सुप्रीम कोर्ट में एक याचिकाकर्ता ने CJI सूर्यकांत पर कागज़ फेंके और गालियाँ दीं। कोर्ट ने उसे 'मानसिक रूप से विक्षिप्त' मानकर बख़्शा, लेकिन SCBA ने इस घटना के बाद कोर्टरूम वीडियो रिकॉर्डिंग पर गाइडलाइन की माँग उठा दी — असल सवाल यह है कि निशाने पर 'हंगामा' है या 'पारदर्शिता'।

तस्वीर यह है — भारत की सबसे बड़ी अदालत, जहाँ संविधान की हर पंक्ति पर बहस होती है, वहाँ एक शख़्स उठता है, CJI सूर्यकांत की बेंच की तरफ़ कागज़ उछालता है, गालियाँ देता है, और कोर्ट उसे यह कहकर जाने देता है कि वह 'मानसिक रूप से विक्षिप्त' है। NDTV की रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने इस शख़्स के ख़िलाफ़ कोई अवमानना कार्रवाई नहीं की। कोर्ट की इस उदारता पर बहस अलग है — लेकिन जो तूफ़ान इस घटना के बाद उठा, वह कहीं ज़्यादा बड़ा और दूरगामी है।

क्योंकि यह घटना कैमरे पर थी। लाइव-स्ट्रीमिंग के ज़रिए पूरा देश देख रहा था। और जो क्लिप बनी, वह मिनटों में YouTube शॉर्ट्स, Instagram Reels और WhatsApp ग्रुप्स की शान बन गई। यही वह बिंदु है जहाँ SCBA — सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन — ने अपना असली पत्ता खेला।

SCBA की माँग — 'मर्यादा' की ढाल, पारदर्शिता पर निशाना?

NDTV के अनुसार, SCBA ने इस हंगामे के तुरंत बाद सुप्रीम कोर्ट से कोर्टरूम वीडियो रिकॉर्डिंग पर व्यापक गाइडलाइन जारी करने की माँग रखी। SCBA का तर्क है कि कोर्टरूम की क्लिप्स सोशल मीडिया पर 'आउट ऑफ़ कॉन्टेक्स्ट' वायरल होती हैं, जजों और वकीलों की गरिमा को ठेस पहुँचाती हैं, और न्यायिक प्रक्रिया को तमाशे में बदल देती हैं।

ऊपरी तौर पर यह बात जायज़ लगती है। कोई भी समझदार व्यक्ति नहीं चाहेगा कि अदालत सर्कस बने। लेकिन ज़रा ग़ौर कीजिए — यह माँग कब उठी? ठीक उस दौर में जब सुप्रीम कोर्ट की लाइव-स्ट्रीमिंग ने पहली बार आम नागरिक को यह ताक़त दी कि वह बिना वकील के, बिना दिल्ली आए, अपनी सर्वोच्च अदालत को काम करते देख सके। 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने ख़ुद स्वतंत्र अभिव्यक्ति के तहत लाइव-स्ट्रीमिंग का समर्थन किया था — उसी के फल अब चुभ रहे हैं।

पॉलिटिकल पल्स

सियासी गलियारों और बार काउंसिल के गलियारों में जो फुसफुसाहट है, वह 'मर्यादा' से कहीं आगे की है। ट्रेड हलकों में चर्चा है कि कई सीनियर वकीलों को असली तकलीफ़ इस बात से है कि अब उनकी कोर्टरूम 'परफ़ॉर्मेंस' — कभी-कभी फ़ीस के अनुपात में ढीली, कभी जजों के सामने अनावश्यक रूप से नम्र — पब्लिक स्क्रूटनी में आ गई है। एक वरिष्ठ वकील की 'ऑब्जेक्शन, योर ऑनर' वाली स्टाइल पहले बंद कमरे की बात थी — अब वह Reel बन जाती है, और क्लाइंट सवाल पूछता है कि '₹10 लाख की फ़ीस में इतना ही बोले?' इंडस्ट्री की बात यह है कि वीडियो रोकने की माँग जितनी जजों की मर्यादा के लिए है, उतनी ही बार की 'मिस्ट्री' बचाने के लिए भी है। (यह इंडस्ट्री चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

पारदर्शिता बनाम मर्यादा — असली टकराव कहाँ है?

