या जिसकी बाइक गड्ढे में गिरी।
इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि जब तक योगी सरकार नगर निगमों में टेंडर प्रक्रिया को पारदर्शी नहीं बनाती, थर्ड-पार्टी ऑडिट अनिवार्य नहीं करती, और निर्माण के बाद कम से कम पाँच साल की वारंटी पीरियड लागू नहीं करती — तब तक 'गड्ढामुक्त यूपी' एक राजनीतिक नारा बना रहेगा, हक़ीक़त नहीं बनेगा। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यह मुद्दा विपक्ष के लिए रेडीमेड हथियार है — और सत्तापक्ष के लिए वह शर्मिंदगी जो हर बारिश में ताज़ा हो जाती है।
आने वाले हफ़्तों में मानसून कानपुर में दस्तक देगा। हर साल बारिश के बाद सड़कों की जो तस्वीरें वायरल होती हैं, वे इस बार और भीषण होंगी — क्योंकि इस बार पुरानी सड़कें टूटी हैं और नई सड़कें बनी ही नहीं। सवाल यह नहीं कि कितने गड्ढे भरे गए — सवाल यह है कि कितने और बनेंगे, और किसकी जान जाएगी इससे पहले कि कोई ज़िम्मेदार ठहराया जाए?
आरोप यहाँ नामित स्रोतों के हवाले से रिपोर्ट किए गए हैं और जब तक अदालत का फ़ैसला न हो, अप्रमाणित हैं; न्यायाधीन मामले बिना पूर्वाग्रह के रिपोर्ट किए गए हैं।
इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।
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मुख्य बातें
- कानपुर में स्मार्ट सिटी मिशन और गड्ढामुक्त यूपी अभियान के बावजूद सड़कें जानलेवा हालत में हैं — लाइव हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार धंसी और खुदी सड़कों से आम लोगों का रोज़मर्रा का सफ़र ख़तरनाक हो गया है
- बार-बार खुदाई और बिना समन्वय के निर्माण का चक्र ठेकेदारों को बार-बार काम और कमीशन दिलाने की व्यवस्था बन गया है — सियासी गलियारों में इस गठजोड़ की चर्चा खुलकर होती है
- सिर्फ़ कानपुर नहीं — लखनऊ, आगरा, वाराणसी समेत यूपी के तमाम स्मार्ट सिटी शहरों में ज़मीनी हालात सरकारी दावों से मेल नहीं खाते
- 2027 विधानसभा चुनाव से पहले यह मुद्दा योगी सरकार के लिए बड़ी शर्मिंदगी और विपक्ष के लिए रेडीमेड हथियार बन सकता है
- जब तक थर्ड-पार्टी ऑडिट और निर्माण वारंटी पीरियड लागू नहीं होता, गड्ढामुक्त यूपी नारा बना रहेगा, हक़ीक़त नहीं
आँकड़ों में
- कानपुर 2015 में स्मार्ट सिटी मिशन की पहली सूची में शामिल हुआ था — लगभग एक दशक बाद सड़कों की हालत जानलेवा है
- केंद्र सरकार की स्मार्ट सिटी मिशन डैशबोर्ड रिपोर्ट्स के अनुसार कई यूपी शहरों में परियोजनाओं की प्रगति लक्ष्य से काफ़ी पीछे है
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: कानपुर के शहरवासी, नगर निगम प्रशासन, स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के ठेकेदार और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का 'गड्ढामुक्त यूपी' अभियान
- क्या: कानपुर में बड़े पैमाने पर सड़कें धंसी और खुदी हैं, जो जानलेवा स्थिति बना रही हैं — लाइव हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार शहरवासियों के लिए सुरक्षित निकलना मुश्किल हो गया है
- कब: जून 2026, बारिश के मौसम की शुरुआत से पहले ही स्थिति गंभीर
- कहाँ: कानपुर शहर, उत्तर प्रदेश — जो केंद्र सरकार की स्मार्ट सिटी मिशन सूची में शामिल है
- क्यों: निम्न गुणवत्ता का निर्माण कार्य, ठेकेदार-अधिकारी गठजोड़ में कमीशन का खेल, और ज़िम्मेदारी तय करने वाली कोई प्रभावी व्यवस्था न होना
- कैसे: सड़क निर्माण में घटिया सामग्री का उपयोग, बार-बार खुदाई और समन्वय की कमी के कारण नई बनी सड़कें महीनों में ही धंस जाती हैं — नगर निगम और स्मार्ट सिटी एजेंसी के बीच जवाबदेही का टकराव इसे और बदतर बनाता है
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
कानपुर में सड़कें क्यों धंस रही हैं?
लाइव हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार, घटिया सामग्री से निर्माण, बार-बार बिना समन्वय के खुदाई और नगर निगम-ठेकेदार गठजोड़ के कारण सड़कें बनने के कुछ ही महीनों में टूट जाती हैं।
स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट में कानपुर की क्या स्थिति है?
कानपुर 2015 से स्मार्ट सिटी मिशन में शामिल है, लेकिन केंद्र सरकार की अपनी डैशबोर्ड रिपोर्ट्स बताती हैं कि कई यूपी शहरों में परियोजनाओं की प्रगति लक्ष्य से पीछे है। सड़कों की ज़मीनी हालत सरकारी दावों से मेल नहीं खाती।
गड्ढामुक्त उत्तर प्रदेश अभियान कितना सफल रहा है?
सरकारी दावों में गड्ढे भरने की रिपोर्ट दी जाती हैं, लेकिन कानपुर जैसे शहरों की ज़मीनी तस्वीर बताती है कि अभियान ज़मीन पर प्रभावी नहीं रहा — बार-बार खुदाई और घटिया निर्माण का चक्र जारी है।
यूपी के किन शहरों में स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट की हालत ख़राब है?
कानपुर के अलावा लखनऊ, आगरा, वाराणसी और प्रयागराज में भी स्मार्ट सिटी परियोजनाओं की प्रगति और सड़कों की गुणवत्ता पर स्थानीय मीडिया में लगातार सवाल उठते रहे हैं।



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