वन नेशन, वन इलेक्शन पर गठित संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के मानसून सत्र में अपनी रिपोर्ट पेश करने की संभावना नहीं है। द हिंदू और द स्टेट्समैन की रिपोर्ट के अनुसार, NDA सहयोगियों की आंतरिक असहमति और विपक्ष की तीखी घेराबंदी ने इस प्रक्रिया को ठंडे बस्ते में डाल दिया है।

JPC की रिपोर्ट वन नेशन वन इलेक्शन पर मानसून सत्र में टलना तय लग रहा है — और यह महज़ एक तारीख़ का खिसकना नहीं, बल्कि मोदी सरकार के सबसे महत्वाकांक्षी संवैधानिक प्रयोग की नींव में दरार का संकेत है। द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, समिति अभी तक अपनी सिफ़ारिशों को अंतिम रूप नहीं दे पाई है और मानसून सत्र की समय-सीमा में रिपोर्ट पेश होने की गुंजाइश लगभग ख़त्म है।

सतह पर यह एक संसदीय प्रक्रिया का विलंब दिखता है। लेकिन ज़रा ग़ौर से देखें — यह देरी उसी समय आई है जब NDA गठबंधन की आंतरिक सेहत पर सवाल उठ रहे हैं। द स्टेट्समैन की रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि JPC के मानसून सत्र में रिपोर्ट देने की संभावना 'unlikely' यानी नगण्य है। सवाल यह है — किसने ब्रेक लगाया?

याद कीजिए, पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में बनी उच्चस्तरीय समिति ने 2024 में अपनी रिपोर्ट दी थी और एक साथ चुनाव का रोडमैप पेश किया था। उसके बाद विधेयक संसद में आया, JPC गठित हुई — सब कुछ तेज़ रफ़्तार से चला। लेकिन अब वह रफ़्तार अचानक थम गई है, जैसे किसी ने इंजन बंद कर दिया हो।

पॉलिटिकल पल्स

सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि असली अड़चन भाजपा के अपने सहयोगियों से आ रही है। TDP प्रमुख चंद्रबाबू नायडू और JDU के नीतीश कुमार — दोनों के लिए एक साथ चुनाव का मतलब है अपनी राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल कटवाना। नायडू ने 2024 में आंध्र प्रदेश में भारी जीत हासिल की है — वे अपनी पाँच साल की सरकार को लोकसभा चुनाव के साथ जोड़कर क्यों दाँव पर लगाएँगे? नीतीश कुमार का बिहार भी इसी तर्क से बँधा है। ट्रेड हलकों में चर्चा है कि JPC की बैठकों में इन दलों के सदस्यों ने सीधे विरोध तो नहीं किया, लेकिन हर बारीक मुद्दे पर इतने सवाल खड़े किए कि सहमति बनना लगभग असंभव हो गया।

(यह इंडस्ट्री चर्चा और राजनीतिक अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

और विपक्ष? कांग्रेस समेत INDIA गठबंधन के दलों ने शुरू से इस विधेयक को 'संघीय ढाँचे पर हमला' बताया है। JPC में विपक्षी सदस्यों ने विरोध-नोट दर्ज कराने की तैयारी शुरू कर दी है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीशों और संवैधानिक विशेषज्ञों ने भी सार्वजनिक रूप से सवाल उठाए हैं कि क्या अनुच्छेद 83 और 172 में संशोधन से संघीय ढाँचे की मूल भावना ही बदल जाएगी। द हिंदू की रिपोर्ट में इन संवैधानिक जटिलताओं को JPC के भीतर रिपोर्ट न बन पाने का एक प्रमुख कारण बताया गया है।

अब गणित की बात करें — और यहीं मामला सबसे दिलचस्प होता है। एक साथ चुनाव लागू करने के लिए संविधान संशोधन चाहिए, जिसके लिए दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत ज़रूरी है। लोकसभा में NDA के पास यह बहुमत किसी तरह जुट सकता है — लेकिन राज्यसभा में? वहाँ भाजपा गठबंधन अभी भी इस जादुई आँकड़े से दूर है। कम से कम आधे राज्यों की विधानसभाओं का अनुमोदन भी चाहिए — और जहाँ विपक्षी सरकारें हैं, वहाँ यह अनुमोदन मिलने का सवाल ही नहीं उठता।

इंडिया हेराल्ड का राजनीतिक पाठ यह है कि JPC रिपोर्ट का टलना कोई तकनीकी देरी नहीं, बल्कि यह NDA के भीतर के उस गहरे अंतर्विरोध का बाहर आना है जिसे अब तक 'गठबंधन धर्म' के पर्दे में छिपाया जा रहा था। भाजपा जानती है कि सहयोगियों को ज़बरदस्ती इस मुद्दे पर धकेलना 2029 से पहले गठबंधन में दरार ला सकता है — और 2024 के नतीजों ने साबित किया कि बिना TDP-JDU के सरकार बनाना संभव नहीं।

