सोनम वांगचुक ने भूख हड़ताल के 12वें दिन 'चलो संसद' मार्च का ऐलान किया है। लद्दाख को छठी अनुसूची में शामिल करने और राज्य का दर्जा देने की माँग लेकर वे संसद की ओर कूच करेंगे। यह कदम मोदी सरकार के लिए किसान आंदोलन जैसी नई चुनौती खड़ी कर सकता है।
बारह दिन। बिना अन्न के। लद्दाख की बर्फ़ीली हवाओं में पले एक शख़्स का शरीर घुल रहा है, लेकिन उसकी आवाज़ और तेज़ होती जा रही है। सोनम वांगचुक — वही इंजीनियर जिनकी कहानी पर बॉलीवुड ने '3 इडियट्स' का फुंसूक वांगडू गढ़ा — अब 'चलो संसद' का नारा बुलंद कर रहे हैं। सवाल सीधा है: क्या दिल्ली की सत्ता एक भूखे गांधीवादी को संसद के दरवाज़े तक पहुँचने देगी?
वांगचुक की माँग नई नहीं है, लेकिन उसका स्वरूप अब ख़तरनाक रूप से बदल चुका है। 2019 में जब अनुच्छेद 370 हटा और लद्दाख को जम्मू-कश्मीर से अलग कर केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया, तो BJP ने इसे 'विकास का नया अध्याय' बताया। लेकिन लद्दाख के लोगों को न विधानसभा मिली, न छठी अनुसूची का जनजातीय संरक्षण — यानी ज़मीन, नौकरी और पर्यावरण पर फ़ैसले दिल्ली के नौकरशाहों के हाथ में चले गए। रिपोर्ट्स के मुताबिक़ लद्दाख की क़रीब 97% आबादी जनजातीय है, और छठी अनुसूची के बिना उनकी ज़मीन पर बाहरी निवेश और खनन का ख़तरा लगातार बढ़ रहा है।
वांगचुक का यह तीसरा बड़ा विरोध है। 2024 में उन्होंने 'दिल्ली चलो' पदयात्रा निकाली थी जिसमें सैकड़ों लद्दाखी पैदल दिल्ली पहुँचे, लेकिन दिल्ली पुलिस ने सिंघु बॉर्डर पर बैरिकेड लगाकर उन्हें रोक दिया — ठीक वैसे ही जैसे किसान आंदोलन के दौरान हुआ था। उस वक़्त गृह मंत्रालय (MHA) ने 'अनौपचारिक बैठक' की पेशकश की, लेकिन कोई ठोस नतीजा नहीं निकला। अब भूख हड़ताल के 12वें दिन 'चलो संसद' का ऐलान इस बात का सबूत है कि वांगचुक धीरे-धीरे दांव बढ़ा रहे हैं।
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि गृह मंत्रालय इस बार क्लासिक 'थकाओ और तोड़ो' रणनीति पर चल रहा है। एक तरफ़ MHA अधिकारी बातचीत के लिए 'तैयार' दिखते हैं — लेकिन हर बैठक 'अनौपचारिक' रहती है, कोई मिनट्स नहीं, कोई प्रतिबद्धता नहीं। दूसरी तरफ़ दिल्ली पुलिस की तैयारी अलग कहानी कहती है — सूत्रों के मुताबिक़ सिंघु और टीकरी बॉर्डर पर पहले से बैरिकेड्स की योजना बन रही है। (यह इनसाइड सर्कल्स की चर्चा है, पुष्ट सरकारी बयान नहीं।)
लेकिन केंद्र सरकार की असली दुविधा इससे कहीं गहरी है, और इसे इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड साफ़-साफ़ पकड़ रहा है। अगर बल प्रयोग किया — लाठियाँ चलीं, गिरफ़्तारियाँ हुईं — तो वही तस्वीर बनेगी जो 2020-21 में किसान आंदोलन के दौरान बनी थी। एक भूखे, कमज़ोर, गांधीवादी बुज़ुर्ग पर बल प्रयोग की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल होते देर नहीं लगेगी। विपक्ष को मुफ़्त में नैरेटिव मिलेगा। और अगर आने दिया — मार्च को संसद तक पहुँचने दिया — तो मानसून सत्र से ठीक पहले संसद के बाहर एक लद्दाखी 'शाहीन बाग़' खड़ा हो जाएगा।
