पूर्णिया ज़िले में 807 बुजुर्गों — जिनमें कई 100 साल से ऊपर हैं — के आधार कार्ड बायोमेट्रिक विफलता के चलते लंबित हैं। उंगलियों के निशान घिस चुके हैं, आईरिस स्कैन काम नहीं करता, और बिना आधार के पेंशन, राशन सब बंद। लाइव हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार यह आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है।
सौ साल की उम्र पार कर चुके एक बुज़ुर्ग की उंगलियां किसी मशीन को क्या बताएंगी? पूर्णिया के एक आधार सेंटर पर बैठा ऑपरेटर उनकी सूखी, झुर्रियों से भरी उंगली बार-बार स्कैनर पर रखता है — मशीन हर बार कहती है: 'अमान्य'। यह कोई एक बुज़ुर्ग की कहानी नहीं है। लाइव हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार, पूर्णिया ज़िले में ऐसे 807 अति-वृद्ध नागरिकों के आधार कार्ड आवेदन लंबित पड़े हैं — सिर्फ़ इसलिए कि उनका शरीर उस डिजिटल कसौटी पर खरा नहीं उतर पाता जो सरकार ने तय की है।
बात साफ़ है: उम्र के साथ उंगलियों की रेखाएं (रिज पैटर्न) घिस जाती हैं — त्वचा पतली हो जाती है, नमी ख़त्म हो जाती है। 80, 90, 100 साल की उम्र में फिंगरप्रिंट स्कैनर के लिए पर्याप्त 'मिनूशिए पॉइंट्स' बचते ही नहीं। आईरिस स्कैन — जो विकल्प माना जाता है — वह भी मोतियाबिंद, कॉर्नियल ओपेसिटी और उम्र-जनित नेत्र रोगों के चलते अक्सर फेल हो जाता है। यानी UIDAI का पूरा बायोमेट्रिक ढांचा उन्हीं लोगों को बाहर कर रहा है जिन्हें सरकारी मदद की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है।
और यहां असली दर्द शुरू होता है। बिहार में वृद्धावस्था पेंशन, राशन कार्ड, आयुष्मान भारत — लगभग हर कल्याणकारी योजना में आधार अनिवार्य कर दिया गया है। UIDAI की अपनी गाइडलाइंस कहती हैं कि बायोमेट्रिक एक्सेप्शन हैंडलिंग (BEH) का प्रावधान है — यानी जहां फिंगरप्रिंट और आईरिस दोनों फेल हों, वहां 'ऑपरेटर असिस्टेड' या 'सुपरवाइज़र ओवरराइड' से एनरोलमेंट हो सकता है। लेकिन ज़मीन पर? पूर्णिया के आधार केंद्रों पर यह प्रक्रिया या तो ऑपरेटरों को पता ही नहीं, या फिर वे ज़िम्मेदारी लेने से बचते हैं। नतीजा: फाइलें अटकी रहती हैं, बुज़ुर्ग चक्कर काटते रहते हैं, और सिस्टम चुप रहता है।
पूर्णिया कोई अपवाद नहीं है — यह बिहार और पूरे हिंदी बेल्ट की एक बड़ी प्रणालीगत ख़ामी का आईना है। भारत की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार देश में 80 वर्ष से अधिक उम्र की आबादी तेज़ी से बढ़ रही है, और बायोमेट्रिक विफलता की दर उम्र के साथ सीधे अनुपात में बढ़ती है। सवाल यह है कि जब सरकार ने आधार को हर योजना की चाबी बना दिया, तो उन लोगों के लिए दरवाज़ा कहां है जिनके हाथ में यह चाबी फिट ही नहीं होती?
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में इस मसले पर एक अजीब चुप्पी है। बिहार में NDA सरकार 'डिजिटल गवर्नेंस' को उपलब्धि के रूप में पेश करती है, और विपक्ष भी आधार के मूल ढांचे पर सवाल उठाने से बचता है — क्योंकि UPA के दौर में इसकी नींव रखी गई थी। नतीजा: 807 बुज़ुर्ग एक ऐसे नो-मैन्स लैंड में फंसे हैं जहां कोई पार्टी उनकी लड़ाई लड़ने को तैयार नहीं। ज़िला प्रशासन की ओर से अब तक इस मामले पर कोई ठोस योजना या समयसीमा सार्वजनिक नहीं की गई है। (यह सियासी गलियारों की चर्चा और ज़मीनी रिपोर्टिंग पर आधारित विश्लेषण है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि यह मसला सिर्फ़ तकनीकी नहीं, गहरे तौर पर राजनीतिक है। 'डिजिटल इंडिया' का नैरेटिव इतना शक्तिशाली हो चुका है कि उसकी ख़ामियों पर उंगली उठाना राजनीतिक रूप से 'महंगा' माना जाता है। कोई भी पार्टी 'एंटी-टेक्नोलॉजी' नहीं दिखना चाहती — भले ही टेक्नोलॉजी किसी 100 साल के बुज़ुर्ग को उसके हक़ से बेदख़ल कर रही हो। यही वह बिंदु है जहां नीति-निर्माण की विफलता, चुनावी गणित और नौकरशाही की लापरवाही — तीनों मिलकर सबसे कमज़ोर इंसान को सबसे नीचे धकेल देते हैं।
