रिपोर्ट्स के मुताबिक अनुपम खेर की फिल्म 'श्री रामभूमि' का कथानक एक मंदिर में चढ़ावा चोरी के इर्द-गिर्द घूमेगा। खेर एक ऐसे किरदार में दिखेंगे जो इस भ्रष्टाचार से जूझता है। यह प्लॉट राम मंदिर ट्रस्ट पर लगे वास्तविक विवादों की छाया में और भी संवेदनशील हो गया है।
एक ऐसा अभिनेता जिसने हिंदुत्व की राजनीतिक धारा में अपनी पहचान बनाई, अब पर्दे पर मंदिर के चढ़ावे में भ्रष्टाचार की कहानी सुनाएगा — यह वाक्य अगर किसी और के बारे में होता तो शायद कोई दो बार नहीं सोचता। लेकिन जब नाम अनुपम खेर का हो और फिल्म का शीर्षक 'श्री रामभूमि' — तो हर शब्द का वज़न बदल जाता है।
Oneindia की रिपोर्ट के मुताबिक, 'श्री रामभूमि' का कथानक एक ऐसे मंदिर के इर्द-गिर्द बुना गया है जहाँ चढ़ावे की रकम की चोरी और भ्रष्टाचार का खेल चलता है। अनुपम खेर इस कहानी में एक ऐसे किरदार की भूमिका में बताए जा रहे हैं जो इस व्यवस्था से टकराता है। फिल्म के निर्माताओं ने अब तक आधिकारिक रूप से पूरी कहानी का खुलासा नहीं किया है, लेकिन जो ब्योरे सामने आए हैं, वे काफ़ी हैं आग लगाने के लिए।
और आग इसलिए भी भड़केगी क्योंकि यह कहानी वैक्यूम में नहीं आ रही। राम मंदिर ट्रस्ट पर पिछले कुछ वर्षों में ज़मीन ख़रीद से लेकर चंदा प्रबंधन तक पर सवाल उठते रहे हैं। विपक्षी दलों ने कई बार आरोप लगाए कि ट्रस्ट के फंड में अनियमितताएँ हुईं — हालाँकि ट्रस्ट ने इन आरोपों को हमेशा सिरे से ख़ारिज किया है। ऐसे माहौल में जब कोई फिल्म 'रामभूमि' नाम लेकर 'चढ़ावा चोरी' का प्लॉट लाती है, तो दर्शक ख़ुद-ब-ख़ुद बिंदुओं को जोड़ना शुरू कर देते हैं।
इनसाइड टॉक
इंडस्ट्री के हलकों में फुसफुसाहट यह है कि अनुपम खेर ने यह प्रोजेक्ट बहुत सोच-समझकर चुना है। ट्रेड सूत्रों का कहना है कि खेर पिछले कुछ समय से ऐसी कहानियाँ तलाश रहे थे जो उन्हें सिर्फ़ 'राइट-विंग पोस्टर बॉय' वाले खाँचे से बाहर निकालें। एक वरिष्ठ प्रोडक्शन सूत्र के मुताबिक, "खेर साहब का मानना है कि आस्था और भ्रष्टाचार दो अलग चीज़ें हैं — आस्था की रक्षा करते हुए भ्रष्टाचार पर चोट करना उनकी ज़िम्मेदारी है।" हालाँकि, यह भी चर्चा है कि क्या बीजेपी इकोसिस्टम में इस फिल्म को लेकर असहजता है। फ़ैन्स और पार्टी समर्थकों के बीच मूड बँटा हुआ बताया जा रहा है — एक धड़ा मानता है कि यह 'एंटी-मंदिर नैरेटिव' है, जबकि दूसरा इसे 'व्यवस्था की सफ़ाई' का सिनेमाई रूप बता रहा है।
(यह इंडस्ट्री चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
अनुपम खेर का दोहरा दाँव
अनुपम खेर का करियर ग्राफ़ देखें तो एक दिलचस्प पैटर्न दिखता है। 'द कश्मीर फ़ाइल्स' (2022) ने उन्हें हिंदुत्व सिनेमा का सबसे विश्वसनीय चेहरा बनाया — वह फिल्म ₹340 करोड़ से ज़्यादा कमाई कर गई और राजनीतिक रूप से भी बड़ी ताक़त बनी। लेकिन उसके बाद खेर की फिल्मों ने बॉक्स ऑफ़िस पर वैसा जादू नहीं दोहराया। ऐसे में 'श्री रामभूमि' एक कैलकुलेटेड गैम्बल है — अगर फिल्म आस्था की रक्षा और भ्रष्टाचार पर प्रहार का संतुलन बिठा लेती है, तो खेर को दोनों खेमों का दर्शक मिल सकता है। रिस्क बड़ा है, लेकिन रिवॉर्ड भी।
यहाँ एक और बात ग़ौर करने लायक़ है। भारतीय सिनेमा में धार्मिक संस्थानों के भ्रष्टाचार पर फिल्में पहले भी बनी हैं — 'ओह माय गॉड' (2012) से लेकर 'पीके' (2014) तक। लेकिन उन फिल्मों को बनाने वाले कभी उस राजनीतिक धारा से नहीं जुड़े थे जिसने मंदिर आंदोलन को अपनी पहचान बनाया। अनुपम खेर अगर यही कहानी कहते हैं, तो यह अंदर से आई आवाज़ होगी — और अंदर से आई आलोचना हमेशा बाहर से आई आलोचना से ज़्यादा तीखी लगती है।
