साइबर ठगों ने अब 500 रुपये किराए वाले व्यक्तिगत 'म्यूल अकाउंट' छोड़कर शेल कंपनियों के करंट खातों का रास्ता अपनाया है — क्योंकि इनकी ट्रांज़ैक्शन लिमिट करोड़ों में होती है और बैंकों का AI फ्रॉड-डिटेक्शन सिस्टम कॉर्पोरेट लेनदेन को 'सामान्य' मानकर छोड़ देता है। टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार, इस रैकेट में चार आरोपी गिरफ्तार किए गए हैं।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: साइबर फ्रॉड रैकेट चलाने वाले चार आरोपी, जिन्हें पुलिस ने गिरफ्तार किया (टाइम्स ऑफ इंडिया)।
  • क्या: फर्ज़ी शेल कंपनियों के नाम पर करंट अकाउंट खोलकर साइबर ठगी की रकम को रूट करने का 'कॉर्पोरेट म्यूल रैकेट' पकड़ा गया (टाइम्स ऑफ इंडिया)।
  • कब: 2026 में पुलिस कार्रवाई के दौरान यह रैकेट उजागर हुआ (टाइम्स ऑफ इंडिया)।
  • कहाँ: भारत — शहर में पुलिस ने यह गिरोह पकड़ा (टाइम्स ऑफ इंडिया)।
  • क्यों: व्यक्तिगत म्यूल खातों पर AI-आधारित फ्रॉड डिटेक्शन सख्त होने के बाद ठगों ने कॉर्पोरेट करंट खातों का रुख किया, जहाँ ट्रांज़ैक्शन लिमिट और वॉल्यूम दोनों ज़्यादा हैं (टाइम्स ऑफ इंडिया और विश्लेषण)।
  • कैसे: फर्ज़ी कंपनी रजिस्ट्रेशन करवाकर, कागज़ी डायरेक्टर बनाकर बैंकों में करंट अकाउंट खोले गए और ठगी की रकम को कई खातों से रूट कर निकाला गया (टाइम्स ऑफ इंडिया)।

एक ज़माना था जब साइबर ठगों का पूरा कारोबार गाँव-देहात के किसी बेरोज़गार नौजवान के बचत खाते पर टिका होता था — 500 रुपये महीने का किराया, एक ATM कार्ड, और पासबुक। जामताड़ा से लेकर मेवात तक, यही 'म्यूल अकाउंट' साइबर अपराध की रीढ़ था। लेकिन अब खेल बदल गया है। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस ने एक 'कॉर्पोरेट म्यूल रैकेट' का भंडाफोड़ करते हुए चार आरोपियों को गिरफ्तार किया है — ये लोग फर्ज़ी शेल कंपनियों के करंट अकाउंट खोलकर करोड़ों रुपये की साइबर ठगी की रकम को ठिकाने लगा रहे थे।

यह गिरफ्तारी मामूली नहीं है। यह उस बड़े बदलाव का सबूत है जो भारत के साइबर अपराध तंत्र में चुपचाप हो चुका है — व्यक्तिगत 'म्यूल' खातों से कॉर्पोरेट करंट खातों की ओर शिफ्ट। और इस शिफ्ट के पीछे एक ठंडी, गणितीय वजह है।

क्यों छोड़े 500 रुपये वाले खाते?

भारतीय बैंकिंग प्रणाली में पिछले दो-तीन सालों में AI-आधारित फ्रॉड डिटेक्शन सिस्टम काफी सख्त हुए हैं। जब कोई व्यक्तिगत बचत खाता, जिसमें सामान्यतः 5-10 हज़ार रुपये महीने का लेनदेन होता है, अचानक लाखों रुपये प्राप्त करने लगता है — तो AI अलर्ट बजता है। खाता फ्रीज़ होता है, जाँच शुरू होती है। ठगों के लिए यह रास्ता अब जोखिम भरा हो गया।

