बिहार में 40 से 60 और झारखंड में 14 से 28 लोकसभा सीटें बढ़ाने का परिसीमन ड्राफ्ट तैयार हो रहा है। दैनिक भास्कर के अनुसार बिहार की 10 मौजूदा सीटों को 30 हिस्सों में बांटा जाएगा। यह बदलाव NDA और RJD दोनों के लिए दांव बदल देगा।
बीस नए सांसद। दस पुरानी सीटों के तीस टुकड़े। एक ड्राफ्ट जो बिहार का पूरा सियासी नक्शा फिर से खींचने जा रहा है — और इसके साथ तेजस्वी यादव, नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी तीनों की गणित किताब भी।
दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार परिसीमन आयोग के प्रस्तावित ड्राफ्ट में बिहार की लोकसभा सीटें 40 से बढ़ाकर 60 और झारखंड की 14 से बढ़ाकर 28 करने की तैयारी है। बिहार की 10 मौजूदा सीटों को 30 हिस्सों में विभाजित किया जाएगा — यानी हर पुरानी सीट औसतन तीन नई सीटों में बदलेगी। यह महज़ अंकगणित नहीं, यह सीधे-सीधे सत्ता का पुनर्वितरण है।
ज़रा सोचिए — आज बिहार में एक लोकसभा सीट पर औसतन 20-22 लाख वोटर हैं। सीटें बढ़ने के बाद यह संख्या 13-15 लाख के आसपास आ जाएगी। छोटा निर्वाचन क्षेत्र मतलब ज़मीनी कार्यकर्ता का दबदबा, जातीय समीकरण का और तीखा होना, और बूथ-स्तरीय मैनेजमेंट की अहमियत कई गुना बढ़ जाना। यही वह जगह है जहाँ असली खेल शुरू होता है।
NDA की गणित: 'लव-कुश' और अति पिछड़ा कार्ड
बिहार में BJP-JDU गठबंधन का सबसे मज़बूत हथियार रहा है जातीय इंजीनियरिंग। नीतीश कुमार ने 'अति पिछड़ा' वोटबैंक को JDU का कोर बनाया, जबकि BJP ने उत्तर बिहार के भूमिहार-राजपूत और EBC (अत्यंत पिछड़ा वर्ग) में सेंध लगाई। सीटें बढ़ने से NDA को एक बड़ा फायदा यह होगा कि कोसी, मिथिला और तिरहुत — जहाँ जनसंख्या घनत्व सबसे ज़्यादा है — वहाँ नई सीटों की संख्या अनुपात में सबसे अधिक होगी। रिपोर्ट्स के मुताबिक इन क्षेत्रों में BJP-JDU की संगठनात्मक पकड़ मज़बूत मानी जाती है।
BJP के लिए एक और अनकहा लाभ है — नई सीटें बनने से SC/ST आरक्षित सीटों की संख्या भी बढ़ेगी। बिहार में फिलहाल 6 SC और 0 ST आरक्षित सीटें हैं। 60 सीटों पर यह संख्या 9-10 SC सीटों तक जा सकती है। BJP ने पिछले दो चुनावों में SC वोटबैंक पर ज़बरदस्त मेहनत की है — नए आरक्षित क्षेत्र उनके लिए 'बोनस सीट' की तरह काम कर सकते हैं।
तेजस्वी का 'MY-BAAP' और मगध का सवाल
लेकिन इसका दूसरा पहलू भी उतना ही दिलचस्प है। तेजस्वी यादव की RJD का 'MY-BAAP' (मुस्लिम-यादव-बेहद पिछड़ा-अनुसूचित जाति-प्रगतिशील) समीकरण मगध और सीमांचल में गहरी जड़ें रखता है। दैनिक भास्कर की रिपोर्ट बताती है कि मगध क्षेत्र की कई बड़ी सीटें टूटकर छोटी होंगी — गया, नवादा, जहानाबाद जैसी सीटें जहाँ यादव-मुस्लिम वोट कंसंट्रेटेड है, वहाँ विभाजन RJD के लिए नई सीटों पर भी अपना प्रभाव बनाए रखने का मौका दे सकता है।
सीमांचल की कहानी और भी पेचीदा है। किशनगंज, अररिया, पूर्णिया — जहाँ मुस्लिम आबादी का घनत्व बिहार में सबसे अधिक है — वहाँ सीट विभाजन AIMIM और ओवैसी फैक्टर को फिर से ज़िंदा कर सकता है। 2024 के आम चुनावों में ओवैसी की पार्टी ने यहाँ कुछ सीटों पर अच्छा प्रदर्शन किया था। नई छोटी सीटों पर कंसंट्रेटेड मुस्लिम वोट एक तीसरे खिलाड़ी को और ताकतवर बना सकता है — जो RJD और NDA दोनों की नींद उड़ा सकता है।
