मुख्यमंत्री मोहन यादव ने लाड़ली बहना योजना की 38वीं किस्त में 1.25 करोड़ महिलाओं के खातों में ₹1835 करोड़ भेजे। लेकिन यह महीना-दर-महीना ₹22,000 करोड़ सालाना का बोझ मध्य प्रदेश के खजाने को खोखला कर रहा है — और शिवराज की विरासत मोहन यादव की सबसे बड़ी राजनीतिक मजबूरी बन चुकी है।
हर महीने की 10 तारीख के आसपास मध्य प्रदेश की राजनीति में एक अजीब-सी हलचल मचती है। मुख्यमंत्री मोहन यादव मंच पर खड़े होकर बटन दबाते हैं, ₹1835 करोड़ एक झटके में 1.25 करोड़ महिलाओं के खातों में पहुँचते हैं, और भोपाल सचिवालय के वित्त विभाग में एक और महीने का हिसाब-किताब बैठाने की जद्दोजहद शुरू हो जाती है। लाड़ली बहना योजना की 38वीं किस्त जारी हो चुकी है — दैनिक जागरण और नईदुनिया दोनों ने इसकी पुष्टि की है। लेकिन इस 'सौगात' के पीछे छिपी असली कहानी कोई सौगात नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश के खजाने पर बढ़ता एक ऐसा बोझ है जिसे न उठाना संभव है, न उतारना।
ज़रा हिसाब लगाइए — ₹1835 करोड़ हर महीने। साल भर में यह आँकड़ा ₹22,000 करोड़ से ऊपर पहुँचता है। मध्य प्रदेश का कुल वार्षिक बजट लगभग ₹3.65 लाख करोड़ है, जिसमें से अकेली लाड़ली बहना योजना राज्य के कुल खर्च का लगभग 6 प्रतिशत खा जाती है। CAG और RBI के आँकड़ों के अनुसार राज्य का सार्वजनिक कर्ज़ ₹4 लाख करोड़ के पार जा चुका है — और हर 38 दिन में एक नई किस्त इस कर्ज़ के पहाड़ पर एक और पत्थर रख देती है।
सवाल यह नहीं कि योजना अच्छी है या बुरी — 1.25 करोड़ महिलाओं के घर में ₹1500 पहुँचना किसी के लिए भी बुरी बात नहीं। असली सवाल यह है: इस योजना को जिस शख्स ने डिज़ाइन किया, वह अब दिल्ली में केंद्रीय कृषि मंत्री हैं, और उनकी विरासत का बोझ उठा रहे हैं मोहन यादव — जिनके पास न इसे बंद करने की राजनीतिक ताकत है, न इसे चलाते रहने के लिए पर्याप्त पैसा।
शिवराज का मास्टरस्ट्रोक, मोहन यादव की मजबूरी
2023 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले शिवराज सिंह चौहान ने लाड़ली बहना योजना को ₹1000 प्रति माह से बढ़ाकर ₹1250 और फिर ₹1500 किया — हर बढ़ोतरी चुनावी कैलेंडर से जुड़ी थी। भाजपा ने मध्य प्रदेश में 163 सीटें जीतीं, और 'लाड़ली बहना' को इस जीत का सबसे बड़ा कारण माना गया। लेकिन चुनाव जीतने वाले शिवराज को दिल्ली भेज दिया गया, और मुख्यमंत्री बने मोहन यादव — जिन्हें विरासत में मिली एक ऐसी योजना जो हर महीने राज्य के खजाने से ₹1835 करोड़ माँगती है, बिना किसी बहस की गुंजाइश के।
नईदुनिया की रिपोर्ट के अनुसार, 38वीं किस्त में प्रत्येक पात्र महिला के खाते में ₹1500 भेजे गए हैं। यह राशि DBT के ज़रिए सीधे बैंक खातों में जाती है। सुनने में यह बेहद सरल है — लेकिन इसके पीछे की वित्तीय गणित कुछ और ही कहानी कहती है।
₹22,000 करोड़ सालाना — पैसा आ कहाँ से रहा है?
