पश्चिम बंगाल कैबिनेट ने एक उच्चस्तरीय समिति बनाई है जो ड्राफ़्ट UCC बिल की समीक्षा करेगी। NDTV के अनुसार समिति की अगुवाई एक रिटायर्ड सुप्रीम कोर्ट जज करेंगे। यह कदम केंद्र सरकार के UCC के ख़िलाफ़ विपक्षी राज्यों का सबसे ठोस जवाब माना जा रहा है — और संवैधानिक टकराव की ज़मीन तैयार कर रहा है।

दो अलग-अलग देश नहीं हैं, एक ही भारत है — लेकिन अगर दो अलग-अलग यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड लागू हो गए, तो एक ही देश में दो समानांतर क़ानूनी ब्रह्मांड चलेंगे। यही वह सवाल है जो पश्चिम बंगाल कैबिनेट के ताज़ा फ़ैसले के बाद हिंदी बेल्ट के हर उस नागरिक को सताना चाहिए जो सोचता है कि UCC का मतलब सिर्फ़ 'एक देश, एक क़ानून' है।

The Hindu की रिपोर्ट के मुताबिक़ बंगाल कैबिनेट ने एक उच्चस्तरीय समिति को मंज़ूरी दी है जो ड्राफ़्ट UCC बिल की समीक्षा करेगी। NDTV के अनुसार इस समिति की अगुवाई एक रिटायर्ड सुप्रीम कोर्ट जज करेंगे और इसमें विधि विशेषज्ञ, समाज के विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधि शामिल होंगे। Telangana Today के अनुसार लक्ष्य अगस्त 2026 तक विधानसभा में बिल पेश करना है — यानी ममता बनर्जी की टीम ने न सिर्फ़ केंद्र के UCC का विरोध करने की बात कही, बल्कि ठोस विधायी काउंटर तैयार करने की रफ़्तार भी पकड़ ली है।

अब ज़रा पीछे चलिए। उत्तराखंड, गुजरात और असम पहले ही केंद्र सरकार के मॉडल पर UCC अपना चुके हैं — ये तीनों BJP शासित राज्य हैं। महाराष्ट्र में भी UCC लागू करने की तैयारी चल रही है। BJP का नैरेटिव साफ़ है: 'समान नागरिक संहिता' संविधान के अनुच्छेद 44 का अधूरा वादा पूरा करना है। लेकिन ममता बनर्जी इसे 'हिंदू कोड बिल 2.0' कहती हैं — उनका आरोप है कि केंद्र का UCC अल्पसंख्यकों के पर्सनल लॉ में सीधा हस्तक्षेप है।

यहाँ असली ट्रिक समझिए। 'यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड' शब्द का इस्तेमाल दोनों पक्ष कर रहे हैं — लेकिन मतलब बिलकुल अलग-अलग है। केंद्र का UCC विवाह, तलाक़, उत्तराधिकार और गोद लेने के क़ानूनों को एक साँचे में ढालना चाहता है, जबकि बंगाल का ड्राफ़्ट — जितना अब तक सामने आया है — पर्सनल लॉ की 'विविधता को सम्मान देते हुए' समानता लाने की बात करता है। The Hindu के अनुसार बंगाल सरकार का तर्क है कि यह 'संघीय ढाँचे' और राज्यों के अधिकार की रक्षा है।

पॉलिटिकल पल्स

सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि ममता का यह क़दम 2029 लोकसभा चुनाव की ज़मीन तैयार करने का सबसे चतुर दांव है। चर्चा है कि INDIA गठबंधन के भीतर केरल के LDF और कर्नाटक की कांग्रेस सरकार भी बंगाल मॉडल को 'टेम्पलेट' की तरह देख रही हैं — अगर ममता का बिल विधानसभा पास कर लेती हैं, तो विपक्षी राज्यों के लिए एक 'रेडीमेड काउंटर-UCC' तैयार हो जाएगा। झारखंड में हेमंत सोरेन सरकार के भी इस राह पर आने की अटकलें ज़ोरों पर हैं। (यह इंडस्ट्री चर्चा और राजनीतिक अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

लेकिन ममता के इस दांव में ख़ुद उनके लिए भी ख़तरा छुपा है। बंगाल में 27% मुस्लिम आबादी है — यह वोट बैंक TMC की रीढ़ है। अगर 'बंगाल UCC' में भी तलाक़, बहुविवाह या उत्तराधिकार के नियम कड़े होते हैं, तो उनके अपने आधार में दरार आ सकती है। और अगर बहुत नरम रखा, तो BJP को 'तुष्टिकरण' का हथियार मिल जाएगा — ठीक वही हथियार जिससे बचने के लिए ममता ने हाल ही में कोलकाता एयरपोर्ट के पास सौ साल पुरानी मस्जिद तोड़ने की इजाज़त दी थी।