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि परिसीमन का यह ड्राफ्ट 'संयोग' नहीं है — इसकी टाइमिंग 2029 के आम चुनावों से ठीक पहले रखी गई है। दिल्ली के एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक का मानना है कि "दक्षिण बनाम उत्तर" का यह पूरा डिबेट BJP के लिए डबल बोनांज़ा है — एक तरफ उत्तर भारत में सीटें बढ़ेंगी जहाँ BJP मज़बूत है, दूसरी तरफ दक्षिणी राज्यों में "हमारी सीटें छिनीं" का नैरेटिव DMK और BRS जैसी पार्टियों को कमज़ोर करेगा।
बिहार की ज़मीनी हकीकत से जुड़े लोग बताते हैं कि JDU के भीतर भी बेचैनी है — अगर 60 सीटों पर NDA का बंटवारा 35-25 (BJP-JDU) या 40-20 हुआ तो नीतीश कुमार की पार्टी "जूनियर पार्टनर" से "बहुत जूनियर पार्टनर" बन जाएगी। यही वह बिंदु है जहाँ परिसीमन एक संवैधानिक प्रक्रिया से बदलकर सीट-शेयरिंग की बारूद बन सकता है।
(यह राजनीतिक हलकों में चल रही चर्चा और विश्लेषण पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
झारखंड: आदिवासी राजनीति का नया अध्याय
झारखंड में 14 से 28 सीटें होने का मतलब है कि छोटानागपुर और संथाल परगना के आदिवासी बहुल इलाकों में ST आरक्षित सीटों की संख्या 5 से बढ़कर 9-10 तक जा सकती है। JMM (झारखंड मुक्ति मोर्चा) के लिए यह दोधारी तलवार है — ज़्यादा आदिवासी सीटें मतलब ज़्यादा ज़मीन, लेकिन BJP ने 2024 में आदिवासी वोटर्स में जो सेंध लगाई है, वह नई सीटों पर और गहरी हो सकती है।
इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि परिसीमन का यह ड्राफ्ट सिर्फ़ 'जनसंख्या अनुपात' का गणित नहीं — यह 2029 के चुनावी मैदान की ब्लूप्रिंट है। जो पार्टी नए निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को पहले समझेगी, बूथ-लेवल कैडर पहले बिठाएगी, जातीय-धार्मिक माइक्रो-मैपिंग पहले करेगी — वही इस नए गणित का विजेता होगी।
आगे क्या देखना है
अगले कुछ महीनों में तीन चीज़ें तय करेंगी कि यह परिसीमन किसका मास्टरस्ट्रोक बनेगा: पहला — सीट आरक्षण का फ़ॉर्मूला (SC/ST/जनरल का अनुपात); दूसरा — सीटों की भौगोलिक सीमाएँ (कौन-सा गाँव किस सीट में जाएगा, यही असली पावर गेम है); और तीसरा — NDA के भीतर BJP-JDU का सीट बंटवारा। अगर नीतीश को लगा कि उनकी पार्टी को 20 से कम सीटें मिलेंगी, तो 2024 जैसा 'पाला बदल' फिर से संभव है — बिहार की राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता।
तेजस्वी के लिए असली चुनौती यह नहीं कि नई सीटें बनीं — चुनौती यह है कि अपने MY-BAAP गठबंधन को 40 सीटों के बजाय 60 सीटों पर फैलाना होगा। और फैलाव में ही समीकरण टूटते हैं। RJD को अगर 2029 में प्रासंगिक रहना है तो उसे कोसी-मिथिला में नई ज़मीन तोड़नी होगी — वरना 20 नई सीटें NDA की झोली में चुपचाप गिर जाएंगी।
परिसीमन का नक्शा तो बदलेगा — सवाल यह है कि जब नक्शा बदलेगा, तो बिहार की जनता का नक्शा किसकी तरफ़ मुड़ेगा?
