असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने एक कैलकुलेटेड कल्चरल शिफ्ट शुरू किया है — दीवारों से चे ग्वेरा और ज़ुबीन गर्ग के म्यूरल हटाकर उल्फा प्रमुख परेश बरुआ जैसे स्थानीय चेहरे स्थापित किए जा रहे हैं, ताकि असमिया युवाओं का वैचारिक कम्पास वामपंथ से स्थायी रूप से मोड़ा जा सके।

गुवाहाटी की उन गलियों में जाइए जहाँ पाँच साल पहले तक चे ग्वेरा की वह मशहूर बेरे वाली तस्वीर दीवारों पर राज करती थी — कॉलेज कैंटीन के बाहर, चाय की दुकानों पर, हॉस्टल की सीढ़ियों में। आज वहाँ पलस्तर है, या फिर एक नया चेहरा है — और वह चेहरा चे का नहीं, उल्फा प्रमुख का है। इंडिया टुडे की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक, असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने जो खेल शुरू किया है, वह सिर्फ़ दीवारों का नहीं — दिमाग़ों का है।

बात सीधी है: असम में एक पीढ़ी ऐसी पली जिसके लिए चे ग्वेरा विद्रोह का मतलब था, ज़ुबीन गर्ग असमिया अस्मिता की आवाज़ थे, और उल्फा 'आतंकवाद' का पर्याय। हिमंत इस पूरी शब्दावली पलट रहे हैं। इंडिया टुडे की रिपोर्ट बताती है कि अब उल्फा प्रमुख परेश बरुआ को 'स्वतंत्रता सेनानी' की तरह पेश किया जा रहा है — सड़कों पर, सरकारी कार्यक्रमों में, नई किताबों में। और चे? चे 'विदेशी' हो गए। ज़ुबीन गर्ग? उनके म्यूरल 'शहर की सुंदरता' के नाम पर मिटाए जा रहे हैं।

यह कोई सांस्कृतिक सफ़ाई अभियान नहीं — यह वोट बैंक इंजीनियरिंग है, और इसकी जड़ें बेहद गहरी हैं।

पॉलिटिकल पल्स

सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि हिमंत की यह चाल असम विधानसभा 2026 की तैयारी से कहीं बड़ी है। बीजेपी के अंदरूनी हलकों में चर्चा है कि पार्टी को पूर्वोत्तर में एक ऐसा 'कल्चरल एंकर' चाहिए जो वामपंथ और कांग्रेस दोनों के पैर नीचे से ज़मीन खींच ले। चे ग्वेरा का चेहरा असम के कैंपस में वामपंथी छात्र संगठनों — SFI, AISF, AISA — का सबसे ताकतवर रिक्रूटमेंट टूल था। अगर वह चेहरा ही ग़ायब हो जाए, तो नई पीढ़ी को वामपंथ से जोड़ने वाला भावनात्मक तार टूट जाता है।

लेकिन असली खेल इससे भी पेचीदा है। ट्रेड हलकों और विश्लेषकों का अनुमान है कि हिमंत उल्फा नेतृत्व को सार्वजनिक रूप से 'रिहैबिलिटेट' करके दो काम एक साथ कर रहे हैं। पहला — असमिया उप-राष्ट्रवाद को बीजेपी की छतरी के नीचे लाना, ताकि कोई क्षेत्रीय पार्टी इस भावना को भुना न सके। दूसरा — शांति प्रक्रिया में उल्फा गुट को मेज़ पर लाने के लिए राजनीतिक माहौल बनाना, जिसकी ज़रूरत केंद्र सरकार को भी है।

(यह इंडस्ट्री चर्चा और राजनीतिक अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

दीवार बदलो, इतिहास बदलो

इतिहास गवाह है कि हर सत्ता अपने नायक गढ़ती है। तुर्की में अतातुर्क ने ऑटोमन प्रतीकों को मिटाया, सोवियत संघ के बिखरने के बाद लेनिन की मूर्तियाँ गिराई गईं। हिमंत की चाल इसी परंपरा में है — लेकिन फ़र्क यह है कि वे किसी हारे हुए शासन के प्रतीक नहीं हटा रहे, बल्कि एक जीवित सांस्कृतिक पहचान को री-प्रोग्राम कर रहे हैं। चे ग्वेरा असम के लिए सिर्फ़ पोस्टर नहीं था — वह एक पूरी पीढ़ी का 'विद्रोह का शॉर्टहैंड' था। कॉलेज की दीवार पर चे का चेहरा बनाने का मतलब था: 'मैं व्यवस्था से सवाल पूछता हूँ।' अब वह दीवार ख़ाली है — या उस पर कोई और चेहरा है।

ज़ुबीन गर्ग का मामला और भी दिलचस्प है। ज़ुबीन ने 2024 में CAA के ख़िलाफ़ खुलकर बोला था और असमिया अस्मिता की राजनीति में बीजेपी के लिए असुविधाजनक हो गए थे। इंडिया टुडे के अनुसार, अब उनके म्यूरल और सार्वजनिक स्मारक 'शहरी सौंदर्यीकरण' की आड़ में हटाए जा रहे हैं। सवाल यह है — क्या कोई मुख्यमंत्री तय कर सकता है कि किस कलाकार की तस्वीर दीवार पर रहेगी और किसकी नहीं?

