पीएम मोदी ने नॉर्वे, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड — तीनों दौरों पर कोई संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की। यह पैटर्न 2014 से जारी है और विपक्ष व अंतरराष्ट्रीय मीडिया दोनों इसे प्रधानमंत्री की 'कंट्रोल्ड नैरेटिव' रणनीति का सबूत बता रहे हैं, जबकि सरकार इसे 'प्रोटोकॉल' का मामला कहती है।

ग्यारह साल। चालीस से ज़्यादा देश। सैकड़ों फ़ोटो-ऑप। और ढूँढ़ते रह जाइए — एक भी वो क्लासिक दृश्य जहाँ दो प्रधानमंत्री पोडियम पर खड़े हों और एक पत्रकार बेलगाम सवाल दाग दे। पीएम मोदी ने जुलाई 2026 में इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड का छह दिवसीय दौरा शुरू किया, और जैसा कि इंडिया टीवी न्यूज़ ने रिपोर्ट किया, एजेंडे में द्विपक्षीय बैठकें, रक्षा समझौते और डायस्पोरा संबोधन तो हैं — प्रेस कॉन्फ्रेंस कहीं नहीं। यह कोई नई बात नहीं, यह एक सुनियोजित पैटर्न है — और सवाल अब भारत की सीमाओं से बाहर भी गूँजने लगे हैं।

MSN पर प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, नॉर्वे से ऑस्ट्रेलिया और अब न्यूज़ीलैंड तक, हर दौरे पर यही सवाल मोदी का पीछा कर रहा है — प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों नहीं? विदेश मंत्रालय का रटा-रटाया जवाब 'प्रोटोकॉल' का हवाला देता है, लेकिन प्रोटोकॉल तो ऑस्ट्रेलिया के एंथनी अल्बनीज़ और न्यूज़ीलैंड के क्रिस्टोफ़र लक्सन के लिए भी वही है — वे अपने देश की मीडिया के सामने खड़े होते हैं, सवालों का जवाब देते हैं। मोदी के साथ ऐसा नहीं होता।

इस पैटर्न का गणित समझिए। भारतीय प्रधानमंत्री ने 2014 से अब तक घरेलू ज़मीन पर शायद ही कभी कोई ओपन प्रेस कॉन्फ्रेंस की हो। मनमोहन सिंह पर भी यही आरोप लगता था, लेकिन उन्होंने कम-से-कम कुछ मौक़ों पर — ख़ासतौर पर विदेशी दौरों पर — संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लिया था। मोदी ने उस परंपरा को लगभग पूरी तरह ख़त्म कर दिया है। इसकी जगह क्या आया? मैनेज्ड इंटरव्यू — जहाँ सवाल पहले से तय होते हैं, और 'मन की बात' जैसे एकतरफ़ा संबोधन।

पॉलिटिकल पल्स

दिल्ली के सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि PMO को प्रेस कॉन्फ्रेंस से नहीं, बल्कि उस एक अनियंत्रित सवाल से डर लगता है जो 24 घंटे का न्यूज़ साइकल बदल दे। 2019 में जब मोदी ने चुनाव प्रचार के बीच पहली और इकलौती प्रेस कॉन्फ्रेंस में बैठे, तो अमित शाह ने सारे सवालों के जवाब दिए — मोदी मुस्कुराते रहे। वह दृश्य आज भी विपक्ष का सबसे धारदार हथियार है।

ट्रेड हलकों और राजनीतिक विश्लेषकों में चर्चा है कि यह रणनीति शॉर्ट-टर्म में कारगर है — 'मैसेज कंट्रोल' में कोई मोदी सरकार की बराबरी नहीं कर सकता। हर विदेश दौरे का विज़ुअल PMO के हिसाब से क्यूरेट होता है — गले मिलना, हाथ मिलाना, भव्य स्वागत, और फिर एक स्क्रिप्टेड संयुक्त बयान। सवाल-जवाब का कोई स्कोप नहीं। लेकिन लॉन्ग-टर्म में यही रणनीति एक ख़तरनाक नैरेटिव बना रही है — कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र चलाने वाला नेता बेलगाम सवालों का सामना नहीं कर सकता।