आरोप और अभिकथन यहाँ नामित स्रोतों के हवाले से प्रस्तुत हैं और जब तक न्यायालय का निर्णय न हो, अप्रमाणित हैं; न्यायाधीन मामलों की रिपोर्टिंग बिना पूर्वाग्रह के की गई है।
इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।
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मुख्य बातें
- बिहार में लोकसभा सीटें 40 से 60 और झारखंड में 14 से 28 होने का प्रस्ताव — दैनिक भास्कर के अनुसार 10 मौजूदा सीटें 30 हिस्सों में बंटेंगी
- कोसी-मिथिला में नई सीटों की सबसे अधिक संभावना — यह क्षेत्र NDA का गढ़ माना जाता है, जबकि मगध में विभाजन RJD को नई ज़मीन दे सकता है
- SC/ST आरक्षित सीटों की संख्या बढ़ेगी — BJP के SC वोटबैंक और झारखंड में आदिवासी सीटों पर सीधा असर
- NDA के भीतर BJP-JDU सीट बंटवारा सबसे बड़ा अनदेखा विस्फोटक — JDU को 'बहुत जूनियर पार्टनर' बनने का डर
- सीमांचल में मुस्लिम बहुल नई सीटें AIMIM जैसी तीसरी शक्ति को मज़बूत कर सकती हैं — RJD और NDA दोनों के लिए ख़तरा
आँकड़ों में
- बिहार: 40 से 60 लोकसभा सीटें — 20 नए सांसद बढ़ेंगे (दैनिक भास्कर)
- झारखंड: 14 से 28 लोकसभा सीटें — सीटें दोगुनी होंगी
- 10 मौजूदा बड़ी सीटों को 30 भागों में विभाजित करने का प्रस्तावित फॉर्मूला
- प्रति सीट वोटर औसत 20-22 लाख से घटकर 13-15 लाख होने का अनुमान
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: परिसीमन आयोग, बिहार-झारखंड की मौजूदा लोकसभा सीटें, NDA (BJP-JDU), RJD (तेजस्वी यादव)
- क्या: बिहार में 20 नई लोकसभा सीटें (40 से 60) और झारखंड में 14 नई सीटें (14 से 28) बनाने का प्रस्तावित ड्राफ्ट
- कब: 2026 में परिसीमन ड्राफ्ट की तैयारी, अगले आम चुनावों से पहले लागू होने की संभावना
- कहाँ: बिहार और झारखंड — विशेषकर कोसी, मिथिला, मगध, छोटानागपुर, संथाल परगना क्षेत्र
- क्यों: 2001 की जनगणना के बाद जनसंख्या अनुपात बदला, दक्षिण भारत की तुलना में उत्तर भारत को अधिक प्रतिनिधित्व देने के लिए सीटें बढ़ाई जा रही हैं — दैनिक भास्कर के अनुसार
- कैसे: मौजूदा बड़ी सीटों को जनसंख्या अनुपात में विभाजित कर नई सीटें बनाई जाएंगी — 10 सीटों को 30 भागों में बांटने का फॉर्मूला प्रस्तावित है
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
बिहार में परिसीमन से कितनी नई लोकसभा सीटें बनेंगी?
दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार बिहार में 40 से बढ़ाकर 60 लोकसभा सीटें प्रस्तावित हैं — यानी 20 नए सांसद बढ़ेंगे। 10 मौजूदा बड़ी सीटों को 30 हिस्सों में बांटा जाएगा।
झारखंड में कितनी लोकसभा सीटें बढ़ेंगी?
झारखंड में मौजूदा 14 लोकसभा सीटें बढ़ाकर 28 करने का प्रस्ताव है — सीटें दोगुनी होंगी, जिसमें ST आरक्षित सीटों की संख्या भी बढ़ने की संभावना है।
परिसीमन से BJP और RJD में किसे ज़्यादा फायदा होगा?
कोसी-मिथिला जैसे NDA गढ़ में नई सीटें BJP-JDU को फायदा दे सकती हैं, जबकि मगध में RJD का यादव-मुस्लिम वोटबैंक नई सीटों पर भी प्रभावी रह सकता है। असली तस्वीर सीट सीमाओं और आरक्षण फॉर्मूले पर निर्भर करेगी।
परिसीमन कब तक लागू होगा?
2026 में ड्राफ्ट तैयारी के दौर में है। 2029 के आम चुनावों से पहले लागू होने की संभावना जताई जा रही है, हालाँकि अंतिम अधिसूचना की तारीख अभी तय नहीं है।




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