आँकड़ों की ज़बान

असम में वामपंथी दलों का वोट शेयर 2016 में लगभग 12% था, जो 2021 में गिरकर 4% से नीचे आ गया — यह गिरावट बीजेपी के सांस्कृतिक अभियान के साथ-साथ हुई है (इंडिया टुडे और मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार)। पूर्वोत्तर के आठ राज्यों में से छह में अब बीजेपी या उसके सहयोगी सत्ता में हैं। और सबसे अहम आँकड़ा — असम में 18-25 आयु वर्ग के वोटर्स की संख्या कुल मतदाताओं का लगभग 18-20% है। यही वह पीढ़ी है जिसके दिमाग़ में चे की जगह कौन बैठेगा, यह तय करने की होड़ है।

इंडिया हेराल्ड का सटीक पॉलिटिकल रीड यही है कि हिमंत का यह कदम चुनावी गणित से कहीं आगे का है — यह एक 'कल्चरल री-सेट' है जिसका मकसद अगले दो दशकों का वैचारिक नक्शा बदलना है। अगर यह कामयाब हुआ, तो असम में वामपंथ सिर्फ़ चुनावी तौर पर नहीं, सांस्कृतिक तौर पर भी ख़त्म हो जाएगा — और बीजेपी के पास पूर्वोत्तर का एक ऐसा मॉडल होगा जिसे बंगाल और केरल में दोहराने की कोशिश की जा सकती है।

विपक्ष की चुप्पी ख़ुद एक बयान है

सबसे अजीब बात यह है कि कांग्रेस और वामपंथी दल इस पूरे खेल पर लगभग चुप हैं। CPI(M) की असम इकाई ने मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक कुछ बयान ज़रूर दिए हैं, लेकिन कोई ज़मीनी प्रतिरोध नहीं दिखता। क्या इसका मतलब यह है कि विपक्ष ने मान लिया है कि यह लड़ाई हार चुकी है? या फिर वे इंतज़ार कर रहे हैं कि जनता ख़ुद प्रतिक्रिया करे?

विश्लेषकों का मानना है कि चुप्पी का एक और कारण है — उल्फा प्रमुख को 'हीरो' बनाने के ख़िलाफ़ बोलना असम में राजनीतिक आत्महत्या हो सकती है। असमिया राष्ट्रवाद इतना गहरा है कि कोई भी पार्टी उल्फा के ख़िलाफ़ खुलकर बोलने का जोखिम नहीं उठाना चाहती — और हिमंत ने ठीक इसी भावना को अपना ढाल बना लिया है।

आगे क्या?

देखने वाली बात यह होगी कि क्या यह मॉडल सिर्फ़ शहरी दीवारों तक सीमित रहता है या गाँवों, स्कूली पाठ्यक्रमों और सांस्कृतिक संस्थाओं तक पहुँचता है। अगर अगले एक साल में असम के स्कूली किताबों में उल्फा आंदोलन का 'रीफ़्रेमिंग' दिखे, तो समझिए कि हिमंत का प्रयोग अगले चरण में पहुँच गया। केंद्र में गृह मंत्रालय की नज़र भी इस पर है — क्योंकि उल्फा के साथ शांति वार्ता का अगला दौर इसी माहौल में होगा।

एक बात तय है — दीवारों पर चेहरे बदलना आसान है, दिमाग़ों में बैठी छवियाँ बदलना कहीं ज़्यादा मुश्किल। लेकिन अगर कोई नेता भारत में यह करने के सबसे क़रीब है, तो वह हिमंत बिस्वा सरमा हैं। सवाल बस यह है — जिस पीढ़ी की दीवारों से चे ग्वेरा हटाया गया, क्या वह अपने फ़ोन की स्क्रीन से भी उसे भुला पाएगी?

