47 लाख बिजली कनेक्शनों का लोड रात के अँधेरे में बिना उपभोक्ता की सहमति के बढ़ा दिया गया, जिनमें लगभग 50% स्मार्ट मीटर वाले हैं। लाइव हिंदुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार बढ़ा हुआ लोड सीधे फिक्स्ड चार्ज बढ़ाता है, यानी बिजली कम जलाओ तो भी बिल ज़्यादा आएगा।

सोचिए — आप सो रहे हैं, घर में सिर्फ़ पंखा चल रहा है, और इसी बीच आपकी बिजली कंपनी ने चुपचाप आपके कनेक्शन का लोड बढ़ा दिया। न कोई फ़ोन आया, न कोई नोटिस, न कोई सहमति। सुबह उठकर आपको पता भी नहीं चलेगा — लेकिन अगले महीने का बिल ज़रूर बता देगा कि कुछ बदला है। लाइव हिंदुस्तान की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक़ ठीक यही हुआ है — 47 लाख बिजली कनेक्शनों के साथ, और इनमें से क़रीब आधे स्मार्ट मीटर वाले उपभोक्ता हैं।

यह कोई तकनीकी गड़बड़ी नहीं है। यह एक सिस्टम है जो डिज़ाइन से ही ऐसा काम करता है। स्मार्ट मीटर की ख़ासियत यही बताई गई थी कि सब कुछ रिमोट से हो सकता है — रीचार्ज, रीडिंग, कनेक्शन काटना। लेकिन किसी ने नहीं कहा था कि इसी 'रिमोट' तकनीक से डिस्कॉम बिना पूछे आपका सैंक्शन्ड लोड भी बढ़ा देगी।

अब यहाँ वह पेच समझिए जो बिजली विभाग कभी साफ़ नहीं बताता। आपके बिजली बिल में दो हिस्से होते हैं — एक यूनिट चार्ज (जितनी बिजली जलाई, उतना), और दूसरा फिक्स्ड चार्ज या डिमांड चार्ज, जो आपके सैंक्शन्ड लोड पर तय होता है। अगर आपका लोड 1 किलोवॉट से 2 किलोवॉट कर दिया गया, तो आपका फिक्स्ड चार्ज दोगुना हो सकता है — चाहे आपने एक भी अतिरिक्त बल्ब न जलाया हो। ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार यह फिक्स्ड चार्ज सालाना हज़ारों रुपये का अंतर पैदा कर सकता है, ख़ासकर ग्रामीण और निम्न-मध्यवर्गीय उपभोक्ताओं के लिए।

सवाल यह है कि डिस्कॉम ने ऐसा किया क्यों? जवाब कंपनियों के वित्तीय ढाँचे में छिपा है। देश भर की अधिकांश बिजली वितरण कंपनियाँ घाटे में चल रही हैं — केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय की रिपोर्टों के मुताबिक़ डिस्कॉम का कुल बक़ाया 6 लाख करोड़ रुपये से ऊपर पहुँच चुका है। बिजली चोरी रोकना और राजस्व बढ़ाना — यही दो काम स्मार्ट मीटर से होने थे। लेकिन बिजली चोरी रोकना मुश्किल काम है, राजस्व बढ़ाना आसान — बस लोड बढ़ाओ, फिक्स्ड चार्ज अपने आप बढ़ जाएगा।

और यह 'आसान रास्ता' इसलिए संभव हुआ क्योंकि स्मार्ट मीटर ने डिस्कॉम को वह ताक़त दे दी जो पहले कभी नहीं थी — रिमोट कंट्रोल। पुराने मीटर में लोड बदलने के लिए लाइनमैन आता, उपभोक्ता से फ़ॉर्म भरवाता, प्रक्रिया होती। अब एक क्लिक से सर्वर से सब बदल जाता है — कोई साक्षी नहीं, कोई दस्तावेज़ नहीं, कोई सूचना नहीं। लाइव हिंदुस्तान की रिपोर्ट बताती है कि यह बदलाव देर रात किए गए, जब शिकायत करने वाला भी कोई जागता नहीं होगा।

