TMC की बंगाल प्रदेश अध्यक्ष चंद्रिमा भट्टाचार्य ने ममता बनर्जी को झटका देते हुए इस्तीफा दिया और बागी खेमे से मुलाकात की। NDTV के अनुसार यह अभिषेक बनर्जी के बढ़ते वर्चस्व के खिलाफ 'ओल्ड गार्ड' की सबसे बड़ी बगावत है।
कल्पना कीजिए — वह शख्स जिसने आपकी पार्टी की नींव में अपनी ईंट लगाई, जिसने हर चुनाव में आपकी ढाल बनकर खड़ा रहा, एक दिन चुपचाप उठकर दरवाज़ा बंद कर दे और सामने वाले कमरे में बैठे बागियों के साथ चाय पीने लगे। तृणमूल कांग्रेस (TMC) में ठीक यही हुआ है। बंगाल प्रदेश अध्यक्ष चंद्रिमा भट्टाचार्य — ममता बनर्जी की उन गिनी-चुनी विश्वासपात्रों में से एक जिन पर 'दीदी' ने दशकों भरोसा किया — ने न सिर्फ अपना पद छोड़ दिया, बल्कि पार्टी के बागी खेमे से जा मिलीं। NDTV की रिपोर्ट के मुताबिक, यह ममता बनर्जी के लिए ताज़ा और शायद सबसे गहरा झटका है।
अब सवाल सिर्फ यह नहीं कि चंद्रिमा क्यों गईं। असली सवाल यह है कि वह गईं किसकी वजह से — और जवाब एक ही नाम पर आकर ठहरता है: अभिषेक बनर्जी।
ओल्ड गार्ड का सफाया — पैटर्न देखिए
चंद्रिमा भट्टाचार्य कोई साधारण पदाधिकारी नहीं थीं। वह बंगाल में TMC की संगठनात्मक रीढ़ मानी जाती थीं — ज़मीनी कार्यकर्ताओं से लेकर ज़िला अध्यक्षों तक उनकी पकड़ थी। लेकिन पिछले दो-तीन वर्षों में TMC के भीतर एक स्पष्ट पैटर्न बना है: जो भी नेता ममता की 'पुरानी टीम' का हिस्सा था और अभिषेक बनर्जी के बढ़ते दखल पर सवाल उठाता था, उसे या तो हाशिए पर धकेल दिया गया या उसने खुद किनारा कर लिया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, चंद्रिमा का यह कदम अचानक नहीं आया — पार्टी के संगठनात्मक फैसलों में अभिषेक गुट की बढ़ती दखलंदाज़ी से वे लंबे समय से खफ़ा थीं।
एक छोटा-सा आँकड़ा ग़ौर कीजिए: TMC के 2021 के विधानसभा चुनावों के बाद से पार्टी के कम-से-कम आठ वरिष्ठ नेता या तो बीजेपी में गए, या बागी बने, या चुपचाप किनारे हो गए। चंद्रिमा इस सूची में सबसे ताज़ा और सबसे करीबी नाम हैं।
शिवसेना-NCP का फॉर्मूला — बंगाल में रीपीट?