इसके मुकाबले एक करंट अकाउंट की दुनिया देखिए: ट्रांज़ैक्शन लिमिट करोड़ों में, रोज़ाना दर्जनों ट्रांज़ैक्शन 'सामान्य', और बैंक का AI सिस्टम इसे बिज़नेस ऑपरेशन मानकर अनदेखा करता है। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट बताती है कि गिरफ्तार आरोपियों ने ठीक इसी कमज़ोरी का फायदा उठाया — फर्ज़ी कंपनियों के नाम पर करंट अकाउंट खुलवाए और ठगी की रकम को इन खातों से गुज़ारा।

शेल कंपनी कैसे बनती है — और कौन बनाता है?

यहाँ असली सवाल शुरू होता है। एक शेल कंपनी रजिस्टर करना भारत में आज भी हैरानी की हद तक आसान है। MCA (Ministry of Corporate Affairs) के पोर्टल पर कुछ हज़ार रुपये की फीस, एक-दो कागज़ी डायरेक्टर जिनके आधार और PAN कार्ड 'किराए' पर लिए गए हों — और कंपनी तैयार। लेकिन असली खेल यहाँ से शुरू होता है: इस कंपनी के नाम पर बैंक में करंट अकाउंट खुलवाना।

बैंक KYC (Know Your Customer) नियमों के तहत कंपनी का रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट, डायरेक्टरों की ID, ऑफिस एड्रेस प्रूफ, और कई बार CA (चार्टर्ड अकाउंटेंट) का सर्टिफिकेट माँगते हैं। सवाल सीधा है: क्या कोई CA बिना कंपनी की वास्तविकता जाँचे सर्टिफिकेट जारी कर रहा है? क्या बैंक शाखा का अधिकारी बिना फिज़िकल वेरिफिकेशन के खाता खोल रहा है? टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में गिरफ्तार चार आरोपियों का ज़िक्र है, लेकिन इस चेन में CA और बैंक अधिकारी कहाँ हैं — यह सवाल खुला है।

केस फाइल

पुलिस और साइबर क्राइम हलकों में इन दिनों एक चर्चा ज़ोरों पर है — कि 'कॉर्पोरेट म्यूल' नेटवर्क अब अकेले नहीं चलते। ट्रेड एनालिस्ट बताते हैं कि इन रैकेटों के पीछे 'CA ब्रोकर' की एक अलग परत काम करती है, जो फ्लैट फीस पर फर्ज़ी कंपनियों को 'कागज़ पर ज़िंदा' रखते हैं — बैलेंस शीट, GST रिटर्न, सब तैयार। इंडस्ट्री की बात यह है कि कुछ बैंक शाखाओं में 'ओपनिंग टारगेट' का दबाव इतना होता है कि करंट अकाउंट खोलने में KYC की सख्ती ढीली पड़ जाती है। यह अपुष्ट अटकलें ज़रूर हैं, लेकिन गिरफ्तारियों का पैटर्न इसी ओर इशारा करता है।

(यह इंडस्ट्री चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

AI को चकमा — कैसे?

बैंकों के फ्रॉड डिटेक्शन AI का मूल तर्क 'बिहेवियरल पैटर्न' पर टिका है। एक व्यक्तिगत खाते में अचानक बड़ी रकम आना 'विषमता' (anomaly) है — AI पकड़ता है। लेकिन एक कंपनी का करंट अकाउंट, जिसमें रोज़ाना 10-50 लाख रुपये का लेनदेन 'सामान्य व्यापार' की तरह दिखता है, AI की नज़र में 'ग्रीन ज़ोन' में रहता है। ठगों ने यही समझा: अगर रकम को कई शेल कंपनियों के करंट खातों में बाँटकर डाला जाए, तो कोई एक ट्रांज़ैक्शन इतना बड़ा नहीं दिखता कि अलर्ट ट्रिगर हो। यह 'स्मर्फिंग' तकनीक पहले भी मनी लॉन्ड्रिंग में इस्तेमाल होती रही है, लेकिन अब इसे साइबर ठगी के छोटे-मँझोले स्तर पर भी लागू किया जा रहा है।

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट से जो तस्वीर उभरती है, वह यही बताती है — यह अब 'जामताड़ा बॉय' वाला खेल नहीं रहा। यह संगठित, कॉर्पोरेट ढाँचे वाला अपराध है।

सिस्टम में छेद कहाँ-कहाँ?