पॉलिटिकल पल्स

सियासी गलियारों में इस मुद्दे की गूँज अभी धीमी है, लेकिन जो लोग ज़मीनी राजनीति समझते हैं वे जानते हैं कि बिजली बिल का मुद्दा चुनाव पलट सकता है। उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश — इन राज्यों में स्मार्ट मीटर सबसे तेज़ी से लग रहे हैं और यही राज्य अगले दो-तीन साल में चुनावी मैदान में होंगे। ट्रेड और ऊर्जा हलकों में चर्चा है कि विपक्षी दल इसे 'डिजिटल लूट' का नाम देकर ज़मीनी अभियान चला सकते हैं। जनता की नब्ज़ यह है कि जिस आदमी को महँगाई पहले से परेशान कर रही है, उसके लिए बिजली बिल में 200-300 रुपये का अतिरिक्त बोझ भी 'आख़िरी तिनका' बन सकता है।

(यह इंडस्ट्री और राजनीतिक हलकों की चर्चा तथा अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

क़ानूनी पेच — उपभोक्ता के पास हथियार क्या है?

भारतीय विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 43 और विद्युत नियामक आयोगों के आदेश स्पष्ट कहते हैं कि सैंक्शन्ड लोड में बदलाव उपभोक्ता की लिखित सहमति के बिना नहीं हो सकता। यानी क़ानूनी रूप से डिस्कॉम का यह क़दम सीधे-सीधे उपभोक्ता अधिकारों का उल्लंघन है। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत भी बिना सूचना सेवा शर्तें बदलना 'अनुचित व्यापार व्यवहार' की श्रेणी में आ सकता है।

लेकिन यहाँ असली समस्या शुरू होती है। उपभोक्ता फ़ोरम में शिकायत करने की प्रक्रिया इतनी लंबी और जटिल है कि 200-300 रुपये ज़्यादा बिल देने वाला आदमी कोर्ट-कचहरी का ख़र्चा और वक़्त नहीं लगाएगा। डिस्कॉम को यह बात पता है — और इसीलिए यह 'छोटी-छोटी लूट' का मॉडल काम करता है। 47 लाख कनेक्शनों में से अगर हर उपभोक्ता से सिर्फ़ 200 रुपये ज़्यादा महीने के वसूले जाएँ, तो यह सालाना 1,100 करोड़ रुपये से ज़्यादा का अतिरिक्त राजस्व है — बिना एक यूनिट ज़्यादा बिजली बेचे।

इंडिया हेराल्ड का राजनीतिक और नीतिगत आकलन यह है कि स्मार्ट मीटर की पूरी कहानी में सबसे बड़ा ख़तरा तकनीक नहीं, बल्कि जवाबदेही का ख़ालीपन है। जब तक स्मार्ट मीटर में हर बदलाव के लिए उपभोक्ता को रियल-टाइम SMS या ऐप नोटिफ़िकेशन अनिवार्य नहीं किया जाता, और जब तक बिना सहमति लोड बदलने पर डिस्कॉम पर स्वतः जुर्माने का प्रावधान नहीं होता — तब तक यह तकनीक उपभोक्ता के लिए 'सुविधा' कम और डिस्कॉम के लिए 'रिमोट कंट्रोल' ज़्यादा रहेगी।

आने वाले दिनों में यह मुद्दा कई दिशाओं में जा सकता है। राज्य विद्युत नियामक आयोगों पर दबाव बढ़ेगा कि वे स्मार्ट मीटर के ज़रिए किए जाने वाले हर बदलाव के लिए अनिवार्य सहमति का आदेश जारी करें। जन-हित याचिकाएँ हाई कोर्ट तक पहुँच सकती हैं — ख़ासकर अगर यह पैटर्न कई राज्यों में दोहराया गया। और चुनावी मौसम में कोई भी विपक्षी दल इस मुद्दे को छोड़ेगा नहीं — क्योंकि बिजली का बिल हर घर में आता है, हर वोटर को छूता है।

केंद्र सरकार की 'रिवैम्प्ड डिस्ट्रीब्यूशन सेक्टर स्कीम' (RDSS) के तहत 25 करोड़ स्मार्ट मीटर लगाने का लक्ष्य है। अगर 47 लाख पर यह खेल शुरू हो गया, तो 25 करोड़ पर क्या होगा — यह सवाल अब हर उपभोक्ता को अपने आप से पूछना चाहिए।

