उत्तराखंड का UCC ड्राफ्ट सिर्फ़ राज्य-स्तरीय सुधार नहीं, बल्कि 2029 लोकसभा चुनाव के लिए बीजेपी की 'नेशनल टेस्टिंग लैब' है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की फाइल में लिव-इन रजिस्ट्रेशन, उत्तराधिकार समानता और बहुविवाह प्रतिबंध — तीन ऐसे प्रावधान हैं जो विपक्ष को चारों ओर से घेरने की रणनीति तैयार करते हैं।

एक छोटा-सा पहाड़ी राज्य, जिसकी आबादी दिल्ली के एक ज़िले से भी कम है — वह आज पूरे हिंदुस्तान की सियासी बिसात पर वह मोहरा बन चुका है जिसे हिलाने से पहले हर पार्टी दस बार सोचेगी। उत्तराखंड का समान नागरिक संहिता (UCC) ड्राफ्ट सिर्फ़ एक क़ानूनी दस्तावेज़ नहीं रहा — यह 2029 के लोकसभा चुनाव की वह ज़मीन है जहाँ बीजेपी विपक्ष को लड़ने के लिए मजबूर करना चाहती है।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने News18 को दिए अपने इंटरव्यू में इस ड्राफ्ट को 'समानता और न्याय का ऐतिहासिक दस्तावेज़' बताया। उन्होंने कहा कि यह संविधान के अनुच्छेद 44 के निर्देशक सिद्धांत को ज़मीन पर उतारने का पहला गंभीर प्रयास है। सतह पर यह बात बिलकुल सही है। लेकिन सतह के नीचे जो खेल चल रहा है, उसे समझने के लिए ड्राफ्ट के तीन अहम पेंचों को बारीकी से देखना ज़रूरी है।

पेंच नंबर एक: लिव-इन रजिस्ट्रेशन — नैतिकता की लड़ाई में विपक्ष को फँसाने का जाल

उत्तराखंड UCC ड्राफ्ट में लिव-इन रिलेशनशिप को अनिवार्य रूप से रजिस्टर कराने का प्रावधान है। बीजेपी ने इसे 'महिला सुरक्षा' के फ्रेम में रखा है — अगर कोई पुरुष बिना रजिस्ट्रेशन के लिव-इन में रहता है और फिर छोड़कर भाग जाता है, तो महिला के पास क़ानूनी अधिकार होंगे। ऊपर से यह प्रगतिशील लगता है। लेकिन असली सियासी गणित यह है: विपक्ष इसका विरोध करे तो 'महिला-विरोधी', समर्थन करे तो बीजेपी के एजेंडे को वैधता दे। यह क्लासिक 'डबल बाइंड' है जिसमें बीजेपी अपने प्रतिद्वंद्वियों को फँसाने में माहिर हो चुकी है।

पेंच नंबर दो: उत्तराधिकार में लैंगिक समानता — 'सबका हक़' के पीछे का चुनावी हिसाब

ड्राफ्ट में सभी धर्मों में बेटी और बेटे को बराबर उत्तराधिकार देने का प्रावधान है। भारतीय विधि आयोग और सुप्रीम कोर्ट ने कई बार इसकी सिफ़ारिश की है। लेकिन इसका चुनावी असर क्या होगा? हिंदू उत्तराधिकार क़ानून (2005 संशोधन) में यह अधिकार पहले से है, लेकिन मुस्लिम पर्सनल लॉ में बेटियों को बेटों से कम हिस्सा मिलता है। बीजेपी यहाँ सीधे 'मुस्लिम महिलाओं के अधिकार' का चैंपियन बनती है — और कांग्रेस या समाजवादी पार्टी जैसी पार्टियों को या तो इसका समर्थन करना होगा (जिससे उनका 'वोट बैंक' नाराज़ होने का डर) या विरोध (जिससे वे 'महिला-विरोधी' दिखें)। Times of India की एक रिपोर्ट के अनुसार, उत्तराखंड सरकार ने ड्राफ्ट बनाते समय विभिन्न समुदायों से 2.3 लाख से अधिक सुझाव मँगवाए थे — यह संख्या अपने आप में बताती है कि सरकार इसे कितनी गंभीरता से 'जन-भागीदारी' का मुखौटा पहनाना चाहती है।

पेंच नंबर तीन: बहुविवाह पर प्रतिबंध — सबसे तीखा हथियार

ड्राफ्ट में बहुविवाह (पॉलीगैमी) पर पूर्ण प्रतिबंध है। यह प्रावधान सीधे मुस्लिम पर्सनल लॉ को चुनौती देता है, जहाँ चार शादियों की इजाज़त है। बीजेपी ने इसे 'लैंगिक न्याय' का मुद्दा बनाया है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह 2029 में हिंदी बेल्ट के चुनावों में ध्रुवीकरण का सबसे तेज़ औज़ार बन सकता है। AIMPLB (ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड) ने पहले ही इसे 'धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला' बताया है — और बीजेपी को शायद यही प्रतिक्रिया चाहिए थी।