आगे क्या होगा? अगर यह मामला मीडिया दबाव या न्यायिक हस्तक्षेप के बिना नहीं सुलझता — और पूर्णिया के ज़िला प्रशासन का रवैया देखते हुए यही संभावना दिखती है — तो यह पैटर्न पूरे बिहार और अन्य राज्यों में दोहराया जाएगा। UIDAI को या तो बायोमेट्रिक एक्सेप्शन प्रोटोकॉल को ज़मीन पर लागू करने का बाध्यकारी तंत्र बनाना होगा, या फिर अति-वृद्ध नागरिकों के लिए 'फेस-ऑथेंटिकेशन' या 'डॉक्यूमेंट-ओनली' जैसे वैकल्पिक रास्ते खोलने होंगे। जब तक ऐसा नहीं होता, हर ज़िले का 'पूर्णिया' बनना तय है।
एक देश जो चंद्रमा पर रॉकेट भेज सकता है, क्या वह अपने सबसे बुज़ुर्ग नागरिक की पहचान साबित करने का कोई रास्ता नहीं खोज सकता? यह सवाल सिर्फ़ 807 बुज़ुर्गों का नहीं है — यह उस हर इंसान का है जो एक दिन बूढ़ा होगा।
आरोप और दावे यहां नामित स्रोतों के हवाले से प्रस्तुत हैं और जब तक अदालत का फ़ैसला न हो, अप्रमाणित हैं; न्यायालय के अधीन मामलों को बिना पूर्वाग्रह प्रस्तुत किया गया है।
इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।
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मुख्य बातें
- पूर्णिया में 807 अति-वृद्ध नागरिकों के आधार आवेदन बायोमेट्रिक विफलता से लंबित हैं — लाइव हिन्दुस्तान की रिपोर्ट
- UIDAI में बायोमेट्रिक एक्सेप्शन हैंडलिंग (BEH) का प्रावधान है, लेकिन ज़मीन पर यह प्रभावी रूप से लागू नहीं हो रहा
- बिना आधार के वृद्धावस्था पेंशन, राशन और आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं का लाभ रुक जाता है
- 'डिजिटल इंडिया' नैरेटिव इतना प्रबल है कि कोई भी पार्टी — सत्ता या विपक्ष — बायोमेट्रिक ख़ामियों पर सवाल उठाने को तैयार नहीं
- UIDAI को अति-वृद्धों के लिए फेस-ऑथेंटिकेशन या डॉक्यूमेंट-ओनली जैसे विकल्प तत्काल लागू करने की ज़रूरत
आँकड़ों में
- पूर्णिया में 807 आधार आवेदन बायोमेट्रिक विफलता के कारण लंबित — लाइव हिन्दुस्तान
- 100 वर्ष से अधिक उम्र के कई आवेदक शामिल — लाइव हिन्दुस्तान
- बिहार में वृद्धावस्था पेंशन, राशन कार्ड, आयुष्मान भारत सहित अधिकांश कल्याणकारी योजनाओं में आधार अनिवार्य
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: पूर्णिया ज़िले के 807 अति-वृद्ध निवासी, जिनमें 100 वर्ष से अधिक उम्र के लोग शामिल हैं
- क्या: इनके आधार कार्ड आवेदन बायोमेट्रिक (फिंगरप्रिंट/आईरिस) विफलता के कारण लंबित पड़े हैं
- कब: 2026 में यह समस्या सामने आई, लाइव हिन्दुस्तान ने रिपोर्ट प्रकाशित की
- कहाँ: बिहार का पूर्णिया ज़िला
- क्यों: अत्यधिक उम्र के कारण उंगलियों के निशान घिस जाते हैं और आंखों की पुतली (आईरिस) भी स्कैन नहीं हो पाती, जिससे UIDAI का बायोमेट्रिक सिस्टम इन्हें रिजेक्ट कर देता है
- कैसे: आधार एनरोलमेंट में बायोमेट्रिक ऑथेंटिकेशन अनिवार्य है; जब फिंगरप्रिंट और आईरिस दोनों फेल होते हैं तो आवेदन अटक जाता है, और इसके लिए कोई वैकल्पिक तंत्र ज़मीन पर प्रभावी रूप से काम नहीं कर रहा
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
पूर्णिया में कितने बुजुर्गों का आधार कार्ड लंबित है?
लाइव हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार पूर्णिया ज़िले में 807 अति-वृद्ध नागरिकों के आधार कार्ड आवेदन बायोमेट्रिक विफलता के कारण लंबित हैं, जिनमें 100 वर्ष से अधिक उम्र के लोग भी शामिल हैं।
बुजुर्गों का आधार बायोमेट्रिक क्यों फेल हो जाता है?
अत्यधिक उम्र में उंगलियों की रेखाएं (रिज पैटर्न) घिस जाती हैं और त्वचा पतली हो जाती है, जिससे फिंगरप्रिंट स्कैनर काम नहीं करता। मोतियाबिंद और अन्य नेत्र रोगों के कारण आईरिस स्कैन भी विफल हो जाता है।
बिना आधार के बुजुर्गों को क्या नुकसान होता है?
बिहार में वृद्धावस्था पेंशन, राशन कार्ड और आयुष्मान भारत जैसी कल्याणकारी योजनाओं में आधार अनिवार्य है। बिना आधार के इन योजनाओं का लाभ मिलना बंद हो जाता है।
क्या बायोमेट्रिक फेल होने पर कोई विकल्प है?
UIDAI की गाइडलाइंस में बायोमेट्रिक एक्सेप्शन हैंडलिंग (BEH) का प्रावधान है, जिसमें सुपरवाइज़र ओवरराइड से एनरोलमेंट हो सकता है। लेकिन ज़मीन पर यह प्रक्रिया प्रभावी रूप से लागू नहीं हो रही।



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