एनसीपी (एसपी) नेता एकनाथ खडसे ने दिल्ली दौरे की पुष्टि करते हुए कहा कि गृह मंत्री अमित शाह ने उन्हें BJP में लौटने का प्रस्ताव दिया, लेकिन उन्होंने शरद पवार के साथ रहने का फ़ैसला किया। द हिंदू के अनुसार, खडसे ने स्पष्ट किया कि वे पवार के साथ हैं और रहेंगे — यह BJP के लिए उत्तर महाराष्ट्र में बड़ा झटका है।
कल्पना कीजिए — भारत का सबसे ताक़तवर गृह मंत्री ख़ुद फ़ोन करे, दिल्ली बुलाए, और कहे 'घर लौट आओ।' और जवाब मिले — 'नहीं।' एकनाथ खडसे ने यही किया। यह कोई मामूली 'ना' नहीं है; यह महाराष्ट्र की सत्ता-राजनीति की सबसे दिलचस्प पहेलियों में से एक है, और इसकी जड़ें सिर्फ़ वफ़ादारी में नहीं, बल्कि एक पुरानी, गहरी, अनसुलझी रंजिश में गड़ी हैं।
द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, एनसीपी (एसपी) के वरिष्ठ नेता एकनाथ खडसे ने अपने हालिया दिल्ली दौरे की पुष्टि करते हुए बताया कि गृह मंत्री अमित शाह ने उन्हें BJP में वापस लौटने का सीधा प्रस्ताव दिया। लेकिन खडसे ने साफ़ कहा — वे शरद पवार के साथ हैं, और रहेंगे। इस एक वाक्य ने BJP की उत्तर महाराष्ट्र रणनीति में सेंध लगा दी।
अब सवाल यह है — अमित शाह जैसे रणनीतिकार ख़ाली हाथ किसी को दिल्ली नहीं बुलाते। खडसे लेवा-पाटीदार और ओबीसी राजनीति के उत्तर महाराष्ट्र में सबसे बड़े चेहरों में हैं। जलगाँव-नंदुरबार बेल्ट में उनका जनाधार BJP के लिए हमेशा से अहम रहा है। शाह का यह क़दम स्पष्ट करता है कि BJP को इस इलाक़े में ज़मीनी ताक़त की कमी महसूस हो रही है — और खडसे के बिना वह ख़ालीपन भरना मुश्किल है।
फडणवीस फैक्टर — वह ज़ख़्म जो भरा नहीं
खडसे की BJP से विदाई की कहानी 2016 से शुरू होती है, जब उन पर भूमि अधिग्रहण से जुड़े आरोप लगे और उन्हें तत्कालीन मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की कैबिनेट से इस्तीफ़ा देना पड़ा। खडसे ने हमेशा माना कि उन्हें फडणवीस गुट ने जानबूझकर निशाना बनाया — राजस्व मंत्री पद से हटाकर पार्टी में हाशिए पर धकेला गया। द हिंदू के अनुसार, खडसे ने दिल्ली मुलाक़ात के बावजूद पवार के साथ रहने का फ़ैसला किया — और इसके पीछे यह पुरानी कड़वाहट एक बड़ा कारण मानी जा रही है।
सियासी गलियारों में फुसफुसाहट है कि फडणवीस आज भी BJP के महाराष्ट्र में सबसे प्रभावशाली चेहरे हैं, और खडसे को डर है कि लौटने पर भी उन्हें वही हाशिया मिलेगा — कोई सम्मानजनक पद नहीं, सिर्फ़ नाम का 'घर वापसी' टैग। एक नेता जिसने कभी विपक्ष के नेता का पद संभाला हो, उसे सिर्फ़ 'वापसी' की फ़ोटो-ऑप के लिए नहीं बुलाया जा सकता — और खडसे यह बख़ूबी समझते हैं।