इस पूरी बिसात के पीछे की असली चाल को इंडिया हेराल्ड की पॉलिटिकल रीडिंग यूँ डिकोड करती है: यह UCC बनाम UCC की लड़ाई दरअसल 'कंकरंट लिस्ट' बनाम 'यूनियन लिस्ट' की संवैधानिक लड़ाई है। पर्सनल लॉ कंकरंट लिस्ट में आता है — यानी केंद्र और राज्य दोनों क़ानून बना सकते हैं। लेकिन अगर दोनों के क़ानून टकराएँ, तो अनुच्छेद 254 के तहत केंद्र का क़ानून ऊपर रहता है — जब तक राज्य का क़ानून राष्ट्रपति की मंज़ूरी न ले ले। ममता जानती हैं कि NDA सरकार के राष्ट्रपति से यह मंज़ूरी मिलना लगभग असंभव है। तो फिर यह कवायद बेकार है?

बिलकुल नहीं — और यहीं सबसे पैना कोण है। ममता को क़ानूनी जीत नहीं चाहिए, राजनीतिक नैरेटिव चाहिए। अगर बंगाल का UCC बिल विधानसभा पास होता है और राष्ट्रपति रोकते हैं, तो ममता के हाथ में सबसे ताक़तवर हथियार आ जाता है: 'देखो, BJP संघीय ढाँचा तोड़ रही है, राज्यों का अधिकार छीन रही है।' यह नैरेटिव 2029 में दक्षिण और पूर्वी भारत में — जहाँ क्षेत्रीय अस्मिता मज़बूत है — बेहद कारगर हो सकता है।

हिंदी बेल्ट का पाठक अब सोच रहा होगा: मेरे राज्य पर किसका UCC लागू होगा? अगर आप UP, बिहार, MP, राजस्थान या दिल्ली में हैं, तो फ़िलहाल केंद्र का UCC ही लागू होगा — क्योंकि ये BJP शासित राज्य हैं और उन्होंने विरोध नहीं किया। लेकिन अगर कल बिहार में महागठबंधन सत्ता में आता है या MP में कांग्रेस लौटती है, तो 'बंगाल मॉडल' अपनाने का दबाव बनेगा। NDTV के अनुसार यही वजह है कि BJP इस क़दम को 'संवैधानिक अराजकता' बता रही है — उनका डर है कि यह एक ऐसी मिसाल बनेगी जो UCC के पूरे मक़सद को ही बेमानी कर दे।

रिटायर्ड सुप्रीम कोर्ट जज की अगुवाई में समिति बनाना ममता का एक और चतुर क़दम है। इससे बिल को 'राजनीतिक' के बजाय 'न्यायिक विश्वसनीयता' का चोला पहनाया जा रहा है। लेकिन सवाल बना हुआ है — समिति के बाक़ी सदस्य कौन होंगे? क्या इसमें सभी समुदायों की आवाज़ होगी? अभी तक बंगाल सरकार ने पूरी सदस्य सूची सार्वजनिक नहीं की है।

BJP की ओर से अभी तक इस विशिष्ट समिति गठन पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है — हालाँकि पार्टी पहले से केंद्रीय UCC का विरोध करने वाले राज्यों को 'तुष्टिकरण की राजनीति' करने वाला बताती रही है।

आने वाले हफ़्तों में देखने लायक़ यह होगा कि ड्राफ़्ट बिल में तलाक़, बहुविवाह और उत्तराधिकार पर क्या प्रावधान रखे जाते हैं — क्योंकि वहीं पता चलेगा कि यह सचमुच 'समान' है या सिर्फ़ 'समानांतर'। और अगर दो UCC वाला भारत सच में बन गया, तो सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाना तय है — उस दिन जो फ़ैसला आएगा, वह शायद भारतीय संघवाद की सबसे बड़ी परीक्षा होगा।

तो बताइए — एक देश में दो 'यूनिफ़ॉर्म' कोड कैसे 'यूनिफ़ॉर्म' रहेंगे?