तो क्या 'वन नेशन, वन इलेक्शन' अब चुपचाप अलमारी में रख दिया जाएगा? ज़रूरी नहीं। भाजपा का इतिहास बताता है कि वह बड़े संवैधानिक दाँव — अनुच्छेद 370, तीन तलाक़, नागरिकता संशोधन — बिलकुल सही मौक़े पर उठाती है। अगर 2027-28 में राज्यसभा का गणित बदलता है और राज्य चुनावों में भाजपा की स्थिति मज़बूत होती है, तो यह मुद्दा फिर तेज़ी से सामने आ सकता है।

लेकिन फ़िलहाल हक़ीक़त यह है: 2029 तक एक साथ चुनाव का सपना व्यावहारिक रूप से खिसक रहा है। JPC रिपोर्ट का टलना उस खिसकन का पहला सार्वजनिक सबूत है। और सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि रिपोर्ट कब आएगी — सवाल यह है कि जब आएगी, तब तक क्या NDA में वह एकजुटता बची रहेगी जो इसे पारित करा सके?

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मुख्य बातें

  • JPC की 'वन नेशन, वन इलेक्शन' रिपोर्ट मानसून सत्र 2026 में आने की संभावना नहीं — द हिंदू और द स्टेट्समैन दोनों ने इसकी पुष्टि की है।
  • NDA सहयोगी TDP और JDU के लिए एक साथ चुनाव का मतलब अपनी राज्य सरकारों का कार्यकाल कटवाना है — यह उनके लिए राजनीतिक आत्मघात होगा।
  • संविधान संशोधन के लिए ज़रूरी दो-तिहाई बहुमत राज्यसभा में NDA के पास अभी नहीं है, और आधे राज्यों का अनुमोदन भी एक बड़ी बाधा है।
  • 2029 तक एक साथ चुनाव व्यावहारिक रूप से कठिन होते जा रहे हैं — JPC रिपोर्ट का टलना इसका पहला सार्वजनिक संकेत है।

आँकड़ों में

  • संविधान संशोधन के लिए दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत और कम से कम आधे राज्यों की विधानसभाओं का अनुमोदन ज़रूरी — NDA के पास राज्यसभा में यह बहुमत अभी नहीं है।
  • 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को बहुमत के लिए TDP और JDU पर निर्भर रहना पड़ा — दोनों सहयोगी एक साथ चुनाव से सबसे ज़्यादा प्रभावित होंगे।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: एक साथ चुनाव पर गठित संयुक्त संसदीय समिति (JPC), जिसकी अध्यक्षता भाजपा सांसद पीपी चौधरी कर रहे हैं।
  • क्या: JPC की रिपोर्ट मानसून सत्र 2026 में पेश होने की संभावना नहीं है — समिति के भीतर कई अहम मुद्दों पर सहमति नहीं बन पाई है।
  • कब: 2026 का मानसून सत्र — रिपोर्ट की कोई निश्चित तारीख़ तय नहीं हो सकी।
  • कहाँ: संसद, नई दिल्ली — JPC की बैठकें और विचार-विमर्श राजधानी में जारी हैं।
  • क्यों: NDA सहयोगियों TDP और JDU की आंतरिक आपत्तियाँ, विपक्षी दलों की कड़ी असहमति, और संवैधानिक संशोधन के लिए ज़रूरी दो-तिहाई बहुमत का गणित न बैठना — ये मूल कारण हैं।
  • कैसे: JPC के समक्ष राज्य विधानसभाओं के कार्यकाल काटने, राज्यपाल की शक्तियों और चुनाव आयोग की क्षमता जैसे जटिल संवैधानिक सवालों पर सदस्यों में गहरे मतभेद हैं, जिससे रिपोर्ट का मसौदा तैयार नहीं हो पा रहा।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

वन नेशन वन इलेक्शन क्या है?

यह एक प्रस्ताव है जिसके तहत लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए जाएँ। इसके लिए संविधान में कई संशोधन ज़रूरी हैं, जिनमें अनुच्छेद 83 और 172 शामिल हैं।

JPC रिपोर्ट मानसून सत्र में क्यों नहीं आ रही?

द हिंदू के अनुसार, JPC सदस्यों के बीच कई संवैधानिक मुद्दों पर सहमति नहीं बन पाई है। NDA सहयोगियों की आपत्तियाँ और विपक्ष का कड़ा विरोध भी प्रमुख कारण हैं।

क्या 2029 तक एक साथ चुनाव हो सकते हैं?

व्यावहारिक रूप से यह बहुत कठिन दिख रहा है। राज्यसभा में दो-तिहाई बहुमत, आधे राज्यों का अनुमोदन और सहयोगी दलों की सहमति — ये तीनों शर्तें एक साथ पूरी होना अभी तक संभव नहीं दिखता।

TDP और JDU इसका विरोध क्यों कर रहे हैं?

दोनों दलों ने अपने राज्यों (आंध्र प्रदेश और बिहार) में ताज़ा जनादेश हासिल किया है। एक साथ चुनाव का मतलब होगा उनकी विधानसभाओं का कार्यकाल कम करना, जो उनके लिए राजनीतिक रूप से नुक़सानदेह है।

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