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मुख्य बातें

  • 47 लाख कनेक्शनों का सैंक्शन्ड लोड बिना सहमति बढ़ाया गया, जिनमें ~50% स्मार्ट मीटर वाले — लाइव हिंदुस्तान
  • बढ़ा लोड = बढ़ा फिक्स्ड चार्ज — एक यूनिट ज़्यादा बिजली न जलाने पर भी बिल बढ़ेगा
  • भारतीय विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 43 के तहत बिना लिखित सहमति लोड बदलना उल्लंघन है
  • 47 लाख उपभोक्ताओं से ₹200/माह अतिरिक्त = सालाना ~₹1,100 करोड़ अतिरिक्त राजस्व — बिना एक यूनिट ज़्यादा बिजली बेचे
  • केंद्र का लक्ष्य 25 करोड़ स्मार्ट मीटर — अगर जवाबदेही तंत्र नहीं बना तो यही पैटर्न राष्ट्रीय स्तर पर दोहराया जाएगा

आँकड़ों में

  • 47 लाख बिजली कनेक्शनों का लोड बिना सूचना बढ़ाया गया, ~50% स्मार्ट मीटर वाले — लाइव हिंदुस्तान
  • डिस्कॉम का कुल बक़ाया 6 लाख करोड़ रुपये से ऊपर — केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय की रिपोर्टें
  • RDSS के तहत 25 करोड़ स्मार्ट मीटर लगाने का केंद्र सरकार का लक्ष्य
  • 47 लाख × ₹200/माह अतिरिक्त = ~₹1,100 करोड़ सालाना अतिरिक्त राजस्व (अनुमानित)

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: 47 लाख घरेलू बिजली उपभोक्ता, जिनमें करीब 50% स्मार्ट मीटर धारक — लाइव हिंदुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार
  • क्या: बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) ने बिना उपभोक्ताओं की सहमति लिए उनके कनेक्शन का सैंक्शन्ड लोड बढ़ा दिया — लाइव हिंदुस्तान
  • कब: हाल ही में, देर रात के समय यह बदलाव किए गए — लाइव हिंदुस्तान
  • कहाँ: भारत में विभिन्न राज्यों में, विशेषकर जहाँ स्मार्ट मीटर लगाए गए हैं — लाइव हिंदुस्तान
  • क्यों: स्मार्ट मीटर की रिमोट तकनीक से डिस्कॉम सीधे लोड बदल सकती हैं; बढ़ा लोड = बढ़ा फिक्स्ड चार्ज = ज़्यादा राजस्व — विश्लेषकों का आकलन
  • कैसे: स्मार्ट मीटर के रिमोट कॉन्फ़िगरेशन फ़ीचर से बिना उपभोक्ता को सूचित किए सैंक्शन्ड लोड सर्वर से बदल दिया गया — लाइव हिंदुस्तान

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

स्मार्ट मीटर से बिना पूछे लोड बढ़ाना क्या क़ानूनी है?

नहीं। भारतीय विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 43 और राज्य विद्युत नियामक आयोगों के आदेशों के अनुसार सैंक्शन्ड लोड में बदलाव उपभोक्ता की लिखित सहमति के बिना नहीं हो सकता।

लोड बढ़ने से बिजली बिल पर क्या असर पड़ता है?

सैंक्शन्ड लोड बढ़ने से फिक्स्ड चार्ज या डिमांड चार्ज बढ़ जाता है — यह वह हिस्सा है जो बिजली की खपत से स्वतंत्र होता है। यानी कम बिजली जलाने पर भी बिल ज़्यादा आएगा।

अगर बिना सहमति लोड बढ़ाया गया तो उपभोक्ता क्या कर सकता है?

उपभोक्ता डिस्कॉम की शिकायत हेल्पलाइन, राज्य विद्युत नियामक आयोग में शिकायत, या उपभोक्ता फ़ोरम में केस दर्ज कर सकता है। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत यह 'अनुचित व्यापार व्यवहार' की श्रेणी में आ सकता है।

केंद्र सरकार की स्मार्ट मीटर योजना का लक्ष्य क्या है?

RDSS (रिवैम्प्ड डिस्ट्रीब्यूशन सेक्टर स्कीम) के तहत केंद्र सरकार 25 करोड़ स्मार्ट मीटर लगाने का लक्ष्य रखती है, जिसका उद्देश्य बिजली वितरण को डिजिटल और कुशल बनाना है।

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