इस बहस में दो बुनियादी सिद्धांत आमने-सामने खड़े हैं। पहला — 'ओपन कोर्ट' का सिद्धांत, जो कहता है कि न्याय सिर्फ़ होना नहीं चाहिए, दिखना भी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने ख़ुद 2018 में स्वतःसंज्ञान मामले में इसे स्वीकारा था। दूसरा — न्यायिक गरिमा, जो कहता है कि अदालत का अधिकार तभी टिकता है जब उसकी गंभीरता बनी रहे।

लेकिन इन दोनों के बीच एक तीसरा किरदार खड़ा हो गया है जो 2018 में नहीं था — एल्गोरिदम। YouTube का एल्गोरिदम वह क्लिप आगे बढ़ाता है जिसमें सबसे ज़्यादा 'ड्रामा' हो। एक शांत, गंभीर सुनवाई को कोई नहीं देखता; लेकिन CJI पर कागज़ उड़ते हुए? वह trending है। नतीजा यह कि लाइव-स्ट्रीमिंग जो पारदर्शिता के लिए शुरू हुई थी, एल्गोरिदम ने उसे 'कोर्टरूम ड्रामा' के कंटेंट मशीन में बदल दिया। यह एक वैध चिंता है — और SCBA इसे हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है।

इंडिया हेराल्ड का सीधा आकलन यह है कि SCBA की माँग का असली निशाना 'हंगामा रोकना' नहीं, बल्कि 'रिकॉर्डिंग का नियंत्रण वापस लेना' है। अगर कोर्ट सुरक्षा बढ़ाकर हंगामा रोक सकता है, तो वीडियो बंद करने की ज़रूरत किसे है? सुरक्षा चूक की समस्या का हल वीडियो गाइडलाइन नहीं हो सकता — जब तक कि असली मक़सद कुछ और न हो।

आगे क्या? — तीन परिदृश्य

पहला — कोर्ट SCBA की माँग मानकर लाइव-स्ट्रीमिंग पर 'एडिटेड डिले' लगा दे, यानी वीडियो 30 मिनट या एक घंटे बाद सार्वजनिक हो। इससे 'वायरल' तत्व कमज़ोर होगा, लेकिन पारदर्शिता पूरी तरह नहीं मरेगी।

दूसरा — कोर्ट व्यक्तिगत वकीलों और जजों को 'राइट टू डिलीशन' दे दे, जिससे कोई भी अपनी क्लिप हटवा सके। यह खुले कोर्ट के सिद्धांत की हत्या होगी।

तीसरा — और सबसे संभावित — कोर्ट एक 'मीडिया गाइडलाइन' जारी करे जो रिकॉर्डिंग तो जारी रखे लेकिन 'री-यूज़' और 'एडिटिंग' पर पाबंदी लगाए। यह बीच का रास्ता होगा — लेकिन डिजिटल दुनिया में इसे लागू करना लगभग नामुमकिन है।

देखने लायक़ बात यह होगी कि CJI की बेंच इस माँग पर कब और कैसे सुनवाई करती है। अगर सुनवाई ज़ल्दी लिस्ट होती है, तो समझिए कि बार और बेंच के बीच 'ऑफ़-रिकॉर्ड' सहमति पहले ही बन चुकी है। अगर टलती रहती है, तो SCBA का दबाव उतना गहरा नहीं जितना दिख रहा है।

आख़िर में सवाल यह नहीं है कि CJI पर कागज़ किसने फेंके — कोर्ट ने ख़ुद कहा कि वह शख़्स 'विक्षिप्त' था। असली सवाल यह है: क्या भारत का सबसे शक्तिशाली संस्थान एक 'विक्षिप्त' व्यक्ति के बहाने उस खिड़की को बंद करने जा रहा है जो पहली बार 140 करोड़ लोगों को अपनी अदालत के अंदर झाँकने देती है? जवाब जो भी आए — वह सिर्फ़ कोर्टरूम का नहीं, लोकतंत्र की पारदर्शिता का फ़ैसला होगा।