भारतीय राजनीति में पार्टियों के भीतर 'पारिवारिक उत्तराधिकार' का तख्तापलट कोई नई बात नहीं। महाराष्ट्र में शिवसेना को देखिए — उद्धव ठाकरे की पार्टी से एकनाथ शिंदे ने बहुमत विधायकों को तोड़ लिया। NCP में शरद पवार और अजित पवार के बीच का विभाजन तो अब राजनीतिक पाठ्यपुस्तक का हिस्सा बन चुका है। लेकिन TMC का मामला इन दोनों से सूक्ष्म रूप से अलग है — और इसीलिए ज़्यादा ख़तरनाक है।
शिंदे और अजित पवार ने बाहर से विद्रोह किया — वे पार्टी तोड़कर अलग गुट बनाकर गए। अभिषेक बनर्जी का रास्ता 'साइलेंट तख्तापलट' है — पार्टी का ढाँचा वही रहता है, झंडा वही रहता है, लेकिन भीतर से नियंत्रण बदल जाता है। ममता बनर्जी अभी भी TMC की सुप्रीमो हैं — कागज़ पर। लेकिन जब आपकी अपनी प्रदेश अध्यक्ष आपका साथ छोड़कर उन लोगों से मिलती है जो आपके भतीजे के खिलाफ बगावत कर रहे हैं, तो 'सुप्रीमो' शब्द की परिभाषा पर ही सवाल खड़ा हो जाता है।
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि चंद्रिमा का कदम अकेला नहीं है — कम-से-कम तीन-चार और वरिष्ठ नेता 'इंतज़ार में' बैठे हैं। ट्रेड सर्किल की चर्चा है कि अगर बागी गुट को कोई बड़ा राष्ट्रीय दल — पढ़ें बीजेपी — खुला सहारा देता है, तो TMC में 'शिंदे मॉडल' का बंगाली संस्करण बनते देर नहीं लगेगी। दूसरी तरफ, ममता के करीबियों का कहना है कि दीदी ने पहले भी ऐसे तूफान झेले हैं — शुवेंदु अधिकारी के जाने के बाद भी पार्टी 2021 में 213 सीटें लेकर आई थी।
(यह सियासी गलियारों की चर्चा और विश्लेषकों के अनुमान पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
लेकिन 2021 और 2026 में एक बुनियादी फ़र्क है — तब दुश्मन बाहर था, बीजेपी के रूप में। अब दुश्मन भीतर बैठा है, और वह खून का रिश्तेदार है। ममता के लिए अभिषेक से लड़ना शुवेंदु से लड़ने जैसा आसान नहीं — क्योंकि भतीजे को काटना अपनी ही विरासत पर कुल्हाड़ी मारना है।
ममता के पास विकल्प क्या बचे?
इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि ममता बनर्जी अब एक 'डेडलॉक' में फँसी हैं — जहाँ हर विकल्प की अपनी कीमत है। अगर वे अभिषेक पर लगाम कसती हैं, तो उनका अपना 'यूथ ब्रिगेड' और डायमंड हार्बर का पूरा नेटवर्क नाराज़ होता है। अगर नहीं कसतीं, तो चंद्रिमा जैसे और लोग जाते रहेंगे और एक दिन पार्टी का खोल तो ममता का होगा, लेकिन भीतर की मशीनरी पूरी तरह अभिषेक की। यह वही जाल है जिसमें शरद पवार फँसे — जब तक उन्हें अहसास हुआ कि पार्टी हाथ से निकल गई, NCP दो हिस्सों में बँट चुकी थी।
आने वाले हफ्तों में देखिए: क्या ममता कोई बड़ा संगठनात्मक फेरबदल करती हैं? क्या चंद्रिमा किसी दूसरी पार्टी में जाती हैं या बागी गुट एक अलग मंच बनाता है? और सबसे अहम — क्या बीजेपी इस दरार का फायदा उठाने के लिए कोई खुला कदम उठाती है? 2026 के नगरपालिका चुनाव करीब हैं और बंगाल में TMC की हर आंतरिक दरार बीजेपी के लिए एक खुला दरवाज़ा है।
एक बात तय है — ममता बनर्जी ने तीन दशकों में कांग्रेस से लड़कर, वामपंथ को उखाड़कर, अपने दम पर बंगाल जीता। लेकिन जिस पार्टी को उन्होंने अपने खून-पसीने से खड़ा किया, उसे बचाने की सबसे कठिन लड़ाई शायद अब उन्हें अपनों से ही लड़नी है। और जब अपनी ही फसल में आग लगे, तो बुझाने वाला आता कहाँ से है?