पॉलिटिकल पल्स
ट्रेड हलकों और महाराष्ट्र के राजनीतिक विश्लेषकों के बीच एक और कहानी घूम रही है — कि शरद पवार ने खडसे को सिर्फ़ भावनात्मक सहारा नहीं, बल्कि कुछ ठोस सियासी आश्वासन दिया है। अटकलें हैं कि आगामी स्थानीय निकाय चुनावों में खडसे को उत्तर महाराष्ट्र की कमान सौंपी जा सकती है — और शायद विधान परिषद की सीट भी। (यह इंडस्ट्री चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
पवार की गणित साफ़ है: खडसे को अपने पास रखना सिर्फ़ एक नेता को बचाना नहीं, बल्कि BJP के ओबीसी वोट बैंक में सीधी सेंध लगाना है। उत्तर महाराष्ट्र में लेवा-पाटीदार समुदाय का वोट एक ब्लॉक की तरह चलता है, और खडसे उसकी चाबी हैं। जब तक खडसे पवार खेमे में हैं, BJP का वह दरवाज़ा बंद है।
BJP का उत्तर महाराष्ट्र संकट
आने वाले दिनों में यह समीकरण किस ओर मुड़ेगा — इंडिया हेराल्ड का सटीक पॉलिटिकल रीड यही है कि BJP के लिए यह सिर्फ़ एक नेता का 'ना' नहीं है, बल्कि एक पूरे क्षेत्रीय जनाधार के खिसकने का संकेत है। अमित शाह ने ख़ुद पहल की — यह दिखाता है कि पार्टी को अंदर से पता है कि उत्तर महाराष्ट्र में ज़मीन खिसक रही है। खडसे के बिना वहाँ का ओबीसी कार्ड खेलना BJP के लिए बेहद मुश्किल होगा।
अगर खडसे अडिग रहते हैं — और फ़िलहाल वे दिख रहे हैं — तो BJP को उत्तर महाराष्ट्र में कोई नया ओबीसी चेहरा खड़ा करना होगा, जो रातोंरात संभव नहीं। दूसरी तरफ़, शरद पवार ने एक चतुर दांव खेला है: खडसे को रोककर उन्होंने न सिर्फ़ BJP को कमज़ोर किया, बल्कि अपनी पार्टी एनसीपी (एसपी) के भीतर यह संदेश भी दिया कि जो उनके साथ है, उसे सम्मान और भूमिका दोनों मिलेंगे।
फडणवीस के लिए यह एक और सिरदर्द है। वे महाराष्ट्र BJP के सबसे मज़बूत नेता हैं, लेकिन उनकी ताक़त ही कभी-कभी पार्टी के लिए समस्या बन जाती है — जब खडसे जैसे दिग्गज सिर्फ़ इसलिए लौटने से इनकार करें क्योंकि फडणवीस वहाँ हैं, तो यह आंतरिक ढाँचे पर सवाल खड़ा करता है।
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आख़िरी बात यह — राजनीति में 'ना' हमेशा 'ना' नहीं होती। लेकिन खडसे की 'ना' में एक पुराना दर्द है, एक ज़िद है, और शायद एक हिसाब भी जो अभी बाक़ी है। सवाल यह नहीं कि खडसे लौटेंगे या नहीं — सवाल यह है कि BJP अपनी ही बनाई खाई को कैसे पाटेगी, और शरद पवार इस मोहरे से अगला कौन सा दांव चलेंगे?