यही वह चीज़ है जो इस आंदोलन को सिर्फ़ एक भूख हड़ताल से कहीं बड़ा बनाती है। वांगचुक का कोई पार्टी से नाता नहीं है — न कांग्रेस, न AAP, न किसी क्षेत्रीय दल का झंडा। यही उनकी सबसे बड़ी ताक़त है और सरकार की सबसे बड़ी मुश्किल। किसान आंदोलन में सरकार ने BKU और टिकैत परिवार पर 'राजनीतिक एजेंडा' का ठप्पा लगाया — वांगचुक पर यह ठप्पा लगाना मुश्किल है। यह वही शख़्स है जिसने लद्दाख में 'आइस स्तूपा' बनाकर दुनिया का ध्यान खींचा, जिसे रेमन मैग्सेसे पुरस्कार मिला, और जिसकी छवि किसी पॉलिटिशियन की नहीं बल्कि एक इनोवेटर-एक्टिविस्ट की है।
लद्दाख की भौगोलिक संवेदनशीलता भी इस आंदोलन को अलग धरातल देती है। यह सिर्फ़ नागरिक अधिकारों का सवाल नहीं — LAC पर चीन से तनाव के बीच लद्दाख में स्थानीय असंतोष भारत की सुरक्षा स्थिति को भी प्रभावित करता है। सेना की बड़ी तैनाती वाले इलाक़े में स्थानीय आबादी का अलगाव किसी भी रक्षा रणनीतिकार के लिए चिंता का विषय है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि लद्दाख के कई पूर्व सैनिक और उनके परिवार भी वांगचुक के समर्थन में खड़े हैं — यह वह बात है जो दिल्ली के लिए सबसे असहज करने वाली है।
अगला अध्याय — क्या होगा आगे?
आने वाले दिनों में तीन चीज़ें देखने लायक़ हैं। पहला: क्या वांगचुक की सेहत टिकती है — 12 दिन की भूख हड़ताल किसी भी 60+ व्यक्ति के लिए जानलेवा हो सकती है, और अगर मेडिकल इमरजेंसी हुई तो सरकार पर दबाव कई गुना बढ़ जाएगा। दूसरा: दिल्ली पुलिस 'चलो संसद' मार्च को कैसे हैंडल करती है — किसान आंदोलन वाला मॉडल (बॉर्डर पर रोको) अपनाती है या इस बार कोई नई रणनीति आज़माती है। तीसरा: विपक्षी दल — ख़ासकर कांग्रेस, AAP और INDIA गठबंधन — कितनी तेज़ी से इस मुद्दे पर कूदते हैं। अभी तक वांगचुक ने किसी पार्टी का साथ नहीं लिया, लेकिन संसद सत्र से पहले विपक्ष के लिए यह सोने की खदान है।
एक बात और। 2019 में जब अनुच्छेद 370 हटा, तो BJP ने लद्दाख को 'मुक्ति' बताया — कश्मीर की राजनीति से आज़ादी। सात साल बाद वही लद्दाख कह रहा है कि उसे एक और तरह की ग़ुलामी मिली — दिल्ली के बाबुओं की। यह वह विडंबना है जिसे सत्ता पक्ष अनदेखा करता रहा, और अब वांगचुक इसे संसद के दरवाज़े तक ले जाने को तैयार हैं।
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असली सवाल यह नहीं है कि वांगचुक संसद पहुँच पाएँगे या नहीं। असली सवाल यह है: क्या एक भूखा, निहत्था, अपार्टीसन गांधीवादी उस सत्ता को झुका सकता है जिसने 370 हटाने को अपनी सबसे बड़ी विरासत बताया? और अगर नहीं झुकी — तो लद्दाख का यह धीमा ग़ुस्सा कब ज्वालामुखी बनेगा?
