हापुड़ में गंगा एक्सप्रेसवे की सर्विस रोड उद्घाटन के महज़ दो महीने बाद पहली बारिश में धंस गई। नवभारत टाइम्स के अनुसार इसी तर्ज़ पर दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे पर भी बारिश ने पोल खोली और इंजीनियर-प्रोजेक्ट मैनेजर सस्पेंड हुए। यह यूपी के इन्फ्रास्ट्रक्चर मॉडल पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।

बारह हज़ार करोड़ रुपये। यह रकम सुनते ही ज़ेहन में कोई मज़बूत, चमचमाती, दशकों तक टिकने वाली सड़क का चित्र बनता है। लेकिन हापुड़ में गंगा एक्सप्रेसवे की सर्विस रोड ने वो चित्र इस मानसून की पहली बारिश में ही धो डाला — शाब्दिक और भौतिक, दोनों अर्थों में। नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, उद्घाटन के महज़ दो महीने बाद सड़क का एक हिस्सा इस तरह धंस गया जैसे नीचे ज़मीन थी ही नहीं — सिर्फ दिखावे की परत थी।

और यह कोई इकलौती घटना नहीं। ठीक इसी दौरान नवभारत टाइम्स ने ही ख़बर दी कि 12,000 करोड़ के दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे की भी पहली बारिश ने पोल खोल दी, जिसके बाद इंजीनियर और प्रोजेक्ट मैनेजर को सस्पेंड किया गया। दो अलग-अलग एक्सप्रेसवे, एक ही बारिश, एक ही नतीजा — यह संयोग नहीं, सिस्टम है।

गंगा एक्सप्रेसवे को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने 'ड्रीम प्रोजेक्ट' के तौर पर प्रोजेक्ट किया था। मेरठ से प्रयागराज तक 594 किलोमीटर लंबा यह एक्सप्रेसवे यूपी के विकास मॉडल का पोस्टर बॉय था। चुनावी रैलियों में इसे 'नए उत्तर प्रदेश' की पहचान बताया गया। अब जब इसकी सर्विस रोड पहली बरसात में ही गिर गई, तो सवाल सड़क की क्वालिटी का नहीं रहा — सवाल उस पूरी ठेकेदारी व्यवस्था का है जिसने करोड़ों रुपये ख़र्च करके बारिश भी नहीं झेल सकने वाली सड़क बनाई।

पॉलिटिकल पल्स

सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यही है कि समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव इस मुद्दे को 2027 के विधानसभा चुनाव तक 'धीमी आँच पर पकाने' की रणनीति बना रहे हैं। कर्नाटक में कांग्रेस ने '40% कमीशन' का नारा बीजेपी के ख़िलाफ़ सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया था — ट्रेड हलकों में चर्चा है कि एसपी की अंदरूनी टीम यूपी के लिए भी ठीक ऐसा ही 'कमीशन कथा' तैयार कर रही है, जहाँ गंगा एक्सप्रेसवे सबसे दमदार एक्ज़िबिट-A बनेगा।

(यह इंडस्ट्री और सियासी चर्चा पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

और सच कहें तो ज़मीन तैयार है। यूपी में पिछले कुछ वर्षों में एक के बाद एक इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट — बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे से लेकर अयोध्या की सड़कों तक — पर निर्माण गुणवत्ता के सवाल उठते रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 2024 में अयोध्या राम मंदिर के आसपास की नई सड़कों पर भी बारिश में गड्ढे बने थे। एक पैटर्न है जो अब अनदेखा करना मुश्किल है: भव्य उद्घाटन, फ़ोटो-ऑप, और फिर पहले मानसून में 'स्ट्रेस टेस्ट' फ़ेल।

दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे पर कम से कम सस्पेंशन की कार्रवाई हुई। लेकिन गंगा एक्सप्रेसवे पर अभी तक किसी ठेकेदार या अधिकारी के ख़िलाफ़ ठोस कार्रवाई की ख़बर सार्वजनिक नहीं हुई है। जब तक ठेकेदार जवाबदेही की यह अनुपस्थिति बनी रहेगी, हर नया एक्सप्रेसवे 'अगली बारिश का इंतज़ार' बनकर रह जाएगा।

इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि असली ख़तरा योगी सरकार के लिए सड़क का धंसना नहीं — बल्कि उस 'विकास की कहानी' का धंसना है जिसके सहारे 2027 का चुनाव लड़ा जाना था। जब आपका सबसे बड़ा प्रोजेक्ट ही आपके ख़िलाफ़ सबूत बन जाए, तो विपक्ष को अलग से मुद्दा ढूँढने की ज़रूरत नहीं रहती — सड़क ख़ुद बोलती है।

आने वाले हफ़्तों में देखने लायक़ यह होगा कि UPEIDA (उत्तर प्रदेश एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण) ठेकेदारों के ख़िलाफ़ ब्लैकलिस्टिंग या दंडात्मक कार्रवाई करता है या बात जाँच समितियों और रिपोर्टों के ढेर में दब जाती है। अगर कार्रवाई हुई, तो सरकार 'ज़ीरो टॉलरेंस' का दावा कर सकती है। अगर नहीं हुई, तो अखिलेश यादव के हाथ में 2027 का सबसे तैयार हथियार होगा — एक धंसी सड़क की तस्वीर और एक सवाल: "12,000 करोड़ गए कहाँ?"