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मुख्य बातें
- TMC बंगाल प्रदेश अध्यक्ष चंद्रिमा भट्टाचार्य का इस्तीफा और बागियों से मुलाकात — ममता बनर्जी के लिए सबसे करीबी सहयोगी का जाना अब तक का सबसे गहरा झटका (NDTV)
- 2021 के बाद से TMC के कम-से-कम 8 वरिष्ठ नेता या तो पार्टी छोड़ चुके हैं या हाशिए पर हैं — पैटर्न अभिषेक बनर्जी के बढ़ते संगठनात्मक नियंत्रण की ओर इशारा करता है
- शिवसेना में शिंदे-उद्धव और NCP में शरद-अजित जैसे विभाजन से तुलना — लेकिन TMC का 'साइलेंट तख्तापलट' सूक्ष्म और ज़्यादा ख़तरनाक क्योंकि पार्टी टूटती नहीं, भीतर से बदलती है
- 2026 के नगरपालिका चुनावों से पहले TMC की हर दरार बीजेपी के लिए अवसर — आने वाले हफ्तों में ममता का जवाबी कदम निर्णायक होगा
आँकड़ों में
- TMC के 2021 विधानसभा चुनाव के बाद से कम-से-कम 8 वरिष्ठ नेता पार्टी छोड़ चुके या हाशिए पर गए — चंद्रिमा भट्टाचार्य सबसे ताज़ा और सबसे करीबी नाम (मीडिया रिपोर्ट्स)
- TMC ने 2021 में 213 सीटें जीतीं — लेकिन तब का बाहरी दुश्मन (बीजेपी) अब भीतरी संकट में बदल गया है
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: TMC बंगाल प्रदेश अध्यक्ष चंद्रिमा भट्टाचार्य — ममता बनर्जी की सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में से एक (NDTV)
- क्या: चंद्रिमा ने प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया और TMC के बागी नेताओं से मुलाकात की (NDTV)
- कब: जुलाई 2026 — TMC के लगातार आंतरिक कलह के बीच (NDTV)
- कहाँ: पश्चिम बंगाल — TMC का गृह राज्य और ममता का सत्ता केंद्र
- क्यों: अभिषेक बनर्जी के बढ़ते संगठनात्मक नियंत्रण और ओल्ड गार्ड की हाशिए पर धकेले जाने से बढ़ा असंतोष (NDTV, मीडिया रिपोर्ट्स)
- कैसे: चंद्रिमा ने पहले इस्तीफा दिया, फिर बागी गुट से मिलीं — जो पार्टी में अभिषेक के एकाधिकार के खिलाफ मोर्चा खोल चुका है (NDTV)
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
चंद्रिमा भट्टाचार्य ने TMC क्यों छोड़ी?
NDTV के अनुसार, चंद्रिमा भट्टाचार्य ने TMC बंगाल प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया और बागी नेताओं से मिलीं। मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि अभिषेक बनर्जी के बढ़ते संगठनात्मक वर्चस्व और ओल्ड गार्ड की अनदेखी से उनका असंतोष चरम पर पहुँच गया था।
क्या TMC में शिवसेना जैसा विभाजन हो सकता है?
विश्लेषकों के अनुसार TMC का मामला शिवसेना-NCP से अलग है — यहाँ खुला विभाजन नहीं, बल्कि 'साइलेंट तख्तापलट' हो रहा है जहाँ पार्टी का ढाँचा वही रहता है लेकिन नियंत्रण बदल जाता है। अगर बागी गुट को किसी राष्ट्रीय दल का सहारा मिला तो खुला विभाजन भी संभव है।
अभिषेक बनर्जी की TMC में क्या भूमिका है?
अभिषेक बनर्जी TMC की राष्ट्रीय महासचिव हैं और डायमंड हार्बर लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने पार्टी के संगठनात्मक ढाँचे पर अपनी पकड़ काफी मज़बूत कर ली है, जिससे कई वरिष्ठ नेता असंतुष्ट हैं।





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