मध्य प्रदेश जैसे राज्य के लिए, जहाँ अपने कर राजस्व (own tax revenue) की स्थिति बिहार या झारखंड से बहुत बेहतर नहीं, ₹22,000 करोड़ सालाना का अतिरिक्त बोझ किसी छोटी बात नहीं। राज्य सरकार पहले ही केंद्रीय अनुदान और उधारी पर भारी निर्भर है। पिछले तीन वर्षों में राज्य का राजकोषीय घाटा लगातार FRBM की सीमा के करीब या उससे ऊपर रहा है। बुनियादी ढाँचे — सड़कें, अस्पताल, स्कूल — पर खर्च सिकुड़ रहा है क्योंकि बजट का बड़ा हिस्सा इस तरह की डायरेक्ट ट्रांसफर योजनाओं में बँध चुका है।
दैनिक जागरण ने अपनी रिपोर्ट में 38वीं किस्त को 'सौगात' बताया। लेकिन सौगात वह होती है जो जेब में अतिरिक्त पैसे से दी जाए — यह तो उधार लेकर बाँटा जा रहा तोहफा है। और उधार चुकाने वाली पीढ़ी वही महिलाएँ और उनके बच्चे होंगे जिन्हें आज ₹1500 मिल रहे हैं।
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में फुसफुसाहट है कि मोहन यादव की टीम ने कई बार अंदरूनी बैठकों में योजना की राशि को 'तर्कसंगत' बनाने (यानी घटाने) पर चर्चा की, लेकिन हर बार दिल्ली से — ख़ासकर शिवराज सिंह चौहान के करीबी हलकों से — साफ़ संदेश आया कि इस योजना को छूना राजनीतिक आत्महत्या होगी। ट्रेड हलकों में चर्चा यह भी है कि 2028 के लोकसभा चुनाव से पहले इस योजना को ₹2000 या ₹2500 तक बढ़ाने का दबाव और बढ़ सकता है — भले ही खजाना इसे बर्दाश्त न कर पाए। (यह सियासी गलियारों की चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
जनता की नब्ज़ यह है कि ग्रामीण मध्य प्रदेश में — ख़ासकर विंध्य और बुंदेलखंड के इलाकों में — यह ₹1500 महिलाओं के लिए महीने की सबसे भरोसेमंद आमदनी बन चुकी है। इसे बंद करने या घटाने की बात सोचना भी किसी सरकार के लिए चुनावी ज़हर है। यही शिवराज का असली मास्टरस्ट्रोक था — उन्होंने एक ऐसी चीज़ बना दी जिसे कोई भी उत्तराधिकारी हटा नहीं सकता, चाहे खजाना कितना भी खाली हो।
भविष्य का असली सवाल — कब तक?
इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यही है कि लाड़ली बहना योजना अब मध्य प्रदेश की राजनीतिक अर्थव्यवस्था का वह स्तंभ बन चुकी है जिसे गिराना किसी के बस में नहीं — लेकिन जिसका बोझ हर साल भारी होता जा रहा है। यह वही जाल है जो कई राज्यों ने बुना है — तमिलनाडु में मुफ़्त टीवी से लेकर दिल्ली में बिजली-पानी तक — लेकिन मध्य प्रदेश के मामले में अंतर यह है कि यहाँ की राजकोषीय क्षमता इस बोझ के अनुपात में कहीं नहीं ठहरती।
आने वाले दिनों में दो चीज़ें देखने लायक होंगी। पहला — क्या केंद्र सरकार किसी रूप में इस योजना का बोझ बाँटने को तैयार होती है, जैसा कि PM किसान सम्मान के साथ हुआ? दूसरा — 2028 के चुनाव से पहले क्या कांग्रेस इसी मॉडल को और बड़ी रकम के साथ अपनाकर भाजपा को उसी के हथियार से मात देने की कोशिश करेगी? दोनों ही सूरतों में, मध्य प्रदेश का खजाना और दबेगा।
38 किस्तें हो चुकीं। हर किस्त ने 1.25 करोड़ महिलाओं के चेहरे पर मुस्कान लाई — और वित्त विभाग के अधिकारियों के माथे पर एक और शिकन। जिस दिन 39वीं किस्त आएगी, यह सवाल और गहरा होगा: आख़िर कब तक एक राज्य उधार लेकर तोहफ़े बाँटता रहेगा — और जब खजाना सच में खाली होगा, तो इसकी कीमत कौन चुकाएगा?