अंतरराष्ट्रीय तुलना करें तो तस्वीर और साफ़ होती है। अमेरिका के राष्ट्रपति — चाहे ट्रंप हों या बाइडन — व्हाइट हाउस लॉन पर चलते-चलते भी पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हैं। ब्रिटिश प्रधानमंत्री हर हफ़्ते संसद में PMQs (प्राइम मिनिस्टर्स क्वेश्चन्स) का सामना करते हैं जहाँ विपक्ष बेरहमी से सवाल पूछता है। ऑस्ट्रेलिया में अल्बनीज़ नियमित प्रेसर करते हैं। यहाँ तक कि चीन के शी जिनपिंग भी — जो किसी लोकतांत्रिक जवाबदेही के दायरे में नहीं आते — विदेशी दौरों पर कभी-कभार प्रेस से मुख़ातिब होते हैं। मोदी इस मामले में एक अनोखे अपवाद बन गए हैं।

इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल ब्यूरो इस पैटर्न के पीछे की असली गणित को ऐसे पढ़ता है: यह प्रेस कॉन्फ्रेंस का मसला नहीं, यह सत्ता के नैरेटिव पर एकाधिकार का मसला है। जब तक PMO तय करता है कि मीडिया को क्या मिलेगा और कब मिलेगा, तब तक सवालों की दिशा भी उनके हाथ में रहती है। विदेश दौरों पर यह और आसान हो जाता है — विदेशी मीडिया को भारत की घरेलू राजनीति की बारीकियाँ नहीं पता, और भारतीय मीडिया को एक्सेस चाहिए तो PMO की शर्तों पर।

लेकिन यह रणनीति अब दरकने लगी है। पहले यह सवाल सिर्फ़ भारतीय विपक्ष उठाता था — अब अंतरराष्ट्रीय मीडिया भी हर दौरे पर इसे हेडलाइन बना रहा है। नॉर्वे में यही हुआ, ऑस्ट्रेलिया में यही हो रहा है, और न्यूज़ीलैंड में भी यही दोहराया जाएगा। हर बार जब मोदी प्रेस कॉन्फ्रेंस से बचते हैं, वो ख़ुद ही सबसे बड़ी हेडलाइन बन जाती है — 'मोदी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की'। यानी जिस मीडिया कवरेज को कंट्रोल करने की कोशिश है, वही बेक़ाबू हो रही है।

और सबसे अहम बात — 2029 की छाया। अभी 2026 है, और अगले लोकसभा चुनाव में तीन साल बाक़ी हैं। अगर यह पैटर्न जारी रहा, तो विपक्ष के पास एक रेडीमेड नैरेटिव होगा: 'जो प्रधानमंत्री प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं कर सकता, वो जनता के सवालों का जवाब कैसे देगा?' यह लाइन सड़क पर उतरने वाली है — चाहे INDIA गठबंधन इस्तेमाल करे या कोई तीसरा मोर्चा।

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सरकार की ओर से अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है कि प्रेस कॉन्फ्रेंस न करने की नीति क्यों जारी है। विदेश मंत्रालय 'प्रोटोकॉल' और 'द्विपक्षीय फ़ॉर्मेट' का हवाला देता रहा है, लेकिन इस सवाल का सीधा जवाब कभी नहीं दिया गया कि जब मेज़बान देश प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए तैयार है, तो भारत की ओर से मना क्यों किया जाता है।

आख़िरकार सवाल एक ही है — और यह सवाल अब सिर्फ़ भारत का नहीं रहा, यह अंतरराष्ट्रीय है: दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का नेता अगर खुले सवालों से बचता है, तो वह लोकतंत्र की ताक़त दिखा रहा है — या उसकी सीमा?