पॉलिटिकल पल्स

सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि धामी का UCC ड्राफ्ट दरअसल केंद्र की 'ड्रेस रिहर्सल' है। दिल्ली के सत्ता गलियारों से लेकर लखनऊ के राजनीतिक ड्राइंग रूम तक चर्चा है कि अगर उत्तराखंड में यह सफल रहा — मतलब अदालत में टिक गया और चुनावी नुक़सान नहीं हुआ — तो 2028-29 तक इसे राष्ट्रीय स्तर पर लाने का ब्लूप्रिंट तैयार है। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने (नाम न छापने की शर्त पर) कथित तौर पर कहा कि 'UCC पर हमारे पास कोई जवाब नहीं है — विरोध करें तो फँसें, समर्थन करें तो अपना बेस खोएँ।' (यह सियासी गलियारों की चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

इस सियासी बिसात के पीछे की असली चाल को इंडिया हेराल्ड ने करीब से देखा है — और तस्वीर यह बनती है कि धामी का UCC ड्राफ्ट असल में तीन काम एक साथ कर रहा है: पहला, बीजेपी को 'सुधारक' पार्टी के रूप में स्थापित करना; दूसरा, विपक्ष को ऐसी ज़मीन पर खींचना जहाँ उसके पास कोई सुरक्षित जवाब नहीं; और तीसरा, 2029 के चुनावी नैरेटिव की नींव रखना।

Indian Express की एक रिपोर्ट के अनुसार, उत्तराखंड उच्च न्यायालय में UCC के ख़िलाफ़ कम से कम 7 याचिकाएँ दायर हो चुकी हैं। इनमें से कई ट्राइबल समुदायों की हैं जो अपनी पारंपरिक रीति-रिवाजों पर असर की आशंका जता रहे हैं। यह बीजेपी के लिए असली परीक्षा है — अगर अदालत ने ड्राफ्ट के किसी अहम हिस्से को रद्द कर दिया, तो राष्ट्रीय स्तर पर इसे लाने का पूरा प्रोजेक्ट ही ख़तरे में पड़ सकता है।

लेकिन अगर अदालत ने इसे बरक़रार रखा? तब देखिए — बीजेपी के पास 2029 में अयोध्या राम मंदिर, अनुच्छेद 370 हटाने, और तीन तलाक़ के बाद चौथा 'मिशन कंप्लीट' होगा। और विपक्ष? विपक्ष अभी तक यह तय नहीं कर पाया है कि UCC पर उसका आधिकारिक रुख़ क्या है — कांग्रेस 'हम भी UCC चाहते हैं लेकिन अभी नहीं' कह रही है, AIMIM का विरोध है, और समाजवादी पार्टी चुप है। यह असमंजस ही बीजेपी की सबसे बड़ी ताक़त है।

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आगे की राह और भी दिलचस्प है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 के उत्तराखंड विधानसभा चुनाव UCC का पहला असली 'रिज़ल्ट कार्ड' होंगे। अगर धामी इस चुनाव में UCC को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि बताकर जीत गए, तो केंद्र सरकार के लिए इसे राष्ट्रीय स्तर पर लाने का रास्ता साफ़ हो जाएगा। अगर हारे, तो ड्राफ्ट ठंडे बस्ते में। उत्तराखंड आज सिर्फ़ UCC नहीं बना रहा — वह 2029 की चुनावी थीसिस का पहला पेपर लिख रहा है।

आख़िर में सवाल यह नहीं है कि UCC सही है या ग़लत — सवाल यह है कि एक दस्तावेज़ जो 'सबके लिए एक क़ानून' का वादा करता है, वह किसकी सियासी ज़रूरत ज़्यादा पूरी कर रहा है — नागरिक की, या पार्टी की?