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मुख्य बातें
- अमित शाह ने ख़ुद एकनाथ खडसे को दिल्ली बुलाकर BJP में वापसी का प्रस्ताव दिया, जिसे खडसे ने ठुकरा दिया — द हिंदू।
- 2016 में फडणवीस सरकार में कैबिनेट से हटाए जाने की कड़वाहट खडसे के इनकार का प्रमुख कारण मानी जा रही है।
- खडसे उत्तर महाराष्ट्र में लेवा-पाटीदार और ओबीसी वोट बैंक की चाबी हैं — उनका पवार के साथ रहना BJP के लिए क्षेत्रीय चुनौती है।
- शरद पवार ने खडसे को रोककर BJP के ओबीसी विस्तार को रोका और अपनी पार्टी में 'वफ़ादारी = सम्मान' का संदेश दिया।
- BJP को उत्तर महाराष्ट्र में अब वैकल्पिक ओबीसी नेतृत्व खड़ा करने की चुनौती है, जो अल्पकाल में कठिन है।
आँकड़ों में
- एकनाथ खडसे को 2016 में फडणवीस कैबिनेट से राजस्व मंत्री पद से हटाया गया — यह घटना उनकी BJP से विदाई का टर्निंग पॉइंट बनी।
- खडसे उत्तर महाराष्ट्र के जलगाँव-नंदुरबार बेल्ट में ओबीसी/लेवा-पाटीदार जनाधार के सबसे बड़े जनप्रतिनिधि माने जाते हैं।
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: एनसीपी (एसपी) के वरिष्ठ ओबीसी नेता एकनाथ खडसे, गृह मंत्री अमित शाह, और एनसीपी (एसपी) अध्यक्ष शरद पवार — द हिंदू के अनुसार।
- क्या: अमित शाह ने खडसे को दिल्ली बुलाकर BJP में वापसी का प्रस्ताव दिया, जिसे खडसे ने ठुकरा दिया और शरद पवार के साथ बने रहने की घोषणा की — द हिंदू की रिपोर्ट।
- कब: 2026 में खडसे ने अपने दिल्ली दौरे और शाह की मुलाक़ात की पुष्टि की — द हिंदू।
- कहाँ: दिल्ली में अमित शाह से मुलाक़ात; प्रभाव क्षेत्र उत्तर महाराष्ट्र का जलगाँव-नंदुरबार बेल्ट — द हिंदू।
- क्यों: खडसे के अनुसार वे शरद पवार के साथ प्रतिबद्ध हैं; राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि देवेंद्र फडणवीस से पुरानी कड़वाहट और BJP में उनकी हाशिए पर रहने की स्मृति प्रमुख कारण है — द हिंदू।
- कैसे: खडसे ने ख़ुद दिल्ली दौरे को स्वीकार किया, कहा कि शाह ने सीधे प्रस्ताव रखा, लेकिन उन्होंने सार्वजनिक रूप से पवार के साथ बने रहने की बात कही — द हिंदू।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
एकनाथ खडसे ने अमित शाह का ऑफर क्यों ठुकराया?
द हिंदू के अनुसार, खडसे ने शरद पवार के साथ रहने का फ़ैसला किया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2016 में फडणवीस कैबिनेट से हटाए जाने की कड़वाहट और BJP में हाशिए पर रहने का अनुभव इसका प्रमुख कारण है।
एकनाथ खडसे BJP से कब और क्यों गए थे?
खडसे 2020 में BJP छोड़कर एनसीपी (शरद पवार गुट) में शामिल हुए थे। 2016 में भूमि अधिग्रहण विवाद के बाद फडणवीस सरकार में कैबिनेट से उनका इस्तीफ़ा और बाद में पार्टी में हाशिए पर जाना इसकी वजह बनी।
खडसे के पवार के साथ रहने से BJP को क्या नुक़सान होगा?
खडसे उत्तर महाराष्ट्र में लेवा-पाटीदार और ओबीसी जनाधार के सबसे बड़े चेहरे हैं। उनके बिना BJP का इस क्षेत्र में ओबीसी वोट बैंक पर दावा कमज़ोर होता है, ख़ासकर स्थानीय निकाय और विधानसभा चुनावों में।
शरद पवार ने खडसे को क्या आश्वासन दिया है?
अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है, लेकिन राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि पवार ने खडसे को उत्तर महाराष्ट्र में संगठनात्मक ज़िम्मेदारी और आगामी चुनावों में अहम भूमिका का भरोसा दिया हो सकता है।





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