आरोप और दावे संबंधित स्रोतों के हवाले से प्रस्तुत हैं और जब तक न्यायालय द्वारा निर्णय न हो, अप्रमाणित माने जाएँ; उप-न्यायिक मामलों पर बिना पूर्वाग्रह रिपोर्ट की गई है।

इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।

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मुख्य बातें

  • हिमंत बिस्वा सरमा ने असम में चे ग्वेरा और ज़ुबीन गर्ग के म्यूरल हटाकर उल्फा प्रमुख जैसे स्थानीय चेहरों को स्थापित करने का अभियान चलाया है — यह वामपंथ की सांस्कृतिक जड़ें काटने की रणनीति है (इंडिया टुडे)।
  • असम में वामपंथी दलों का वोट शेयर 2016 के ~12% से गिरकर 2021 में 4% से नीचे आ चुका है — सांस्कृतिक अभियान और चुनावी गिरावट साथ-साथ चली है।
  • उल्फा नेतृत्व को सार्वजनिक रूप से 'रिहैबिलिटेट' करके हिमंत दो लक्ष्य साध रहे हैं — असमिया उप-राष्ट्रवाद को बीजेपी की छतरी में लाना और शांति प्रक्रिया के लिए माहौल बनाना।
  • विपक्ष की चुप्पी बताती है कि उल्फा के ख़िलाफ़ बोलना असम में राजनीतिक रूप से ख़तरनाक माना जा रहा है — हिमंत ने असमिया राष्ट्रवाद को अपनी ढाल बना लिया है।
  • अगला चरण — अगर स्कूली पाठ्यक्रमों में उल्फा आंदोलन की 'रीफ़्रेमिंग' दिखे, तो इस प्रयोग की सफलता पक्की मानी जाएगी।

आँकड़ों में

  • असम में वामपंथी वोट शेयर 2016 में ~12% से गिरकर 2021 में 4% से नीचे (मीडिया रिपोर्ट्स)
  • पूर्वोत्तर के 8 में से 6 राज्यों में बीजेपी या सहयोगी सत्ता में
  • असम में 18-25 आयु वर्ग कुल मतदाताओं का ~18-20%

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा, जिन्होंने यह सांस्कृतिक अभियान शुरू किया है (इंडिया टुडे के अनुसार)।
  • क्या: असम में चे ग्वेरा और ज़ुबीन गर्ग जैसे चेहरों के म्यूरल/पोस्टर हटाकर उल्फा प्रमुख सहित स्थानीय चेहरों को सार्वजनिक स्थलों पर स्थापित किया जा रहा है।
  • कब: 2026 में यह अभियान तेज़ हुआ है, जब असम में अगले विधानसभा चुनाव की तैयारियाँ शुरू हो चुकी हैं।
  • कहाँ: असम के प्रमुख शहरों और कस्बों में — गुवाहाटी, डिब्रूगढ़, तिनसुकिया सहित कई ज़िलों में।
  • क्यों: इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, हिमंत वामपंथी प्रतीकों की जगह स्थानीय चेहरों को लाकर असमिया राष्ट्रवाद को बीजेपी के हक़ में मोड़ना चाहते हैं।
  • कैसे: सरकारी और अर्ध-सरकारी संस्थाओं के ज़रिये म्यूरल बदले जा रहे हैं, सार्वजनिक स्मारक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में नई नैरेटिव स्थापित की जा रही है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

हिमंत बिस्वा सरमा असम में चे ग्वेरा के म्यूरल क्यों हटवा रहे हैं?

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, हिमंत वामपंथी प्रतीकों को हटाकर स्थानीय असमिया चेहरों को स्थापित कर रहे हैं ताकि युवाओं का वैचारिक जुड़ाव वामपंथ से टूटे और असमिया राष्ट्रवाद बीजेपी के पक्ष में काम करे।

असम में उल्फा प्रमुख को 'हीरो' के रूप में क्यों पेश किया जा रहा है?

विश्लेषकों का मानना है कि यह दो उद्देश्यों से है — असमिया उप-राष्ट्रवाद को बीजेपी की छतरी में लाना और उल्फा के साथ शांति वार्ता के लिए अनुकूल माहौल बनाना।

ज़ुबीन गर्ग के म्यूरल क्यों हटाए जा रहे हैं?

इंडिया टुडे के अनुसार, ज़ुबीन गर्ग ने CAA के ख़िलाफ़ खुलकर बोला था और बीजेपी के लिए असुविधाजनक हो गए — उनके म्यूरल 'शहरी सौंदर्यीकरण' की आड़ में हटाए जा रहे हैं।

क्या हिमंत का यह मॉडल दूसरे राज्यों में दोहराया जा सकता है?

इंडिया हेराल्ड का विश्लेषण है कि अगर यह प्रयोग सफल रहा तो बीजेपी इसे बंगाल और केरल जैसे वामपंथी प्रभाव वाले राज्यों में दोहराने की कोशिश कर सकती है।

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