कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद ने मोदी सरकार पर पाकिस्तान और ट्रंप से संबंधों को लेकर सीधा हमला किया है, कहा कि भारत ने अपनी नैतिक साख गँवा दी है। दी प्रिंट की रिपोर्ट के अनुसार, यह बयान कांग्रेस की विदेश नीति केंद्रित नई आक्रामक रणनीति का संकेत माना जा रहा है।

एक पूर्व विदेश मंत्री जब खुलकर कहे कि देश ने अपनी नैतिक साख गँवा दी है, तो यह महज़ विपक्षी तंज़ नहीं — यह एक गणना है। सलमान खुर्शीद ने मोदी सरकार की विदेश नीति पर जो हमला बोला है, वह कांग्रेस के पुराने 'महँगाई-बेरोज़गारी' वाले हथियारों से बिलकुल अलग है। दी प्रिंट की रिपोर्ट के अनुसार, खुर्शीद ने साफ़ कहा कि पाकिस्तान से लेकर ट्रंप तक — मोदी की विदेश नीति ने भारत को वह 'मोरल अथॉरिटी' खो दिया है जो दशकों में कमाई गई थी।

यह बयान अकेला नहीं है। पिछले कुछ महीनों में कांग्रेस ने धीरे-धीरे अपनी आक्रामकता का रुख़ बदला है — घरेलू मुद्दों से हटकर मोदी की उस छवि पर सीधा निशाना साधा है जिसे बीजेपी अपनी सबसे मज़बूत ढाल मानती है: 'विश्वगुरु', 'ग्लोबल लीडर', '56 इंच'। सवाल यह है कि क्या यह कोई अचानक का फ़ैसला है, या पर्दे के पीछे एक सोची-समझी रणनीति काम कर रही है?

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पाकिस्तान और ट्रंप — दो ऐसे नाम जो मोदी की ताक़त भी हैं और कमज़ोरी भी

खुर्शीद ने जो दो बिंदु उठाए हैं — पाकिस्तान और ट्रंप — वे संयोग से नहीं चुने गए। बीजेपी ने 2019 से लेकर अब तक पाकिस्तान को 'कड़ा जवाब' देने की कहानी पर भरपूर वोट बटोरे हैं। सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट हर चुनावी रैली की ओपनिंग लाइन रहे हैं। लेकिन खुर्शीद का तर्क उलटा है — उनका कहना है कि तनाव बढ़ाना कूटनीतिक सफलता नहीं, विफलता है। जब कोई पूर्व विदेश मंत्री यह कहे, तो बात में एक वज़न आ जाता है जो किसी सामान्य विपक्षी नेता के बयान में नहीं होता।

दूसरा निशाना और भी दिलचस्प है — ट्रंप। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ मोदी की 'दोस्ती' को बीजेपी ने हमेशा कूटनीतिक मास्टरस्ट्रोक की तरह पेश किया है। हाउडी मोदी से लेकर ट्रंप के भारत दौरे तक — यह नैरेटिव था कि मोदी ने अमेरिका को 'अपनी जेब में' रख लिया है। लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त? ट्रंप ने व्यापार पर भारत को कई बार झटका दिया है, H-1B वीज़ा पर भारतीय प्रोफ़ेशनल्स की मुश्किलें बढ़ी हैं, और कश्मीर पर 'मध्यस्थता' की पेशकश से भारत सरकार ख़ुद असहज हुई थी। रॉयटर्स और पीटीआई की विभिन्न रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत-अमेरिका व्यापार तनाव पिछले वर्षों में कई बार सतह पर आया है।

पॉलिटिकल पल्स

सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि कांग्रेस ने आख़िरकार वह बात समझ ली है जो उसे 2014 के बाद से समझनी चाहिए थी — मोदी को हराना है तो उनकी ताक़त पर वार करो, कमज़ोरी पर नहीं। महँगाई और बेरोज़गारी पर हमले का असर सीमित रहा क्योंकि मतदाता के मन में एक काउंटर-नैरेटिव पहले से बैठा हुआ था: 'कम से कम दुनिया में तो इज़्ज़त बढ़ी।' अब कांग्रेस उसी इज़्ज़त वाली कहानी में छेद करने की कोशिश कर रही है।

