दिग्गज पार्श्वगायिका एस. जानकी का 88 वर्ष की आयु में निधन हो गया। द प्रिंट के अनुसार प्रधानमंत्री मोदी ने इसे संगीत जगत की 'अपूरणीय क्षति' बताया। छह दशकों में 48,000 से अधिक गानों वाली जानकी के जाने से लता-आशा-जानकी त्रिमूर्ति का आख़िरी स्तंभ भी गिर गया।
48,000 गाने। सत्रह भाषाएँ। छह दशक। और फिर भी जब हिंदी पट्टी में 'महान गायिकाओं' की बात होती थी, तो लता मंगेशकर और आशा भोसले के बाद अक्सर एक विराम आ जाता था — जैसे तीसरा नाम ज़बान पर है पर याद नहीं आ रहा। वो तीसरा नाम एस. जानकी का था, और अब वो आवाज़ हमेशा के लिए ख़ामोश हो गई है।
तेलंगाना टुडे के अनुसार दिग्गज पार्श्वगायिका एस. जानकी का 88 वर्ष की आयु में निधन हो गया। द प्रिंट की रिपोर्ट के मुताबिक़ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त करते हुए इसे भारतीय संगीत जगत की 'अपूरणीय क्षति' बताया। टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने मोदी के शब्दों को विस्तार से छापा — प्रधानमंत्री ने जानकी की बहुभाषी प्रतिभा और उनकी आवाज़ की 'दिव्य मिठास' का ज़िक्र किया।
लेकिन इस श्रद्धांजलि को सिर्फ़ शोक-संदेश की तरह पढ़ना उसी ग़लती को दोहराना होगा जो हिंदी बेल्ट ने जानकी के साथ दशकों तक की — उन्हें अनदेखा करना।
वो आवाज़ जो विंध्य पार नहीं कर पाई — या करने नहीं दी गई?
एस. जानकी ने 1957 में अपना करियर शुरू किया और तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम सिनेमा में वो मुक़ाम हासिल किया जो उत्तर भारत में लता मंगेशकर का था। तेलंगाना टुडे के अनुसार उन्होंने 17 भाषाओं में 48,000 से अधिक गाने गाए — यह आँकड़ा लता मंगेशकर के अनुमानित 25,000-30,000 गानों से कहीं ज़्यादा है। फिर भी 'राष्ट्रीय' पहचान के पैमाने पर जानकी हमेशा हाशिए पर रहीं।
इसकी वजह सीधी है और असहज करने वाली: भारतीय सांस्कृतिक विमर्श में 'राष्ट्रीय' का मतलब अक्सर 'हिंदी बॉलीवुड' रहा है। जानकी ने हिंदी में भी गाया — 'मिल गई मंज़िल मुझे' से लेकर कई यादगार गाने — लेकिन बॉलीवुड की राजनीति और मुंबई-केंद्रित संगीत उद्योग में उन्हें वो जगह कभी नहीं मिली जिसकी वो हक़दार थीं। दक्षिण में वो देवी थीं; उत्तर में एक फुटनोट।
मोदी की श्रद्धांजलि: शोक के पीछे का राजनीतिक व्याकरण
प्रधानमंत्री मोदी की श्रद्धांजलि की भाषा ग़ौर करने लायक़ है। टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार उन्होंने जानकी की 'बहुभाषी प्रतिभा' और दक्षिण भारतीय संगीत में उनके योगदान को विशेष रूप से रेखांकित किया। यह कोई रूटीन ट्वीट नहीं था — यह एक सोची-समझी भाषा थी जो कहती है: 'मैं दक्षिण को जानता हूँ, दक्षिण की विरासत को पहचानता हूँ।'