इंडिया हेराल्ड का विश्लेषण बताता है कि यह रैकेट कम से कम चार स्तरों पर सिस्टम की नाकामी उजागर करता है:

पहला — कंपनी रजिस्ट्रेशन: MCA पोर्टल पर फर्ज़ी कंपनी बनाना आज भी चंद घंटों का काम है। डायरेक्टरों की वास्तविकता की कोई गहन जाँच नहीं होती।

दूसरा — CA सर्टिफिकेशन: चार्टर्ड अकाउंटेंट का सर्टिफिकेट बैंकों के लिए 'ट्रस्ट सील' का काम करता है। अगर CA ने मंज़ूरी दी है, तो बैंक अक्सर आगे की जाँच नहीं करता। लेकिन ICAI (Institute of Chartered Accountants of India) के पास ऐसे CAs के खिलाफ कार्रवाई की कितनी शिकायतें आई हैं और कितनों पर कार्रवाई हुई — यह आँकड़ा सार्वजनिक रूप से पारदर्शी नहीं है।

तीसरा — बैंक KYC: RBI के दिशानिर्देशों के बावजूद, करंट अकाउंट खोलते वक्त फिज़िकल वेरिफिकेशन कई बार कागज़ी खानापूर्ति बनकर रह जाती है। बैंक शाखा अधिकारी पर 'अकाउंट ओपनिंग टारगेट' का दबाव अलग।

चौथा — AI फ्रॉड डिटेक्शन: मौजूदा AI मॉडल व्यक्तिगत खाता-केंद्रित हैं। कॉर्पोरेट खातों के लिए अलग से 'बिज़नेस-बिहेवियर बेसलाइन' बनाने की ज़रूरत है, जो अभी ज़्यादातर बैंकों में नहीं है।

आगे क्या?

चार गिरफ्तारियाँ हुई हैं, लेकिन असली चेन बहुत लंबी है। अगर जाँच एजेंसियाँ गंभीर हैं, तो अगला कदम उन CAs और बैंक अधिकारियों तक पहुँचना होगा जिन्होंने इन शेल कंपनियों को 'कागज़ पर वैध' बनाया। हाल ही में ऐसे कई मामलों में सिस्टम की मिलीभगत का सवाल उठा है — और यह मामला भी उसी कड़ी में है।

RBI को भी अपने KYC फ्रेमवर्क में कॉर्पोरेट खातों के लिए अलग 'रिस्क टायर' बनाने पर विचार करना होगा। जब तक एक नई बनी कंपनी का करंट अकाउंट उसी AI लेंस से देखा जाएगा जिससे टाटा और रिलायंस का, तब तक यह छेद खुला रहेगा।

MCA की तरफ से कंपनी रजिस्ट्रेशन के वक्त डायरेक्टरों का लाइव वेरिफिकेशन (वीडियो KYC जैसा) अगर अनिवार्य हो, तो फर्ज़ी कंपनियों की संख्या पर रोक लग सकती है। लेकिन 'ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस' के नारे और 'फ्रॉड प्रिवेंशन' की ज़रूरत के बीच सरकार किस तरफ झुकती है — यह देखना बाकी है।

यह कहानी चार लोगों की गिरफ्तारी की नहीं है। यह उस सिस्टम की कहानी है जहाँ एक ठग कंपनी बनाता है, एक CA उसे सर्टिफाई करता है, एक बैंक अधिकारी खाता खोलता है, और एक AI उसे 'सामान्य' मानकर छोड़ देता है। जब तक यह पूरी चेन नहीं टूटती, गिरफ्तारियाँ सिर्फ सुर्खियाँ बनेंगी — समस्या नहीं मिटेगी।

आखिर कितने और करोड़ AI की 'ग्रीन ज़ोन' वाली नींद में बहने चाहिए, इससे पहले कि सिस्टम जागे?