ट्रेड सर्कल और राजनीतिक विश्लेषकों के बीच चर्चा है कि खुर्शीद को आगे रखना भी एक सोचा-समझा दाँव है। वे पूर्व विदेश मंत्री हैं — उनके मुँह से विदेश नीति की आलोचना में एक संस्थागत भरोसा होता है जो राहुल गाँधी या प्रियंका गाँधी के बयान में उस तरह नहीं आता। यह वैसा ही है जैसे क्रिकेट में नई गेंद का पहला ओवर अनुभवी तेज़ गेंदबाज़ को दिया जाता है — स्विंग तभी मिलती है जब हाथ में अनुभव हो।

(यह खंड राजनीतिक गलियारों की चर्चा और विश्लेषकों के अनुमानों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

'विश्वगुरु' की ढाल में सेंध — यह क्यों अहम है

इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि कांग्रेस की यह शिफ़्ट केवल एक बयान नहीं, बल्कि एक व्यापक 'नैरेटिव शिफ़्ट' का हिस्सा है। पिछले कुछ हफ़्तों में ग़ौर करें — शशि थरूर ने संयुक्त राष्ट्र में भारत की भूमिका पर सवाल उठाए, जयराम रमेश ने चीन सीमा विवाद पर सरकार को घेरा। यह सब अलग-अलग नहीं, एक ही दिशा में जा रहा है: मोदी के 'ग्लोबल स्टेट्समैन' वाले कवच को तोड़ना।

और यहाँ एक गहरी विडंबना है। बीजेपी ने ख़ुद ही विदेश नीति को चुनावी मुद्दा बनाया — 'मोदी है तो मुमकिन है' का एक बड़ा हिस्सा यही था कि दुनिया अब भारत की बात सुनती है। लेकिन जब आप किसी चीज़ को चुनावी दाँव बनाते हैं, तो विपक्ष को भी उसी मैदान में खेलने का हक़ मिल जाता है। खुर्शीद बस वही कर रहे हैं — बीजेपी के अपने बनाए मैदान पर उन्हीं की गेंद से खेल रहे हैं।

आगे क्या देखना है — चुनावी अंकगणित और 2027 की छाया

अगर कांग्रेस यह रणनीति जारी रखती है, तो आने वाले हफ़्तों में कुछ चीज़ें साफ़ होंगी। पहला, क्या राहुल गाँधी ख़ुद इस नैरेटिव को अपनाते हैं या यह केवल 'सीनियर लीडर्स की ड्यूटी' बनकर रह जाता है — क्योंकि असली असर तभी आएगा जब पार्टी प्रमुख ख़ुद इसे लेकर मैदान में उतरें। दूसरा, बीजेपी की काउंटर-स्ट्रैटेजी क्या होगी — क्या वे खुर्शीद को 'पाकिस्तान का वकील' बताकर ख़ारिज करेंगे (जो उनका पुराना फ़ॉर्मूला रहा है), या इस बार कोई नई लाइन लेंगे?

तीसरा और सबसे अहम — 2027 के आम चुनाव अब दूर नहीं हैं। अगर कांग्रेस सच में विदेश नीति को चुनावी मुद्दा बनाने में सफल हो गई, तो यह भारतीय चुनावी इतिहास में एक बड़ा बदलाव होगा। आमतौर पर भारत में विदेश नीति वोट नहीं देती — रोटी, कपड़ा, मकान देता है। लेकिन मोदी ने ख़ुद इस समीकरण को बदला है, और अब वही बदलाव उनके ख़िलाफ़ इस्तेमाल हो सकता है।

असली सवाल यह नहीं है कि खुर्शीद सही हैं या ग़लत। असली सवाल यह है: क्या भारतीय मतदाता, जो 'विश्वगुरु' की तस्वीर देखकर गर्व महसूस करता रहा है, अब उस तस्वीर के पीछे की दरारें भी देखने को तैयार है? अगर हाँ, तो कांग्रेस ने शायद अपनी सबसे समझदारी भरी चाल चली है। अगर नहीं, तो यह एक और बयानबाज़ी बनकर रह जाएगी — और मोदी की ढाल पहले से ज़्यादा मज़बूत दिखेगी।