असली सवाल — सेंसर बोर्ड और राजनीतिक प्रतिक्रिया
इंडिया हेराल्ड का आकलन यह है कि इस फिल्म की असली परीक्षा रिलीज़ से पहले शुरू होगी। CBFC (सेंसर बोर्ड) के सामने यह कहानी एक नई चुनौती लेकर आएगी — क्या 'चढ़ावा चोरी' के दृश्यों को 'धार्मिक भावनाओं को ठेस' की श्रेणी में रखा जाएगा? पिछले कुछ वर्षों में हमने देखा है कि CBFC ने 'सतलज' जैसी फिल्मों पर 120 से ज़्यादा कट लगाए — ऐसे में 'श्री रामभूमि' का रास्ता आसान नहीं होगा।
राजनीतिक प्रतिक्रिया का अंदाज़ा लगाना भी मुश्किल नहीं। अगर फिल्म सच में राम मंदिर ट्रस्ट जैसी किसी संस्था की ओर इशारा करती है, तो विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल जैसे संगठनों की प्रतिक्रिया तय है। लेकिन अगर कहानी को काल्पनिक रखा गया और 'किसी भी मंदिर से समानता संयोग मात्र है' वाला डिस्क्लेमर लगाया गया — तो क्या दर्शक उस बहाने को स्वीकार करेंगे?
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आगे क्या होगा — देखने लायक़ बातें
अभी फिल्म की रिलीज़ डेट आधिकारिक रूप से घोषित नहीं हुई है। लेकिन जिस तरह प्लॉट डिटेल्स लीक हो रहे हैं, वह या तो मार्केटिंग की चाल है — जानबूझकर विवाद खड़ा करो, ताकि फिल्म रिलीज़ से पहले ही चर्चा में आ जाए — या फिर प्रोडक्शन टीम में कोई है जो बात बाहर ला रहा है। दोनों ही सूरतों में, 'श्री रामभूमि' ने बिना एक भी ट्रेलर दिखाए अपना पहला विवाद खड़ा कर दिया है।
आने वाले हफ़्तों में तीन चीज़ें देखने लायक़ होंगी: पहला, अनुपम खेर ख़ुद इस प्लॉट पर कोई सफ़ाई देते हैं या ख़ामोश रहते हैं। दूसरा, बीजेपी और संघ परिवार के नेता इस पर कोई बयान देते हैं या नहीं। और तीसरा, क्या कोई राजनीतिक दल इस फिल्म को अपने नैरेटिव में इस्तेमाल करने की कोशिश करता है — चाहे समर्थन में हो या विरोध में।
एक बात पक्की है — अनुपम खेर ने एक ऐसा पत्थर उठाया है जिसके नीचे क्या-क्या निकलेगा, यह किसी को नहीं पता। सवाल यह नहीं कि फिल्म हिट होगी या फ्लॉप — सवाल यह है कि क्या इस फिल्म को रिलीज़ होने दिया जाएगा वैसे जैसे बनाई गई है, या रास्ते में ही कहानी का चेहरा बदल दिया जाएगा।
मुख्य बातें
- अनुपम खेर की 'श्री रामभूमि' में मंदिर के चढ़ावे में भ्रष्टाचार का प्लॉट सामने आया है — Oneindia की रिपोर्ट के मुताबिक
- यह कथानक राम मंदिर ट्रस्ट पर लगे वास्तविक आरोपों की छाया में विवादित हो गया है — ट्रस्ट ने आरोपों को ख़ारिज किया है
- खेर का यह प्रोजेक्ट उनकी 'राइट-विंग पोस्टर बॉय' छवि को चुनौती देता है — इंडस्ट्री सूत्रों के अनुसार
- CBFC और राजनीतिक संगठनों की प्रतिक्रिया फिल्म की असली परीक्षा होगी
- फिल्म की रिलीज़ डेट अभी आधिकारिक रूप से घोषित नहीं — लेकिन प्लॉट लीक ने पहला विवाद पहले ही खड़ा कर दिया है
आँकड़ों में
- 'द कश्मीर फ़ाइल्स' (2022) ने ₹340 करोड़ से ज़्यादा बॉक्स ऑफ़िस कमाई की थी — ट्रेड रिपोर्ट्स के अनुसार
- CBFC ने हाल ही में 'सतलज' फिल्म पर 120 से ज़्यादा कट लगाए थे — मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक



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