आरोप और दावे संबंधित स्रोतों के अनुसार हैं और जब तक न्यायालय निर्णय न दे, अप्रमाणित रहते हैं; न्यायाधीन मामलों की रिपोर्टिंग बिना पूर्वाग्रह की गई है।
इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।
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मुख्य बातें
- सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल 12वें दिन में — अब 'चलो संसद' मार्च का ऐलान, लद्दाख को छठी अनुसूची और पूर्ण राज्य का दर्जा देने की माँग।
- केंद्र सरकार की दुविधा: बल प्रयोग करे तो किसान आंदोलन जैसा नैरेटिव बनेगा, न रोके तो संसद सत्र से पहले बड़ा बवाल।
- वांगचुक की अपार्टीसन छवि सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती — 'राजनीतिक एजेंडा' का आरोप लगाना मुश्किल।
- LAC पर चीन से तनाव के बीच लद्दाख में स्थानीय असंतोष सुरक्षा के लिहाज़ से भी संवेदनशील।
- विपक्ष के लिए मानसून सत्र से पहले यह मुद्दा 'सोने की खदान' — INDIA गठबंधन की भूमिका निर्णायक होगी।
आँकड़ों में
- लद्दाख की क़रीब 97% आबादी जनजातीय — छठी अनुसूची के बिना ज़मीन और रोज़गार पर बाहरी दख़ल का ख़तरा
- 2024 में 'दिल्ली चलो' पदयात्रा को सिंघु बॉर्डर पर रोका गया — MHA की 'अनौपचारिक' बैठकों से कोई नतीजा नहीं निकला
- भूख हड़ताल 12वें दिन में — 60+ उम्र के व्यक्ति के लिए मेडिकल रिस्क गंभीर
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: लद्दाखी एक्टिविस्ट और इंजीनियर सोनम वांगचुक, जो Climate Justice People (CJP) अभियान का नेतृत्व कर रहे हैं।
- क्या: भूख हड़ताल के 12वें दिन 'चलो संसद' मार्च का ऐलान — लद्दाख को छठी अनुसूची में शामिल करने और पूर्ण राज्य का दर्जा देने की माँग।
- कब: जुलाई 2026 — भूख हड़ताल 12वें दिन में प्रवेश कर चुकी है, चलो संसद मार्च की तिथि जल्द घोषित होने की उम्मीद।
- कहाँ: दिल्ली — संसद भवन की ओर मार्च की योजना; लद्दाख से समर्थक जुटने की ख़बरें।
- क्यों: 2019 में अनुच्छेद 370 हटाने के बाद लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया लेकिन विधानसभा और छठी अनुसूची का संरक्षण नहीं मिला — स्थानीय आबादी ज़मीन, नौकरी और पर्यावरण पर नियंत्रण खोने से भयभीत है।
- कैसे: वांगचुक ने पहले भी 2024 में 'दिल्ली चलो' पदयात्रा निकाली थी जिसे दिल्ली पुलिस ने रोका — इस बार भूख हड़ताल को एस्केलेट कर सीधे संसद तक मार्च का दबाव बनाया जा रहा है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
सोनम वांगचुक कौन हैं और उनकी माँग क्या है?
सोनम वांगचुक लद्दाखी इंजीनियर और एक्टिविस्ट हैं, रेमन मैग्सेसे पुरस्कार विजेता, जिन्होंने 'आइस स्तूपा' प्रोजेक्ट बनाया। उनकी माँग है कि लद्दाख को छठी अनुसूची में शामिल किया जाए और पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाए ताकि स्थानीय आबादी को ज़मीन और रोज़गार पर नियंत्रण मिले।
छठी अनुसूची क्या है और लद्दाख के लिए क्यों ज़रूरी है?
छठी अनुसूची भारतीय संविधान का वह प्रावधान है जो जनजातीय इलाक़ों को स्वायत्त ज़िला परिषदों के ज़रिए ज़मीन, जंगल और स्थानीय शासन पर विशेष अधिकार देता है। लद्दाख की 97% आबादी जनजातीय होने के बावजूद यह संरक्षण नहीं मिला है।
क्या यह किसान आंदोलन जैसा बन सकता है?
समानताएँ साफ़ हैं — लंबी भूख हड़ताल, दिल्ली मार्च, बॉर्डर पर रोकने की रणनीति। लेकिन फ़र्क़ यह है कि वांगचुक अपार्टीसन हैं और LAC पर चीन से तनाव के कारण लद्दाख की सुरक्षा संवेदनशीलता इसे अलग धरातल देती है।
केंद्र सरकार ने अभी तक क्या जवाब दिया है?
गृह मंत्रालय ने 'अनौपचारिक' बैठकों की पेशकश की है लेकिन कोई ठोस प्रतिबद्धता या आधिकारिक बयान अभी तक सामने नहीं आया है। इस रिपोर्ट तक सरकार की ओर से 'चलो संसद' मार्च पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।



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