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मुख्य बातें

  • CJI सूर्यकांत पर कागज़ फेंके जाने और गालियाँ दिए जाने के बाद कोर्ट ने याचिकाकर्ता को 'मानसिक रूप से विक्षिप्त' मानकर छोड़ दिया — NDTV रिपोर्ट के अनुसार।
  • SCBA ने कोर्टरूम वीडियो रिकॉर्डिंग पर सख़्त गाइडलाइन की माँग रखी — निशाना 'हंगामा' नहीं, बल्कि लाइव-स्ट्रीमिंग से आई पारदर्शिता पर क़ाबू पाना हो सकता है।
  • 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने ख़ुद लाइव-स्ट्रीमिंग का समर्थन किया था — अब वही पारदर्शिता बार और बेंच दोनों के लिए असुविधाजनक हो रही है।
  • YouTube/Reels एल्गोरिदम ने कोर्टरूम की गंभीर कार्यवाही को 'वायरल कंटेंट' में बदल दिया — यह एक वैध चिंता है, लेकिन इसका हल वीडियो बंद करना नहीं।
  • आने वाले दिनों में CJI बेंच इस माँग पर कब सुनवाई लिस्ट करती है — यही बताएगा कि बार-बेंच 'ऑफ़-रिकॉर्ड' सहमति बनी है या नहीं।

आँकड़ों में

  • 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने स्वतःसंज्ञान मामले में लाइव-स्ट्रीमिंग के पक्ष में आदेश दिया था
  • SCBA ने इस घटना के बाद पहली बार कोर्टरूम वीडियो रिकॉर्डिंग पर व्यापक गाइडलाइन की औपचारिक माँग रखी

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: एक याचिकाकर्ता (जिसे कोर्ट ने 'मानसिक रूप से विक्षिप्त' बताया) ने CJI सूर्यकांत पर हमला किया; SCBA (सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन) ने वीडियो गाइडलाइन माँगी — NDTV रिपोर्ट के अनुसार।
  • क्या: याचिकाकर्ता ने CJI की बेंच पर कागज़ फेंके, अपशब्द कहे; इसके बाद SCBA ने कोर्टरूम वीडियो रिकॉर्डिंग और लाइव-स्ट्रीमिंग पर सख़्त गाइडलाइन की माँग रखी — NDTV के अनुसार।
  • कब: जून 2026 में, सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान — NDTV रिपोर्ट के अनुसार।
  • कहाँ: नई दिल्ली, सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया — NDTV रिपोर्ट के अनुसार।
  • क्यों: SCBA का तर्क है कि कोर्टरूम वीडियो क्लिप सोशल मीडिया पर वायरल होकर न्यायिक मर्यादा और वकीलों की गरिमा को नुक़सान पहुँचाती हैं — NDTV रिपोर्ट के अनुसार।
  • कैसे: कोर्ट ने याचिकाकर्ता को मानसिक स्थिति का हवाला देकर छोड़ दिया; SCBA ने औपचारिक रूप से कोर्ट से वीडियो रिकॉर्डिंग के नियमन पर गाइडलाइन जारी करने की माँग की — NDTV रिपोर्ट के अनुसार।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

सुप्रीम कोर्ट में CJI पर कागज़ किसने फेंके?

NDTV की रिपोर्ट के अनुसार, एक याचिकाकर्ता ने CJI सूर्यकांत की बेंच पर कागज़ फेंके और अपशब्द कहे। कोर्ट ने उसे 'मानसिक रूप से विक्षिप्त' मानकर कोई अवमानना कार्रवाई नहीं की।

SCBA कोर्टरूम वीडियो रिकॉर्डिंग पर गाइडलाइन क्यों माँग रहा है?

SCBA का कहना है कि कोर्टरूम वीडियो सोशल मीडिया पर 'आउट ऑफ़ कॉन्टेक्स्ट' वायरल होकर जजों-वकीलों की गरिमा को नुक़सान पहुँचाते हैं। लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि असली चिंता लाइव-स्ट्रीमिंग से आई सार्वजनिक जवाबदेही है।

क्या सुप्रीम कोर्ट की लाइव-स्ट्रीमिंग बंद होगी?

अभी तक कोर्ट ने लाइव-स्ट्रीमिंग बंद करने का कोई संकेत नहीं दिया है। सबसे संभावित परिदृश्य यह है कि कोर्ट वीडियो के 'री-यूज़' और 'एडिटिंग' पर गाइडलाइन ला सकता है, लेकिन स्ट्रीमिंग पूरी तरह बंद करना 2018 के अपने ही आदेश के ख़िलाफ़ होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने लाइव-स्ट्रीमिंग कब शुरू की?

सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में एक स्वतःसंज्ञान मामले में लाइव-स्ट्रीमिंग के पक्ष में सैद्धांतिक आदेश दिया। संवैधानिक बेंच की कार्यवाही की लाइव-स्ट्रीमिंग चरणबद्ध तरीक़े से शुरू हुई।

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