आरोपों और अभियोजन सम्बन्धी सूचनाएँ यहाँ नामित स्रोतों से ली गई हैं और जब तक न्यायालय का निर्णय न हो, अप्रमाणित मानी जाएँगी; विचाराधीन मामलों की रिपोर्टिंग बिना पूर्वाग्रह के की गई है।

इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।

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मुख्य बातें

  • उत्तराखंड UCC ड्राफ्ट में लिव-इन रजिस्ट्रेशन, उत्तराधिकार समानता और बहुविवाह प्रतिबंध — ये तीन प्रावधान विपक्ष को 'डबल बाइंड' में फँसाने की रणनीति हैं।
  • 2.3 लाख से अधिक सार्वजनिक सुझाव मँगवाए गए — बीजेपी ने इसे 'जन-भागीदारी' का चेहरा दिया है।
  • उत्तराखंड उच्च न्यायालय में कम से कम 7 याचिकाएँ दायर — अदालती फ़ैसला तय करेगा कि राष्ट्रीय UCC का रास्ता खुलेगा या बंद होगा।
  • 2027 का उत्तराखंड विधानसभा चुनाव UCC का पहला असली 'रिज़ल्ट कार्ड' होगा।
  • विपक्ष का असमंजस — कांग्रेस का 'अभी नहीं', AIMIM का विरोध, सपा की चुप्पी — बीजेपी की सबसे बड़ी ताक़त है।

आँकड़ों में

  • उत्तराखंड सरकार ने UCC ड्राफ्ट के लिए 2.3 लाख से अधिक सार्वजनिक सुझाव प्राप्त किए — Times of India के अनुसार।
  • उत्तराखंड उच्च न्यायालय में UCC के ख़िलाफ़ कम से कम 7 याचिकाएँ दायर — Indian Express के अनुसार।
  • बीजेपी के 2029 तक चार 'मिशन कंप्लीट' — राम मंदिर, अनुच्छेद 370, तीन तलाक़, और अब UCC।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और बीजेपी की केंद्रीय नेतृत्व टीम।
  • क्या: उत्तराखंड UCC ड्राफ्ट तैयार किया गया है जिसमें लिव-इन रजिस्ट्रेशन, उत्तराधिकार में लैंगिक समानता और बहुविवाह पर प्रतिबंध जैसे प्रावधान शामिल हैं।
  • कब: 2024 में लागू प्रक्रिया शुरू हुई, 2025-26 में ड्राफ्ट को अंतिम रूप दिया जा रहा है — News18 की रिपोर्ट के अनुसार।
  • कहाँ: उत्तराखंड — भारत का पहला राज्य जिसने UCC लागू करने की दिशा में ठोस कदम उठाया।
  • क्यों: बीजेपी का दावा है कि यह संविधान के अनुच्छेद 44 को साकार करने का कदम है; राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह 2029 के लिए राष्ट्रीय नैरेटिव तैयार करने की रणनीति भी है।
  • कैसे: रिटायर्ड जस्टिस रंजना देसाई की अध्यक्षता वाली समिति ने ड्राफ्ट तैयार किया, विधानसभा में पारित हुआ, और अब चरणबद्ध अमल की प्रक्रिया में है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

उत्तराखंड UCC ड्राफ्ट में क्या-क्या प्रावधान हैं?

प्रमुख प्रावधानों में लिव-इन रिलेशनशिप का अनिवार्य रजिस्ट्रेशन, सभी धर्मों में बेटी-बेटे को बराबर उत्तराधिकार, बहुविवाह पर पूर्ण प्रतिबंध, और विवाह-तलाक़ के लिए एक समान क़ानूनी प्रक्रिया शामिल हैं। रिटायर्ड जस्टिस रंजना देसाई की अध्यक्षता वाली समिति ने ड्राफ्ट तैयार किया था।

UCC ड्राफ्ट 2029 के चुनाव में बीजेपी की कैसे मदद कर सकता है?

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, अगर उत्तराखंड में UCC सफलतापूर्वक लागू हुआ और 2027 विधानसभा चुनाव में बीजेपी जीती, तो केंद्र के पास 2029 में राष्ट्रीय UCC लाने का मज़बूत तर्क होगा। इसके तीन प्रावधान विपक्ष को ऐसी स्थिति में रखते हैं जहाँ विरोध भी मुश्किल है और समर्थन भी।

UCC के ख़िलाफ़ अदालत में क्या चुनौतियाँ हैं?

Indian Express के अनुसार, उत्तराखंड उच्च न्यायालय में कम से कम 7 याचिकाएँ दायर हो चुकी हैं, जिनमें ट्राइबल समुदायों की याचिकाएँ भी शामिल हैं जो अपनी पारंपरिक रीतियों पर असर की आशंका जता रहे हैं।

विपक्ष का UCC पर क्या रुख़ है?

विपक्ष असमंजस में है — कांग्रेस 'हम भी UCC चाहते हैं लेकिन अभी नहीं' का रुख़ अपनाए है, AIMIM ने खुला विरोध किया है, AIMPLB ने इसे 'धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला' बताया है, और समाजवादी पार्टी ने अब तक कोई स्पष्ट स्टैंड नहीं लिया है।

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