और यहाँ राजनीतिक गणित शुरू होता है। 2024 के बाद से भाजपा दक्षिण भारत में अपनी पकड़ मज़बूत करने में जुटी है — तमिलनाडु और केरल अभी भी दूर के सपने हैं, कर्नाटक में उतार-चढ़ाव है, तेलंगाना में ज़मीन तैयार हो रही है, आंध्र में गठबंधन सरकार है। ऐसे में एक दक्षिण भारतीय सांस्कृतिक आइकन को भावपूर्ण श्रद्धांजलि देना सिर्फ़ शिष्टाचार नहीं — यह उस 'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' नैरेटिव का हिस्सा है जिसे मोदी हर अवसर पर मज़बूत करते हैं।
इस राजनीतिक सुर को इंडिया हेराल्ड ने सटीक पकड़ा है: मोदी की हर सांस्कृतिक श्रद्धांजलि एक साथ दो काम करती है — शोक भी, और उस क्षेत्र के मतदाता को यह संदेश भी कि 'दिल्ली तुम्हें भूली नहीं है।' यह कोई आरोप नहीं, यह आधुनिक राजनीतिक संचार का स्वाभाविक व्याकरण है — और मोदी इसमें माहिर हैं।
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में फुसफुसाहट है कि जानकी को भारत रत्न न मिलना दक्षिण भारतीय सांस्कृतिक हलकों में हमेशा एक टीस रही। ट्रेड और संगीत जगत में चर्चा है कि अगर जानकी उत्तर भारतीय होतीं, तो यह सम्मान कब का मिल चुका होता। अब उनके निधन के बाद मरणोपरांत भारत रत्न की माँग उठ सकती है — और अगर ऐसा होता है, तो यह भाजपा के लिए दक्षिण में एक बड़ा सांस्कृतिक कार्ड बन सकता है। (यह इंडस्ट्री और राजनीतिक हलकों की चर्चा पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
लता-आशा-जानकी: एक त्रिमूर्ति जो अब इतिहास है
लता मंगेशकर 2022 में गईं। आशा भोसले अभी हैं, लेकिन सक्रिय गायन से लगभग दूर। और अब जानकी। तेलंगाना टुडे के अनुसार जानकी ने 2016 में ही सक्रिय गायन से सन्यास ले लिया था, लेकिन उनका होना ही एक भरोसा था — कि वो पीढ़ी अभी पूरी तरह ख़त्म नहीं हुई। अब वो भरोसा भी टूटा।
इन तीनों ने मिलकर एक ऐसा युग रचा जिसमें एक गायिका की आवाज़ ही फ़िल्म की नायिका की पहचान बन जाती थी। आज AI-जनित आवाज़ों और ऑटो-ट्यून के दौर में वो 'एक आवाज़ = एक पहचान' वाला रिश्ता ख़त्म हो रहा है। जानकी का जाना सिर्फ़ एक गायिका का जाना नहीं — यह उस पूरे मॉडल का अंत है जिसमें आवाज़ में आत्मा थी, तकनीक का सहारा नहीं।
आगे क्या: वो सवाल जो अब उठेंगे
जानकी के जाने के बाद कुछ सवाल अनिवार्य हैं। क्या सरकार मरणोपरांत भारत रत्न पर विचार करेगी? अगर करती है, तो यह 2027 के चुनावी साल से पहले दक्षिण भारत में भाजपा के लिए एक मज़बूत सांस्कृतिक दावा बन सकता है। क्या हिंदी सिनेमा अब जानकी की विरासत को वो सम्मान देगा जो ज़िंदगी में नहीं दिया — जैसा अक्सर होता है, मरने के बाद याद आता है? और सबसे बड़ा सवाल: क्या भारत कभी अपने 'राष्ट्रीय' सांस्कृतिक कैनन को सच में राष्ट्रीय बनाएगा — जहाँ दक्षिण, पूर्वोत्तर, और हर क्षेत्र के कलाकार को बराबरी का दर्जा मिले, न कि बॉलीवुड का हाशिया?