आँकड़ों में

  • व्यक्तिगत बचत खाते में सामान्य लेनदेन 5-10 हज़ार रुपये मासिक बनाम करंट अकाउंट में करोड़ों — यही ट्रांज़ैक्शन लिमिट का अंतर ठगों को कॉर्पोरेट मार्ग पर ले गया।
  • कॉर्पोरेट म्यूल रैकेट में 4 आरोपी गिरफ्तार — लेकिन शेल कंपनी बनाने से लेकर खाता खोलने तक की चेन में CA और बैंक अधिकारी की भूमिका पर सवाल (टाइम्स ऑफ इंडिया)।

मुख्य बातें

  • साइबर ठगों ने व्यक्तिगत 'म्यूल अकाउंट' छोड़कर शेल कंपनियों के करंट खातों का रास्ता अपनाया है — ट्रांज़ैक्शन लिमिट और AI से बचाव दोनों वजहें हैं (टाइम्स ऑफ इंडिया)।
  • करंट अकाउंट खोलने के लिए फर्ज़ी कंपनी रजिस्ट्रेशन, किराए के डायरेक्टर और CA सर्टिफिकेट की पूरी चेन काम करती है।
  • बैंकों का AI फ्रॉड डिटेक्शन सिस्टम कॉर्पोरेट लेनदेन को 'सामान्य बिज़नेस' मानकर अनदेखा करता है — यही सबसे बड़ा छेद है।
  • गिरफ्तारी चार आरोपियों की हुई है, लेकिन CA और बैंक अधिकारियों की भूमिका की जाँच अभी बाकी है।
  • MCA पोर्टल पर कंपनी रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया में डायरेक्टरों के लाइव वेरिफिकेशन की कमी फर्ज़ी कंपनियों को आसान बनाती है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

कॉर्पोरेट म्यूल रैकेट क्या है?

इसमें साइबर ठग फर्ज़ी शेल कंपनियों के नाम पर बैंकों में करंट अकाउंट खुलवाते हैं और ठगी की रकम को इन खातों से गुज़ारकर निकालते हैं। करंट अकाउंट की ज़्यादा ट्रांज़ैक्शन लिमिट और बैंक AI की कमज़ोरी इसे संभव बनाती है (टाइम्स ऑफ इंडिया)।

ठग AI फ्रॉड डिटेक्शन को कैसे चकमा देते हैं?

बैंकों का AI व्यक्तिगत खातों में असामान्य लेनदेन पकड़ता है, लेकिन कॉर्पोरेट करंट अकाउंट में बड़े और बार-बार के लेनदेन को 'सामान्य बिज़नेस' मानता है। ठग रकम को कई शेल कंपनियों में बाँटकर 'स्मर्फिंग' करते हैं ताकि कोई एक ट्रांज़ैक्शन अलर्ट ट्रिगर न करे।

शेल कंपनी और म्यूल अकाउंट में क्या फर्क है?

म्यूल अकाउंट किसी व्यक्ति का बचत खाता होता है जो किराए पर दिया जाता है, जबकि शेल कंपनी एक फर्ज़ी कॉर्पोरेट इकाई होती है जिसके नाम पर करंट अकाउंट खोला जाता है — ट्रांज़ैक्शन लिमिट और AI से बचाव दोनों में यह कहीं ज़्यादा प्रभावी है।

इस रैकेट में CA और बैंक अधिकारी की क्या भूमिका हो सकती है?

फर्ज़ी कंपनी के नाम पर करंट अकाउंट खोलने के लिए CA सर्टिफिकेट और बैंक KYC अनिवार्य है। बिना इनकी मिलीभगत या लापरवाही के यह प्रक्रिया पूरी होना बेहद कठिन है — हालाँकि यह अभी जाँच का विषय है।

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