इस रिपोर्ट में उल्लिखित आरोप व दावे नामित स्रोतों के हवाले से हैं और जब तक न्यायालय का निर्णय न हो, अप्रमाणित हैं; न्यायाधीन मामलों की रिपोर्टिंग बिना पूर्वाग्रह के की गई है।
इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।
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मुख्य बातें
- लाड़ली बहना योजना की 38वीं किस्त में ₹1835 करोड़, 1.25 करोड़ महिलाओं के खातों में भेजे गए — सालाना बोझ ₹22,000 करोड़ से अधिक (स्रोत: दैनिक जागरण, नईदुनिया)
- मध्य प्रदेश का सार्वजनिक कर्ज़ ₹4 लाख करोड़ के पार — अकेली यह योजना राज्य के कुल बजट का करीब 6% खपा रही है
- शिवराज सिंह चौहान ने 2023 चुनाव से पहले योजना डिज़ाइन की, भाजपा ने 163 सीटें जीतीं — लेकिन वित्तीय बोझ अब मुख्यमंत्री मोहन यादव पर है
- योजना बंद करना राजनीतिक रूप से असंभव — लेकिन जारी रखना राजकोषीय रूप से टिकाऊ नहीं, यही मध्य प्रदेश की सबसे बड़ी दुविधा है
आँकड़ों में
- ₹1835 करोड़ प्रति माह — लाड़ली बहना योजना की एक किस्त की लागत (स्रोत: दैनिक जागरण)
- 1.25 करोड़ — मध्य प्रदेश में लाड़ली बहना योजना की लाभार्थी महिलाओं की संख्या (स्रोत: नईदुनिया)
- ₹22,000 करोड़+ — योजना का अनुमानित वार्षिक व्यय
- ₹4 लाख करोड़+ — मध्य प्रदेश का कुल सार्वजनिक कर्ज़
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: मुख्यमंत्री मोहन यादव ने 1.25 करोड़ लाभार्थी महिलाओं के खातों में राशि भेजी (स्रोत: दैनिक जागरण)
- क्या: लाड़ली बहना योजना की 38वीं किस्त के तहत ₹1835 करोड़ की राशि जारी की गई, प्रति महिला ₹1500 (स्रोत: नईदुनिया)
- कब: जुलाई 2026 में 38वीं किस्त जारी हुई (स्रोत: नईदुनिया)
- कहाँ: मध्य प्रदेश की 1.25 करोड़ से अधिक पंजीकृत महिला लाभार्थियों के बैंक खातों में (स्रोत: दैनिक जागरण)
- क्यों: 2023 विधानसभा चुनाव से पहले शिवराज सिंह चौहान द्वारा शुरू की गई यह योजना भाजपा की चुनावी रणनीति का केंद्रबिंदु थी और अब इसे बंद करना राजनीतिक रूप से असंभव है (स्रोत: विश्लेषण)
- कैसे: डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) के ज़रिए सीधे महिलाओं के बैंक खातों में ₹1500 प्रति माह हस्तांतरित होते हैं (स्रोत: नईदुनिया)
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
लाड़ली बहना योजना की 38वीं किस्त में कितने रुपये मिले?
38वीं किस्त में प्रत्येक पात्र महिला को ₹1500 मिले, कुल ₹1835 करोड़ की राशि 1.25 करोड़ लाभार्थियों के खातों में DBT से भेजी गई (स्रोत: दैनिक जागरण, नईदुनिया)।
लाड़ली बहना योजना से मध्य प्रदेश पर कितना वित्तीय बोझ है?
₹1835 करोड़ प्रति माह यानी सालाना ₹22,000 करोड़ से अधिक — यह राज्य के कुल बजट (लगभग ₹3.65 लाख करोड़) का करीब 6% है।
क्या लाड़ली बहना योजना बंद हो सकती है?
राजनीतिक रूप से इसे बंद करना लगभग असंभव है — 1.25 करोड़ महिला लाभार्थी एक विशाल वोट बैंक हैं। किसी भी सरकार के लिए इसे छूना चुनावी आत्मघाती कदम माना जाता है।
शिवराज सिंह चौहान ने यह योजना क्यों शुरू की थी?
2023 विधानसभा चुनाव से पहले महिला वोटरों को सीधे आर्थिक लाभ देने की रणनीति के तहत — भाजपा ने उस चुनाव में 163 सीटें जीतीं और इस योजना को जीत का प्रमुख कारक माना गया।





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