48,000 गाने गाकर भी अगर कोई 'अनसुना' रह जाए, तो सवाल उस गायिका की प्रतिभा पर नहीं — उस व्यवस्था पर है जो सुनने से इनकार करती रही।
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आरोप और रिपोर्ट यहाँ नामित स्रोतों को श्रेय दिए गए हैं और जब तक किसी अदालत ने निर्णय नहीं दिया, अप्रमाणित हैं; न्यायालय के अधीन मामले बिना पूर्वाग्रह रिपोर्ट किए गए हैं।
इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।
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मुख्य बातें
- एस. जानकी ने 17 भाषाओं में 48,000 से ज़्यादा गाने गाए — यह आँकड़ा लता मंगेशकर के अनुमानित रिकॉर्ड से भी कहीं अधिक है, फिर भी हिंदी बेल्ट में उनकी पहचान सीमित रही — तेलंगाना टुडे
- प्रधानमंत्री मोदी ने जानकी के निधन को 'अपूरणीय क्षति' बताया और उनकी बहुभाषी विरासत को रेखांकित किया — यह दक्षिण भारत में भाजपा की सांस्कृतिक पहुँच बढ़ाने की रणनीति से मेल खाता है — टाइम्स ऑफ़ इंडिया
- जानकी के जाने के साथ लता-आशा-जानकी त्रिमूर्ति का युग पूरी तरह इतिहास बन गया — भारतीय पार्श्वगायन का वो मॉडल समाप्त हुआ जिसमें एक आवाज़ ही नायिका की पहचान थी
- मरणोपरांत भारत रत्न की माँग उठ सकती है — यह 2027 से पहले भाजपा के लिए दक्षिण भारत में एक बड़ा सांस्कृतिक कार्ड बन सकता है
आँकड़ों में
- एस. जानकी ने 17 भाषाओं में 48,000 से अधिक गाने गाए — तेलंगाना टुडे
- जानकी ने 1957 से 2016 तक लगभग छह दशक सक्रिय गायन किया — तेलंगाना टुडे
- लता मंगेशकर के अनुमानित 25,000-30,000 गानों की तुलना में जानकी का आँकड़ा काफ़ी अधिक है
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: दिग्गज पार्श्वगायिका एस. जानकी (88 वर्ष) और श्रद्धांजलि देने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी — टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार
- क्या: एस. जानकी का निधन; मोदी ने इसे 'अपूरणीय क्षति' बताया और उनकी बहुभाषी विरासत को श्रद्धांजलि दी — द प्रिंट के अनुसार
- कब: जनवरी 2026 — तेलंगाना टुडे के अनुसार
- कहाँ: भारत — जानकी ने कन्नड़, तेलुगु, तमिल, मलयालम, हिंदी समेत 17 भाषाओं में गाया — तेलंगाना टुडे
- क्यों: लंबी बीमारी के बाद 88 वर्ष की आयु में निधन — तेलंगाना टुडे
- कैसे: प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया पर श्रद्धांजलि दी, संगीत जगत और राजनीतिक हलकों में शोक की लहर — द प्रिंट
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
एस. जानकी ने कितने गाने गाए और कितनी भाषाओं में?
तेलंगाना टुडे के अनुसार एस. जानकी ने 17 भाषाओं में 48,000 से अधिक गाने गाए, जो उन्हें भारत की सबसे विपुल पार्श्वगायिकाओं में से एक बनाता है।
प्रधानमंत्री मोदी ने एस. जानकी के निधन पर क्या कहा?
टाइम्स ऑफ़ इंडिया और द प्रिंट के अनुसार मोदी ने जानकी के निधन को संगीत जगत की 'अपूरणीय क्षति' बताया और उनकी बहुभाषी प्रतिभा व आवाज़ की 'दिव्य मिठास' की प्रशंसा की।
एस. जानकी को भारत रत्न क्यों नहीं मिला?
जानकी को जीवनकाल में भारत रत्न नहीं मिला। संगीत और राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि भारत के उत्तर-केंद्रित सांस्कृतिक कैनन ने दक्षिण भारतीय कलाकारों को इस सम्मान से वंचित रखा। उनके निधन के बाद मरणोपरांत सम्मान की माँग उठ सकती है।
लता-आशा-जानकी त्रिमूर्ति का भारतीय संगीत में क्या महत्व था?
इन तीनों ने मिलकर भारतीय पार्श्वगायन का वो स्वर्णिम युग रचा जिसमें एक गायिका की आवाज़ ही फ़िल्म की नायिका की पूरी पहचान बन जाती थी। जानकी के जाने से यह तिकड़ी अब पूरी तरह इतिहास बन गई है।






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