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मुख्य बातें

  • पीएम मोदी ने 2014 से अब तक विदेश दौरों पर लगभग कोई संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की — नॉर्वे, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड तीनों ताज़ा दौरों पर भी यही पैटर्न दोहराया गया।
  • विदेश मंत्रालय 'प्रोटोकॉल' का हवाला देता है, जबकि मेज़बान देशों के नेता अपनी मीडिया के सामने सवालों का जवाब देते हैं — दोहरा मानदंड साफ़ दिखता है।
  • अंतरराष्ट्रीय मीडिया अब हर दौरे पर इस सवाल को हेडलाइन बना रहा है — PMO की 'कंट्रोल्ड नैरेटिव' रणनीति ख़ुद ख़बर बन गई है।
  • 2029 लोकसभा चुनाव के संदर्भ में विपक्ष के पास एक तैयार नैरेटिव बन रहा है: 'जो प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं कर सकता, वो जनता को जवाब कैसे देगा?'

आँकड़ों में

  • पीएम मोदी ने 2014 से 2026 तक ग्यारह साल में घरेलू ज़मीन पर शायद ही कोई ओपन प्रेस कॉन्फ्रेंस की है — जुलाई 2026 की इंडोनेशिया-ऑस्ट्रेलिया-न्यूज़ीलैंड यात्रा में भी कोई संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस एजेंडे पर नहीं।
  • तीन विकसित लोकतंत्रों — नॉर्वे, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड — के ताज़ा दौरों पर शून्य प्रेस कॉन्फ्रेंस, जबकि इन देशों के अपने प्रधानमंत्री नियमित रूप से मीडिया के सामने आते हैं।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनका PMO — जिन पर विपक्ष और अंतरराष्ट्रीय मीडिया सवाल उठा रहे हैं।
  • क्या: जुलाई 2026 की इंडोनेशिया-ऑस्ट्रेलिया-न्यूज़ीलैंड यात्रा सहित तीन ताज़ा विदेश दौरों पर एक भी संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं हुई।
  • कब: जुलाई 2026 — छह दिवसीय दौरा; इससे पहले जून 2025 में नॉर्वे दौरे पर भी यही पैटर्न दिखा।
  • कहाँ: नॉर्वे (ओस्लो), ऑस्ट्रेलिया (कैनबरा), न्यूज़ीलैंड (वेलिंगटन) — तीनों विकसित लोकतंत्र।
  • क्यों: PMO की मीडिया रणनीति में 'कंट्रोल्ड नैरेटिव' को प्राथमिकता दी जाती है; विदेश मंत्रालय इसे प्रोटोकॉल बताता है, लेकिन आलोचक मानते हैं कि बेलगाम सवालों से बचने की कोशिश है।
  • कैसे: विदेश दौरों पर संयुक्त बयान जारी होते हैं, फ़ोटो-ऑप होती है, लेकिन मेज़बान और भारतीय मीडिया को सवाल पूछने का मौक़ा नहीं दिया जाता — मैनेज्ड इंटरव्यू या रिकॉर्डेड संबोधन उसकी जगह लेते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

पीएम मोदी ने आख़िरी बार प्रेस कॉन्फ्रेंस कब की थी?

2019 लोकसभा चुनाव के दौरान मोदी एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बैठे थे, लेकिन सारे सवालों के जवाब तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने दिए। उसके बाद से किसी ओपन प्रेस कॉन्फ्रेंस की सार्वजनिक जानकारी नहीं है।

क्या अन्य देशों के नेता भी प्रेस कॉन्फ्रेंस से बचते हैं?

अधिकतर विकसित लोकतंत्रों में — अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा — नेता नियमित प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हैं। ब्रिटिश PM को हर हफ़्ते PMQs का सामना करना पड़ता है। मोदी इस मामले में अपवाद माने जाते हैं।

विदेश मंत्रालय प्रेस कॉन्फ्रेंस न होने पर क्या कहता है?

विदेश मंत्रालय 'प्रोटोकॉल' और 'द्विपक्षीय फ़ॉर्मेट' का हवाला देता है, लेकिन इस सवाल का सीधा जवाब नहीं दिया गया कि जब मेज़बान देश तैयार है तो भारत की ओर से मना क्यों किया जाता है।

क्या यह 2029 चुनाव में BJP के लिए मुद्दा बन सकता है?

विश्लेषकों का मानना है कि अगर यह पैटर्न जारी रहा, तो विपक्ष 'प्रधानमंत्री जनता के सवालों से भागते हैं' का नैरेटिव बना सकता है, जो चुनावी प्रचार में इस्तेमाल हो सकता है।

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