यहाँ रिपोर्ट किए गए आरोप नामित स्रोतों को श्रेय दिए गए हैं और जब तक किसी न्यायालय ने निर्णय नहीं दिया है, अप्रमाणित हैं; न्यायालय में विचाराधीन मामलों की रिपोर्ट बिना पूर्वाग्रह के की गई है।

इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।

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मुख्य बातें

  • सलमान खुर्शीद ने पाकिस्तान और ट्रंप का हवाला देकर मोदी की विदेश नीति को भारत की नैतिक साख खोने का कारण बताया — दी प्रिंट रिपोर्ट
  • कांग्रेस की रणनीति में बड़ा बदलाव: घरेलू मुद्दों से हटकर अब मोदी की 'ग्लोबल लीडर' छवि को सीधे निशाने पर लिया जा रहा है
  • खुर्शीद को आगे रखना एक गणित है — पूर्व विदेश मंत्री की आलोचना में संस्थागत भरोसा होता है जो अन्य नेताओं के बयानों में नहीं
  • 2027 आम चुनाव से पहले यह देखना अहम होगा कि क्या राहुल गाँधी ख़ुद इस नैरेटिव को अपनाते हैं या यह सीनियर लीडर्स तक सीमित रहता है
  • बीजेपी ने ख़ुद विदेश नीति को चुनावी दाँव बनाया — अब वही मैदान विपक्ष के हमले के लिए खुल गया है

आँकड़ों में

  • कांग्रेस के पूर्व विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने 2026 में मोदी की विदेश नीति पर 'मोरल अथॉरिटी खोने' का आरोप लगाया — दी प्रिंट
  • भारत-अमेरिका व्यापार तनाव पिछले वर्षों में कई बार सतह पर आया है — रॉयटर्स और पीटीआई रिपोर्ट्स

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद
  • क्या: मोदी सरकार की विदेश नीति पर सीधा हमला — कहा कि पाकिस्तान से लेकर ट्रंप तक भारत ने अपना 'मोरल अथॉरिटी' (नैतिक अधिकार) खो दिया है
  • कब: जून 2026 में दिया गया बयान
  • कहाँ: भारत — राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य
  • क्यों: खुर्शीद के अनुसार, मोदी सरकार की विदेश नीति ने भारत की वैश्विक साख को कमज़ोर किया है; विपक्ष अब इसी कमज़ोर कड़ी को निशाना बना रहा है
  • कैसे: खुर्शीद ने पाकिस्तान के साथ सैन्य तनाव और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के साथ रिश्तों के उदाहरण देकर सरकार की आलोचना की — दी प्रिंट की रिपोर्ट के अनुसार

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

सलमान खुर्शीद ने मोदी की विदेश नीति पर क्या कहा?

दी प्रिंट की रिपोर्ट के अनुसार, खुर्शीद ने कहा कि पाकिस्तान से लेकर ट्रंप तक मोदी की विदेश नीति ने भारत को अपनी 'मोरल अथॉरिटी' यानी नैतिक साख खो दी है।

कांग्रेस ने विदेश नीति को निशाना क्यों बनाया?

विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस ने अब मोदी की सबसे मज़बूत छवि — 'ग्लोबल लीडर' — को टारगेट करने की रणनीति अपनाई है, क्योंकि घरेलू मुद्दों पर हमले का असर सीमित रहा है।

क्या विदेश नीति भारतीय चुनावों में मुद्दा बन सकती है?

आमतौर पर भारत में विदेश नीति वोट नहीं देती, लेकिन मोदी सरकार ने ख़ुद इसे चुनावी दाँव बनाया है। 2027 आम चुनाव से पहले यह देखना अहम होगा कि क्या विपक्ष इसे प्रभावी मुद्दा बना पाता है।

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