और यह सवाल सिर्फ यूपी का नहीं है। मुंबई से लेकर बेंगलुरु तक, भारत का हर बड़ा शहर मानसून में अपने इन्फ्रास्ट्रक्चर का 'असली ऑडिट' देखता है। लेकिन जब एक एक्सप्रेसवे — जो ग्रीनफ़ील्ड है, नया बना है, जिस पर पुरानी सड़कों वाला 'मेंटेनेंस गैप' का बहाना भी नहीं चलता — पहली बारिश में ही धंस जाए, तो यह बहाने की नहीं, जवाब की स्थिति है।

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12,000 करोड़ की सड़क दो महीने भी नहीं टिकी — और अभी तक किसी की ज़िम्मेदारी तय नहीं हुई। पाठक, अगली बार जब कोई नेता फ़ीता काटे, तो एक ही सवाल पूछिएगा: "पहली बारिश तक गारंटी है?"

मुख्य बातें

  • गंगा एक्सप्रेसवे की सर्विस रोड हापुड़ में उद्घाटन के दो महीने बाद पहली बारिश में धंसी — 12,000 करोड़ के प्रोजेक्ट पर गंभीर सवाल।
  • दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे पर भी बारिश में वही हाल, इंजीनियर और प्रोजेक्ट मैनेजर सस्पेंड — नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार।
  • ठेकेदार जवाबदेही का अभाव एक सिस्टमिक समस्या बन चुकी है — ब्लैकलिस्टिंग या दंडात्मक कार्रवाई के बिना यह चक्र नहीं टूटेगा।
  • समाजवादी पार्टी इसे 2027 चुनाव के लिए 'कमीशन कथा' के रूप में प्रोजेक्ट करने की तैयारी कर रही है — सियासी हलकों में चर्चा।

आँकड़ों में

  • गंगा एक्सप्रेसवे: 594 किमी लंबा, ₹12,000+ करोड़ की लागत — सर्विस रोड उद्घाटन के 2 महीने में ही धंसी।
  • दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे: ₹12,000 करोड़ की लागत, पहली बारिश में क्षति, इंजीनियर-प्रोजेक्ट मैनेजर सस्पेंड — नवभारत टाइम्स।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: गंगा एक्सप्रेसवे के ठेकेदार और उत्तर प्रदेश एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण (UPEIDA), नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार।
  • क्या: हापुड़ में गंगा एक्सप्रेसवे की सर्विस रोड पहली बारिश में धंस गई, उद्घाटन के सिर्फ दो महीने बाद।
  • कब: जुलाई 2026, मानसून की पहली बारिश के दौरान।
  • कहाँ: हापुड़ ज़िला, उत्तर प्रदेश — गंगा एक्सप्रेसवे का हिस्सा।
  • क्यों: निर्माण गुणवत्ता में गंभीर कमी और ठेकेदारी प्रणाली में जवाबदेही के अभाव को प्रमुख कारण माना जा रहा है।
  • कैसे: बारिश के पानी ने सड़क की सतह और नींव को इस तरह काटा कि सर्विस रोड का एक हिस्सा धंस गया, जो निर्माण सामग्री और कंपैक्शन में भारी खामी की ओर इशारा करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

गंगा एक्सप्रेसवे की सर्विस रोड कहाँ और कब धंसी?

हापुड़ ज़िले में जुलाई 2026 में, उद्घाटन के महज़ दो महीने बाद, मानसून की पहली बारिश में सर्विस रोड का एक हिस्सा धंस गया।

क्या दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे पर भी ऐसा हुआ?

हाँ, नवभारत टाइम्स के अनुसार दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे पर भी पहली बारिश ने नुकसान किया, जिसके बाद इंजीनियर और प्रोजेक्ट मैनेजर को सस्पेंड किया गया।

गंगा एक्सप्रेसवे की कुल लागत कितनी है?

गंगा एक्सप्रेसवे 594 किमी लंबा है और इसकी अनुमानित लागत ₹12,000 करोड़ से अधिक बताई जाती है।

क्या ठेकेदारों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई हुई है?

गंगा एक्सप्रेसवे पर अभी तक ठेकेदारों के ख़िलाफ़ ब्लैकलिस्टिंग या दंडात्मक कार्रवाई की कोई सार्वजनिक ख़बर नहीं है, जबकि दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे पर अधिकारी सस्पेंड किए गए।

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