यहाँ रिपोर्ट किए गए आरोप नामित स्रोतों को श्रेय दिए गए हैं और जब तक अदालत का फ़ैसला न हो, अप्रमाणित हैं; विचाराधीन मामले बिना पूर्वाग्रह के रिपोर्ट किए गए हैं।

इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।

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मुख्य बातें

  • बंगाल कैबिनेट ने रिटायर्ड सुप्रीम कोर्ट जज की अगुवाई में UCC ड्राफ़्ट बिल समीक्षा समिति बनाई — अगस्त 2026 तक विधानसभा में बिल पेश करने का लक्ष्य (The Hindu, NDTV)।
  • पर्सनल लॉ कंकरंट लिस्ट में है — केंद्र और राज्य दोनों क़ानून बना सकते हैं, लेकिन टकराव होने पर अनुच्छेद 254 के तहत केंद्र का क़ानून ऊपर रहता है जब तक राष्ट्रपति राज्य के क़ानून को मंज़ूरी न दें।
  • ममता का असली लक्ष्य क़ानूनी जीत नहीं, 2029 का नैरेटिव है — 'BJP संघीय ढाँचा तोड़ रही है' यह कहानी क्षेत्रीय दलों के लिए सबसे ताक़तवर हथियार बन सकती है।
  • हिंदी बेल्ट के BJP शासित राज्यों में केंद्र का UCC लागू होगा — लेकिन सत्ता बदलने पर 'बंगाल मॉडल' अपनाने का दबाव बन सकता है।
  • उत्तराखंड, गुजरात और असम पहले ही केंद्रीय मॉडल पर UCC अपना चुके हैं (NDTV)।

आँकड़ों में

  • बंगाल में मुस्लिम आबादी लगभग 27% — यह TMC का सबसे मज़बूत वोट बैंक है और UCC बिल के प्रावधान इसी आधार को प्रभावित करेंगे।
  • 3 BJP शासित राज्य — उत्तराखंड, गुजरात, असम — पहले ही केंद्रीय मॉडल पर UCC लागू कर चुके हैं (NDTV)।
  • अनुच्छेद 254: केंद्र और राज्य के क़ानून टकराने पर केंद्र का क़ानून प्रभावी — जब तक राष्ट्रपति राज्य के क़ानून को मंज़ूरी न दें।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी कैबिनेट ने यह फ़ैसला लिया — समिति की अगुवाई रिटायर्ड सुप्रीम कोर्ट जज करेंगे (NDTV)।
  • क्या: बंगाल सरकार ने ड्राफ़्ट यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड बिल की समीक्षा के लिए उच्चस्तरीय समिति गठित की (The Hindu)।
  • कब: जुलाई 2026 में कैबिनेट ने मंज़ूरी दी, अगस्त 2026 तक विधानसभा में बिल पेश करने का लक्ष्य (Telangana Today)।
  • कहाँ: पश्चिम बंगाल — जो केंद्र के UCC को लागू करने से इनकार करने वाले प्रमुख विपक्षी राज्यों में से एक है।
  • क्यों: केंद्र सरकार के UCC को 'हिंदू बहुसंख्यकवादी' बताते हुए बंगाल अपना 'समावेशी' विकल्प तैयार करना चाहता है — The Hindu के अनुसार यह 'संघीय ढाँचे की रक्षा' का तर्क है।
  • कैसे: कैबिनेट प्रस्ताव से समिति गठित → रिटायर्ड SC जज + विधि विशेषज्ञ + समाज प्रतिनिधि शामिल → ड्राफ़्ट बिल तैयार → विधानसभा में पेश → संभावित संवैधानिक चुनौती (NDTV, Telangana Today)।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

बंगाल का UCC बिल केंद्र के UCC से कैसे अलग है?

केंद्र का UCC सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक़, उत्तराधिकार के एक समान नियम चाहता है। बंगाल का प्रस्तावित बिल पर्सनल लॉ की 'विविधता का सम्मान' करते हुए समानता लाने की बात करता है — The Hindu के अनुसार इसे 'संघीय अधिकार की रक्षा' के रूप में पेश किया जा रहा है।

अगर केंद्र और राज्य दोनों UCC बनाएँ तो कौन सा लागू होगा?

पर्सनल लॉ कंकरंट लिस्ट में है, इसलिए दोनों बना सकते हैं। लेकिन अनुच्छेद 254 के तहत टकराव होने पर केंद्र का क़ानून प्रभावी रहता है — जब तक राज्य का क़ानून राष्ट्रपति की मंज़ूरी न ले ले।

हिंदी बेल्ट के राज्यों पर किसका UCC लागू होगा?

फ़िलहाल BJP शासित हिंदी बेल्ट राज्यों (UP, MP, राजस्थान, छत्तीसगढ़) में केंद्र का UCC लागू होगा। लेकिन भविष्य में सत्ता परिवर्तन होने पर 'बंगाल मॉडल' अपनाने का दबाव बन सकता है।

बंगाल UCC समिति में कौन शामिल हैं?

NDTV के अनुसार समिति की अगुवाई एक रिटायर्ड सुप्रीम कोर्ट जज करेंगे। इसमें विधि विशेषज्ञ और समाज के विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधि शामिल होंगे — हालाँकि पूरी सदस्य सूची अभी सार्वजनिक नहीं की गई है।

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